रिश्ते धरती जैसे होते हैं...
रिश्ते भी धरती जैसे होते हैं। जितना प्रेम बोओगे, उतना ही स्नेह उगेगा। लेकिन यदि कोई सिर्फ फसल लेना चाहे और धरती को आराम न दे, तो एक दिन उसकी उर्वरता खत्म हो जाती है। यही बात इंसानी रिश्तों पर भी लागू होती है।
आज कई रिश्ते इसलिए टूट रहे हैं क्योंकि उनमें पाने की इच्छा तो बहुत है, लेकिन समझने और संवारने का धैर्य कम होता जा रहा है। हम चाहते हैं कि सामने वाला हमेशा हमारे लिए मौजूद रहे, हमारी जरूरतें पूरी करे, हमारी बात सुने, हमारा साथ दे। मगर यह भूल जाते हैं कि उसके भी अपने सपने, अपनी थकान, अपनी परेशानियां और अपनी इच्छाएं हैं।
कोई भी रिश्ता अधिकार से नहीं, सम्मान से चलता है। प्रेम का अर्थ किसी को अपने अनुसार ढाल लेना नहीं, बल्कि उसे उसके पूरे व्यक्तित्व के साथ स्वीकार करना है। जिस तरह एक माली पौधे को खींचकर बड़ा नहीं कर सकता, उसी तरह किसी इंसान को मजबूर करके अपना नहीं बनाया जा सकता।
रिश्तों की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि उनमें बराबरी होती है। जहां एक व्यक्ति सिर्फ देता रहे और दूसरा सिर्फ लेता रहे, वहां संबंध धीरे-धीरे बोझ बन जाते हैं। नदी और किनारे की तरह दोनों का होना जरूरी है; एक के बिना दूसरा अधूरा है।
अक्सर लोग कहते हैं कि रिश्ते निभाना मुश्किल हो गया है। सच तो यह है कि रिश्ते कभी मुश्किल नहीं होते, मुश्किल हमारा अहंकार होता है। हम सुने जाने की इच्छा रखते हैं, लेकिन सुनना नहीं चाहते। हम समझे जाना चाहते हैं, लेकिन समझने का प्रयास नहीं करते। हम प्रेम चाहते हैं, लेकिन प्रेम जताने में कंजूसी करते हैं।
एक अच्छा रिश्ता वह नहीं जिसमें कभी मतभेद न हों, बल्कि वह है जिसमें मतभेदों के बावजूद सम्मान बना रहे। जहां गुस्सा आए तो शब्दों की मर्यादा न टूटे, दूरी आए तो भरोसा न टूटे, और समय बदले तो अपनापन न बदले।
धरती की तरह रिश्तों को भी समय चाहिए, पानी चाहिए, धूप चाहिए और कभी-कभी विश्राम भी। हर दिन हिसाब मांगने से प्रेम नहीं बढ़ता। कुछ जगह खाली छोड़नी पड़ती है, ताकि विश्वास सांस ले सके।
रिश्ते जीतने की चीज नहीं हैं, जीने की चीज हैं। जो लोग रिश्तों को कब्जे की तरह नहीं, जिम्मेदारी की तरह निभाते हैं, उनके जीवन में प्रेम लंबे समय तक हरा-भरा रहता है। क्योंकि प्रेम का सबसे सुंदर रूप अधिकार नहीं, बल्कि सम्मान है; और साथ का सबसे मजबूत आधार मजबूरी नहीं, बल्कि स्वेच्छा है।
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