"एक छोटी-सी नाव पर बैठे लोग"
ब्रह्मांड के अथाह सागर में
एक छोटी-सी नाव बह रही थी।
उस नाव का नाम था "पृथ्वी"।
न जाने कितने अरब वर्षों से
वह अंधेरों और तारों के बीच
चुपचाप अपनी यात्रा कर रही थी।
उस नाव पर
अरबों यात्री सवार थे।
सब एक ही तूफ़ानों से गुजरते थे,
एक ही सूरज की गर्मी पाते थे,
एक ही चाँदनी में सोते थे,
एक ही मृत्यु की ओर बढ़ते थे।
फिर भी
उन्होंने नाव के बीच दीवारें खड़ी कर लीं।
किसी ने आगे का हिस्सा अपना कह दिया,
किसी ने पीछे का।
किसी ने कहा,
"यही मेरा देश है।"
किसी ने कहा,
"यही मेरा धर्म है।"
किसी ने कहा,
"मेरी मान्यता ही अंतिम सत्य है।"
और फिर
एक ही नाव में बैठे लोग
एक-दूसरे से लड़ने लगे।
उन्हें यह समझ न आया
कि यदि नाव डूबेगी
तो किसी एक की नहीं,
सबकी डूबेगी।
मनुष्य का बड़ा भ्रम
यह नहीं कि वह गरीब है या अमीर।
यह नहीं कि वह शक्तिशाली है या दुर्बल।
उसका सबसे बड़ा भ्रम यह है
कि वह स्वयं को अलग समझता है।
जैसे लहर
खुद को समुद्र से अलग समझ ले।
जैसे पत्ता
खुद को वृक्ष से अलग समझ ले।
जैसे साँस
खुद को जीवन से अलग समझ ले।
वह भूल जाता है
कि वह आया भी अकेला था
और जाएगा भी अकेला।
उसके हाथ में जो कुछ है
वह बस कुछ वर्षों की धूप है,
कुछ मौसम हैं,
कुछ रिश्ते हैं,
कुछ अधूरे सपने हैं।
लेकिन वह इन्हीं कुछ दिनों में
इतना अहंकार इकट्ठा कर लेता है
कि स्वयं को अमर समझ बैठता है।
और एक दिन
जब मृत्यु उसके कंधे पर हाथ रखती है,
तब सारी बहसें शांत हो जाती हैं।
न कोई धर्म साथ जाता है,
न कोई झंडा,
न कोई सीमा,
न कोई उपाधि।
साथ जाता है तो केवल
उसका व्यवहार।
उसके द्वारा दिया गया प्रेम।
उसकी करुणा।
उसकी मनुष्यता।
इसलिए जीवन शायद
जीतने की प्रतियोगिता नहीं है।
यह तो एक यात्रा है
जिसमें हम सब
एक ही नाव के मुसाफ़िर हैं।
और बुद्धिमानी इसी में है
कि यात्रा पूरी होने तक
एक-दूसरे का हाथ थामे रहें,
न कि एक-दूसरे को समुद्र में धकेलते रहें।
क्योंकि....
नाव किसी की निजी नहीं,
यात्रा किसी की स्थायी नहीं,
और समय किसी के लिए रुकता नहीं।
हम सब बस यात्री हैं,
और मनुष्य होने का अर्थ शायद यही है कि
यात्रा समाप्त होने से पहले
किसी के लिए रास्ता थोड़ा आसान कर जाएँ।
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