Tuesday, May 26, 2026

यह संसार वैसा ही है जैसा हमें दिखाई देता है

 क्या यह संसार वैसा ही है जैसा हमें दिखाई देता है… या हमारी पूरी वास्तविकता केवल मन द्वारा निर्मित एक अनुभव है… यह प्रश्न जितना रहस्यमयी लगता है, उतना ही गहरा भी है। क्योंकि हजारों वर्षों से वेदांत कहता आया है कि यह संसार माया है… जबकि आधुनिक विज्ञान भी धीरे-धीरे यह स्वीकार करने लगा है कि जो दुनिया हम अनुभव करते हैं, वह सीधे-सीधे बाहरी सत्य नहीं… बल्कि मस्तिष्क द्वारा निर्मित एक आंतरिक अनुभव है। अब इसे धीरे-धीरे समझते हैं। विज्ञान कहता है कि हमारी आँखें वास्तव में संसार को सीधे नहीं देखतीं… वे केवल प्रकाश के संकेत ग्रहण करती हैं। कान केवल कंपन ग्रहण करते हैं… त्वचा केवल स्पर्श संकेतों को महसूस करती है। इसके बाद मस्तिष्क इन सभी संकेतों को जोड़कर एक अनुभव बनाता है… और हम उसे वास्तविकता मान लेते हैं। अर्थात जो संसार हम देख रहे हैं, वह सीधे बाहर की दुनिया नहीं… बल्कि मस्तिष्क द्वारा निर्मित एक आंतरिक चित्र है। यही कारण है कि दो व्यक्ति एक ही घटना को बिल्कुल अलग प्रकार से अनुभव कर सकते हैं। क्योंकि अनुभव केवल बाहर की घटना से नहीं बनता… बल्कि भीतर की चेतना और मानसिक अवस्था से भी बनता है। अब अध्यात्म और वेदांत इसे और गहराई से देखते हैं। वे कहते हैं कि संसार पूरी तरह झूठा नहीं है… लेकिन यह अंतिम सत्य भी नहीं है। इसे माया कहा गया है। माया का अर्थ केवल भ्रम नहीं… बल्कि वह शक्ति जो बदलने वाली चीज़ों को स्थायी और पूर्ण प्रतीत कराती है। मनुष्य शरीर, विचार, संबंध और संसार को अंतिम सत्य मान लेता है… जबकि ये सब निरंतर बदल रहे हैं। यही कारण है कि वेदांत कहता है कि जो बदलता है वह शाश्वत सत्य नहीं हो सकता। अब यहाँ सबसे गहरी बात यह है कि विज्ञान और वेदांत दोनों एक समान दिशा में संकेत करते दिखाई देते हैं। विज्ञान कहता है कि हमारी वास्तविकता मस्तिष्क द्वारा निर्मित अनुभव है… और वेदांत कहता है कि मन और इंद्रियाँ हमें सीमित अनुभव दिखाती हैं… लेकिन अंतिम सत्य उससे परे है। अध्यात्म में कहा गया है कि मनुष्य एक स्वप्न जैसी अवस्था में जी रहा है… जहाँ वह अपने विचारों, इच्छाओं और भय को ही वास्तविकता मान बैठता है। लेकिन जब चेतना जागृत होने लगती है… तब व्यक्ति धीरे-धीरे देखना शुरू करता है कि अनुभव बदल रहे हैं… विचार बदल रहे हैं… शरीर बदल रहा है… लेकिन भीतर कुछ ऐसा है जो सबको देख रहा है और स्वयं नहीं बदलता। वही साक्षी चेतना वेदांत में आत्मा कही गई है। अब इसका अर्थ यह नहीं कि संसार का कोई अस्तित्व नहीं है… बल्कि इसका अर्थ यह है कि हमारा अनुभव पूर्ण सत्य नहीं है। जैसे स्वप्न में सब कुछ वास्तविक लगता है… लेकिन जागने पर समझ आता है कि वह अनुभव मन के भीतर था… उसी प्रकार अध्यात्म कहता है कि मनुष्य जब तक केवल मन और इंद्रियों तक सीमित है… तब तक वह माया के स्तर पर जी रहा है। अब प्रश्न उठता है कि यदि संसार माया है तो जीवन का उद्देश्य क्या है। वेदांत कहता है कि उद्देश्य संसार से भागना नहीं… बल्कि उसके पीछे छिपे सत्य को पहचानना है। अर्थात अनुभवों में खो जाना नहीं… बल्कि उन्हें देखने वाली चेतना को जानना। जब व्यक्ति धीरे-धीरे साक्षी भाव में आने लगता है… तब वह समझने लगता है कि वास्तविक शांति बाहरी परिस्थितियों से नहीं आती… बल्कि उस चेतना से आती है जो हर अनुभव के पीछे मौन रूप से उपस्थित है। विज्ञान अभी भी चेतना के रहस्य को पूरी तरह नहीं समझ पाया है… लेकिन अध्यात्म हजारों वर्षों से कहता आया है कि चेतना ही मूल सत्य है… और संसार उसी चेतना में अनुभव हो रहा है। यही कारण है कि वेदांत बार-बार पूछता है — यदि सब बदल रहा है… तो वह कौन है जो इस परिवर्तन को देख रहा है। और जैसे-जैसे यह प्रश्न भीतर गहराता है… वैसे-वैसे व्यक्ति माया के पार झाँकना शुरू कर देता है…

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