साक्षी की पहचान
हमें कैसे पता चले कि वह कौन सा क्षण होता है जब हमारा साक्षी में प्रवेश हो जाता है और हम साक्षी हो जाते हैं?
हमारे रोजमर्रा के जीवन में ऐसे कई मौके आते हैं जब हम साक्षी में प्रवेश कर जाते हैं। लेकिन हम अपनी इस स्थिति को पहचान नहीं पाते हैं। अचानक घटी कोई घटना हमें साक्षी में ला खड़ा करती है। लेकिन उस समय हम सजग नहीं होते हैं, इसलिए पहचान नहीं पाते हैं। यदि हम उस घटना के प्रति सजग हो जाते हैं, होश से भर जाते हैं, अपना ध्यान बाहरी घटना के साथ ही अपने शरीर के भीतर हो रही घटनाओं पर भी लगाते हैं तो बात हमारी समझ में आने लगती है।
साक्षी की पहली स्थिति है - प्रेम का क्षण
जब हमारा किसी से प्रेम होता है तब हमारा साक्षी वाली स्थिति में प्रवेश हो जाता है। ज्यों ही हमारा प्रेमी हमारे सामने आता है अचानक हमारा सोच-विचार रूक जाता है और हम वर्तमान में आ जाते हैं। अक्सर हम या तो अतीत की किसी स्मृति में खोए रहते हैं या फिर भविष्य में करने वाले किसी काम का सोच-विचार करते रहते हैं लेकिन प्रेमी को देखते ही हमारा सोच-विचार रूक जाता है और हम वर्तमान में आ जाते हैं। और वर्तमान में आते ही हमारा साक्षी में प्रवेश हो जाता है। विचारों की अनुपस्थिति ही साक्षी की उपस्थिति है। क्योंकि जो साक्षी विचारों में खोया हुआ था विचारों के रूकते ही वह अपने आप में लौट आता है और हमें साक्षी का स्मरण होता है। जैसे ही हम साक्षी हो जाते हमारी श्वास गहरी हो जाती है, दिल की धड़कनें सुनाई देने लगती है, सारे शरीर में कंपकंपी सी छूट जाती है और मन में विचारों की जगह एक सन्नाटा सुनाई देने लगता है, निर्विचार का सन्नाटा, जो अचानक विचारों की अनुपस्थिति में आ खड़ा होता है।
साक्षी की दूसरी स्थिति है - दुर्घटना का क्षण
अचानक घटी कोई दुर्घटना, जिसे देख-सुनकर हम अवाक खड़े रह जाते हैं, तब भी हमारा साक्षी में प्रवेश हो जाता है। जब अचानक हमें पता चलता है कि अभी-अभी हमारे किसी प्रियजन की दुर्घटना में असमय मौत हो गई है...
हम वहीं स्तब्ध खड़े रह जाते हैं और हमारी सोच-विचार करने की क्षमता समाप्त हो जाती है। और सोच-विचार की जगह सिर में एक सन्नाटा सुनाई देने लगता है। हम वर्तमान में आ जाते हैं और हमारा साक्षी में प्रवेश हो जाता है। हमारी श्वास गहरी हो जाती है, दिल धड़कने लगता है और शरीर में कंपकंपी छूट जाती है।
साक्षी की तीसरी स्थिति है - खतरे का क्षण
जब खतरे का समय हो और हम भयभीत होते हैं तब भी हमारा साक्षी में प्रवेश हो जाता है। अचानक अभी-अभी हमारा एक्सीडेंट होते-होते बचा हो या हम ऐसी परिस्थिति में हों जहां पर हमारी जान को खतरा हो, तब भी हमारा सोच-विचार रूक जाता है और हम वर्तमान में आ जाते हैं। हमारी श्वास गहरी हो जाती है, दिल जोर-जोर से धड़कने लगता है, शरीर में कंपकंपी छूट जाती है, और हमारे दिमाग में विचारों की जगह एक सन्नाटा पसर जाता है।
यानि विचारों की अनुपस्थिति में हम वर्तमान में आ जाते हैं और वर्तमान में हम साक्षी हो जाते हैं और साक्षी होते ही हमें अपने भीतर एक सन्नाटा सुनाई देता है। यह सन्नाटा ही अनहद नाद है, जो विचारों के रूकने पर सुनाई देता है।
प्रेम, दुर्घटना और खतरा इन तीनों ही स्थितियों में हमारा सोच-विचार रुक जाता है और हम वर्तमान में आ जाते हैं।सोच-विचार के रूकते ही हमारे शरीर से सारे तनाव हट जाते हैं तो हमारी श्वास गहरी हो नाभि तक जाने लगती है। श्वास नाभि तक जाती है तो आक्सीजन मिलने पर नाभि चक्र सक्रिय होने लगता है और सारा शरीर कांपने लगता है। श्वास गहरी होने के कारण ह्रदय को ज्यादा काम करना पड़ता है अतः हमारा ह्रदय जोर-जोर से धड़कने लगता है। हमारा दिल तो दिन रात धड़कता है लेकिन सोच-विचार में डूबे रहने के कारण हमें उसकी धड़कनें सुनाई नहीं देती है। विचारों के रूकते ही हमें दिल की धड़कनें सुनाई देने लगती है। सन्नाटा भी रात और दिन हो रहा है लेकिन सतत विचारों में उलझे रहने के कारण हम उसे सुन नहीं पाते हैं।
इन तीनों स्थितियों में पहले हम वर्तमान में आ जाते हैं, जिससे हमारे विचार रूक जाते हैं और विचारों के रूकने से हमारे शरीर के सारे तनाव हट जाते हैं और हमारी श्वास गहरी हो जाती है जिससे नाभि सक्रिय हो डांवाडोल होने लगती है और हम भयभीत हो कंपने लगते हैं। नाभि का सुप्त होना ही भय का कारण है। छाती तक अधूरी श्वास लेने के कारण नाभि को प्राण तत्व नहीं मिलते हैं और वह सुप्त होता जाता है और हम भयभीत होते रहते हैं। यदि हम अपनी श्वास को गहरी कर नाभि तक ले जाते हैं तो हमारा नाभि चक्र सक्रिय होने लगता है और हम अभय को उपलब्ध होने लगते हैं।
उक्त घटनाओं में वर्तमान में आने पर अचानक हमारे विचार रूक जाते हैं। सामान्यतः हम अपने विचारों को रोक नहीं पाते हैं इसलिए ध्यान में हम इसी बात को दूसरे सिरे से लेते हैं। ध्यान में हम पहले श्वास को नाभि तक गहरी लेते हैं तो हमारे शरीर से सारे तनाव हट जाते हैं और तनाव के हटते ही हमारे विचार रूक जाते हैं तो हम वर्तमान में आ जाते हैं। और वर्तमान में आते ही हम साक्षी हो जाते हैं।
यानि घटनाओं में हम पहले वर्तमान में आते हैं और हमारे विचार रूकते हैं फिर हमारे शरीर से तनाव हटते हैं और हमारी श्वास गहरी होती है और हमें मष्तिष्क में सन्नाटा और दिल की धड़कनें सुनाई पड़ती है जबकि ध्यान में हम पहले श्वास को गहरी करते हैं जिससे शरीर से तनाव हटता है जिससे विचार रुकते हैं और हम वर्तमान में आ जाते हैं और साक्षी हो जाते हैं। अर्थात श्वास पर ध्यान करने वाले सारे प्रयोग हमें वर्तमान में लाते हुए साक्षी में प्रवेश करवाते है।
No comments:
Post a Comment