Friday, April 17, 2026

रामचरितमानस और कलियुग

 रामचरितमानस और कलियुग...


गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के पन्नों पर स्याही से भविष्य के वो जख्म उकेरे थे, जिन्हें आज हम अपनी आँखों से देख रहे हैं। 

आइए, इन दो कालजयी चौपाइयों के आईने में देखते हैं कि कैसे हम उस गर्त की ओर बढ़ रहे हैं जिसकी भविष्यवाणी सदियों पहले हो चुकी थी:


"मारग सोइ जा कहूँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥"

"मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहूँ संत कहइ सब कोई॥"


अर्थ - 

जिसे जो अच्छा लगे, वही मार्ग है, जो गाल अधिक बजाते हैं, वही पंडित कहलाते हैं। जो मिथ्या कार्यों के आरंभ और ढोंग में तत्पर हैं, सब कोई उसी को संत कहते हैँ।


"मनमर्जी ही अब धर्म है"

चौपाई:मारग सोइ जा कहूँ जोइ भावा।


पुराने ज़माने में एक पक्का रास्ता होता था जिस पर सब चलते थे। लेकिन तुलसीदास जी कहते हैं कि कलियुग में "रास्ता वह है, जो मुझे पसंद है।" आज का इंसान कहता है— "मेरी लाइफ, मेरी मर्जी!" अगर मुझे चोरी करना अच्छा लगता है, तो वह मेरा सच है। अगर मुझे अनुशासन तोड़ना पसंद है, तो वही मेरा धर्म है। आज समाज में 'सही-गलत' की परिभाषा खत्म हो गई है। लोग अपनी सुविधा के हिसाब से नियम बनाते हैं और तोड़ते हैं। जो मन को भा गया, बस वही 'सत्य' बन बैठा है।


तुलसीदास जी कहते हैं कि कलियुग में इंसान किसी नियम, कायदे या शास्त्र को नहीं मानेगा। "जिसको जो अच्छा लगे, वही उसके लिए सही रास्ता है।" आज का सच: आज हम इसी दौर में जी रहे हैं। लोग कहते हैं— "मेरी लाइफ, मेरी मर्जी।" अगर किसी को गलत काम में सुख मिल रहा है, तो वह उसे ही अपना 'धर्म' बना लेता है। समाज के पुराने और ऊंचे आदर्शों को पीछे छोड़कर लोग अपनी मनमानी को ही 'आधुनिकता' का नाम दे रहे हैं। जो मन को भा गया, बस वही सही है।


आज हम 'Individualism' (व्यक्तिवाद) के उस दौर में हैं जहाँ नैतिकता की कोई एक परिभाषा नहीं बची। अगर किसी को झूठ बोलना 'सूट' करता है, तो वह उसके लिए सही है। प्राचीन मर्यादाओं और सिद्धांतों को 'पुरानी सोच' कहकर ठुकरा दिया गया है। आज हर व्यक्ति का अपना एक अलग 'धर्म' और अपना अलग 'सच' है, जिसे वह अपनी सुविधा के अनुसार बदलता रहता है।


"शोर मचाने वाला ही विद्वान"

चौपाई: पंडित सोइ जो गाल बजावा॥


पहले के समय में 'पंडित' या 'विद्वान' वह होता था जो सालों तक तपस्या और पढ़ाई करता था। लेकिन आज? आज तुलसीदास जी की बात एकदम सटीक बैठती है— "पंडित वही, जो गाल बजाए।" यानी, जिसके पास सबसे तेज़ आवाज़ है, जो सबसे ज़्यादा चिल्ला सकता है, जो शब्दों की बाजीगरी से दूसरों को चुप करा सकता है, दुनिया उसे ही सबसे बुद्धिमान मान लेती है। आज शांति से सच बोलने वाले को कोई नहीं सुनता, लेकिन ज़ोर-ज़ोर से 'गाल बजाने' (शोर मचाने) वाले के करोड़ों फॉलोअर्स हैं।


यहाँ 'पंडित' का अर्थ है बुद्धिमान व्यक्ति। तुलसीदास जी ने भविष्यवाणी की थी कि कलियुग में असली ज्ञान की कद्र खत्म हो जाएगी और "पंडित वही माना जाएगा, जो गाल बजाना (बड़बोलापन) जानता हो।"

 

आज आप टीवी डिबेट्स या सोशल मीडिया देखिए। जिसके पास सबसे तेज़ आवाज़ है, जो सबसे ज़्यादा शोर मचा सकता है और जो चतुराई से बातें घुमा सकता है, लोग उसी को सबसे बड़ा 'जीनियस' मान लेते हैं। शांत और गहरे ज्ञान वाले लोग पीछे छूट गए हैं और केवल 'गाल बजाने' वाले (दिखावटी वक्ता) आज के हीरो बन बैठे हैं।


