भारतीय दर्शनशास्त्र के सम्बन्ध में आधुनिक युग में एक अत्यन्त प्रचलित धारणा यह बन गई है कि न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्वमीमांसा और वेदान्त—ये छह वैदिक दर्शन परस्पर विरोधी दार्शनिक प्रणालियाँ हैं। विशेषतः पाश्चात्य विद्वानों तथा उनके प्रभाव में विकसित आधुनिक अकादमिक पद्धति ने इन दर्शनों को प्रायः अलग-अलग और प्रतिस्पर्धी विचारधाराओं के रूप में प्रस्तुत किया। परिणामस्वरूप अनेक शिक्षित भारतीयों के मन में भी यह धारणा बैठ गई कि प्रत्येक दर्शन अन्य दर्शनों का खण्डन करता है और वे एक-दूसरे के विरोध में खड़े हैं। किन्तु जब इस विषय का शास्त्रीय, तार्किक और पारम्परिक दृष्टि से गंभीर परीक्षण किया जाता है, तब स्थिति कहीं अधिक सूक्ष्म और संतुलित दिखाई देती है।
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि भारतीय परम्परा में “विरोध” का अर्थ क्या है। न्याय और मीमांसा की दृष्टि से विरोध तभी माना जाता है जब एक ही विषय, एक ही प्रसंग और एक ही अभिप्राय के सम्बन्ध में दो कथन परस्पर निषेधक हों। उदाहरणार्थ यदि एक शास्त्र कहे कि “आत्मा नित्य है” और दूसरा उसी अर्थ और प्रसंग में कहे कि “आत्मा अनित्य है”, तब वास्तविक विरोध माना जाएगा। किन्तु यदि एक शास्त्र धर्म की मीमांसा कर रहा हो, दूसरा ब्रह्मतत्त्व की, तीसरा चित्तविज्ञान की और चौथा पदार्थतत्त्व की, तो वहाँ विषयभेद है, विरोध नहीं।
यहीं से षड्दर्शनों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होने लगती है। प्रत्येक दर्शन का एक प्रमुख प्रतिपाद्य अवश्य है। पूर्वमीमांसा का केन्द्र धर्म और वैदिक कर्म है; वेदान्त ब्रह्म और मोक्ष का विवेचन करता है; योग चित्तवृत्तिनिरोध और साधना का मार्ग प्रस्तुत करता है; न्याय प्रमाण और तर्क की व्यवस्था करता है; वैशेषिक पदार्थों का वर्गीकरण करता है; और सांख्य प्रकृति-पुरुष-विवेक तथा दुःखत्रयनिवृत्ति का प्रतिपादन करता है। अब यदि इन सबका प्रतिपाद्य भिन्न है, तो उनकी विवेचन-पद्धति, शब्दावली और सिद्धान्त-रचना में भिन्नता स्वाभाविक है। यह भिन्नता विरोध का प्रमाण नहीं, बल्कि कार्य-विभाजन का संकेत है।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी दर्शन के एक विशेष पक्ष को ही उसका सम्पूर्ण स्वरूप मान लिया जाता है। उदाहरणार्थ सांख्यदर्शन को केवल “प्रकृति और पुरुष की संख्या-मीमांसा” तक सीमित करके प्रस्तुत किया जाता है। जबकि वास्तव में सांख्य अत्यन्त व्यापक दार्शनिक प्रणाली है। उसमें प्रमाणमीमांसा, कारण-कार्य-सिद्धान्त, त्रिगुणवाद, मनोविज्ञान, दुःख और मोक्ष का विवेचन, पुरुष की चेतन सत्ता और प्रकृति की प्रवृत्ति—इन सभी का गम्भीर प्रतिपादन है। उसी प्रकार न्याय केवल तर्कशास्त्र नहीं; वह आत्मा, ईश्वर, दुःख और मोक्ष की भी चर्चा करता है। योग केवल आसन या समाधि का शास्त्र नहीं; उसमें क्लेश, कर्म, संस्कार, ईश्वर और ज्ञान का भी विवेचन है। पूर्वमीमांसा केवल कर्मकाण्ड नहीं; उसमें भाषा-दर्शन और प्रमाणमीमांसा का अत्यन्त सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है। अतः प्रत्येक दर्शन अपने मुख्य प्रतिपाद्य से आगे बढ़कर व्यापक तत्त्वचिन्तन प्रस्तुत करता है।
