प्रश्न: अप्सरा साधना और यक्षिणी साधना मूलतः क्या हैं? इनका आध्यात्मिक लक्ष्य क्या है? इन साधनाओं की विधि का वर्णन क्या है और क्या यह सुरक्षित है? क्या ये साधनाएँ वास्तविक हैं या महज मिथक और इनका मनोवैज्ञानिक व गूढ़ रहस्य क्या है?
उत्तर:
देखिए, ये तीनों प्रश्न भारतीय तंत्र की सबसे रहस्यमयी और गोपनीय परंपराओं के द्वार खोलते हैं। यह कोई सामान्य पूजा-पाठ या ध्यान की विधि नहीं है, बल्कि काम्य प्रयोग का वह कोना है जहाँ साधक अपनी प्रबल इच्छाओं को सिद्ध करने के लिए सूक्ष्म जगत की शक्तियों से सीधा संपर्क साधता है। आइए, इसे बहुत धीरे-धीरे खोलते हैं और साथ ही यह भी समझते हैं कि सनातन धर्म की मुख्यधारा इसे क्यों आत्मिक पतन का मार्ग मानती है।
सबसे पहले समझते हैं कि ये साधनाएँ हैं क्या और इनका लक्ष्य क्या है। यह एकदम साफ बात है कि अप्सरा और यक्षिणी साधनाएँ मोक्ष, आत्मज्ञान या ईश्वर प्राप्ति के लिए नहीं हैं। ये पूर्णतः काम्य यानी इच्छापूर्ति वाली साधनाएँ हैं। अप्सरा साधना स्वर्गलोक की दिव्य नर्तकियों और सौंदर्य की अधिष्ठात्री देवियों को सिद्ध करने की विद्या है। मेनका, उर्वशी, रंभा, तिलोत्तमा जैसी अप्सराओं को प्रसन्न कर साक्षात् प्रकट करने का प्रयास किया जाता है। साधना का मूल उद्देश्य अलौकिक सौंदर्य, दिव्य भोग, अक्षत यौवन की प्राप्ति, तथा कला और संगीत में सिद्धि पाना है। मान्यता है कि सिद्ध अप्सरा साधक को दिव्य लोकों का भ्रमण भी करा सकती है।
दूसरी ओर यक्षिणी साधना धन के देवता कुबेर की अनुचरी अर्ध-दिव्य शक्तियों को सिद्ध करने की विद्या है। ये शक्तियाँ मूलतः प्रकृति, धन-संपदा और गुप्त खज़ानों से जुड़ी हैं। कनकावती जो स्वर्ण प्रदान करती है, कामेश्वरी जो हर इच्छा पूरी करती है, सुरसुंदरी जैसी प्रमुख यक्षिणियाँ हैं। इस साधना के पीछे अतुल धन-धान्य, गुप्त धन का ज्ञान, शीघ्रगामी बनने की शक्ति यानी खेचरत्व, और अदृश्य शक्तियों पर नियंत्रण पाने की इच्छा होती है। यहाँ आध्यात्मिक लक्ष्य नाम मात्र को शून्य है, क्योंकि यह मार्ग पूर्णतः भौतिकवादी है। सनातन धर्म के योग और वेदांत की मुख्यधारा इन सिद्धियों को मोक्षमार्ग में विघ्न डालने वाली और साधक के पतन का कारण मानती है, क्योंकि ये अहंकार और आसक्ति को और गहरा करती हैं।
अब बात करते हैं इन साधनाओं की विधि की और क्या यह सुरक्षित है। यह विधि अत्यंत जटिल, भयावह और कठोर है। इसका उल्लेख रुद्रयामल, भूत डामर तंत्र, यक्षिणी कवच एवं अन्य तंत्रसार ग्रंथों में मिलता है। सबसे पहली और अनिवार्य शर्त है गुरु दीक्षा। बिना किसी निष्णात गुरु के यह साधना करना सर्वथा वर्जित और प्राणघातक माना गया है। गुरु ही साधक की राशि, नक्षत्र और मनोबल परखकर इसकी अनुमति देता है। स्थान और समय भी विशेष होते हैं। साधना एकांत श्मशान, गुफा, नदी संगम या सुनसान पर्वत शिखर पर की जाती है। प्रायः अमावस्या या पूर्णिमा की मध्यरात्रि का चयन होता है।
विधि का स्वरूप बहुत कठोर है।
• साधक को मिट्टी या धातु के विशेष यंत्र पर रक्तचंदन या अष्टगंध से यक्षिणी या अप्सरा का चित्र या यंत्र बनाना होता है।
• मंत्र जप की संख्या लाखों में होती है और माला हड्डी यानी मृतक की रीढ़ या रुद्राक्ष की होती है।
• अप्सरा साधना में सुगंधित द्रव्य जैसे कपूर, केसर, कस्तूरी, गुलाब जल और शुद्ध वातावरण की आवश्यकता होती है।
• यक्षिणी साधना अपेक्षाकृत अधिक उग्र और तामसी है। इसमें पंचमकार (मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन) का प्रयोग होता है, जो शाब्दिक या प्रतीकात्मक हो सकता है, लेकिन ऊर्जा को निम्न स्तर पर ही जाग्रत करता है।
