Friday, June 26, 2026

उसके हिस्से आया बिना अपराध का अपराध

 “उसके हिस्से आया बिना अपराध का अपराध”


वह दोषी नहीं थी

पर दोष का सबसे भारी पत्थर

हमेशा उसी के कंधों पर रख दिया गया था।


उसने न कुछ तोड़ा था,

न किसी का विश्वास छलाया था,

बस इतना हुआ था कि

वह किसी के बनाए हुए “सही” के पैमाने में

फिट नहीं बैठी।


और यही उसकी सबसे बड़ी “गलती” बन गई।


वह जब चुप रहती थी,

तो लोग कहते “कुछ छुपा रही है।”

जब वह सच बोलती थी,

तो लोग कहते “बहुत बोलती है, ज़रूर दोष है इसमें।”


उसकी आँखों में जब थकान उतरती,

तो किसी ने यह नहीं पूछा कि क्यों,

सबने बस यह तय कर लिया

कि थकान भी अपराध का संकेत है।


उसका मन एक घर था

जिसमें हर दिन कोई न कोई

बिना दरवाज़ा खटखटाए घुस आता था

और अपने शक के जूते

उसकी सफ़ाई पर रख देता था।


वह सोचती थी

क्या प्यार इतना कमजोर होता है

कि एक अफवाह से टूट जाए?


या पुरुष का प्रेम

इतना हल्का होता है

कि सच के वजन को सह नहीं पाता?


जब वह उसे छोड़कर गया,

तो उसने कोई बड़ा दृश्य नहीं बनाया।

न रोई, न चीखी, न गिरकर टूटी।


बस उसके भीतर

एक बहुत छोटा-सा कमरा बंद हो गया

जहाँ वह हर शाम

उसके लौटने की आदत रखती थी।


अब वहाँ

सिर्फ़ खालीपन बैठा रहता है,

जैसे कोई पुराना परिचित

जो अब घर का हिस्सा बन चुका हो।


वह रातों में जागती थी,

पर जागना उसे नींद से ज्यादा ईमानदार लगता था।

क्योंकि नींद में सपने आते थे

और सपनों में भी

वह वही सुनती थी:

“तुम ठीक नहीं हो।”


उसके भीतर कई बातें थीं

जो उसने कभी कही नहीं

जैसे जब वह डरती थी,

तो वह डर किसी आवाज़ में नहीं बदलता था,

बस उसकी उंगलियाँ

कपड़ों के किनारों को बार-बार पकड़ लेती थीं।


जैसे जब उसे प्यार चाहिए होता था,

तो वह सीधे नहीं मांगती थी,

बस चाय में चीनी थोड़ा ज्यादा डाल देती थी,

शायद किसी को समझ आ जाए कि

मीठा कम है उसके जीवन में।


और वह पुरुष…

जिसने उसे दोष दिया और छोड़ दिया,

शायद कभी जान ही नहीं पाया

कि एक निर्दोष महिला

जब टूटती है,

तो वह टूटना भी शोर नहीं करता।


वह बस

अपनी ही परछाई में सिकुड़ जाती है।


उसके मन में अब भी सवाल हैं

क्या प्यार का मतलब

सिर्फ भरोसा पाना है?

या बिना सुने ही

सजा दे देना भी प्रेम का हिस्सा बन गया है?


क्या किसी स्त्री का मौन

हमेशा अपराध की भाषा माना जाएगा?


अब वह बदल गई है

पर टूटकर नहीं,

थककर भी नहीं।


बल्कि उस समझ के साथ

कि कुछ लोग प्यार नहीं करते,

वे सिर्फ अपने भ्रम से प्रेम करते हैं।


और जब भ्रम टूटता है,

तो वे इंसान नहीं ढूँढते

बस दोष ढूँढते हैं।


अब वह अकेली नहीं डरती,

क्योंकि उसने समझ लिया है

हर छोड़ देने वाला पुरुष

सच में मजबूत नहीं होता,

वह बस सुनने से डरता है।


और वह स्त्री…

जिसे दोषी कहा गया था

पर वह थी नहीं


अब भी हर सुबह उठती है,

बाल बाँधती है,

आईने में खुद को देखती है,

और बिना किसी से पूछे

धीरे से कहती है


“मैं वही हूँ,

जिसे समझा नहीं गया,

पर जो गलत भी नहीं थी।”


और यही उसका मौन

अब उसकी सबसे बड़ी जीत है।

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