Wednesday, April 15, 2026

एकाग्रता ध्यान नहीं है

 एकाग्रता ध्यान नहीं है।

एकाग्रता तो वैज्ञानिक विचारणा के लिए एक अत्यधिक उपयोगी माध्यम है। यह मन को एकाग्र करना, मन को संकुचित करना, मन को किसी विशेष वस्तु पर केंद्रित करना है। किंतु मन रहता है, और संकेंद्रित हो जाता है, और —समग्र हो जाता है।

ध्यान किसी पर एकाग्रता करना नहीं है। वास्तव में यह विश्रांत हो जाना है, संकुचित होना नहीं है।

एकाग्रता में एक लक्ष्य होता है। ध्यान में कोई भी लक्ष्य नहीं होता जिस पर हमें ध्यान लगाना है। तुम बस एक लक्ष्य—मुक्त चैतन्य में, चेतना के विस्तार में खो जाते हो। एकाग्रता में किसी एक पर ही सारा अवधान रहता है और दूसरी सभी वस्तुओं से सरोकार नहीं रहता। यह केवल एक वस्तु को अपने अवधान में सम्मिलित करती है, यह प्रत्येक अन्य वस्तु को बहिष्कृत कर देती है।


उदाहरण के लिए, यदि तुम मुझे सुन रहे हो, तो तुम मुझको दो उपायों से सुन सकते हो : तुम एकाग्रता के द्वारा सुन सकते हो; तब तुम तनाव में होओगे, और तुम जो मैं कह रहा हूं उस पर केंद्रित रहोगे। फिर पक्षी गा रहे होंगे, किंतु तुम उनको नहीं सुनोगे। तुम सोचोगे कि यह एक व्यवधान है।


एकाग्रता के लिए किए जाने वाले तुम्हारे प्रयास से ही व्यवधान का जन्म होता है। व्यवधान एकाग्रता का सह—उत्पाद है। तुम मुझको ध्यानपूर्ण ढंग से भी सुन सकते हो, तब तुम मात्र खुले हुए हो—उपलब्ध— तुम मुझे सुनते हो और तुम पक्षियों को भी सुनते हो, और वृक्षों से होकर हवा बहती है, .और एक ध्वनि निर्मित करती है; उसे भी तुम सुनते हो—तब यहां पर पूरी तरह से उपस्थित हो। फिर जो कुछ भी यहां पर घटित हो रहा है उसके लिए तुम बिना अपने किसी निजी मन के हस्तक्षेप के, बिना तुम्हारे किसी निजी चुनाव के तुम उपलब्ध रहते हो। तुम यह नहीं कहते कि मैं केवल इसी को सुनूंगा और मैं उसको नहीं सुनूंगा। नहीं, तुम सारे अस्तित्व को सुनते हो। फिर पक्षी और मैं और हवा तीन भिन्न वस्तुएं नहीं हैं। वे अलग—अलग नहीं हैं। वे उसी क्षण में साथ—साथ, एक संग घटित हो रहे हैं। निःसंदेह तब तुम्हारी समझ आत्यंतिक रूप से समृद्ध हो जाएगी, क्योंकि पक्षी भी अपने ढंग से उसी बात को कह रहे हैं, हवा भी उसी संदेश को अपने ढंग से संवाहित कर रही है, और मैं भी उसी बात को भाषा के रूप में कह रहा हूं जिससे कि तुम इसको और अधिक समझ सको। अन्यथा संदेश तो वही है। माध्यम भिन्न होते हैं किंतु संदेश एक ही है, क्योंकि परमात्मा ही संदेश है।


जब कोई कोयल दीवानगी से भर उठती है, तो यह परमात्मा ही दीवाना हो रहा है। इनकार मत करो, उसको अस्वीकार मत करो, ऐसा करके तुम परमात्मा को बाहर कर रहे होंगे। किसी वस्तु को निष्कासित मत करो, सभी को समाहित कर लो।


चेतना का संकुचित हो जाना एकाग्रता है, ध्यान है चेतना का विस्तीर्ण हो जाना, सभी द्वार खुले हैं, सारी खिड़कियां खुली हैं, और तुम कोई चुनाव नहीं कर रहे हो। निःसंदेह जब तुम चुनाव नहीं करते तब तुम्हें कोई व्यवधान भी नहीं पड़ता। ध्यान का सौंदर्य यही है. ध्यान करने वाले के लिए कुछ भी व्यवधान नहीं बन सकता। और इसी को कसौटी बन जाने दो। यदि तुम्हें व्यवधान होता है तो जान लो कि तुम एकाग्रता का अभ्यास कर रहे हो, ध्यान नहीं। कोई कुत्ता भौंकना आरंभ कर देता है—ध्यान करने वाले को बाधा नहीं पड़ती। वह इसे भी स्वीकार कर लेता है, वह इसका भी मजा लेता है। तब वह कहता है, देखो......तो परमात्मा कुत्ते के माध्यम से भौंक रहा है। बिलकुल ठीक। मेरे ध्यान करते समय भौंकने के लिए आपका धन्यवाद। इस तरह आप अनेक उपायों से मेरा ध्यान रखते हैं, लेकिन कोई तनाव नहीं उठता। वह यह नहीं कहता, यह कुत्ता मेरा विरोधी है। वह मेरी एकाग्रता भंग करने का प्रयास कर रहा है। मैं इतना धार्मिक, गंभीर व्यक्ति हूं और यह बेवकूफ कुत्ता.. .यह यहां कर क्या रहा है? फिर शत्रुता उठ खड़ी होती है, क्रोध जाग जाता है। और तुम सोचते हो कि यह ध्यान है? नहीं, किसी कीमत का भी नहीं है यह, यदि तुम एक कुत्ते पर, बेचारे कुत्ते पर क्रोधित हो उठते हो, जो कि केवल अपना स्वयं का काम कर रहा है। वह तुम्हारी एकाग्रता या तुम्हारे ध्यान या किसी भी चीज को नष्ट नहीं कर रहा है। वह तुम्हारे धर्म के बारे में, तुम्हारे बारे में, जरा भी चिंतित नहीं है। हो सकता है कि उसे पता भी न हो कि तुम क्या मूर्खता कर रहे हो। वह तो बस अपने जीवन का अपने ढंग से मजा ले रहा है। नहीं, वह तुम्हारा शत्रु नहीं है।


जरा निरीक्षण करना. .घर में यदि एक व्यक्ति धार्मिक हो जाता है, तो सारा घर मुसीबत में पड़ जाता है, क्योंकि वह व्यक्ति लगातार विचलित होने की सीमा रेखा पर रहता है। वह प्रार्थना कर रहा है; कोई जरा भी आवाज न करे। वह ध्यान कर रहा है; बच्चों को खामोश रहना चाहिए, कोई भी खेलेगा नहीं। तुम अस्तित्व पर अनावश्यक शर्तें थोप रहे हो। और तब यदि तुम विचलित हो जाते हो और तुमको व्यवधान अनुभव होता है, तो केवल तुम ही उत्तरदायी हो। केवल तुम पर ही आरोप लगाया जाना चाहिए, किसी और पर नहीं।


जिसे रूडोल्फ स्टीनर ध्यान कहता है वह एकाग्रता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। और एकाग्रता के द्वारा तुम अहंकार खो सकते हो और तुमको 'मैं' मिल जाएगा और यह 'मैं' एक बहुत सूक्ष्म अहंकार के सिवाय और कुछ भी नहीं होगा। तुम एक पवित्र अहक़ारी बन जाओगे, तुम्हारा अहंकार धर्म की भाषा से अलंकृत हो जाएगा, किंतु यह वहीं होगा।


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