एक क्षण में एक युग को जिया जा सकता है।
एक तिल बराबर का कर्म पहाड़ बराबर की रुकावट बन सकता है और एक पहाड़ बराबर का कर्म तिल बराबर की रुकावट भी हो सकता है।
चूक कहाँ और क्यों हो रही है हम ध्यान उन विषय और वस्तुओं पर डालते चलते हैं।
करना यही है जो कर रहे हो। यदि समझकर करोगे तो कर्म शून्य होंगे और अगर न समझी में किए तो बंधन गहरे होंगे।
भक्ति, प्रार्थना, समर्पण ये सब भी काम करते हैं। ये सहायक भी होते हैं। लेकिन जो तुम्हारी तिजोरी में कर्म की पूंजी बंद हैं।उसके लिए तिजोरी तुम्हें खोलनी ही पड़ेगी और इन कर्मों को खर्च भी तुम्हें करना होगा।
सभी ईश्वर तुम्हारे साथ खड़ा है लेकिन जो फिक्स डिपॉजिट तुमने कर रखा है उसका क्या......... ?
इसीलिए बार-बार ज्ञानी कहते मिल जाएंगे होश में आओ, जागो। सीधा अर्थ है करना क्या है और कर क्या रहे हो। पहले समझ लो .....जीवन में बाधाएं क्यों हैं।
धन नहीं कर्म को खर्च करना है। ये सत्य है धन से धर्म होता है। लेकिन आपके धन खर्च करने से धर्म हो भी रहा है या नहीं। ये विचार करते रहना चाहिए।
मात्र समझ लेने से सब कुछ ठीक हो जाएगा। जीवन में कइयों बार कर्म हिसाब लेने आता है। कभी भय बनकर, कभी नुकसान बनकर वो हिसाब लेने आया है। अब तुम डरकर यात्रा बंद नहीं कर सकते हो। बड़ा भारी नुकसान हो गया। तो अपने को बंद कमरे में बंद नहीं कर सकते हो। कर्म का लेनदेन भी चलता रहे और जीवन भी न रुके।
ये जीवन यात्रा है। कर्म तब तक नहीं जाएगा जब तक उसका हिसाब बाकी है। भीष्म को एक सौ जन्म के बाद तीरों की शय्या पर लिटा दिया था। लेकिन ये भी सत्य है कर्म का हिसाब किताब किसी का रास्ता रोकने नहीं आता है। घबराकर रुक तो तुम स्वयं ही जाते हो। जीवन का परम सत्य ये है तुम इस धरती पर तब तक ही हो जब तक कुछ भी बाकी है।
उसके बाद....
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जैसे मरे हुए जानवर को खून चूसने वाले कीड़े छोड़ देते हैं। वैसे ही तुम्हारा इस धरती से हाल होगा। आज जो भी तुम्हारे रिश्ते दिख रहे हैं वास्तव में वो पीछे से आया कर्मों का लेखा जोखा ही है। तो पत्नी, पति, संतान पर जान मत लुटाओ। बस अपनी जिम्मेदारी समझकर काम को पूरा करो। जब तक हिसाब बाकी हैं संबंध हैं।उसके बाद खूब रोना, कुछ न होगा।
अभिमन्यु की मृत्यु हो गई। अर्जुन पछाड़ खाकर गिरे। आखिर कृष्ण उन्हें ले गए अभिमन्यु से मिलवाने। यहाँ से मरे और कहीं जन्म ले लिया। अर्जुन दौड़ते गए चिल्लाते हुए बेटा-बेटा...... अभिमन्यु ने कहा इस धरती पर पता नहीं तुम कितनी बार मेरे बाप बने और पता नहीं कितनी बार मैं तुम्हारा बाप बना। जो काम मिला है उसे करो जाकर।
कोई भ्रम मत पालो इस धरती पर क्या करने आए हैं। जिन्होंने जन्म दिया है, जहां तुम्हारा जन्म हुआ है और जहां तुम वर्तमान में हो यही सब करने आए हो। जैसे लाखों गायों के बीच छोटा बछड़ा अपनी माँ ढूंढ लेता है। वैसे कर्म भी है; तुम तक पहुँच ही जाएगा और परिस्थितियाँ वो करवा भी लेंगी जो करने आए हो। तो न तो भागो और न ही अंदर कोई ग्लानि रखो।
बस जो करें जागरूक होकर करें ।
यहाँ दो ही मार्ग हैं। ये दोनों ही साधना पथ है। एक है गृहस्थ और दूसरा है संन्यास। दोनों ही इस धरती पर रहने के लिए विवश हैं।
संन्यासी जिस दिन पिंडदान करता है उस दिन क्यों शरीर त्याग नहीं हो पाता है ...........?
