मनुष्य अपने जीवन को एक यात्रा मानता है, और इस यात्रा में उसे हमेशा कुछ पाना होता है। कभी वो धन की तलाश में भटकता है, कभी संबंधों में पूर्णता खोजता है, और कभी आध्यात्मिक शांति की ओर मुड़ जाता है। ये दिशा बदलती रहती है, पर खोज की प्रवृत्ति नहीं बदलती। हर बार उसे लगता है कि इस बार जो मिलेगा, वो उसे संतुष्टि दे देगा। पर हर उपलब्धि के बाद एक खालीपन फिर उभर आता है। ये खालीपन ही उसे आगे बढ़ने के लिए मजबूर करता है, और यही चक्र चलता रहता है।
जब व्यक्ति आध्यात्मिकता की ओर बढ़ता है, तो उसे लगता है कि अब उसे सच्ची शांति मिल जाएगी। वो ध्यान करता है, साधना करता है, अपने मन को नियंत्रित करने की कोशिश करता है। पर यहां भी वही बात छिपी होती है, कुछ पाने की चाह। ये चाह बहुत सूक्ष्म होती है, पर यही असली बाधा बन जाती है। क्योंकि जहां पाने की इच्छा है, वहां पहले से ही एक दूरी मान ली गई है। और ये दूरी ही अशांति का कारण बनती है।
ये समझ बहुत कठिन लगती है, क्योंकि मन हमेशा कुछ करने में विश्वास रखता है। उसे लगता है कि बिना प्रयास के कुछ भी संभव नहीं है। पर यही विश्वास उसे उस सत्य से दूर रखता है, जो किसी प्रयास का परिणाम नहीं है। ये सत्य हमेशा से मौजूद है, पर उसे पाने की कोशिश ही उसे छुपा देती है।
अहंकार की अदृश्य दीवार:
मनुष्य के भीतर एक ऐसी दीवार खड़ी होती है, जो दिखाई नहीं देती, पर हर अनुभव को प्रभावित करती है। ये दीवार अहंकार की होती है। ये अहंकार कोई ठोस चीज नहीं है, ये केवल एक विचार है, एक पहचान है, जिसे बार बार दोहराया गया है। ये पहचान इतनी मजबूत हो जाती है कि व्यक्ति इसे अपनी सच्चाई मान लेता है।
ये अहंकार हर चीज को अपने केंद्र में रखता है। हर अनुभव को ये अपने साथ जोड़ लेता है। अगर कुछ अच्छा होता है, तो ये कहता है कि ये मैंने किया। अगर कुछ बुरा होता है, तो ये दुखी हो जाता है। इस तरह ये हर अनुभव को व्यक्तिगत बना देता है। और यही व्यक्तिगतता दुख का मूल कारण बनती है।
अहंकार केवल बाहरी उपलब्धियों में नहीं होता, ये आध्यात्मिकता में भी प्रवेश कर जाता है। जब कोई व्यक्ति खुद को साधक मानता है, जब वो खुद को दूसरों से अलग और विशेष मानता है, तब भी ये अहंकार ही होता है। ये रूप बदल लेता है, पर इसकी जड़ वही रहती है।
स्वरूप की विस्मृति और खोज का भ्रम:
मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये नहीं है कि वो कुछ नहीं जानता, बल्कि ये है कि वो अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गया है। ये भूल इतनी गहरी है कि उसे ये भी याद नहीं रहता कि उसने कुछ भुला दिया है। इसी भूल के कारण वो बाहर खोजता है, जबकि जो खोजा जा रहा है, वो उसके भीतर ही है।
जिस प्रकार मछली को पानी खोजने की आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार मनुष्य को अपने अस्तित्व को पाने की आवश्यकता नहीं है। ये हमेशा से उसके साथ है। पर क्योंकि ये बहुत सामान्य और स्वाभाविक है, इसलिए इसका मूल्य नहीं समझ आता। ध्यान हमेशा उन चीजों पर जाता है, जो अलग हैं, जो नए हैं, जो आकर्षक हैं।
ये खोज एक आदत बन जाती है। व्यक्ति हर अनुभव में कुछ विशेष ढूंढता है। उसे लगता है कि कोई विशेष अवस्था आएगी, जहां सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा। पर ये समझ नहीं आती कि ये प्रतीक्षा ही उसे उस क्षण से दूर रख रही है, जो पहले से ही पूर्ण है।
बाहरी और भीतरी दौड़ का एक ही स्वरूप:
जीवन की दौड़ केवल बाहरी नहीं होती, ये भीतर भी चलती रहती है। बाहर व्यक्ति सफलता के पीछे भागता है, और भीतर शांति के पीछे। पर दोनों में कोई अंतर नहीं होता, क्योंकि दोनों ही अहंकार को मजबूत करते हैं। दोनों ही इस धारणा पर आधारित हैं कि कुछ कमी है, जिसे पूरा करना है।
जब कोई व्यक्ति कहता है कि उसे शांति चाहिए, तो इसके पीछे भी एक चाह होती है। ये चाह ही अशांति का कारण बनती है। क्योंकि जब तक चाह है, तब तक संतुष्टि नहीं हो सकती। ये एक अंतहीन चक्र बन जाता है, जहां हर प्राप्ति के बाद एक नई चाह जन्म लेती है।
इस दौड़ को समझना ही इसका अंत है। जब ये स्पष्ट हो जाता है कि ये सब केवल एक पैटर्न है, तब व्यक्ति इससे बाहर आ सकता है। ये बाहर आना कोई प्रयास नहीं है, ये केवल देखने का परिणाम है।
तत्व ज्ञान की शांत स्पष्टता:
जब सारे भ्रम धीरे धीरे गिरने लगते हैं, तब एक नई स्पष्टता उभरती है। ये स्पष्टता किसी विचार की नहीं होती, ये किसी तर्क की भी नहीं होती। ये एक सीधा अनुभव होता है, जो बिना किसी प्रयास के प्रकट होता है। इसमें कोई जटिलता नहीं होती, केवल सादगी होती है।
इस ज्ञान में कोई दावा नहीं होता, कोई अहंकार नहीं होता। ये केवल एक जानना होता है, जो शब्दों से परे होता है। इसमें व्यक्ति खुद को किसी पहचान से नहीं जोड़ता। वो केवल होता है, बिना किसी परिभाषा के।
ये तत्व ज्ञान व्यक्ति को भीतर से बदल देता है। अब उसे कुछ साबित करने की जरूरत नहीं होती, कुछ पाने की आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि अब उसे ये स्पष्ट हो जाता है कि जो है, वही पर्याप्त है।
शांति जो हमेशा से थी:
जब खोज समाप्त होती है, तब शांति प्रकट होती है। ये शांति कहीं से आती नहीं है, ये हमेशा से थी। केवल खोज के शोर में ये दब गई थी। अब जब शोर कम होता है, तो ये स्पष्ट हो जाती है।
इस शांति में कोई उत्तेजना नहीं होती, कोई विशेष अनुभव नहीं होता। ये बहुत साधारण होती है, इतनी साधारण कि इसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। पर यही साधारणता इसकी गहराई है।
अब जीवन वैसा ही रहता है, पर उसे देखने का तरीका बदल जाता है। हर चीज में एक सहजता आ जाती है, एक हल्कापन आ जाता है। और इसी हल्केपन में एक गहरी स्थिरता छिपी होती है, जो कभी बदलती नहीं है।
(यह लेख “सत्यदर्शी जी” की आत्मज्ञान विषयक पुस्तक से प्रेरित है। पुस्तक प्राप्त करने का Link नीचे Comment में दिया गया है।)
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