सुविधाओं से भरे हुए जीवन में भी बेचैनी का बने रहना एक साधारण बात नहीं है। अगर धन, मनोरंजन, संबंध और उपलब्धियां ही संतोष देने के लिए पर्याप्त होते, तो सबसे सफल और संपन्न लोग सबसे अधिक शांत दिखाई देते। लेकिन वास्तविकता कुछ और ही कहानी कहती है। बाहर से भरा हुआ दिखने वाला जीवन अक्सर भीतर से रिक्त होता है। चेहरे पर मुस्कान होती है, दिन व्यस्तताओं से भरे होते हैं, लोगों का साथ भी होता है, फिर भी एक अनकहा खालीपन बना रहता है। यही खालीपन जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संकेत है। दुर्भाग्य से अधिकांश लोग इसे समझने के बजाय ढकने की कोशिश करते रहते हैं।
जीवन की बड़ी विडंबना ये है कि जिस चीज से सबसे अधिक सीख मिल सकती है, उसी से सबसे ज्यादा बचा जाता है। दुख आता है तो उसे तुरंत हटाने की कोशिश होती है। बेचैनी उठती है तो ध्यान कहीं और मोड़ दिया जाता है। अकेलापन महसूस होता है तो किसी न किसी सहारे की तलाश शुरू हो जाती है। किसी को मनोरंजन चाहिए, किसी को बातचीत, किसी को भीड़, किसी को उपलब्धियों का नशा। उद्देश्य अलग अलग दिखाई देते हैं, लेकिन दिशा एक ही होती है, स्वयं से दूरी बनाए रखना। यही दूरी समय के साथ इतनी सामान्य लगने लगती है कि व्यक्ति उसे जीवन का हिस्सा मान लेता है।
हर युग में इंसान ने अपने दुखों से बचने के नए नए तरीके खोजे हैं। पहले साधन सीमित थे, इसलिए भागने के रास्ते भी कम थे। आज स्थिति अलग है। अब एक क्षण का खाली समय भी असहनीय लगता है। जेब में रखा एक छोटा सा उपकरण पूरे संसार का शोर लेकर उपस्थित हो जाता है। विचारों की जगह सूचनाएं ले लेती हैं। आत्मचिंतन की जगह प्रतिक्रियाएं ले लेती हैं। देखने की जगह केवल उपभोग बचता है। परिणाम ये होता है कि जीवन के सबसे आवश्यक प्रश्न पीछे छूट जाते हैं।
माया का सबसे सूक्ष्म जाल:
अधिकांश लोग माया को केवल धन, वैभव या भौतिक वस्तुओं से जोड़कर देखते हैं। लेकिन माया का क्षेत्र इससे कहीं बड़ा है। माया केवल वस्तुओं में नहीं होती, विचारों में भी होती है। माया केवल संग्रह में नहीं होती, पहचान में भी होती है। कोई अपनी सफलता से बंधा है, कोई अपनी असफलता से। कोई अपनी प्रशंसा से चिपका हुआ है, कोई अपने दुख से। जहां भी झूठा सहारा है, वहीं माया है।
माया का सबसे खतरनाक रूप वो है जो व्यक्ति को संतुष्ट होने का भ्रम दे देता है। जब जीवन में वास्तविक प्रश्न उठने चाहिए, तब अगर कोई झूठी तृप्ति मिल जाए तो खोज रुक जाती है। व्यक्ति सोचने लगता है कि सब ठीक है। उसे लगता है कि जीवन का उद्देश्य केवल आराम, सुविधा और मनोरंजन तक सीमित है। लेकिन सत्य का द्वार उन लोगों के लिए नहीं खुलता जो अपने भ्रमों में आराम से सो रहे हों। सत्य हमेशा उसी को पुकारता है जिसके भीतर कोई बेचैनी अभी जीवित है।
