जब इंद्रियाँ हमारे साथ नहीं होतीं, तब मन लगातार विचलित रहता है. यह विचलन किसी कमजोरी का प्रमाण नहीं बल्कि एक संकेत है कि इंद्रियाँ बिना दिशा के काम कर रही हैं.
एक व्यक्ति रात को मोबाइल स्क्रॉल करता है. वह जानता है कि सुबह ऑफिस है, काम अधूरा है, शरीर थका है फिर भी उँगली रुकती नहीं.
यह आलस्य नहीं है, यह इंद्रियों का नियंत्रण है.
इंद्रियों को दबाने से वे शांत नहीं होतीं
कई लोग सोचते हैं...
“इच्छा को मार दो, सब ठीक हो जाएगा।”
एक युवक वर्षों तक अपने आकर्षण और भावनाओं को गलत कहकर दबाता रहा पर जब अवसर मिला, वह संतुलित नहीं रहा.
या तो अत्यधिक आसक्त हो गया, या अपराधबोध में टूट गया.
इंद्रियाँ दबाने से नहीं, समझाने से शांत होती हैं.
इंद्रियाँ क्षणिक सुख खोजती हैं.
इंद्रियों का स्वभाव है - अभी का सुख.
एक छात्र पढ़ाई के समय बार-बार नोटिफिकेशन देखता है.
हर मैसेज पर हल्का सा आनंद (dopamine) मिलता है लेकिन तीन घंटे बाद न पढ़ाई हुई, न संतोष मिला, केवल अपराधबोध बचा. यही क्षणिक सुख का जाल है.
इंसान क्यों उलझ जाता है ?
क्योंकि इंद्रियाँ पूछती हैं- अभी अच्छा लग रहा है या नहीं ?
जबकि जीवन पूछता है- पाँच साल बाद तुम कहाँ होगे ?
एक व्यक्ति रोज़ सोचता है....
कभी लिखूँगा…
कभी तैयारी शुरू करूँगा…
कभी बिज़नेस करूँगा…
लेकिन रोज़ वही टीवी, वही फोन, वही थकान.
जीवन बदलने की इच्छा है पर इंद्रियाँ आज का आराम चाहती हैं.
रचनात्मकता कहाँ नष्ट होती है ?
रचनात्मकता ध्यान चाहती है और ध्यान तब आता है जब इंद्रियाँ सहयोगी हों.
एक लेखक जब लिखने बैठता है...
थोड़ी देर में बाहर की आवाज़, मोबाइल, चाय की तलब सब ध्यान तोड़ते हैं. अगर वह हर उत्तेजना के पीछे भागे, लेख मर जाता है.
लेकिन अगर वह इंद्रियों से कहे.... रुको, बाद में,
तो वही इंद्रियाँ गहराई देती हैं.
इंद्रियों को न तो दुश्मन बनाइए,
न उन्हें मालिक बनाइए, उन्हें मित्र बनाइए.
एक युवा अपने भीतर उठती कामुक इच्छाओं को लेकर भ्रमित है. कभी वह उन्हें पूरी तरह ‘गलत’ मानकर दबाने की कोशिश करता है, तो कभी अचानक किसी दृश्य, किसी स्पर्श, किसी कल्पना में बह जाता है. जब वह दबाता है, भीतर तनाव बढ़ता है और जब वह बहता है तो केवल क्षणिक सुख मिलता है, जिसके बाद खालीपन और अपराधबोध रह जाता है.
असल समस्या कामुकता नहीं है, समस्या है उससे संबंध न समझ पाना.
जिस दिन वह यह समझता है कि कामुकता ऊर्जा है, शत्रु नहीं, और उसे सही दिशा, सही समय और सही मर्यादा चाहिए.
उस दिन वह न दमन में फँसता है, न अति में.
तब वही इंद्रियाँ उसके संबंधों में गहराई लाती है,
उसकी रचनात्मकता को बल देती है और उसके व्यक्तित्व में संतुलन पैदा करती है.
एक साधक सुबह टहलते समय हर दृश्य को देखता है, हर आवाज़ सुनता है पर किसी में खोता नहीं, यही मित्रता है.
