Friday, April 24, 2026

मन की मौन और गहराई

 मन की गहरायी :-


यह कहानी है एक विद्वान संत की जिसने मन की गहराई नापने का निश्चय किया और इस विचार के साथ उसने सम्पूर्ण संसार का भ्रमण शुरू कर दिया। 


अपनी यात्रा के मार्ग में उसने धर्मोपदेशकों, संतों, उपदेशकों. भिक्षुओं, धन्ना सेठों, विद्वानों, ज्ञानी पंडितों और राजाओं आदि से भेंट की। 

वो जितना ही लोगों से मिलता उसकी खोज उतनी ही बढ़ती जाती फिर भी उसके पास अपने प्रश्न का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं होता।


कई दशक तक निरंतर मन की गहराई नापने का उसका प्रयास तब व्यर्थ जान पड़ा जब एक भ्रमणशील भिक्षु उसे मार्ग में मिला। भिक्षु नदी के जल को हथेली में रोकने की कोशिश कर रहा था लेकिन जल उसके हथेली में ठहर नहीं पा रहा था। 

भिक्षु का हर प्रयास व्यर्थ जा रहा था। संत बड़े ध्यान से भिक्षु के इस खेल को देख रहा था और तभी उसे अपने प्रश्न का उत्तर भिक्षु के इस कौतुहूल भरे खेल में अनायास ही मिल गया।


मन अनंत, अपार, असीमित, अनियंत्रित, अगम्य, निरंतर है जिसे बांधने का कोई भी प्रयास व्यर्थ ही है, उसे केवल साक्षी भाव से समझा जा सकता है, द्रष्टा हुआ जा सकता है और यही सहज बोध ही मन की गहराई नाप लेता है।


मन को बहुत गहराई तक भेदने की प्रक्रिया ही ध्यान है। 


मौन शक्ति :


मौन इंद्रिय संयम का सर्वोपरि साधन है।

महाभारत का लेखन समाप्त होने पर कृष्ण द्वैपायन व्यास ने श्रीगणेश से कहा था, 'मेरा बोलना अकथ था, किंतु आप मौन में अवस्थित होकर धैर्यपूर्वक लेखन कार्य में निमग्न रहते थे। आपको धन्यवाद! ऐसा वाक् संयम अप्रतिम है।' 


इस पर श्रीगणेश ने उत्तर दिया था, 'मूल ऊर्जा तो प्राण है। प्राण ही समस्त इंद्रियों को चैतन्य करने वाला चिन्मय पीयूष है, उसका अनावश्यक क्षरण महापातक है। 

वाक्-संयम के साध लेने से अन्य इंद्रियों का संयम भी स्वत: सध जाता है।' श्रीगणेश ने अपनी बात जारी रखी- 'अधिक बोलने वाले व्यक्ति के मुख से कभी-कभी अवांछित शब्द भी निकल जाते हैं। इसका कुफल इंद्रियों को भोगना पड़ता है।' 

इसीलिए इंद्रिय संयम में वाक् संयम प्रमुख है। 


मौन साधना की अध्यात्म-दर्शन में बड़ी महत्ता बताई गई है। कहा गया है "मौनं सर्वार्थ साधनम्।" अर्थात मौन रहने से सभी कार्य पूर्ण होते हैं। 

मौन में आंतरिक शक्ति को जगाने की अद्भुत एवं अद्वितीय क्षमता है।

जो व्यक्ति अपने जीवन में शाश्वत सत्य की खोज कर रहा है, उसे मौन साधना का ही पथ अनुकरण करना चाहिए। 


मूल मौन एक तितीक्षा है, तप साधना है जो समय-समय पर महामानवों द्वारा अपनी साधना पुरुषार्थ के क्रम में अपनायी जाती है। 

योगी के लिए सबसे मूल्यवान निधि है मौन की शक्ति। 


जीवन की इस अतृप्त उष्ण मरुस्थली में साधक जब चिन्मय पीयूष द्वारा पोषित मौन के उत्तरार्ध में प्रवेश करता है, तब वह परमसत्ता के और निकट जा पहुँचता है। 

बहिरंग से नाता विखंडन कर अंतःक्षेत्र की मौन गुफा में प्रवेश साधना उसके लिए अभीष्ट सिद्धिकारक होती है...


मन को कैसे मोड़ें ?


क्या आप जानते हैं कि मन का स्वभाव एक प्यासे हिरण जैसा है? वह सुख की तलाश में इधर-उधर भटकता रहता है, लेकिन अक्सर उसे सिर्फ 'मृगतृष्णा' (धोखा) ही मिलती है।


सच तो यह है कि मन को दबाने या जबरदस्ती रोकने से वह और ज्यादा बागी हो जाता है। इसे दबाना नहीं, बल्कि इसे **'ऊँचा रस'** देना है।


 **मन को जीतने के 3 सरल सूत्र:**


1️⃣ **स्वाद बदलिए:** मन केवल आनंद का भूखा है। जब इसे नाम (सिमरन) का सच्चा अमृत चखने को मिलता है, तो यह संसार के फीके भोगों को अपने आप छोड़ देता है।


2️⃣ **शब्द की शक्ति:** जैसे ही शब्द का रस अंदर उतरता है, मन की बाहर की भटकन खत्म हो जाती है। वह अंदर ही टिकने लगता है।


3️⃣ **स्थिरता का अभ्यास:** सिमरन और ध्यान के जरिए मन को अंदर की ओर मोड़ें। जितना आप अंदर जुड़ेंगे, उतना ही मन शांत होता जाएगा।


**निष्कर्ष:** मन को अपना दुश्मन मत समझिए, इसे अपना **दोस्त** बनाइए। सही दिशा मिलने पर यही मन आपको परमात्मा के द्वार तक ले जाएगा। 👣


आज ही से अपने मन को 'अमृत' की ओर मोड़ना शुरू करें।



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