कई बार जीवन का संकट आशीर्वाद बन जाता है। कोई संबंध टूटता है, कोई सपना बिखरता है, कोई विश्वास हिल जाता है। पहली नजर में ये सब दुर्भाग्य लगता है। लेकिन इन्हीं घटनाओं के कारण व्यक्ति पहली बार गंभीर होकर जीवन को देखता है। जो प्रश्न पहले दबे हुए थे, वे सामने आने लगते हैं। जो खालीपन पहले मनोरंजन से ढका हुआ था, वो स्पष्ट दिखाई देने लगता है। यहीं से वास्तविक यात्रा शुरू होती है।
खालीपन से भागना क्यों आसान लगता है:
खालीपन का सामना करना आसान नहीं है। क्योंकि वहां कोई कहानी नहीं होती। कोई उपलब्धि नहीं होती। कोई पहचान नहीं होती। वहां केवल व्यक्ति और उसकी वास्तविक स्थिति होती है। इसी कारण लोग हर समय कुछ न कुछ करते रहना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि सक्रिय रहना जीवन है। लेकिन कई बार ये सक्रियता केवल एक बचाव होती है।
सोचने वाली बात ये है कि अगर कोई व्यक्ति कुछ देर भी शांत बैठने में असमर्थ है, तो क्या उसकी व्यस्तता वास्तव में स्वतंत्रता है। अगर अकेले होने पर बेचैनी घेर लेती है, तो क्या भीड़ सचमुच आनंद दे रही है। अगर हर समय किसी न किसी उत्तेजना की जरूरत पड़ती है, तो क्या जीवन संतुलित है। ये प्रश्न असुविधाजनक हैं, लेकिन आवश्यक हैं। क्योंकि इन्हीं प्रश्नों से आत्मज्ञान की शुरुआत होती है।
खालीपन को देखकर लोग घबरा जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनके भीतर कुछ गलत है। लेकिन खालीपन बीमारी नहीं है। कई बार यही सबसे बड़ा निमंत्रण होता है। ये संकेत देता है कि जीवन केवल बाहरी उपलब्धियों के लिए नहीं है। ये बताता है कि अभी कुछ ऐसा है जिसे समझा जाना बाकी है। जो व्यक्ति इस संकेत को समझ लेता है, उसकी दिशा बदलने लगती है।
मानसिक उथल पुथल का महत्व:
दुनिया शांति की बात बहुत करती है, लेकिन शायद ही कोई ये समझता हो कि सच्ची शांति तक पहुंचने के लिए अक्सर अशांति के क्षेत्र से गुजरना पड़ता है। जब पुराने भ्रम टूटते हैं तो मन अस्थिर होता है। जब वर्षों से पकड़े हुए विश्वास कमजोर पड़ते हैं तो बेचैनी पैदा होती है। जब व्यक्ति अपने बारे में बनाई हुई छवि पर प्रश्न उठाता है तो संघर्ष होता है। लेकिन ये संघर्ष व्यर्थ नहीं होता।
मानसिक उथल पुथल को लोग समस्या समझ लेते हैं। वे चाहते हैं कि कोई ऐसा उपाय मिल जाए जिससे तुरंत राहत मिल जाए। लेकिन राहत और समझ एक चीज नहीं हैं। राहत कुछ समय के लिए दर्द को ढक सकती है। समझ दर्द की जड़ तक पहुंचती है। इसलिए जो व्यक्ति केवल राहत चाहता है, वो अक्सर सत्य से दूर रह जाता है। और जो व्यक्ति समझ चाहता है, उसे कभी कभी बेचैनी का सामना करना पड़ता है।
बीज जब मिट्टी के भीतर टूटता है, तब उसके लिए वो एक संकट जैसा होगा। लेकिन उसी टूटन से नया जीवन जन्म लेता है। इसी प्रकार जब मन की पुरानी संरचनाएं टूटती हैं, तब एक नई संभावना जन्म लेती है। जो व्यक्ति इस प्रक्रिया को समझता है, वो अपनी बेचैनी से युद्ध नहीं करता। वो उसे ध्यान से देखता है। और देखने में ही परिवर्तन का बीज छिपा होता है।
