राख और प्रकाश के बीच
जब अंतिम लौ
अपने लाल होंठों से
शरीर का नाम मिटा देती है,
जब हड्डियों की आख़िरी सफेदी भी
समय की उँगलियों में घुल जाती है,
तब एक प्रश्न
धुएँ की पतली रेखा बनकर
आकाश में उठता है
यदि सब यहीं रह गया,
तो फिर कौन है
जो अब भी यात्रा पर है?
कौन है
जो राख नहीं बना,
जो चिता की आग से भी बच निकला,
जो मृत्यु की मुहर लग जाने के बाद भी
अपने भीतर किसी अधूरी पुकार को लिए
अज्ञात दिशाओं में भटकता है?
शायद वह कोई व्यक्ति नहीं,
कोई चेहरा नहीं,
कोई नाम नहीं।
शायद वह केवल स्मृतियों का एक बादल है,
इच्छाओं का एक अनदेखा जंगल,
अधूरे सपनों की एक गठरी,
जो वर्षों तक शरीर नामक घर में रहने के बाद
घर टूट जाने पर भी
दरवाज़ा खोजती रहती है।
जैसे कटे हुए पंख का दर्द
पक्षी को याद रहता है,
वैसे ही
टूटे हुए शरीर की आदतें
चेतना को याद रहती हैं।
प्यास बिना गले के,
भूख बिना पेट के,
डर बिना किसी शत्रु के
मन अपने ही बनाए हुए
रेगिस्तानों में भटकता है।
और तब,
कहीं किसी कोने में,
कोई मनुष्य
किसी दूसरे मनुष्य को रोटी दे देता है।
कोई अजनबी
किसी अजनबी के आँसू पोंछ देता है।
कोई थका हुआ यात्री
किसी पेड़ की छाया पा लेता है।
कोई बच्चा
पहली बार भरपेट भोजन करता है।
उसी क्षण
ब्रह्मांड के अदृश्य तंतु हिलते हैं।
करुणा की एक लहर
समय और दूरी की सीमाएँ लाँघकर
उन सभी जगहों तक पहुँचती है
जहाँ अँधेरा अब भी अपना साम्राज्य समझता है।
क्योंकि दया कभी नष्ट नहीं होती।
वह रूप बदलती है,
तरंग बनती है,
प्रकाश बनती है,
स्मृति बनती है,
और फिर किसी भटकी हुई चेतना के भीतर
एक दीपक की तरह जल उठती है।
यही शायद वह रहस्य है
जिसे शब्द कभी पूरी तरह कह नहीं पाए।
कि वस्तुएँ नहीं पहुँचतीं,
पर उनका प्रेम पहुँचता है।
रोटी नहीं पहुँचती,
पर तृप्ति पहुँचती है।
जल नहीं पहुँचता,
पर शीतलता पहुँचती है।
हाथ नहीं पहुँचते,
पर स्पर्श पहुँच जाता है।
और तब
भय की नदियाँ थोड़ी उथली हो जाती हैं,
पछतावों के मगरमच्छ
थोड़े शांत हो जाते हैं,
अंधकार की आँधियाँ
अपनी दिशा भूलने लगती हैं।
फिर एक दिन,
जब सारी इच्छाएँ
अपने अंतिम पत्ते भी गिरा देती हैं,
जब स्मृतियाँ
अपने अंतिम गीत भी गा लेती हैं,
जब ‘मैं’ का छोटा-सा दीपक
अनंत सूर्य को पहचान लेता है,
तब यात्रा समाप्त नहीं होती
यात्री समाप्त हो जाता है।
बूँद सागर में नहीं गिरती,
उसे पता चलता है
कि वह स्वयं सागर थी।
आकाश कहीं नहीं जाता,
उसे बस याद आता है
कि वह कभी किसी घड़े में कैद था ही नहीं।
और तब
राख,
धुआँ,
शोक,
विरह,
प्रतीक्षा,
जन्म,
मृत्यु
सब एक ही महान संगीत के स्वर बन जाते हैं।
जहाँ कोई पराया नहीं,
कोई खोया नहीं,
कोई मरा नहीं।
केवल प्रकाश है।
अनंत,
निर्विकार,
अविभाज्य प्रकाश।
और हम सब,
युगों से,
उसी प्रकाश का
एक क्षणिक सपना हैं।
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