"हर इंसान एक अलग दुनिया है"
ज़रा अपने आस-पास देखिए।
मोबाइल, कुर्सी, पंखा, किताब, सड़क, बिजली ये सब कभी किसी के मन में सिर्फ़ एक विचार थे। किसी इंसान ने सोचा, प्रयोग किया, असफल हुआ, फिर सीखा और धीरे-धीरे वही चीज़ दुनिया के लिए ज़रूरत बन गई।
इससे एक बात साफ़ होती है हर इंसान में कुछ नया करने की क्षमता है। हर व्यक्ति अपने भीतर एक पूरा ब्रह्माण्ड लेकर चलता है, जिसमें उसके विचार, अनुभव, भावनाएँ और ऊर्जा होती हैं।
लेकिन सवाल यह है कि सब लोग कुछ नया क्यों नहीं कर पाते?
क्योंकि हर इंसान की दुनिया अलग है। किसी की दुनिया डर से बनी है, किसी की ज़िम्मेदारियों से, किसी की संघर्षों से, तो किसी की सपनों से। बाहर से सब एक जैसे दिखते हैं, लेकिन अंदर से हर कोई अलग कहानी है।
पसंद, सोच और अनुभव का फर्क
कोई किताबों में खो जाना पसंद करता है,
तो कोई लोगों से बातें करके सीखता है।
किसी को शांति अच्छी लगती है,
तो किसी को शोर में सुकून मिलता है।
कोई अपने दुख भीतर ही रख लेता है,
तो कोई उन्हें शब्दों में बाँट देता है।
यह फर्क गलत या सही नहीं है यह सिर्फ़ अलग होना है।
हमारा बचपन, हमारा परिवार, हमारी परिस्थितियाँ ये सब मिलकर हमारी पसंद बनाते हैं। इसलिए यह स्वाभाविक है कि दो लोगों की पसंद, सोच और संवेदनाएँ एक जैसी नहीं होंगी।
रिश्तों में सबसे बड़ी भूल
यहीं से रिश्तों में टकराव शुरू होता है।
अक्सर हम यह भूल जाते हैं कि सामने वाला भी एक पूरी दुनिया है, और हम अपनी दुनिया उसे समझाए बिना उस पर थोपने लगते हैं।
“तुम ऐसा क्यों सोचते हो?”
“तुम्हें मेरी तरह महसूस क्यों नहीं होता?”
“मैं जो कह रहा हूँ वही सही है।”
हम यह नहीं देखते कि जो हमें सही लग रहा है, वह हमारी दुनिया का सच है, पूरी दुनिया का नहीं।
मान लीजिए एक पेड़ है और एक नदी।
पेड़ चाहता है कि नदी उसके पास रुके, ताकि उसकी जड़ें हमेशा भीगी रहें।
नदी चाहती है कि वह बहे, क्योंकि उसका स्वभाव ही बहना है।
अब अगर पेड़ नदी से कहे...
“अगर तुम मुझसे प्यार करती हो तो रुक जाओ,”
तो क्या नदी गलत है अगर वह बहती रहे?
और अगर नदी कहे..
“अगर तुम समझदार हो तो मुझे जाने दो,”
तो क्या पेड़ गलत है अगर उसे डर लगे?
असल में दोनों गलत नहीं हैं, बस दोनों की प्रकृति अलग है।
समझ, स्वीकार और सम्मान
रिश्ते तब खूबसूरत बनते हैं जब हम यह मान लेते हैं कि
“तुम मेरी तरह नहीं हो, और यह ठीक है।”
जब हम सामने वाले को बदलने की बजाय उसे समझने की कोशिश करते हैं।
जब हम अपनी बात कहें, लेकिन उसे थोपें नहीं।
जब हम यह जान लें कि पसंद न मिलना अस्वीकार होना नहीं होता।
हर इंसान अपने आप में एक ब्रह्माण्ड है।
अगर हम यह मान लें कि
"मेरी दुनिया अलग है¡
और सामने वाले की दुनिया भी अलग है
तो टकराव कम होंगे, संवाद बढ़ेगा और रिश्तों में गहराई आएगी।
दुनिया बदलने वाले अविष्कार सिर्फ़ मशीनों से नहीं होते,
कभी-कभी किसी को समझ लेना भी एक बहुत बड़ा बदलाव होता है।
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