"जिसके मन में इच्छा है, वह ध्यान में हो ही नहीं सकता।"
पूरा लेख इसी आग के आसपास लिखा जाना चाहिए। बिना उपदेश, बिना आध्यात्मिक शब्दाडंबर, बिना "साक्षी भाव", "चेतना", "ऊर्जा का प्रवाह" जैसी घिसी हुई शब्दावली के।
उदाहरण के लिए....
ध्यान: इच्छा का अंत
लोग सोचते हैं कि वे ध्यान कर रहे हैं।
लेकिन अधिकतर लोग ध्यान नहीं कर रहे होते, वे अपनी इच्छाओं को पूरा करने की कोशिश कर रहे होते हैं।
कोई शांति चाहता है।
कोई सफलता चाहता है।
कोई अपने भीतर कोई विशेष अनुभव चाहता है।
कोई चाहता है कि उसका क्रोध समाप्त हो जाए।
कोई चाहता है कि उसे ईश्वर मिल जाए।
ध्यान के नाम पर व्यक्ति अपनी इच्छाओं की सूची लेकर बैठ जाता है।
फिर वह कहता है कि मैं ध्यान कर रहा हूँ।
लेकिन जिस क्षण तुम कुछ पाने के लिए बैठे हो, उसी क्षण तुम ध्यान से बाहर हो।
ध्यान और इच्छा साथ-साथ नहीं चल सकते।
इच्छा का अर्थ है कि तुम्हारा मन किसी और जगह है।
ध्यान का अर्थ है कि तुम यहीं हो।
इच्छा हमेशा भविष्य में रहती है।
ध्यान हमेशा वर्तमान में।
इसीलिए ध्यान की सबसे बड़ी बाधा मन की अशांति नहीं है, बल्कि मन की आकांक्षा है।
बहुत से लोग कहते हैं कि उन्हें ध्यान से शांति नहीं मिली।
सवाल यह है कि क्या वे कभी शांति के बिना बैठे थे?
या वे हर दिन शांति पाने के लिए बैठते रहे?
जो शांति को पाना चाहता है, वह शांति को एक वस्तु बना देता है।
और जिस चीज़ को वस्तु बना दिया जाए, उसका पीछा करना पड़ता है।
ध्यान पीछा करने का नहीं, रुक जाने का नाम है।
जब तुम पहली बार बिना किसी मांग के बैठते हो, तब ध्यान की संभावना पैदा होती है।
न शांति चाहिए।
न अनुभव चाहिए।
न कोई उपलब्धि।
न कोई आध्यात्मिक प्रमाण।
केवल जो है, उसे स्वीकार करने की तैयारी।
यहीं से ध्यान का जन्म होता है।
धीरे-धीरे व्यक्ति देखता है कि उसका अधिकांश जीवन इच्छाओं द्वारा संचालित था।
वह प्रेम भी किसी कारण से करता था।
वह प्रार्थना भी किसी कारण से करता था।
वह ध्यान भी किसी कारण से करता था।
हर जगह कुछ पाने की छिपी हुई भूख थी।
और यही भूख उसे स्वयं से दूर रखे हुए थी।
जिस दिन यह भूख थोड़ी शांत पड़ती है, उसी दिन ध्यान पहली बार घटित होता है।
तब व्यक्ति को समझ आता है कि ध्यान करने की चीज़ नहीं है।
ध्यान होने वाली घटना है।
यह प्रयास से नहीं आता।
यह तब आता है जब अनावश्यक प्रयास समाप्त हो जाते हैं।
तब जीवन बदलता नहीं है।
पर जीवन को देखने वाला बदल जाता है।
परिस्थितियाँ वही रहती हैं।
संसार वही रहता है।
लोग वही रहते हैं।
लेकिन भीतर कोई संघर्ष नहीं बचता कि जीवन मेरी इच्छा के अनुसार होना चाहिए।
और शायद यही शांति है।
वह शांति नहीं जिसे पाया जाए।
वह शांति जो तब प्रकट होती है जब पाने वाला ही अनुपस्थित हो जाता है।
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