और सुरक्षा का प्रश्न तो और भी गंभीर है। यह एक महान जोखिम का कार्य है। साधना में थोड़ी सी भी कमी, मंत्र का गलत उच्चारण, या भय और कामुकता का संचार होने पर ये सूक्ष्म सत्ताएँ साधक पर आक्रमण कर सकती हैं। परिणामस्वरूप साधक का मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है, उन्माद हो सकता है, शारीरिक पक्षाघात हो सकता है, या अकाल मृत्यु भी हो सकती है। और यदि साधना सिद्ध भी हो जाए, तो साधक का मोह इन सत्ताओं से नहीं छूटता, जो अंततः मृत्यु के बाद निम्न लोकों या प्रेत योनि की प्राप्ति का कारण बनता है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह एक प्रकार की आत्महत्या ही है।
अब अंतिम और सबसे गूढ़ प्रश्न कि क्या ये वास्तविक हैं या महज मिथक और इनका मनोवैज्ञानिक व गूढ़ रहस्य क्या है। यह प्रश्न वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और अध्यात्मिक तीनों स्तरों पर जटिल है। पौराणिक और ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो राजा विक्रमादित्य और बेताल की कथाएँ, राजा भर्तृहरि, और शंकराचार्य जैसे आचार्यों के तंत्र संवाद इन साधनाओं के ऐतिहासिक अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं। परंपरा मानती है कि सतयुग और त्रेता में ये साधनाएँ सहज सिद्ध होती थीं, द्वापर में कठिन हो गईं, और कलियुग में ये लगभग असंभव एवं निष्फल हैं।
इसका मनोवैज्ञानिक यथार्थ और भी गहरा है। आधुनिक गहन मनोविज्ञान, विशेषतः कार्ल युंग के सिद्धांत के अनुसार, अप्सरा और यक्षिणी बाहरी सत्ताएँ न होकर साधक के अचेतन मन में स्थित आदिरूप (Archetypes) हैं।
• अप्सरा पुरुष मन की दमित काम वासना, सौंदर्य की आदर्श छवि और ऐनिमा (Anima) का प्रतीक है।
• यक्षिणी सुप्त लोभ, धन की अतृप्त भूख और प्राकृतिक शक्तियों पर नियंत्रण की गहरी आकांक्षा का प्रतीक है।
अत्यधिक एकाग्रता, संवेदी वंचन और सघन पुनरावृत्ति के द्वारा मस्तिष्क इस 'स्वनिर्मित सत्ता' को बाह्य रूप में प्रक्षेपित (Project) कर देता है और साधक को उसके दर्शन एवं अनुभूति होती है। सफलता-असफलता पूर्णतः साधक के अपने मन की दृढ़ता और भाव की गहराई पर निर्भर करती है।
और अब तांत्रिक दर्शन का आध्यात्मिक एवं गूढ़ रहस्य समझिए। यह साधना कुंडलिनी जागरण के एक वाममार्गी और अति-जोखिम भरे प्रयोग से अधिक कुछ नहीं है। साधक मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित प्रचंड काम और लोभ की ऊर्जा को जाग्रत कर उसे अत्यंत निम्न स्तर पर सिद्धि-रूप में अभिव्यक्त करता है। वास्तविक योगी इस ऊर्जा को नियंत्रित कर सहस्रार की ओर ले जाता है, जबकि ये साधनाएँ उसी ऊर्जा का भौतिकीकरण कर पतन का मार्ग खोलती हैं। श्रीकृष्ण ने गीता में साफ कहा है कि जो पुरुष कामनाओं का त्याग कर देता है, वही शांति को प्राप्त होता है, न कि वह जो उनके पीछे भागता है। यही श्लोक इन साधनाओं की पूरी सच्चाई पर प्रकाश डालता है।
निष्कर्ष यह है कि अप्सरा और यक्षिणी साधनाएँ मानव मन की अतृप्त कामनाओं की चरम परिणति हैं। इनके विवरण भारतीय तंत्र शास्त्र की विविधता और गूढ़ता को दर्शाते हैं, लेकिन नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से इनका अनुकरण करना आत्मविनाश का मार्ग अपनाना है। वास्तविक साधना भीतर की इन्हीं वृत्तियों पर विजय पाना है, न कि उन्हें दैवीय रूप देकर उनके समक्ष समर्पण करना।
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