क्यों की कुछ कर्म बाकी रह गया है। जब पूरा होगा चला जाएगा | कुछ कांक्रीट कर्म होते हैं जिसे सबको भोगना होता है । रामकृष्ण, महावीर, बुद्ध, आदि शंकर सभी बोधि होने के बाद भी इन्हें स्वीकारा और सम्मान भी दिया। बुद्ध ने छोटे से छोटे कर्म को सम्मान दिया और अंत में शरीर को गिरने दिया।
आदि शंकर ने जरूरी कर्म भोगे अंततः शरीर त्याग दिया। वो कर्म जिन्हें जरूरी नहीं समझा या जिनकी पहुँच शरीर तक थी उसके लिए शरीर ही छोड़ दिया।
आप लोग भी करते हैं। किसी का कर्ज देना है पैसा तो नहीं है, कुछ अन्य प्रॉपर्टी है इससे चुक जाए तो ले लो। तो आदि शंकर ने शरीर ही छोड़ दिया बचा खुचा इससे ले लो। कहा जाता है महात्मा ने शरीर छोड़ दिया। वो यही है, अब ये शरीर बचा है इससे उधार चुके तो ले लो। शरीर ही छोड़ दिया शरीर से अर्थ है जैविक शरीर। तो भागने से कुछ न होगा। यदि किसी का उधारी है तो गंगा नहाने से न चुकेगा। उधार देना ही पड़ेगा।
तो यहाँ दोनों ही गृहस्थ और संन्यासी अपने अपने कर्मों का नाश कर रहे हैं। तरीके अलग अलग हैं पर कर तो एक ही काम रहे हैं। एक त्याग रहा है दूसरा भोग रहा है।
पहले इस सत्य को स्वीकारें..... कर्म से नहीं भागा जा सकता है..... तो भागना ही क्यों......... ?
हिसाब रोकर क्यों चुकाना.... रोने से बच नहीं पाओगे। कर्म भी चलता रहे और जीवन भी चलता रहे। इसे एक बार फिर से समझना कर्म रास्ता रोकने नहीं आया हैं। हिसाब लेने आया है। हँसकर चुकाएंगे आनंद होगा ।
अर्जुन ने महाभारत जीता ....लेकिन जो हजारों हत्याएं की अपने परिजनों की, गुरु, पितामह उसका क्या ........?
ग्लानि कितनी गहरी रही होगी .........?
वो अर्जुन ने अकेले भोगी होगी......तुम भी जान लो।
यदि कभी ये कुछ करके ये लगे ये क्या कर दिया....... ?
बाद में अफसोस हो समझ लेना ये तुमने नहीं किया है। जब ग्लानि गहरी हो चले तो कृष्ण का एक वाक्य दिमाग में लाना परिस्थितियाँ तुमसे करवा ही लेंगी। कर्म भी चले जीवन भी निर्वाध चलता रहे यही साधना है। साधना पथ हमेशा पावन होते हैं। अगर रुक गए तो पाप हो गया। तुमने जो भी किया है इससे जीवन चक्र में फँसोगे नहीं बल्कि निकलने वाले हो।अपने कर्म को करके ही निकलोगे।
किसी भी परिस्थिति में तुम पापी नहीं हो सकते हो।
इसीलिए मैं कह देता हूँ गंगा नहाने से पहले पाप कर तो लो।अभी तो जो कर रहे हो वही तो करने आए हो। लेकिन फिर भी अंदर कहीं ग्लानि हो रही है तो पश्चाताप नहीं करना, प्रायश्चित करना। सनातन में सब कुछ के लिए प्रायश्चित है।
पता नहीं कितने कीड़े, मकोड़े पैरों के नीचे, गाड़ी से मर जाते हैं। कई को हम ही मार देते हैं। लेकिन साल में हम एक दिन उज्जैन सिद्ध वट पर जाकर उनका पिंडदान भी कर देते हैं। ये वो सब है जो रास्ता रोकता है। इस हालत में हम बुद्ध महावीर के तरीकों से सोचने लगते हैं।
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