आज के दौर में शांत ज्ञान की कोई कद्र नहीं है। टीवी डिबेट्स से लेकर सोशल मीडिया के कमेंट्स तक—विद्वान उसे ही माना जाता है जो सबसे तेज़ चिल्लाता है, जो तर्क को कुतर्क से दबा देता है। आज 'Information' (सूचना) बहुत है, पर 'Wisdom' (विवेक) शून्य है। जिसके पास शब्दों की बाजीगरी है, वही आज का सबसे बड़ा ज्ञानी (Influencer) बनकर बैठा है।


 "दिखावे का बाज़ार और नकली संत"

चौपाई: मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहूँ संत कहइ सब कोई॥


तुलसीदास जी कहते हैं कि जो लोग 'मिथ्यारंभ' (झूठे आडंबरों की शुरुआत) करते हैं और 'दंभ' (पाखंड और अहंकार) में डूबे रहते हैं, कलियुग में सारा समाज उन्हीं को 'संत' मानकर पूजेगा।


तुलसीदास जी कहते हैं कि कलियुग में लोग "पैकिंग" देखकर सामान खरीदेंगे, अंदर का माल नहीं देखेंगे। जो इंसान जितना बड़ा पाखंडी होगा, जो जितना बड़ा दिखावा (दंभ) करेगा, दुनिया उसे ही 'संत' या 'महान आदमी' कहेगी।

आज आप सोशल मीडिया खोलिए। लोग नकली हंसी, नकली लाइफस्टाइल और नकली ज्ञान का दिखावा कर रहे हैं। हम जानते हैं कि सामने वाला झूठ बोल रहा है, ढोंग कर रहा है, लेकिन पूरी दुनिया उसी के पीछे पागल है। असली हीरा धूल में पड़ा है और कांच के टुकड़ों को मखमल पर सजाया जा रहा है।


 आज हम देखते हैं कि जिनका जीवन भीतर से पूरी तरह खोखला और बेईमानी से भरा है, लेकिन बाहर से जिन्होंने बड़ी-बड़ी 'ब्रांडिंग' और दिखावा कर रखा है, दुनिया उन्हीं के पीछे भाग रही है। असली सादगी की पहचान मिटती जा रही है और 'पाखंड' को ही महानता का प्रमाण मान लिया गया है।


आज समाज में उन लोगों की जय-जयकार होती है जिनका जीवन ऊपर से 'फिल्टर्ड' और 'ग्लैमरस' है, चाहे भीतर से वे कितने ही खोखले क्यों न हों। आध्यात्मिक गुरुओं के नाम पर बड़े-बड़े साम्राज्य खड़े करने वाले पाखंडी हों या समाजसेवा का ढोंग करने वाले लोग—दुनिया उन्हीं के चरणों में झुकती है। जो वास्तव में त्याग कर रहा है, वह गुमनाम है; और जो विज्ञापन कर रहा है, वही 'संत' है।


तुलसीदास जी की ये बातें आज हवा की तरह साफ हैं। उन्होंने 500 साल पहले ही देख लिया था कि एक समय ऐसा आएगा जब इंसान सत्य को नहीं, बल्कि सुविधा को चुनेगा; ज्ञान को नहीं, बल्कि शोर को पूजेगा। 

सोच कर देखिए... उस ज़माने में न इंटरनेट था, न टीआरपी का चक्कर था, न ही 'फेक न्यूज़' जैसा कोई शब्द था। फिर भी तुलसीदास जी ने कैसे जान लिया कि एक दिन इंसान इतना बदल जाएगा?

उनकी चौपाइयां  हमें चेतावनी दे रहे हैं कि हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ:

सच हार रहा है, क्योंकि उसके पास आवाज़ नहीं है।

झूठ जीत रहा है, क्योंकि उसने बढ़िया मेकअप कर रखा है।

स्वार्थ सबसे ऊपर है, और मर्यादा मिट्टी में मिल चुकी है।

यह विश्लेषण पढ़ते हुए क्या आपको महसूस नहीं हो रहा कि आपके आस-पास की दुनिया बिल्कुल ऐसी ही हो गई है? तुलसीदास जी ने जो पन्नों पर लिखा था, वह आज सड़कों पर चरित्र हो रहा है।


आज आप अपने चारों ओर नज़र दौड़ाइए—हर दूसरी दुकान, हर दूसरा न्यूज़ चैनल और हर दूसरा शख्स इन चौपाइयों का जीता-जागता उदाहरण पेश कर रहा है। तुलसीदास जी ने भविष्य नहीं लिखा था, उन्होंने आज का 'आईना' तैयार किया था।


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