उम्र का सफर
उम्र का सफर…
ना कोई पूछता है,
ना कोई ठहराता है।
हम चलते जाते हैं,
रास्ते बदलते हैं,
कुछ लोग हाथ पकड़कर जाते हैं,
कुछ सिर्फ छाया बनकर गुजर जाते हैं।
याद है, वो दिन जब आँखों में सपने थे,
और जमीं के सच ने उन्हें चूर-चूर कर दिया।
कभी भरोसा किया, तो धोखा मिला।
कभी हाथ थामा, तो छोड़ दिया।
रिश्तेदार दूर हुए,
कुछ दोस्त मिट्टी में मिल गए,
और खुद को संभालना पड़ा
जब मन कह रहा था “हार जा”,
हमने कहा, “नहीं, चलूँगा।”
क्योंकि हार मानना आसान था,
लेकिन अपने आप को गिरने नहीं देना,
सबसे बड़ी जंग वही थी।
दुनिया घूमती रही,
बिना रुके, बिना थके,
और हम थक कर भी खड़े रहे।
धरती पर रोज अत्याचार होते हैं,
मनुष्य मनुष्य पर अत्याचार करता है,
और उम्र बढ़ती जाती है,
हड्डियाँ बोलती हैं, पर कोई सुनता नहीं।
जिंदगी ने सिखाया,
कि हर चोट, हर धोखा, हर दूरी,
हमें कमजोर नहीं बनाती,
बल्कि हमारे भीतर की आग को जलाती है।
अब उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए,
जब आंखों में धूल जम गई,
और शरीर कमजोर पड़ गया,
लोग पूछते नहीं,
लेकिन यादें हमारी कहानी खुद बताती हैं।
हम मूर्त नहीं हैं,
हमने महसूस किया है,
हमने सहा है,
हमने खुद से दोस्ती की है,
और अपने दर्द में भी मुस्कान ढूँढी है।
उम्र का सफर, अकेला सही,
लेकिन अनुभव की किताब हाथ में,
हमने खुद को पाया,
हमने खुद को देखा,
और अपने दर्द से भी दोस्ती कर ली।
क्योंकि यही जीवन है
कुछ खोते हुए, कुछ पाते हुए,
अकेले रहकर भी खड़े होना,
और हर चुनौती के बीच,
अपने आप को जिंदा रखना।
और जब दिन ढल जाएँ,
जब कोई पूछे बिना रातें कटें,
तब भी हम कहेंगे
“मैं जिंदा रहा, मैंने देखा, मैंने महसूस किया,
मैंने खुद को कभी खोने नहीं दिया।”
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