सत्य की प्यास कैसे जागती है:
सत्य की खोज सुविधा से नहीं, आवश्यकता से शुरू होती है। जब तक व्यक्ति को लगता है कि बाहरी चीजें उसे पूर्ण संतोष दे देंगी, तब तक वो खोज नहीं करता। खोज तब शुरू होती है जब सारे प्रयासों के बाद भी कोई अधूरापन बना रहता है। जब उपलब्धियां मिल जाती हैं और फिर भी मन शांत नहीं होता। जब इच्छाएं पूरी हो जाती हैं और फिर भी संतोष नहीं आता। तब पहली बार व्यक्ति रुककर पूछता है, आखिर कमी कहां है।
ये प्रश्न साधारण नहीं है। यही प्रश्न पूरी आध्यात्मिक यात्रा का द्वार है। क्योंकि अब ध्यान बाहर से हटकर भीतर की तरफ मुड़ने लगता है। अब व्यक्ति दुनिया को बदलने से ज्यादा स्वयं को समझने में रुचि लेने लगता है। अब उसे केवल जानकारी नहीं चाहिए, अनुभव चाहिए। केवल शब्द नहीं चाहिए, सत्य चाहिए।
सत्य की प्यास किसी पुस्तक से नहीं आती। कोई उपदेश उसे पैदा नहीं कर सकता। ये प्यास जीवन के अनुभवों से जन्म लेती है। जब व्यक्ति बार बार देखता है कि जिन चीजों को उसने अंतिम समझा था, वे अस्थायी निकलीं, तब उसके भीतर कुछ और जानने की चाह उठती है। यही चाह उसे गहराई की तरफ ले जाती है।
मौन का असली अर्थ:
मौन का अर्थ केवल चुप रहना नहीं है। बहुत से लोग चुप रहते हैं, लेकिन उनके मन में हजारों आवाजें चलती रहती हैं। वास्तविक मौन तब आता है जब विचारों की पकड़ कमजोर पड़ने लगती है। जब व्यक्ति हर अनुभव पर तुरंत प्रतिक्रिया देना बंद कर देता है। जब देखने की क्षमता प्रतिक्रिया से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
मौन में व्यक्ति पहली बार अपने मन को समझना शुरू करता है। उसे दिखाई देता है कि कितनी इच्छाएं उसे चला रही हैं। कितने भय उसके निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं। कितनी स्मृतियां उसके वर्तमान को रंग रही हैं। ये देखना कभी कभी असुविधाजनक होता है, लेकिन यही जागरूकता का आरंभ है।
जो व्यक्ति मौन से मित्रता कर लेता है, उसके जीवन में एक नया आयाम खुलता है। अब उसे हर समय किसी बाहरी सहारे की जरूरत नहीं रहती। अब वह स्वयं के साथ रह सकता है। अब अकेलापन उसे डराता नहीं। क्योंकि उसने खोज लिया है कि शांति भीड़ में नहीं, समझ में जन्म लेती है।
प्रेम और सत्य का संबंध:
सत्य और प्रेम को अलग नहीं किया जा सकता। जहां सत्य नहीं है, वहां प्रेम केवल कल्पना बन जाता है। और जहां प्रेम नहीं है, वहां सत्य कठोर सिद्धांत बनकर रह जाता है। प्रेम का अर्थ केवल भावनात्मक लगाव नहीं है। प्रेम का अर्थ है किसी चीज को उसके वास्तविक रूप में देखने की क्षमता।
जब व्यक्ति अपने भ्रमों से चिपका होता है, तब प्रेम संभव नहीं होता। क्योंकि वह दूसरे को नहीं, अपनी कल्पनाओं को देख रहा होता है। वह संबंधों का उपयोग अपनी रिक्तता भरने के लिए करता है। इसलिए अपेक्षाएं जन्म लेती हैं। अपेक्षाओं से संघर्ष पैदा होता है। संघर्ष से दूरी आती है। फिर लोग सोचते हैं कि प्रेम कठिन है।
