प्रेम जब जन्म लेता है,
तो वह केवल “तुम मुझे अच्छे लगते हो” से शुरू नहीं होता।
वह धीरे-धीरे मन के अंदर एक घर बनाता है…
और फिर अनजाने में वही घर एक किला बन जाता है
जहाँ प्यार कम, पहरेदारी ज्यादा होने लगती है।
यही प्रेम का सबसे सूक्ष्म और सबसे खतरनाक मोड़ है।
शुरुआत में लगता है
“मैं तुम्हारी चिंता करता हूँ।”
फिर वही चिंता बदल जाती है
“तुम कहाँ हो?”
फिर
“किसके साथ हो?”
और अंत में
“तुम्हें वैसे ही रहना होगा जैसा मुझे पसंद है।”
यहीं प्रेम, अधिकार बन जाता है।
और सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि
जो इंसान सामने वाले को बाँध रहा होता है,
उसे खुद पता भी नहीं होता कि वह प्रेम नहीं, नियंत्रण कर रहा है।
"प्रेम का सबसे अदृश्य जाल"
प्रेम कभी-कभी उस माली जैसा हो जाता है
जो पौधे से इतना प्रेम करता है
कि हर घंटे उसे पानी देने लगता है।
उसे लगता है वह देखभाल कर रहा है,
पर ज्यादा पानी से जड़ें ही सड़ने लगती हैं।
रिश्तों में भी बार-बार पूछना, रोकना, हर बात में दखल देना
हमेशा प्रेम नहीं होता,
कभी-कभी यह खोने के डर से पैदा हुआ नियंत्रण होता है।
कोई कहता है...
“इतनी देर से रिप्लाई क्यों किया?”
कोई कहता है...
“तुम्हारी DP मुझे पसंद नहीं।”
कोई कहता है...
“उस दोस्त से थोड़ा कम बात करो।”
कोई कहता है...
“तुम्हें मेरी पसंद के कपड़े अच्छे लगने चाहिए।”
और धीरे-धीरे एक इंसान अपना असली स्वरूप खोने लगता है।
कल्पना करो…
एक आदमी ने अपने घर के आँगन में एक बहुत सुंदर चिड़िया पाली।
वह उससे बेहद प्रेम करता था।
सुबह उठते ही उसका हाल पूछता,
उसे दाना देता,
उसके लिए सबसे सुंदर पिंजरा खरीदता।
उसे लगता था
“देखो, मैं कितना ख्याल रखता हूँ।”
लेकिन एक दिन उसने देखा कि चिड़िया अब गाना बंद कर चुकी है।
वह घबरा गया।
उसने और महँगा पिंजरा खरीदा।
और अच्छा खाना दिया।
और ज्यादा ध्यान दिया।
पर चिड़िया फिर भी चुप रही।
उसे समझ नहीं आया…
क्योंकि उसे कभी यह समझाया ही नहीं गया था कि
चिड़िया दाने से नहीं,
आकाश से खुश होती है।
उसने प्रेम दिया,
पर उड़ने की आज़ादी छीन ली।
और अक्सर रिश्तों में यही होता है।
हम सामने वाले को दुख नहीं देना चाहते,
हम सिर्फ उसे खोना नहीं चाहते।
लेकिन खोने के डर में
हम उसे जीने ही नहीं देते।
"पुरुष और स्त्री दोनों कंट्रोल करते हैं"
पर दोनों का तरीका अलग होता है
पुरुष का नियंत्रण अक्सर बाहरी होता है।
स्त्री का नियंत्रण अक्सर भावनात्मक होता है।
पुरुष कहेगा
“ये मत पहनो।”
“वहाँ मत जाओ।”
“उससे बात मत करो।”
उसे लगता है कि वह सुरक्षा दे रहा है।
पर भीतर कहीं उसका डर बोल रहा होता है
“कहीं मैं तुम्हारे जीवन में कम महत्वपूर्ण न हो जाऊँ।”
दूसरी तरफ स्त्री अक्सर सीधे आदेश नहीं देती।
वह भावनाओं से बाँधती है।
वह कहेगी
“तुम बदल गए हो…”
“पहले इतना ध्यान रखते थे…”
“अब मैं खास नहीं रही क्या?”
