Saturday, May 30, 2026

क्या अच्छा है और क्या बुरा

 जब बुद्ध से पूछा जाता है 

कि क्या अच्छा है और क्या बुरा, 

तो बुद्ध कहते हैं, 

जो बोधपूर्वक किया जाए, वह अच्छा है 

और जो बोधहीनता से किया जाए, वह बुरा। 

इस फर्क पर ध्यान देना। 


बुद्ध यह नहीं कहते कि 

हर काम हर स्थिति में भला हो सकता है। 

या कोई काम हर स्थिति में बुरा हो सकता है। 

कभी कोई बात पुण्य हो सकती है, 

कभी वही बात दूसरी स्थिति में पाप हो सकती है। 


इसलिए पाप और पुण्य कर्र्मो 

के ऊपर लगे हुए लेबल नहीं हैं।

तो फिर हमारे पास शाश्वत आधार क्या होगा निर्णय का? 

बुद्ध ने एक नया आधार दिया। 

बुद्ध ने आधार दिया-बोध अर्थात जागरूकता का। 

जो मनुष्य जागरूकतापूर्वक जो भी काम कर पाए, 

वही पुण्य है। और जो बात केवल मूच्र्छा (बेहोशी) 

में की जा सके, वही पाप है। 


जैसे, तुम पूछो, क्रोध पाप है या पुण्य? तो बुद्ध कहते हैं, 

अगर तुम क्रोध जागरूकतापूर्वक कर सको, 

तो वह पुण्य है। अगर क्रोध मूर्छित होकर करोगे, तो पाप है।


अब फर्क समझना। 

इसका मतलब यह हुआ कि हर क्रोध पाप नहीं होता 

और हर क्रोध पुण्य नहीं होता। 

कभी मां जब अपने बेटे पर क्रोध करती है, 

तो जरूरी नहीं है कि पाप हो। शायद पुण्य भी हो। 

शायद बिना क्रोध के बेटा भटक जाता। 

लेकिन इतना ही बुद्ध का कहना है 

कि जो भी काम किया जाए, वह होश के साथ किया जाए।


मैंने एक जेन कहानी सुनी है। 

एक समुराई के गुरु को किसी ने मार दिया। 

जापान में ऐसी व्यवस्था है कि अगर 

किसी का गुरु मार डाला जाए, 

तो शिष्य का कर्तव्य है कि वह बदला ले। 

जब तक वह मारने वाले को न मार दे, तब तक चैन न ले।


समुराई तो बड़े योद्धा होते हैं। 

वह सब कुछ छोड़कर बस इसी काम में लग गया। 

दो साल उसका पीछा करते-करते एक जंगल 

की एक गुफा में उसे पकड़ लिया। 

वह उसकी छाती में छुरा भोंकने वाला ही 

था कि उसने समुराई पर थूक दिया। 

जैसे ही उसने थूका, 

समुराई ने छुरा वापस म्यान में रख 

लिया और गुफा के बाहर चला गया।


उस आदमी ने बाहर आकर कहा, 

दो साल से तुम मुझे जंगलों में ढूंढ़ रहे हो, 

आज जब तुम्हें मिल गया, तो निकला 

हुआ छुरा वापस क्यों रख लिया? 