जब इंद्रियाँ मित्र बनती हैं तब....
पढ़ाई में गहराई आती है.
काम में एकाग्रता आती है.
सोच में स्पष्टता आती है.
एक व्यक्ति जिसने दिन में निश्चित समय फोन बंद किया, धीरे-धीरे उसने महसूस किया मन हल्का है, विचार साफ़ हैं, काम कम समय में पूरा हो रहा है.
मन का भटकाव बुरा नहीं, वह चेतावनी है.
जो व्यक्ति इंद्रियों को समझ लेता है, वह उन्हें साध लेता है.
और जो इंद्रियों को साध लेता है, वह जीवन को दोहराता नहीं रचता है.
दीपक, ईंधन और मनुष्य का जीवन...
दीपक में रखे घी , तेल और बाती की शक्ति को यदि कोई समझ ले…तो वह जीवन का एक बहुत बड़ा रहस्य समझ लेता है ! जब तक दीपक में ईंधन होता है वह अंधकार को चीरते हुए दूर तक प्रकाश फैलाता है ! उसकी लौ स्थिर रहती है… शांत रहती है… और उपयोगी रहती है ! लेकिन जैसे -जैसे ईंधन कम होने लगता है वैसे- वैसे उसकी लौ डगमगाने लगती है…फड़फड़ाती है… अस्थिर हो जाती है…और अंततः एक समय ऐसा आता है जब वह बुझ जाती है !
ठीक यही यही कहानी आज के मनुष्य की है आपकी यानि कि इस लेख को पढ़ने वाले की भी हो सकती है ! आज का मनुष्य बाहर से तो दीपक की भांति "जल" रहा है यानि कार्य कर रहा है , भाग रहा है , संघर्ष कर रहा है…गति प्रगति कर रहा है लेकिन उसके भीतर उसका “ईंधन” समाप्त होता जा रहा है ! उसका
मन थका हुआ है…शरीर टूट रहा है…विचार बिखरे हुए हैं…
और भावनाएँ असंतुलित हो चुकी हैं !
हम लगातार "जलते" जा रहे हैं लेकिन स्वयं को भरने का समय ही नहीं निकाल पा रहे ! जैसे दीपक में तेल उसका ईंधन है ठीक ऐसे ही एनर्जी आपका ईंधन है ! हम भूल चुके हैं कि दीपक को भी समय-समय पर "तेल" चाहिए होता है और यदि उसे भरा न जाए तो उसका बुझना तो निश्चित ही है !
हम मनुष्यों को भी अपने “ईंधन” की आवश्यकता होती है ! शरीर के लिए संतुलित आहार और पर्याप्त विश्राम , मन के लिए शांति , सीमित और सार्थक जानकारी , आत्मा के लिए मौन, ध्यान और आत्मचिंतन और जब यदि ये तीनों ही नहीं मिलते तो तब कोई भी मनुष्य बाहर से चाहे जितना भी चमकता दिखाई दे रहा होता है भीतर से वह धीरे-धीरे बुझ रहा होता है और जब भीतर का दीपक बुझने लगता है तो जीवन में अंधकार बढ़ने लगता है ! चिड़चिड़ापन , क्रोध , चिंता , निराशा , रिश्ते नातों में दूरी मतभेद समाज देश में वैचारिक मतभेद सब उसी के संकेत हैं इस लेख को दो बार पढ़ना या रात्रि विश्राम पूर्व पढ़ना ऐसा लगेगा जैसे आपकी ही कहानी व्यक्त कर दी हों !
हमको किसी का भीतर पढ़ने की वर्षों पुरानी आदत है अतः विचार बना तो लेख बना दिए ! स्थूल शरीर का आहार भोजन है और बाकी शरीर यानि सूक्ष्म शरीर, ब्रह्मांडीय शरीर , कारण शरीर.. का आहार "भजन" है ! भोजन और भजन का संतुलन आपका ईंधन है एनर्जी है ऊर्जा है !! यदि आप स्थूल शरीर को ही भोजन देंगे अन्य शरीर भोजन से वंचित रहेगा तो तब जीवन में असंतुलन आने से कोई नहीं रोक सकता !
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