और पुरुष अपराधबोध में घिर जाता है।
पुरुष बाहरी स्वतंत्रता नियंत्रित करता है।
स्त्री भीतर की भावनात्मक स्वतंत्रता।
एक शरीर को बाँधता है।
दूसरी मन को।
दोनों को खुद पता नहीं चलता कि
वे प्रेम नहीं, स्वामित्व कर रहे हैं।
"मन के अंदर से कंट्रोल करना सबसे खतरनाक है"
कुछ लोग सीधे रोकते नहीं।
वे बस इतना करते हैं कि
तुम्हें हर निर्णय पर अपराधबोध होने लगे।
तुम दोस्तों के साथ हँसो
तो लगे कि शायद तुम गलत हो।
तुम अपने लिए समय निकालो
तो लगे कि तुम स्वार्थी हो।
तुम फोन देर से उठाओ
तो लगे कि तुम प्यार कम करते हो।
यही मानसिक नियंत्रण है।
यह रस्सी से नहीं बाँधता,
यह इंसान को उसके ही मन में कैद कर देता है।
"बार-बार कॉल करना हमेशा प्रेम नहीं होता"
समाज ने हमें सिखाया
“जो ज्यादा पूछता है, वही ज्यादा प्यार करता है।”
पर यह हमेशा सच नहीं।
कभी-कभी बार-बार हाल पूछना
असल में सामने वाले की स्वतंत्रता पर पहरा होता है।
“कहाँ हो?”
“क्या कर रहे हो?”
“किसके साथ हो?”
“फोन क्यों नहीं उठाया?”
यह चिंता कम,
अपने डर को शांत करने की कोशिश ज्यादा होती है।
सच्चा प्रेम विश्वास पर चलता है,
निगरानी पर नहीं।
अगर कोई बाहर गया है
और तुम्हारे भीतर हर पाँच मिनट में बेचैनी उठ रही है,
तो समस्या शायद सामने वाले में नहीं,
तुम्हारे भीतर के असुरक्षित मन में है।
“केवल तुम मेरी हो” यह प्रेम नहीं, स्वामित्व है"
किसी इंसान को “मेरा” कहना आसान है।
पर यह भूल जाना कि
उसका अपना भी एक संसार है
यहीं गलती शुरू होती है।
उसके दोस्त हैं।
उसके रिश्तेदार हैं।
उसका काम है।
उसकी थकान है।
उसका अकेलापन है।
उसकी अपनी चुप्पियाँ हैं।
लेकिन प्रेम में डूबा इंसान चाहता है
“तुम्हारा सबसे अच्छा समय सिर्फ मुझे मिले।”
और यही अपेक्षा धीरे-धीरे दम घोंटने लगती है।
"प्रेम तब मरने लगता है"
जब एक इंसान खुद को खोने लगे
जब हर कपड़ा किसी और की पसंद से चुना जाए…
जब हर सोशल मीडिया पोस्ट पर अनुमति लेनी पड़े…
जब हर रिश्तेदार से बात करने पर सवाल उठे…
जब पढ़ाई तक तय होने लगे कि
“ये पढ़ो, वो मत पढ़ो…”
तब रिश्ता रिश्ता नहीं रहता।
वह धीरे-धीरे एक अदृश्य अनुबंध बन जाता है
जहाँ प्रेम के बदले स्वतंत्रता देनी पड़ती है।
किसी को कंट्रोल करने की इच्छा
असल में प्रेम से नहीं जन्मती।
वह जन्मती है
खोने के भय से।
जिसे खुद पर भरोसा नहीं होता,
वह दूसरे को बाँधना चाहता है।
जिसे डर होता है कि
“कहीं मैं पर्याप्त न निकलूँ…”
वह सामने वाले की दुनिया छोटी करने लगता है।
ताकि उसे लगे
“अब यह सिर्फ मेरा है।”
"लेकिन प्रेम का सत्य बिल्कुल उल्टा है"
जिसे सच में प्रेम करना आता है,
वह सामने वाले को और बड़ा बना देता है।
वह कहता है
“उड़ो…”
“दोस्त बनाओ…”
“अपने सपने पूरे करो…”
“अपने लिए भी जियो…”
क्योंकि उसे पता है
बंधन से साथ नहीं मिलता।
साथ मिलता है विश्वास से।
दुनिया का सबसे सुंदर प्रेम कौन सा है?
वह जहाँ
तुम किसी को खोने से डरते तो हो…
पर फिर भी उसकी स्वतंत्रता नहीं छीनते।
जहाँ तुम पूछते हो
“खाना खाया?”
पर यह नहीं पूछते
“हर मिनट कहाँ हो?”
जहाँ तुम कहते हो
“तुम सुंदर लग रही हो।”
पर यह नहीं कहते
“सिर्फ वैसा बनो जैसा मुझे पसंद है।”
जहाँ तुम किसी के जीवन में
कैदखाना नहीं,
घर बनते हो।
और शायद प्रेम की परिभाषा यही है...
“जिस रिश्ते में इंसान खुद को खोने नहीं,
खुद को और गहराई से पाने लगे…
वही प्रेम है।
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