कभी आपने एक बात को नोटिस किया ?…
आप सुबह उठे…
सब ठीक था… मन हल्का…
फिर आपने मोबाइल खोला और दिखा -
कोई मेसेज...
किसी की सफलता…
किसी की लाइफ “परफेक्ट” दिखती हुई…
या कोई नकारात्मक खबर…
और अचानक -
अंदर कुछ बदल सा गया।
कोई घटना नहीं हुई…
फिर भी मन भारी हो गया।
👉 यहाँ एक पल को रुकिए… और खुद से पूछिए -
क्या सच में कोई “परिस्थिति” बदली थी… या “आपकी फ्रीक्वेंसी”?
👉 Frequencies - और उनका हमारे जीवन पर अदृश्य प्रभाव
मनोविज्ञान कहता है,
आप सिर्फ शरीर नहीं हैं…
आप एक “वाइब्रेशनल सिस्टम” हैं।
हर विचार…
हर भावना…
हर प्रतिक्रिया…
👉 एक फ्रीक्वेंसी निर्मित करती है।
अब ध्यान दें -
👉 जब आप डर या तनाव (Low Frequency)में होते हैं :
- दुनिया असुरक्षित लगती है,
- खाने में स्वाद नही आता,
- कुछ भी अच्छा नही लगता,
- मन और शरीर भारी और विचलित सा महसूस करता है।
👉 जब आप प्रेम ( High Frequency) में होते हैं:
वही दुनिया...
- सुंदर लगने लगती है,
- पेड़, पौधे, प्रकृति हर चीज सुन्दर महसूस होती है,
- अंदर एक अलग सी ताजगी और ऊर्जा महसूस करते हैं,
- क्रोध कम हो जाता है
- ज्यादातर समय आप खुश और आनंदित महसूस करते हैं।
👉 दुनिया वही रहती है… बाहर कुछ बदलता नही...
लेकिन आपकी “रिसीविंग फ्रीक्वेंसी” बदल गई होती है।
और उसके बदलते ही आपके जीने का अंदाज भी बदल जाता है।
👉 सच तो ये है कि -
आप जीवन को वैसा नहीं देख रहे जैसा वो है, बल्कि आप उसे अपनी फ्रीक्वेंसी के चश्मे से देख रहे होते हैं।
✔️ Frequency की engineering को समझने के पहले उसके Basic को समझना भी जरूरी है।
1.भावनात्मक Frequency आपकी मनःस्थिति के द्वारा निर्मित होता है।
2. आपकी मनःस्थिति को बाहरी और आंतरिक कारक प्रभावित करते हैं
3. जैसी आपकी frequency होगी वैसी ही चीजों की ओर आप आकर्षित होते हैं, या फिर उसे अपनी ओर आकर्षित करने लगते हैं।
यानी... आप फिर से पहले स्टेज पर आ जाते हैं।
और इस तरह यह चक्र चलता रहता है।
अब जरा भावनाओं की आवृत्तियों को देखें -
शर्म (Shame): 20 Hz
अपराधबोध (Guilt): 30 Hz
डर/भय (Fear): 100 Hz
क्रोध/गुस्सा (Anger): 150 Hz
साहस (Courage): 200 Hz
प्रेम/प्यार (Love): 500 Hz
आनंद/हर्ष (Joy): 540 Hz
शांति (Peace): 600 Hz
आत्मज्ञान/ज्ञानोदय (Enlightenment): 700+ Hz
उपरोक्त नंबर केवल कोई frquency का माप नही, बल्कि ऐसा समझें कि आपके अंदर की ऊर्जा और आपके मस्तिष्क के सक्रियता की स्थिति को दर्शाता है।
जैसे जैसे आपके frequency का स्तर गिरता या उठता है, वैसे ही आपकी शारीरिक और मानसिक क्षमतायें भी गिरने या बढ़ने लगती हैं।
स्वाभाविक तौर पर इसका प्रभाव आपके जीवन पर भी देखने को मिलेगा।
और सबसे महत्वपूर्ण बात:
आप जैसी frequency पर Vibrate कर रहे होंगे, वैसी ही परिस्थितियों का अनजाने में manifestation भी कर रहे होते हैं। तो जाहिर है उस से निकलना और भी मुश्किल होता जाएगा।
👉 अब सबसे बड़ा सवाल: Frequency को कैसे बदल सकते हैं?
जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि frequency को बदलने के लिए पहले मनःस्थिति को बदलना जरूरी है, और वह बदलती है -
👉 बाहरी कारकों के प्रभाव से
जैसे -
1. आप धन की समस्या से दुःखी हों, और कोई लॉटरी निकल जाये
2. आप निराश हों और आपको किसी से प्रेम हो जाये
3. किसी उच्च स्तरीय Frequency का व्यक्ति आपके सम्पर्क में आ जाये
4. सम्भोग के क्षणों मे, ये लगभग हर किसी ने महसूस किया ही होता है
परन्तु ये सब बाहरी कारक पूरी तरह आपके वश में नही होते, आपको परिस्थितियों पर निर्भर होना होता है।
✔️ लेकिन एक दूसरा तरीका भी है :
👉 आपकी आंतरिक समझ
सबसे पहले हम ये समझते हैं कि, हमसे चूक कहाँ हो जाती है?