यह सत्य है कि विभिन्न दर्शनों में कुछ सिद्धान्तगत भिन्नताएँ दिखाई देती हैं। उदाहरण के लिए सांख्य की कुछ व्याख्याओं में निरीश्वरवाद की प्रवृत्ति दिखाई गई, जबकि योग ईश्वर को स्वीकार करता है। अद्वैत वेदान्त जगत् को मायिक कहता है, जबकि न्याय-वैशेषिक जगत् की वस्तुगत सत्ता पर बल देते हैं। पूर्वमीमांसा कर्म को प्रमुखता देती है, जबकि वेदान्त ज्ञान को सर्वोच्च साधन बताता है। आधुनिक पाश्चात्य अध्येताओं ने इन्हीं भिन्नताओं को प्रमुख आधार बनाकर दर्शनों को “competing systems” अर्थात् प्रतिस्पर्धी प्रणालियों के रूप में प्रस्तुत किया। किन्तु यह दृष्टि भारतीय परम्परा की मूल समन्वयात्मक भावना का पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं करती।
भारतीय आस्तिक परम्परा षड्दर्शनों को “वेदोपजीवी” मानती है। अर्थात् वे सभी वेद को प्रमाण स्वीकार करते हैं और सत्य के विभिन्न पक्षों का प्रतिपादन करते हैं। इसी कारण अनेक पारम्परिक आचार्यों तथा विशेषतः स्वामी दयानन्द सरस्वती ने यह मत प्रतिपादित किया कि षड्दर्शन वास्तव में परस्पर पूरक हैं। उनके अनुसार जहाँ विरोध प्रतीत होता है, वहाँ या तो विषयभेद का विचार नहीं किया गया है, या फिर अनार्ष भाष्यों तथा सम्प्रदायगत आग्रहों ने मूल तात्पर्य को विकृत कर दिया है।
स्वामी दयानन्द का मत था कि न्याय प्रमाण-विचार की भूमिका निर्मित करता है; वैशेषिक पदार्थतत्त्व का विश्लेषण देता है; सांख्य सृष्टि और तत्त्वों की व्यवस्था समझाता है; योग साधना और अनुभव का मार्ग बताता है; पूर्वमीमांसा धर्म और कर्म की व्यवस्था करती है; और वेदान्त परमब्रह्म तथा मोक्ष का प्रतिपादन करता है। इस प्रकार ये सभी दर्शन मिलकर एक समग्र वैदिक तत्त्वदर्शन की रचना करते हैं। वे शरीर के विभिन्न अंगों की भाँति हैं—भिन्न कार्य करते हुए भी एक ही जीवन-व्यवस्था के अंग।
यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि भारतीय परम्परा का उद्देश्य केवल तार्किक संघर्ष उत्पन्न करना नहीं था। पश्चिमी दार्शनिक परम्पराओं में अनेक बार विचारधाराएँ परस्पर पूर्ण निषेध के रूप में खड़ी होती हैं; किन्तु भारतीय परम्परा का आग्रह अधिकतर समन्वय पर रहा। इसी कारण यहाँ शास्त्रार्थ का उद्देश्य केवल प्रतिपक्ष का विनाश नहीं, बल्कि तत्त्वनिर्णय था। मतभेदों के रहते हुए भी एक व्यापक आध्यात्मिक एकता की खोज भारतीय दर्शन की विशेषता रही है।
अतः अधिक संतुलित निष्कर्ष यही प्रतीत होता है कि षड्दर्शनों में प्रतिपाद्यभेद, पद्धतिभेद और कुछ स्थानों पर सिद्धान्तगत भिन्नताएँ अवश्य हैं; किन्तु उन्हें पूर्णतः परस्पर-विरोधी दर्शन कहना शास्त्रीय और पारम्परिक दृष्टि से उचित नहीं है। वास्तविक विरोध समान विषय पर परस्पर निषेधक प्रतिपादन में होता है, जबकि षड्दर्शन मुख्यतः विभिन्न पक्षों से सत्य का विवेचन करते हैं। इसलिए वैदिक परम्परा उन्हें विरोधी नहीं, बल्कि पूरक और समन्वित तत्त्वदर्शन के विविध आयामों के रूप में देखती है।
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