जन्म और मृत्यु के समय की यह बेहोशी एक दृष्टि से आवश्यक भी है।
#केवल_वे_ही_लोग_मृत्यु_के_समय बेहोशी से मुक्त रहते हैं जो देहभाव से सर्वथा के लिए मुक्त हो गए हैं। देहभाव से मुक्ति ही हमें मृत्यु के समय चैतन्य, जाग्रत और तटस्थ रखती है। इसलिये योग का पहला लक्ष्य है और पहली उपलब्धि है--'देहभाव से मुक्ति।'
मृत्यु के समय बेहोशी की आवस्यकता क्यों ?
एक डॉक्टर हमारे किसी महत्वपूर्ण अंग का ऑपरेशन करता है, मगर इससे पहले वह हमें बेहोश कर देता है, इसलिए कि ऑपरेशन के समय हमें पीड़ा का अनुभव न हो। बाद में जब हमें होश आयेगा तो हमें पीड़ा अनुभव होगी। लेकिन वह पीड़ा सहनीय होगी। डॉक्टर के इस ऑपरेशन से कहीं बहुत बड़ा ऑपरेशन मृत्यु का है। इससे बड़ा और कोई ऑपरेशन नहीं है संसार में। डॉक्टर सिर्फ किसी अंग विशेष् का ही ऑपरेशन करता है, मगर मृत्यु तो हमारे पूरे शरीर का ऑपरेशन कर हमको शरीर से अलग कर देती है। *मृत्यु इस संसार में सबसे बड़ी शल्य-चिकित्सा है।* प्रकृति हमें बेहोश कर देती है और मृत्यु करती है शल्य-क्रिया और फिर आत्मा को हमेशा के लिए शरीर से अलग कर देती है।
आखिर मृत्यु तो एक दिन हर स्थूल शरीर की होनी है। मृत्यु से लोग भयभीत भी बहुत रहते हैं। रिश्तेदार, सम्बन्धी, परिवारी-- सभी दुःखी भी हो जाते हैं। लेकिन प्रकृति जहाँ निर्दयी है, वहीँ दयालु भी है। अगर वह मरणासन्न व्यक्ति को बेहोश न करे तो जो उसको पीड़ा होगी, उसे वह सहन नहीं कर सकेगा। इस दृष्टि से प्रकृति से बढ़कर संसार में कोई दयालु नहीं है।
जो व्यक्ति देहभाव से मुक्त होकर मृत्यु को प्राप्त होता है, उसे मृत्यु की घटना का बराबर ज्ञान रहेगा। वह दूर खड़ा देखता रहेगा अपने स्थूल शरीर को एक साक्षी की तरह, एक द्रष्टा की तरह मृत्यु घटित होते हुए, मृत्यु की महा शल्य-क्रिया होते हुए।
कैवल्य क्या है ?
देहभाव की मुक्ति की प्रतीति गहन होनी चाहिए। हमको बराबर यही समझ कर चलना होगा कि हम 'शरीर' नहीं, 'आत्मा' हैं। प्रकृति तभी हमें अवसर देगी और तभी हम होश में, चेतना में रहकर मर सकेंगे। लेकिन यह घटना तो बाद में घटने वाली है। पहले तो हमें सजग और चैतन्य रहकर सोना सीखना होगा और सोना सीखने से पहले सजग होकर जागना सीखना होगा। होश में जागना, होश में सोना--ठीक से इन दोनों का अभ्यास हो जाने पर ही हम पूरे होश में मर सकेंगे। देहभाव से मुक्ति का परिणाम है--अपनी मृत्यु का साक्षी बनना।
जो पूरी चेतना में मरता है, वह बड़े ही अदभुत अनुभव से गुजरता है। एक साधक ने मुझे बतलाया था कि शरीर से आत्मा को अलग होते समय उन्हें बड़े ही आनंद का अनुभव हुआ।
होश में मरने वाले व्यक्ति की मृत्यु शत्रु नहीं, मित्र प्रतीत होती है--एक ऐसा मित्र जो उसे विराट से मिलाता है। जो होश में मरता है, वह होश में जन्म भी लेता है। उसका जीवन कुछ दूसरा ही हो जाता है। वह वही सब कर्म नहीं दोहराता जो उसने पिछले जन्मों में बार-बार किये थे। उसका जीवन फिर नया और निर्मल हो जाता है। एक तरह से वह नए आयाम में प्रवेश कर जाता है और उस नए आयाम के नए जीवन का भी वह साक्षी हो जाता है। मृत्यु के समय वह साक्षी था, जन्म के समय भी साक्षी था और अब पूरे जीवन का साक्षी है। उसका जीवन फिर उसका नहीं रह जाता, उसका शरीर भी उसका नहीं रह जाता। उसका जीवन और उसका शरीर उस परम शक्ति का लीला-स्थली बन जाता है। वह एक प्रकार से जीवन्मुक्त हो जाता है। ऐसे में वह जो भी कर्म करता है, वह ईश्वर् की प्रेरणा से करता है। उसका प्रत्येक कर्म 'अकर्म' हो जाता है जिसका फल प्राप्त नहीं होता। अतः *देह की दुनियां से हमेशा के लिए तिरोहित होना ही कैवल्य है।* कैवल्य पद नहीं, अवस्था विशेष् है। कैवल्य का अर्थ है--केवल 'मैं'। मात्र 'मैं' सत्य हूँ और कुछ भी सत्य नहीं है।
जो देख रहा है--वही सत्य है। जो दिखलाई दे रहा है--वह असत्य है, मिथ्या है। एकमात्र आत्मा ही सत्य है, यह दृश्य (संसार) मिथ्या है--"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या "।
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