अस्थियों के नगर में मत्सरियाँ भी हैं
रूपनंदा शास्ता की छोटी बहन थी। एक दिन उसने सोचा कि उसके अग्रज श्रेष्ठबुद्ध बन गए, उनका पुत्र राहुल, उसकी माता गौतमी तथा पति नंद भी प्रव्रजित हो गए; फिर मैं भी क्यों न प्रव्रजित हो जाऊँ? अतः वह भी प्रव्रजित हो गई पर बुद्ध के त्रिरत्न में उसकी कोई श्रद्धा नहीं थी।
उसने सुन रखा था कि तथागत सदैव रूप को अनित्य कहा करते हैं। अतः काफी समय तक वह कभी धर्मसभा में नहीं गई पर एक दिन वह बहुत साहस जुटा कर धर्मोपदेश सुनने गई। उसने अपने आपको शास्ता की दृष्टि से छिपाकर रखा। इधर बुद्ध ने अपनी अंतर्दृष्टि से देख कर सोचा कि रूपनन्दा को किस प्रकार शिक्षा दी जाए। काँटा निकालने के लिए काँटे का ही व्यवहार किया जाता है- यह सोचकर उन्होंने एक अति सुंदर षोडशी लड़की को अपने पीछे प्रकट किया जो उनको पंखा झल रही थी। उस तरुणी को या तो रूपनन्दा देख सकती थी या बुद्ध। उसकी अपूर्व सुन्दरता को देख रूपनन्दा को लगा कि उसके सामने वह वैसी ही थी जैसे एक राजहंसिनी के सममुख एक मादा कौआ खड़ी हो। उसकी सुन्दरता से प्रभावित होकर वह उसमें अनुरक्त हो गई।
बुद्ध ने उसकी आसक्ति देख उस तरुणी का रूप बदलना प्रारम्भ कर दिया। पहले उसका षोडशी रूप बदलकर उसको बीस वर्ष की युवती के रूप में दिखाया। बाद में उसका सौंदर्य क्रमशः कम करते हुए उसे प्रौढ़ और एक बुढ़िया के रूप में दिखा दिया। बूढ़ी औरत के रूप में वह एक लाठी के सहारे बहुत कठिनाई से अपने काँपते हुए शरीर को संभाल रही थी। बाद में वह रोगग्रस्त होकर गिर गई, अपने ही मलमूत्र में लोटती रही और दर्द से पीड़ित रही। अंततः मृत्यु को प्राप्त हुई। शरीर पूरी तरह फूल गया, बदबू आने लगी और शरीर के नौ छिद्रों से दुर्गन्धयुक्त द्रव्य बाहर आने लगे; आँख, कान, मुँह सभी से कीड़े बाहर आने लगे। कौआ, चील उस शरीर को खाने के लिए टूट पड़े।
इन दृश्यों को देख रूपनन्दा की उस युवती में आसक्ति खंडित हो गई और उसमें पूर्ण वैराग्य जाग उठा। उसकी मनःस्थिति देखकर, तथागत ने समय को अनुकूल पाकर, रूपनन्दा को समझाया कि अपने रूप पर किस बात का अभिमान? इस तरुणी की जो गति हुई है, वह तुम्हारी भी होगी और सबों की भी होगी।
यह शरीर रोगों का घर है। अन्दर में गन्दा, अपवित्र, दुर्गन्धमय नाला बह रहा है। पाखाना-पेशाब, शुक्र-खखार, नाक-आँख-कान की गंदगी, पीव आदि अनेक गंदगियों को ढँककर, ऊपर से उसे सुन्दर बना दिया गया है। ऐसा अपवित्र शरीर शाश्वत भी नहीं है, वह अनित्य है। गन्दगी से भरा हुआ घड़ा, जिसे बाहर से बहुत सुंदर रंगों से रंग दिया गया हो, एक दिन टूट जाएगा। ऐसे शरीर से कोई मूर्ख व्यक्ति ही आसक्त करेगा। ऐसे शरीर की प्रशंसा तो कोई महामूर्ख ही करेगा। सत्य का जो अन्वेषी इस सत्य को पहचान लेगा, वह इस शरीर के धोखे से बाहर आ जाएगा। जो इस शरीर के धोखे से बाहर आ जाएगा, वह आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाएगा।
बुद्ध ने यह भी समझाया कि यह शरीर तीन सौ अस्थियों का घर मात्र है। जैसे शाक-सब्जी के वृक्ष को खड़ा रखने के लिए उसे लकड़ी से बाँध दिया जाता है, जैसे खर को बल्लियों एवं रस्सी से बाँधकर उसके ऊपर मिट्टी का लेप कर, झोपड़ी का निर्माण किया जाता है, वैसे ही तीन सौ हड्डियों को एकत्र कर उन्हें पेशियों से बाँध दिया जाता है, और उसके अन्दर रक्त की नलिका बनाकर माँस द्वारा स्थायी रूप देकर, चर्म द्वारा ढँक दिया जाता है। इस शरीर के अन्दर बुढ़ापा, बीमारी व मृत्यु के साथ-साथ अभिमान आदि को छुपाकर रख दिया जाता है जो समय-समय पर अपना असर दिखाते हैं। ऐसे शरीर से अगर कुछ प्राप्त हो सकता है तो वह है शारीरिक तथा मानसिक कष्ट; उससे आनन्द कहाँ?
गाथा:
अट्ठीनं नगरं कतं, मंसलोहितलेपनं।
यत्थ जरा च मच्चु च, मानो मक्खो च ओहितो।
अर्थ:
यह शरीर अस्थियों से बना हुआ नगर है जिसे बाहर से माँस तथा रक्त द्वारा लीप दिया गया है। इस नगर में वृद्धावस्था, मृत्यु, अभिमान और ईर्ष्या आदि दुर्गुण वास करते हैं।
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