अविद्या क्या है?
भगवान बुद्ध ने अविद्या को तृष्णा का कारण क्यों कहा?
भगवान बुद्ध के धम्म में “अविद्या” सम्पूर्ण दुःख का मूल कारण मानी गई है।
यह केवल सामान्य अज्ञान या अशिक्षा नहीं है, बल्कि जीवन के वास्तविक सत्य को न जानना ही अविद्या है।
मनुष्य संसार को जैसा है वैसा नहीं देखता|
बल्कि, अपनी इच्छाओं, भय, मोह और कल्पनाओं के अनुसार देखता है।
यही विकृत दृष्टि “अविद्या” कहलाती है।
अविद्या का वास्तविक अर्थ:-
“विद्या” अर्थात् सही ज्ञान।
“अविद्या” अर्थात् सत्य का अभाव।
भगवान बुद्ध के अनुसार अविद्या का मुख्य अर्थ है —
चार आर्य सत्यों को न समझना,
अनित्य को नित्य मानना,
दुःख को सुख समझना,
अनात्म को आत्मा समझना,
परिवर्तनशील वस्तुओं में स्थायी सुख खोजना,
अर्थात् जहाँ वास्तविकता का सही दर्शन नहीं है, वहाँ अविद्या है।
भगवान बुद्ध ने अविद्या को तृष्णा का कारण क्यों कहा?
भगवान बुद्ध ने प्रतित्यसमुत्पाद में बताया कि, दुःख का पूरा चक्र अविद्या से शुरू होता है।
जब मनुष्य वास्तविकता को नहीं समझता, तब वह बाहरी वस्तुओं में सुख खोजने की उलझन मे पड़ता है।
यहीं से तृष्णा उत्पन्न होती है।
अविद्या कैसे तृष्णा बनती है?
मनुष्य यह हमेशा सोचता रहता है =>
यह शरीर हमेशा स्वस्थ रहेगा,
यह संबंध कभी नहीं टूटेगा,
यह सुख हमेशा बना रहेगा,
यह संपत्ति मुझे पूर्ण सुरक्षा देगी,
लेकिन, वह इस संसार के स्वभाव परिवर्तन के बारे मे कभी नहीं सोचता ओर ना ही वह उसे कभी जीवन की गहाराई से समझने की कोशिश करता है| एक मायावी भ्रम की दुनिया मनुष्य अपने जीवन मे निर्माण करता है, ओर उसी दुनिया को वह यथार्थ की दुनिया समझ बैठता है | यही मनुष्य की जीवन मे सबसे बड़ी भूल हो जाती है | जिसके कारण, वह स्वयं का ओर उसके सानिध्य मे आये हुए अनगिनत लोगो का भी इस भूल के कारण नुकसान करता है ओर स्वयं के लिए ओर दुसरो के लिए भी दुःख का कारण बनता है |
जब मनुष्य इस परिवर्तनशील संसार को स्थायी समझता है, तब वह उससे चिपक जाता है।
यही चिपकाव “तृष्णा” है।
तृष्णा का जन्म कैसे होता है?
पहले भ्रम उत्पन्न होता है, ओर उसी भ्रम से फिर इच्छा उत्पन्न होती है |
उदाहरण:-
एक व्यक्ति सोचता है —
“यदि मुझे बहुत प्रसिद्धि मिल जाए, तो मैं पूर्ण सुखी हो जाऊँगा।”
यह सोच ही उसकी अविद्या है।
फिर उसके भीतर ये विचारधारा पैदा होती है की, जिसके कारण उसका चित्त भ्रमित अवस्था के सोच मे पड़ता है :-
अधिक प्रसिद्धि की चाह मे,
दूसरों से तुलना करने मे,
प्रशंसा की भूख मे,
दुसरो की आलोचना करने मे उसे आनंद आने लगता है | ओर उसके भ्रमित आनंद की अवस्था मे वह मनुष्य स्वयं नहीं जान सकता की,यही उसकी
तृष्णा है।
अविद्या का सबसे गहरा रूप:-
अविद्या केवल बाहरी वस्तुओं के प्रति नहीं होती,
बल्कि “मैं” के प्रति भी होती है।
मनुष्य मानता है:
“यह शरीर, यह विचार, यह भावनाएँ — यही मैं हूँ।”
लेकिन, भगवान बुद्ध ने बताया है की :-
शरीर बदलता रहता है,
विचार बदलते रहते हैं,
भावनाएँ बदलती रहती हैं,
जो हर क्षण बदल रहा है, वह स्थायी “मैं” कैसे हो सकता है?
इस सत्य को न देख पाना ही अविद्या है।
मानवी जीवन में अविद्या:-
मनुष्य बार-बार उन्हीं चीजों में सुख खोजता है,
जिनसे पहले भी उसे दुःख मिला था।
फिर भी वह मानता है —
“इस बार शायद स्थायी सुख मिल जाएगा।”
यही अविद्या की शक्ति है।
एक मार्मिक उदाहरण:-
एक व्यक्ति किसी प्रिय संबंध में अत्यधिक आसक्त हो जाता है।
वह सोचता है:
“यह व्यक्ति कभी नहीं बदलेगा, कभी दूर नहीं जाएगा।”
लेकिन समय बदलता है,
विचार बदलते हैं,
परिस्थितियाँ बदलती हैं,
लोग बदलते हैं,
जब संबंध बदलता है, तब व्यक्ति टूट जाता है।
दुःख का कारण केवल बिछड़ना नहीं है।
दुःख का कारण है — अनित्य वस्तु को नित्य समझना।
यही अविद्या है।
भगवान बुद्ध का गहरा संदेश:-
भगवान बुद्ध ने कहा:
“तृष्णा दुःख का कारण है,
और तृष्णा का कारण अविद्या है।”
अर्थात् यदि जड़ समाप्त करनी है, तो केवल इच्छाओं को दबाना पर्याप्त नहीं।
अविद्या को समझना आवश्यक है।
अविद्या से उत्पन्न तीन विष
अविद्या से ही तीन प्रमुख क्लेश उत्पन्न होते हैं:
लोभ — पाने की अतृप्त इच्छा
द्वेष — अप्रिय वस्तु से घृणा
मोह — सत्य को न देख पाना
ये तीनों मिलकर मनुष्य को दुःख के चक्र में बाँधे रखते हैं।
अविद्या का अंत कैसे होता है?
भगवान बुद्ध ने कहा —
अविद्या का अंत “प्रज्ञा” से होता है।
प्रज्ञा क्या है?
वस्तुओं को जैसा है वैसा देखना।
जब साधक ध्यान और सतर्कता से देखता है कि:
सब अनित्य है,
तृष्णा दुःख को जन्म देती है,
कोई भी वस्तु स्थायी संतोष नहीं दे सकती
तब धीरे-धीरे मोह टूटने लगता है।
भगवान बुद्ध के धम्म का अत्यंत गंभीर सार:-
अविद्या अंधकार है।
तृष्णा उस अंधकार से उत्पन्न होनेवाली प्यास है।
और दुःख उस प्यास का परिणाम है।
भगवान बुद्ध का धम्म हमें बाहरी संसार से भागना नहीं सिखाता,
बल्कि संसार को सही रूप में देखना सिखाता है।
जब सत्य का दर्शन होता है, तब तृष्णा शांत होने लगती है।
और जहाँ तृष्णा शांत होती है, वहीं से दुःख का अंत प्रारंभ होता है।
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