वास्तव में प्रेम कठिन नहीं है। कठिन है स्वयं को समझना। क्योंकि जब तक व्यक्ति अपने भय, अपनी असुरक्षाओं और अपनी इच्छाओं को नहीं समझता, तब तक उसका प्रेम भी उन्हीं से प्रभावित रहेगा। प्रेम तभी खिलता है जब मन थोड़ी स्वतंत्रता का स्वाद चखने लगता है। जब पकड़ कम होती है। जब स्वार्थ कम होता है। जब देखने की क्षमता बढ़ती है।
जागरण की शुरुआत:
जागरण किसी चमत्कार का नाम नहीं है। ये कोई अचानक मिलने वाली रहस्यमयी अवस्था भी नहीं है। जागरण की शुरुआत बहुत साधारण जगह से होती है। ये तब शुरू होती है जब व्यक्ति अपने जीवन को ईमानदारी से देखना शुरू करता है। जब वह अपने दुखों के लिए केवल परिस्थितियों को दोष देना बंद करता है। जब वह अपनी बेचैनी को समझने का प्रयास करता है।
हर वास्तविक परिवर्तन देखने से शुरू होता है। जो देखा नहीं गया, उसे बदला नहीं जा सकता। इसलिए जागरण का पहला कदम है स्वयं को देखना। बिना निर्णय के, बिना भागे, बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे। केवल देखना। यही देखने की कला धीरे नहीं, बल्कि गहराई से जीवन को बदल देती है।
यहीं से माया की पकड़ कमजोर होने लगती है। यहीं से खालीपन दुश्मन नहीं, शिक्षक बन जाता है। यहीं से मानसिक उथल पुथल अर्थपूर्ण लगने लगती है। यहीं से सत्य की प्यास जन्म लेती है। और यहीं से जीवन केवल घटनाओं का क्रम नहीं रह जाता, बल्कि आत्मबोध की एक जीवित यात्रा बन जाता है।
जवानी तुम संसार को देते हो, बुढ़ापा परमात्मा को!
तुम्हारे देने से पता चलता है कि मूल्य किसका है। जवानी तुम व्यर्थ को देते हो और बुढ़ापा परमात्मा को!
जब शक्ति होती है तब तुम गलत करते हो और जब शक्ति नहीं होती तब तुम कहते हो कि अच्छा करेंगे। जब करने को ही कुछ नहीं बचता, तब तुम कहते हो कि अच्छा करेंगे। जब मरने लगते हो, तब तुम कहते हो समर्पण। और जब तक तुम पकड़ सकते थे, तब तक तुमने कभी समर्पण की बात न सोची।
तुम किसे धोखा दे रहे हो? इसलिए तो शंकर कहते हैं, आंख के अंधे। तुम किसे धोखा दे रहे हो?
जब तक शक्ति है, तब तक करो स्मरण; क्योंकि स्मरण के लिए महाशक्ति की जरूरत है। उससे बड़ा कोई कृत्य नहीं है; वह तुम्हारी समग्रता को मांगता है; वह तुम्हारे रोएं-रोएं, श्वास-श्वास को मांगता है। जब तुम्हारे हाथ-पैर जीर्ण-जर्जर हो जाएंगे, लाठी टेक कर चलने लगोगे, आंख से दिखाई न पड़ेगा, तब तुम स्मरण करोगे? तब तुमसे गोविन्द की आवाज भी न निकलेगी; तब तुम्हारा कंठ भी अवरुद्ध हो गया होगा; तब तुम कहोगे भी मुर्दा-मुर्दा; वह परमात्मा तक पहुंचेगा?
त्वरा चाहिए; बाढ़ चाहिए; जीवन की पूरी ऊर्जा को दांव पर लगा देने की हिम्मत, तैयारी चाहिए। वह आज ही हो सकता है।
जिस दिन तुम्हें समझ आ जाए, उसी दिन वानप्रस्थ।
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