Friday, April 24, 2026

भय बाधा है, साहस सीढ़ी है

 "काम के बाण उस व्यक्ति को बद्ध कर देते हैं, जो विराग को प्राप्त नहीं हुआ है।" "कंपन से सावधान। भय की सांस के नीचे पड़ने से धैर्य की कुंजी में जंग लग जाता है और जंग लगी कुंजी ताले को नहीं खोल सकती।"


एक तो कुंजी का मिलना मुश्किल है। और मिल भी जाए तो हम उसे जंग लगा लेते हैं। धैर्य की कुंजी में जंग लग जाता है कंपन से, भय से।


"जितना ही तू आगे बढ़ता है, उतना ही तेरे पांव को खाई-खंदकों का सामना करना होता है। और जो मार्ग उधर जाता है, वह एक ही अग्नि से प्रकाशित है-साधक के हृदय में जलने वाली अग्नि से।"


वहां कोई बाहर का दीया साथ न देगा। और वहां कोई बाहरी प्रकाश नहीं है उस रास्ते पर। रास्ता अंधेरा है। और अगर कोई बाहरी प्रकाश के आधार से जा रहा है वहां तो नहीं जा सकेगा। क्योंकि वह अंधकार बाहरी प्रकाश से नहीं मिट सकता। वह अंधकार और तरह का अंधकार है। आपके दीए उसे नहीं मिटा सकेंगे। उस अंधकार को मिटाने के लिए एक ही दीया है, और वह है, साधक के हृदय में जलने वाली साहस की अग्नि।


भय बाधा है, साहस सीढ़ी है।


भय से विपरीत है साहस। साहस का क्या मतलब होता है?


साहस का मतलब होता है, जो अभी नहीं हुआ है, जो अभी प्रकट नहीं, उसके लिए चेष्टा, जो अभी अज्ञात में है, उसके लिए प्रयास।


भय का मतलब है, जो ज्ञात है, उसको पकड़ कर बैठ जाना।


आपका एक पैर जमीन पर है, जब आप एक कदम उठाते हैं जमीन से, तो आप अज्ञात में कदम उठा रहे हैं। अब यह पैर उस जमीन पर पड़ेगा, जिससे आप परिचित नहीं हैं। अगर आप भयभीत आदमी हैं, तो जिस जमीन पर आप खड़े हैं, उसको पकड़े रहें। अगर साहस के आदमी हैं तो जिस जमीन को जान लिया, उसको छोड़ें।


ध्यान रहे, भय पकड़ है, साहस त्याग है।


जो जान लिया, उसे छोड़ें। जिसे पहचान लिया और जिसमें कुछ भी न पाया, अब उसको खोने में डर क्या है? ज्यादा से ज्यादा यही होगा कि जो जमीन पैर के नीचे है, वह खो जाएगी। लेकिन वह जान ली गई है, जी ली गई है। अब उसका सार क्या है? नई भूमि का खतरा है। पता नहीं भूमि हो भी या न हो। इस खतरे के कारण साहस की जरूरत है। और धर्म की यात्रा तो निरंतर अज्ञात से अज्ञात में है।


जो हम जानते हैं, वह संसार है।


और जो हम नहीं जानते हैं, वह ही परमात्मा है।


उस अनजान में तो साहस की जरूरत पड़ेगी। तो पहले तो भय को हटा देना जरूरी है और फिर साहस को जन्माना जरूरी है।


"एक ही अग्रि से प्रकाशित है वह मार्ग साधक के हृदय में जलने वाली अग्रि से। जितना ही कोई साहस करता है, वह उतना ही पाता है। और जितना ही वह डरता है, उतनी ही वह ज्योति मंद पड़ जाती है।"


