अधूरी बातचीत...
विवाह को पच्चीस वर्ष हो चुके थे।
घर बड़ा था, बच्चे अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो चुके थे। बाहर से देखने पर सब कुछ ठीक लगता था। लोग उन्हें आदर्श दंपति कहते थे। वे साथ रहते थे, साथ बाज़ार जाते थे, मेहमानों का स्वागत साथ करते थे और हर सामाजिक अवसर पर एक-दूसरे के साथ दिखाई देते थे।
लेकिन एक रात अचानक बिजली चली गई।
पूरा घर अँधेरे में डूब गया।
दोनों बरामदे में आकर बैठ गए। वर्षों बाद ऐसा हुआ था कि न टीवी चल रहा था, न मोबाइल, न कोई काम। केवल सन्नाटा था।
काफ़ी देर तक दोनों चुप बैठे रहे।
फिर स्त्री ने पूछा,
"क्या तुम सचमुच खुश हो?"
पुरुष ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
यह प्रश्न उसने पहले कभी नहीं पूछा था।
कुछ क्षण बाद उसने कहा,
"पता नहीं। शायद हूँ। शायद नहीं।"
फिर उसने धीरे से पूछा,
"और तुम?"
स्त्री मुस्कुराई, लेकिन वह मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची।
"मुझे भी नहीं पता।"
फिर दोनों चुप हो गए।
उस रात पहली बार उन्होंने अपने जीवन के बारे में बात की।
पुरुष बोला,
"जब मैं छोटा था, तब मुझे सिखाया गया कि पुरुष का काम कमाना है। रोना नहीं है। डरना नहीं है। थकना नहीं है। मैंने वही किया। पढ़ाई की, नौकरी की, घर बनाया, बच्चों को बड़ा किया। लेकिन कभी किसी ने नहीं पूछा कि मैं क्या महसूस करता हूँ। धीरे-धीरे मैंने खुद भी पूछना छोड़ दिया।"
उसकी आवाज़ भारी हो गई।
"आज सोचता हूँ कि मैं पूरी ज़िंदगी जिम्मेदारियाँ निभाता रहा, लेकिन खुद को कभी जान नहीं पाया।"
स्त्री उसे देखती रही।
फिर उसने कहा,
"मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। फर्क बस इतना है कि मुझे सिखाया गया कि अच्छी स्त्री वही है जो सबको खुश रखे। मैंने भी वही किया। माता-पिता को खुश रखा, फिर तुम्हें, फिर बच्चों को। लेकिन इस कोशिश में मैं खुद कहाँ रह गई, यह कभी समझ ही नहीं पाई।"
बरामदे में फिर सन्नाटा फैल गया।
दोनों पहली बार एक-दूसरे को सुन रहे थे।
वर्षों तक वे एक ही घर में रहे थे, लेकिन शायद पहली बार एक-दूसरे के भीतर के मनुष्य से मिल रहे थे।
पुरुष ने कहा,
"अजीब बात है। मैं समझता था कि मैं तुम्हें जानता हूँ।"
स्त्री हल्का-सा हँसी।
"मैं भी यही सोचती थी।"
"लेकिन हम तो केवल एक-दूसरे की भूमिकाओं को जानते थे। तुम पत्नी थीं, मैं पति था। तुम माँ थीं, मैं पिता था। पर जो व्यक्ति इन भूमिकाओं के पीछे था, उससे तो कभी परिचय ही नहीं हुआ।"
स्त्री की आँखें भर आईं।
"शायद इसलिए इतने लोग साथ रहते हुए भी अकेले रहते हैं।"
पुरुष ने पहली बार उसकी ओर ध्यान से देखा।
उसे लगा, जिस स्त्री के साथ उसने आधी ज़िंदगी बिताई, वह उसके लिए अभी भी एक रहस्य है।
और शायद वह स्वयं भी उसके लिए।
उस रात दोनों ने जाना कि मनुष्य का सबसे बड़ा अकेलापन तब नहीं होता जब उसके पास कोई न हो।
सबसे बड़ा अकेलापन तब होता है जब वह स्वयं अपने भीतर की आवाज़ से अनजान हो जाए।
एक पुरुष पूरी उम्र मजबूत बनने में लगा रह सकता है, जबकि भीतर एक डरा हुआ बच्चा बैठा हो।
एक स्त्री पूरी उम्र सबको प्रेम देती रह सकती है, जबकि उसके भीतर कोई वर्षों से प्रेम पाने की प्रतीक्षा कर रहा हो।
दुनिया इन बातों को नहीं देखती।
दुनिया केवल चेहरे देखती है।
लेकिन हर चेहरे के पीछे एक ऐसा जीवन होता है जिसके बारे में अक्सर स्वयं उस व्यक्ति को भी पूरा पता नहीं होता।
रात गहरी हो चुकी थी।
बिजली अभी भी नहीं आई थी।
लेकिन अँधेरे में बैठे उन दोनों लोगों को पहली बार लगा कि उनके जीवन में थोड़ा उजाला हुआ है।
क्योंकि वर्षों बाद उन्होंने एक-दूसरे को नहीं, स्वयं को सुनना शुरू किया था।
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