Thursday, April 23, 2026

स्त्री प्रेम के बिना नहीं रह सकती

 स्त्री प्रेम के बिना नहीं रह सकती..प्रेम के बिना स्त्री का अस्तित्व ही सूखने लगता है..ऐसे जैसे फूल मुरझा जाते हैं..सड़ने लगते हैं...रहने को तो कोई भी इंसान प्रेम के बिना नहीं रह सकता लेकिन स्त्री के लिए ये खास ऑक्सीजन जैसा है..ये दोनों एक दूसरे के लिए जितने अनिवार्य हैं, समाज ने उनके बीच उतनी ही ऊंची दीवारें खड़ी कर दी हैं...


अब स्त्री ताउम्र प्रेम और हदों के बीच जूझती है, स्नेह पाने की चाह इतनी कि एक पिता से भी बगावत कर जाती है..बचपन में ममत्व ना मिले तो अल्हड़पन में इसकी चाहत में कुछ स्त्रियां अपना मूल्य ही भूल बैठती हैं..अपनत्व की चाह में पगलाई सी वो स्त्री बार बार उसे बाहर खोजती है..ठगी जाती हैं..प्रेम का ना मिलना उसे कमज़ोर कर देता है..वो ढोंगियों का शिकार हो जाती है..उसका आत्मसम्मान चकनाचूर हो जाता है, अस्मिता धूमिल हो जाती है.. अब वो बस एक यंत्र बनकर रह जाती है..थोड़ा सा प्यार का ढोंग मिलते ही किसी के सामने भी गिर जाती है..


फिर सामाजिक सुरक्षा का वास्ता देकर मर्ज़ी या बिन मर्ज़ी के उसे ब्याह दिया जाता है..इस गारंटी के साथ कि अब यहां इसे आत्मीयता मिलेगी, स्नेह मिलेगा...पर कई बार यहां भी उसपर अपनी मलकियत समझकर उसे प्रेम के लिए तरसाया ही जाता है...कई पहले से मर चुकी स्त्रियां यंत्रों की तरह ही काम करती हैं..प्रेमी का रोबोट बन जाती हैं.


लगातार उपेक्षा सहने से वो मन, असल जुड़ाव की पहचान ही खो बैठता है..जिस कोमलता के लिए वो बनी थी अब उसी जगह पर नफरत के बीज पैदा होने लगते हैं...फिर वही स्त्री जो जुड़ाव की तलाश में थी..उसी जुड़ाव की खातिर हत्याएं तक कर डालती है..


आप ढूंढेंगे तो आपको इन सबमें स्त्री की मनःस्थिति की कड़ियां मिलेंगी..स्त्री का हत्यारा हो जाना, प्यार पाने के लिए अपराध करने तक उतर आना कोई मामूली बात नहीं है..इसके पीछे गहरा मनोविज्ञान है..बहुत से केसों में इसकी शुरुआत उस स्त्री के बचपन में होती है.. प्रेम रहित बचपन..जहां उसे स्नेह की एक एक बूंद के लिए तड़पाया गया हो...बचपन की कड़वी स्मृतियां और बार बार ठगे जाने का असर उसे एक स्थायी असुरक्षा दे देता है..ये असुरक्षा का डर इतना गहरा होता है कि वो जहां थोड़ा सी भी तवज्जो मिले वहां वो समर्पण करने लगती है...बिछ जाती है किसी पायदान की तरह !


वरना स्त्री का किरदार ऐसा नहीं कि उसे कोई भी बहला ले..स्त्री अपनी सुरक्षा के लिए छठी इंद्री लेकर पैदा होती है..अगर परिवार में उसे सम्मान और भावनात्मक पोषण मिले तो यही उसे असीम ताकत देता है..फिर वो भटकती नहीं है


पर कुछ स्त्रियां प्रेम नहीं पाती, ना मां बाप से, ना प्रेमी से, ना पति से, बहकी हुई ये स्त्री प्लास्टिक के फूल की तरह होती है. ऊपर से बहुत सुंदर, पर अंदर से बेजान ! किसी मशीन की तरह ,जिससे जब कोई मानवीय चूक होती है, तो यही समाज...जिसने उसे सुखाया था उससे नफरत करने का स्वांग रचने लगता है..



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