❌ 1. हम “विचार” को सच मान लेते हैं
मन में आया -
“मैं असफल हूँ…”
और हम उसे पकड़ लेते हैं।
👉 लेकिन वह “सच” नहीं था…
वह सिर्फ एक लो फ्रीक्वेंसी सिग्नल था
जो आपने पकड़ लिया है।
❌ 2. हम उसी फ्रीक्वेंसी पर समाधान ढूंढते हैं जिस पर हम होते हैं
आप दुखी हैं…
और उसी दुख में बैठकर सोचते हैं -
“मैं खुश कैसे रहूँ?”
👉 यह वैसा ही है जैसे -
अंधेरे में खड़े होकर रोशनी खोज रहे हों…
बिना एक कदम बाहर निकले।
❌ 3. हम भागते हैं… देखते नहीं
जब डर या कोई चिंता होती है -
हम क्या करते हैं?
मोबाइल खोलते हैं
खुद को distract करते हैं
खुद को समझाते हैं
👉 लेकिन डर या चिंता वहीं रहती है…
बस कुछ देर के लिए दब जाती है।
और दबा हुआ डर -
और गहरा हो जाता है।
✅️ तो असली बदलाव कहाँ से शुरू होता है?
👉 “करने” से नहीं…
👉 “देखने” से।
अगली बार -
जब आप बेचैन हों…
कुछ मत कीजिए।
बस रुकिए…
और धीरे से कहिए -
“हाँ… अभी मेरे अंदर डर (या जो भी भावना हो) है… और मैं उसे देख रहा हूँ।”
शुरुआत में थोड़ा अजीब लगेगा…
लेकिन फिर...
👉 आप महसूस करेंगे -
आपका डर थोड़ा ढीला पड़ रहा है।
क्योंकि -
👉 जिसे आप देख लेते हैं…
उससे आप अलग हो जाते हैं।
ये आपका neutral स्टेट होता है, जहां से दूसरी frequency में जाना आसान हो जाता है
✔️ शरीर - आपका सबसे आसान “फ्रीक्वेंसी स्विच”
अभी एक छोटा सा प्रयोग कर के देखें -
👉 झुककर बैठिए…
सांस छोटी लें …
और महसूस करें -
मन कैसा हो जाता है।
अब -
👉 रीढ़ सीधी रखें …
छाती खुली… और
गहरी सांस लें …
और आप पाएंगे -
अंदर कुछ बदलने लगा।
👉 यह कोई जादू नहीं है -
Body ➡️ Chemistry ➡️ Emotion ➡️ Frequency
आपका शरीर…
आपकी फ्रीक्वेंसी का “रिमोट कंट्रोल” है।
✔️ भीतर का “सूर्य” - असली फ्रीक्वेंसी
आपके भीतर एक जगह है -
जहाँ कोई डर नहीं…
कोई तुलना नहीं…
कोई भ्रम नहीं…
ज्योतिष उसे “सूर्य” कहता है—
आपकी चेतना… आपका प्रकाश।
जब आप डर में होते हैं -
यह ढक जाता है।
जब आप जागरूक होते हैं -
यह चमकने लगता है।
👉 फ्रीक्वेंसी बदलना =
भीतर के सूर्य को प्रकट करना।
✔️एक सरल लेकिन प्रभावी अभ्यास
अगली बार जब आप “Low” महसूस करें -
1. अपनी भावना को पहचानें
“अभी मैं चिंता/डर में हूँ”
👉 बस इतना कहना ही दूरी बना देता है
2. शरीर की स्थिति को बदलें
रीढ़ सीधी रखें
गहरी सांस लें
और धीरे-धीरे उसे छोड़ें
👉 आपका मानसिक "सिस्टम" रीसेट होने लगता है
3. ध्यान की दिशा बदलें
कुछ ऐसा याद करें -
कोई व्यक्ति
कोई अनुभव
कोई Blessings
जिसकी वज़ह से आप अच्छा महसूस करते हों, और उसके लिए मन मे आभार व्यक्त करें।
👉 अचानक आपको कुछ हल्का महसूस होने लगेगा
ध्यान रखें …
आप हर पल किसी न किसी फ्रीक्वेंसी पर जी रहे हैं।
और -
👉 आपकी जिंदगी वही बनती है
जिस फ्रीक्वेंसी पर आप बार-बार लौटते हैं।
इसलिए -
डर से लड़िए मत…
उसे दबाइए मत…
बस उसे देखिए…
क्योंकि -
👉 डर को दबाने से वह गहरा होता है…
और उसे देखने मात्र से…
डर की frequency खत्म होकर उच्च स्तर की ओर बढ़ने लगेगी।
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