जैसे दीया जलता है बाहर का, तो आपको पता है, आक्सीजन से जलता है, नाइट्रोजन से बुझता है। आक्सीजन न हो पास दीये के हवा में, तो दीया बुझने लगता है। नाइट्रोजन ज्यादा हो, तो दीया बुझने लगता है। अगर तूफान चल रहा हो, और आपके घर के दीये के लिए डर पैदा हो जाए कि तूफान में बुझ न जाए, तो एक कांच का बर्तन उस पर ढक देना बचाने के लिए। तूफान शायद न बुझा पाता, वह कांच का ढंकने वाला बर्तन उसे शीघ्र ही बुझा देगा। क्योंकि कांच के ढंके बर्तन के भीतर बहुत थोड़ी आक्सीजन है, जल्दी ही जल जाएगी दीये में। नाइट्रोजन बचेगी, वह नाइट्रोजन बुझा देगी।


भीतर के दीए में भय नाइट्रोजन है और साहस आक्सीजन। वह भीतर का दीया जलता है जितना साहस हो, बुझता है जितना भय हो। और जैसे नाइट्रोजन और आक्सीजन का अपना रासायनिक विज्ञान है, वैसा ही उस भीतर का भी अपना रासायनिक विज्ञान है। तो सब उपायों से, जिन-जिन उपायों से साहस बढ़े, बढ़ाना है। और जिन-जिन उपायों से भय कम हो,वे उपाय करना। तो ही वह ज्योति जलेगी, जो वहां साथ देगी।


एक साधक अपने गुरु के घर से विदा हो रहा था। रात थी अंधेरी। और उस साधक ने कहा, मैं रात यहीं रुक जाऊं; रात अंधेरी है और रास्ता अजान है, फिर कोई संगी-साथी भी नहीं। तो गुरु ने कहा कि मैं तुझे दीया जला कर दे देता हूं, तू यह दीया लेकर चला जा। दीया जला कर गुरु ने दे दिया। वह साधक अपने हाथ में दीया लेकर सीड़ियां उतर गया, तो आखिरी सीड़ी पर गुरु ने कहा, एक क्षण रुक, और फूंक मार कर दीया बुझा दिया। उस साधक ने कहा, यह क्या खेल करते हैं आप?


गुरु ने कहा, इस अंधेरे रास्ते पर तो मैं तुझे दीया दे दूंगा, लेकिन मैं तुझे उस अंधेरे रास्ते पर कैसे दीया दे सकता हूं? और इस अंधेरे रास्ते पर भी तू बिना दीए के ही चल, अपने ही पैर की रोशनी से। बेहतर है कम से कम तुझे यह तो पता चले, कि अंधेरे में भी चला जा सकता है। तेरा साहस तो बढ़े। और फिर उस रास्ते पर, जिसका तू पथिक है, मैं कोई दीया तुझे न दे सकूंगा। अचानक मुझे ख्याल आया, इसलिए मैंने फूंक मारकर बुझा दिया, कि जब असली रास्ते पर दीया न दे सकूंगा, तो नकली रास्ते पर भी दीया देने से क्या सार है। और यह दीया देकर मैं तेरा भय बढ़ा रहा हूं। दीया बुझा कर तेरा साहस बढ़ा रहा हूं। तू अंधेरे में उतर जा, रास्ता मिल ही जाएगा। और खोजना, अंधेरा भी कट ही जाएगा। कोई अंधेरा शाश्वत नहीं है। और फिर मेरे जलाए दीए का भरोसा क्या, मेरी एक फूंक ने बुझा दिया! बाहर देख, कितनी आंधी चल रही है? और जो एक फूंक से बुझ गया है, वह आंधी में बुझ जाएगा। तो जो बुझ ही जाने वाला है. उसे देने का भी क्या प्रयोजन है। अगर मैं तुझे ऐसा दीया नहीं दे सकता, जो बुझे नहीं, तो जो बुझ सकता है, उसे देने का भी कोई अर्थ नहीं।


यह बात मूल्यवान है और ध्यान में रखने की है कि उस रास्ते पर आपके भीतर की ज्योति ही काम पड़ेगी। और भय अगर ज्यादा हुआ, तो ज्योति आपके भीतर की नहीं जग सकती। साहस हुआ, तो जग सकती है।


