हम सब एक बड़े नाटक में जी रहे हैं।
नाटक का नाम है “मैं तुम्हें पूरा कर दूँगा”।
दोनों पक्ष जानते हैं कि यह असंभव है, फिर भी पटकथा वही चल रही है। हम अपनी खाली जगह दूसरे में भरने की कोशिश करते हैं, और जब जगह नहीं भरती तो दूसरे को दोष देते हैं। यही आज का सबसे आम, सबसे महंगा और सबसे बेवकूफ़ाना सौदा है।
सच ये है कि आज का इंसान पहले कभी इतना स्वतंत्र नहीं था, और न कभी इतना अकेला।
हमने स्वतंत्रता को “कोई मुझे नियंत्रित न करे” में बदल दिया, लेकिन अंदर की भूख को कोई स्वतंत्रता नहीं दे पाई। नतीजा? हम रिश्तों में भी उपभोक्ता की तरह घुसते हैं क्या मिल रहा है? कितना मिल रहा है? क्या बेहतर मिल सकता है?
पुरुष अब पहले से ज़्यादा उलझन में है।
वह न पुराना वाला मालिक बन पा रहा है, न नया वाला संवेदनशील। बाहर से वह दिखावटी जागरूकता की भाषा बोलता है, अंदर से अभी भी वही पुरानी हिकारत महसूस करता है जब कोई उसकी कमज़ोरी देख लेता है। वह जानता है कि दुनिया अब उसकी रक्षक वाली भूमिका नहीं चाहती, लेकिन वह नई भूमिका भी नहीं सीख पाया। तो वह या तो अत्यधिक आक्रामक हो जाता है, या भावनात्मक रूप से सुन्न। दोनों ही हालत में वह असली नहीं होता।
स्त्री का संघर्ष और भी सूक्ष्म है।
वह आजादी पा चुकी है, लेकिन उस आजादी के साथ आने वाली ज़िम्मेदारी और अकेलेपन के बोझ को वह अकेले ही ढो रही है। वह चाहती है कि कोई उसे देखे न तो वस्तु की तरह, न सशक्त दिखावटी नारी की तरह, बल्कि एक इंसान की तरह जो कभी मजबूत, कभी कमज़ोर, कभी तर्कहीन, कभी प्रतिभाशाली हो। लेकिन वह खुद भी नहीं जानती कि वह बिना किसी भूमिका के कैसे खड़ी हो।
समस्या भूमिका उलटने की नहीं है।
समस्या ये है कि हम भूमिकाएँ बदल रहे हैं, लेकिन अपनी चेतना नहीं बदल रहे।
हम अभी भी एक-दूसरे को “समाधान” समझते हैं, जबकि दोनों की अंदरूनी खाई पहले से कभी ज़्यादा गहरी हो गई है।
सामाजिक मीडिया ने हमें दिखा दिया है कि बाहर कितना कुछ है। अब हर कोई सोचता है “कहीं बेहतर मिल सकता है”। ये डर रिश्तों को ज़हर दे रहा है। हम वर्तमान में कम, तुलना में ज़्यादा जी रहे हैं।
क्या हम किसी के साथ तब भी रह सकते हैं जब हम जानते हैं कि वह हमें कभी पूरा नहीं कर पाएगा?
क्या हम खुद को तब भी प्यार कर सकते हैं जब हम जानते हैं कि हम अधूरे हैं?
जो लोग इस सवाल का जवाब “हाँ” दे पाते हैं, वही आज सच्चे रिश्ते जी पा रहे हैं। बाकी सब सौदा है भावनात्मक लेन-देन, सुरक्षा जाल, अहंकार की मालिश, भविष्य की सुरक्षा।
सच्चा जुड़ाव तब शुरू होता है जब दोनों ये मान लेते हैं कि:
“मैं तुम्हें पूरा नहीं कर सकता। तुम मुझे पूरा नहीं कर सकती। फिर भी मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूँ।”
ये कोई रोमांटिक संवाद नहीं, ये बहुत कठिन, बहुत परिपक्व और बहुत दुर्लभ समर्पण है।
इसमें न कोई नायक है, न पीड़ित।
न कोई उद्धारकर्ता, न कोई टूटा हुआ।
सिर्फ़ दो इंसान जो अपनी-अपनी पूरी गन्दगी, सुंदरता, डर, महत्वाकांक्षा और थकान के साथ एक-दूसरे के सामने खड़े हैं।
बिना “मुझे ठीक करो” कहे।
बिना “मुझे पूरा करो” की उम्मीद के।
जब तक हम इस जगह नहीं पहुँचते, तब तक सब कुछ अभिनय रहेगा चाहे कितना भी आधुनिक, कितना भी समान, कितना भी सचेत दिखे।
रिश्ता कोई दो अधूरे टुकड़ों को जोड़ने का काम नहीं है।
रिश्ता दो अधूरे इंसानों का साहस है एक-दूसरे के अधूरेपन को देखने का, सहने का, और फिर भी रोज़ चुनने का।
बाकी सब बस कहानी है।
अच्छी कहानी।
लेकिन सिर्फ़ कहानी।
अब तुम खुद से पूछो
तुम किस कहानी में जी रहे हो?
और कितने दिन और नाटक कर पाओगे?
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