समुराई ने कहा कि तुमने थूक दिया, 

तो मुझे क्रोध आ गया। मेरे गुरु का उपदेश था 

कि कोई भी काम मूच्र्छा में मत करना। 

दो साल तक मैंने होश रखा। 

तुमने मेरे गुरु को मारा, तो व्यवस्था के 

तहत मैं तुम्हें मार रहा था। 

इसमें मेरा कुछ निजी नहीं था, 

लेकिन तुमने थूक दिया, 

तो मैं सब कुछ भूल गया और मेरे मन में भाव उठा 

कि इस आदमी को मार डालूं। 

मेरी चेतना को मूच्र्छा आ गई। 

अहंकार बीच में आ गया। 

जब यह मूच्र्छा हट जाएगी, तब सोचूंगा।


बुद्ध ने कहा है, जो तुम मूच्र्छा में करो, वही पाप है 

और जो जागरूकता में करो, वही पुण्य है। 


पाप और पुण्य की व्यवस्था 

में व्यक्ति को परम स्वतंत्रता है। 

कोई दूसरा तय नहीं कर सकता 

कि क्या पाप है, क्या पुण्य है। 

तुमको ही तय करना है। 

बुद्ध ने व्यक्ति को परम गरिमा दी।


एक बात और, गौतम बुद्ध सहजता के उपदेष्टा हैं। 

गौतम बुद्ध कहते हैं, कठिन से आकर्षित मत होना, 

क्योंकि उसमें अहंकार का लगाव है। 

जितनी कठिन बात हो, 

लोग उसमें उतने ही उत्सुक होते हैं। 

क्योंकि कठिन बात में अहंकार को रस आता है, 

मजा आता है कि करके दिखा दूं। 

अब जैसे पूना की पहाड़ी पर कोई चढ़ जाए, 

तो इसमें कुछ मजा नहीं है, 

एवरेस्ट पर चढ़ जाऊं तो कुछ बात है। 

पूना की पहाड़ी पर चढ़कर कौन तुम्हारी फिकर करेगा। 

जिस पहाड़ी पर कोई भी चढ़ सकता है, 

उसमें अहंकार को तृप्ति का उपाय नहीं है। 


बुद्ध ने कहा कि अहंकार अक्सर ही 

कठिन में और दुर्गम में उत्सुक होता है। 

इसलिए कभी-कभी जो सहज और सुगम है, 

जो नजदीक है, वह चूक जाता है 

और दूर के तारों पर हम चलते जाते हैं। 


आदमी चांद पर पहुंच गया, 

लेकिन अपने भीतर नहीं पहुंचा। 

चांद पर पहुंचना तकनीक और विज्ञान की अद्भुत विजय है, लेकिन जो आदमी चांद पर पहुंच गया, 

वह अभी छोटी-छोटी चीजें करने में सफल नहीं हो पाया है।


 हम सर्दी-जुकाम का इलाज नहीं खोज पाए। 

सर्दी-जुकाम का इलाज ढूंढ़ने में उत्सुक भी कौन है। चिकित्सक कैंसर की दवा खोज रहे हैं। 

बड़ी चीज अहंकार की चुनौती बनती है। 

आदमी अपने भीतर नहीं पहुंचा, 

जो निकटतम है और चांद पर पहुंच गया। 


पर बुद्ध कहते है, 

सहज पर ध्यान दो। जो सरल है, सुगम है, उसे जियो। 


बुद्ध ने जीवनचर्या को अत्यंत सुगम बनाने के 

लिए उपदेश दिया है। छोटे बच्चे की भांति सरल जीवन जियो। जीवन तो सुगम है, अत्यंत सरल है। 

सत्य भी सुगम और सरल ही होगा। 

तुम नैसर्गिक बनो और अहंकार के आकर्षणों में मत उलझो।


करुणा किसी पर दया करना नहीं है।

दया में ऊपर-नीचे का भाव होता है — जैसे कोई बड़ा है और कोई छोटा।

लेकिन करुणा में गहरा प्रेम, समझ और एकत्व होता है।

ओशो कहते हैं —

“जब तुम स्वयं को जान लेते हो, भीतर शांति और मौन उतर आता है, तब तुम्हारे भीतर से करुणा स्वतः बहने लगती है।”

करुणा पैदा नहीं की जाती,

यह मनुष्य की चेतना का स्वाभाविक फूल है।

करुणा कैसे उत्पन्न होती है?

जब मन शांत होता है

जब अहंकार कम होता है

जब तुम दूसरों के दुःख को अपने जैसा महसूस करने लगते हो

जब ध्यान के माध्यम से भीतर जागरूकता आती है

तब हृदय में करुणा जन्म लेती है।

ओशो के अनुसार,

क्रोध, हिंसा, ईर्ष्या और घृणा — ये सब अचेतन मन की अवस्थाएँ हैं।

लेकिन ध्यान और जागरूकता से वही ऊर्जा प्रेम और करुणा में बदल जाती है।

करुणा का अर्थ है —

बिना किसी स्वार्थ के प्रेम बरसाना।

जैसे फूल अपनी सुगंध सबको दे देता है, वैसे ही जागृत व्यक्ति अपनी करुणा सब पर बरसाता है।

“करुणा ध्यान की सुगंध है।”

जब भीतर मौन गहराता है,

तब करुणा अपने आप प्रकट होती है।

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