"वह हृदय-ज्योति वैसी ही है. जैसे किसी ऊंचे पर्वत शिखर पर चमकने वाली सूर्य की अंतिम किरण, जिसके बुझने पर अंधेरी रात का आगमन होता है। जब वह ज्योति भी बुझ जाती है. तब तेरे ही हृदय से निकल कर एक काली और डरावनी छाया मार्ग पर पड़ेगी और तेरे भय-की चारों तरफ पड़ती है।


इस जगत और उस जगत के परमात्मा के नियम विपरीत हैं। ठीक ऐसे ही जैसे आप झील के किनारे जाकर खड़े हो जाएं और अगर मछलियां देखती हों झील की तो उन्हें आपका प्रतिबिंव जो दिखाई पड़ेगा, वह उलटा दिखाई पड़ेगा। सिर नीचे होगा और पैर ऊपर होंगे, और मछलियां समझेंगी कि आप उलटे खड़े हैं। लेकिन मछलियों को क्या पता कि झील के बाहर नियम उलटे हैं। झील के बाहर आदमी सीधा खड़ा है। जिनको हम सीधा कहते हैं झील के बाहर, वह झील में उलटा दिखाई पड़ता है। प्रतिबिंब उलटे हो जाते हैं। जिसे हम संसार कहते हैं, वह झील के भीतर पड़ा हुआ जगत है। यहां नियम उलटे हैं।


इस सूत्र को समझने के लिए कह रहा हूं कि यहां छाया तभी बनती है आपकी, जब आपके चारों तरफ रोशनी होती है। यहां प्रकाश होता है, तो ही छाया बनती है। वहां जब प्रकाश नहीं होता, तब छाया बनती है। वहां के नियम उलटे हैं। यहां अंधेरे में कोई छाया नहीं बनती। यहां आप अंधेरे में खड़े हो जाएं, तो कोई छाया नहीं बनेगी। इस जगत में छाया बनाने के लिए प्रकाश की जरूरत है। उस जगत का नियम उलटा है। वहां छाया बनती है तब, जब प्रकाश नहीं होता। और छाया मिट जाती है, जब प्रकाश होता है। अगर आपके आस-पास अंधेरा पता चलता हो, तो भय को कम करना और साहस को बढ़ाना। यहां हम ध्यान में लगे हैं, वह भी भय कम करने और साहस को बढ़ाने का उपाय है। हजार तरह से यह हो सकता है। कभी छोटी-छोटी बातों से हो जाता है।


एक महिला ने, भारतीय महिला ने मुझे आकर कहा कि विदेशी महिलाएं नग्न हो जाती हैं, हमारी इतनी हिम्मत नहीं है। क्या बिना नग्न हुए घटना न घटेगी? नग्न होने से घटना घटने का कोई संबंध नहीं, संबंध किसी और बात से है। वह बात है भय और साहस की। वह जो सरलता से नग्न खड़ा हो गया, उसने बहुत सा भय छोड़ा है। वह कितना ही क्षुद्र मालूम पड़े कि कपड़े छोड़ने से क्या हुआ, कपड़ा नहीं छोड़ा उसने। कपड़े ही छोड़ा होता, तो कुछ भी न होता। लेकिन कपड़ा छोड़ने के पीछे कपड़े में छिपा हुआ जो भय है, वह भी छोड़ा।


लोग मुझसे आकर पूछते हैं, कपड़ा छोड़ने से क्या होगा? कपड़ा छोड़ने की बात ही नहीं है यहां। लेकिन कपड़ा पकड़े हुए क्यों हैं? और छोड़ने से कुछ नहीं होगा, तो पकड़ने से क्या हो जाएगा? वह जो पकड़ है, वह भय है भीतर। फिर बहाने हम कोई भी खोज ले सकते हैं। क्योंकि हम अपने भय को भी रेशनलाइज करते हैं, उसके भी तर्क बिठाते हैं। वह जो नग्न खड़ा हो जा रहा है, वह एक भय छोड़ रहा है और एक साहस कर रहा है। हो सकता है, शरीर उसका कुरूप हो, और लोग क्या कहेंगे? जिस शरीर को हजारों-हजार--से खुद भी नहीं देखा है दूसरों के देखने का तो सवाल ही नहीं है। उसे लोग देख कर क्या कहेंगे! क्या सोचेंगे! शरीर की नग्नता भी तो अपने को अनावृत छोड़ देना है लोगों के लिए। पागल समझेंगे, अनैतिक समझेंगे, अधार्मिक समझेंगे, बुरा समझेंगे--क्या समझेंगे लोग! वह सारा भय भीतर पकड़ रहा है; उस भय को छोड़ने की बात है। वस्त्र के साथ वह भी कभी गिरता है; वरात्र के गिरने के साथ कभी भीतर साहस का भी जन्म होता है।


मुझे याद आती है एक घटना। अमेरिका का एक युवा कवि है जिन्सवर्ग। बड़ी अजीब सी घटना उसके कवि सम्मेलन में घटी। केलिफोर्निया में एक कवि सम्मेलन में वह अपने गीत पड़ रहा था। गीत में ऐसे शब्दों का भी उपयोग था, जिनको हम अश्लील कहते हैं। लेकिन जिन्सबर्ग का यह कहना है कि वे अश्लील शब्द नहीं हैं और हम उन्हें अश्लील इसलिए तो कहते हैं कि शरीर के कुछ अंगों को अश्लील कहते हैं, और वे हमारे अंग भी हैं। और जो है, उसकी कितनी ही निंदा करो, उससे कोई छुटकारा नहीं। जो है, वह है, यथार्थ है। इसलिए वह अश्लील शब्दों का भी सहज प्रयोग करता है। लोग गुस्से में आ गए। और एक आदमी ने खड़े होकर कहा कि क्या तुम यह समझ रहे हो कि अश्लील शब्दों का कविता में उपयोग कर लिया, तो कोई बड़ा साहस किया।


तो जिन्सबर्ग ने कहा कि अब साहस की ही बात आ गई, तो तुम आ जाओ मंच पर और नग्र हो जाओ, या में नग्र हो जाता हूं। वह आदमी घबड़ाया; क्योंकि उसने यह नहीं सोचा था कि मामला यहां आ जाएगा। और जिन्सबर्ग कपड़े उतार कर नग्न खड़ा हो गया। और उसने कहा कि जो में कविता में कह रहा हूं, वह कविता में नहीं कह रहा हूं, बल्कि मैं मनुष्य को उसके पूरे यथार्थ में स्वीकार करता हूं। मेरे मन में कोई निंदा नहीं है।


और कितने ही वस्त्र ढांको, आदमी भीतर नंगा है। वस्त्र ढांकने में कुछ भय है। तो उस महिला को मैंने कहा कि नहीं, ऐसी चिंता की कोई बात नहीं है। वस्त्र छोड़ना आवश्यक नहीं है। ध्यान बिना वस्त्र छोड़े भी हो जाता है; हो गया है बहुतों को। बुद्ध ने कभी वस्त्र नहीं छोड़े और ध्यान हो गया। महावीर ने छोड़े और ध्यान हो गया। कोई वस्त्र छोड़ने से ध्यान के होने न होने की बात नहीं है। वह महिला बहुत प्रसन्न हो गई। उसने कहा, तब बिल्कुल ठीक है।


क्या बिल्कुल ठीक है? कौन सी चीज बिल्कुल ठीक है? ध्यान के बहाने भय है, बच गए। ऐसी जटिलता है आदमी के मन की। छोटे-छोटे भी भय छोड़ें। छोटे-छोटे भी साहस करें। एक-एक कदम उठाते-उठाते हजारों मील की यात्रा भी पूरी हो जाती है



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