स्त्री की हार का मिथक : असल में वह व्यवस्था जो उसे जीतने नहीं देती
स्त्री की असफलता को अक्सर उसकी क्षमता से जोड़ा जाता है।
कभी कहा जाता है.... वह भावुक है,
कभी....वह ज़्यादा सोचती है,
कभी.... उसके लिए परिवार ज़रूरी है,
और कभी.....“उसके लिए सब कुछ नहीं हो सकता।”
लेकिन सच यह है कि
स्त्री की राह में सबसे बड़ी बाधा उसकी योग्यता नहीं,
बल्कि वह अदृश्य व्यवस्था है
जो उसे शुरू से यह सिखाती है कि
उसका सपना सीमित होना चाहिए।
यह लेख उसी अदृश्य व्यवस्था को खोलता है
जो स्त्री के भीतर बैठकर
उसे खुद से ही डराने लगती है।
1. सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है : स्त्री को रोका कैसे जाता है?
स्त्री को कभी ज़ंजीर से नहीं बाँधा गया।
उसे शब्दों से बाँधा गया।
“इतना आगे मत बढ़ो”
“ज़्यादा बोलोगी तो अच्छी नहीं लगोगी”
“सब कुछ पाने वाली स्त्री सही नहीं होती”
“पहले दूसरों का सोचो, फिर अपना”
ये आदेश नहीं थे।
ये धीरे-धीरे भीतर डाली गई आवाज़ें थीं।
और सबसे खतरनाक बात यह हुई कि
एक दिन स्त्री ने इन्हें अपनी आवाज़ समझ लिया।
2. यह व्यवस्था कहाँ से आती है?
जब किसी समाज को यह तय करना होता है
कि सत्ता, अवसर और निर्णय
कुछ हाथों में ही रहें,
तो वह सीधे मना नहीं करता।
वह कहता है...
“यह तुम्हारी भलाई के लिए है।”
स्त्री के साथ यही हुआ।
उसकी सुरक्षा, मर्यादा, सम्मान
इन सबके नाम पर
उसकी उड़ान को छोटा किया गया।
3. पहली चोट : शरीर पर अधिकार
स्त्री का शरीर
सबसे पहले नियंत्रित किया गया।
क्या पहने,
कैसे बैठे,
कितनी हँसे,
कितनी चुप रहे।
धीरे-धीरे स्त्री ने सीख लिया कि
उसका शरीर उसका नहीं,
दूसरों की नज़रों के लिए है।
जिस स्त्री को
अपने ही शरीर से डरना सिखा दिया जाए,
वह दुनिया से कैसे भिड़ेगी?
4. दूसरी चोट : सपनों का अपराधीकरण
लड़की का सपना
हमेशा “ज़्यादा” माना गया।
ज़्यादा पढ़ना... घमंड
ज़्यादा आगे जाना.... स्वार्थ
ज़्यादा कमाना.... रिश्तों के लिए खतरा
ज़्यादा स्वतंत्र होना.... चरित्र पर सवाल
इस तरह
सपना देखना
स्त्री के लिए अपराध बना दिया गया।
5. सबसे मजबूत दीवार : घर के भीतर
स्त्री को अक्सर बाहर की दुनिया से नहीं,
घर के भीतर से रोका गया।
घर, जो उसका सहारा होना चाहिए था,
वही उसकी सीमा बन गया।
“घर संभालो”
“सब देख रहे हैं”
“लोग क्या कहेंगे”
यहाँ “लोग” कभी दिखाई नहीं देते,
लेकिन उनका डर
स्त्री की रीढ़ में बैठ जाता है।
6. श्रम का अवमूल्यन
स्त्री का काम
या तो “उसका फ़र्ज़” कहा गया,
या “कोई बड़ी बात नहीं।”
वह थकती है,
पर उसकी थकान गिनी नहीं जाती।
वह बनाती है,
पर उसका नाम नहीं लिखा जाता।
जब किसी का श्रम अदृश्य कर दिया जाए,
तो उसका आत्मविश्वास
खुद-ब-खुद टूटने लगता है।
7. सबसे खतरनाक जाल : अच्छी स्त्री की परिभाषा
अच्छी स्त्री
जो चुप रहे,
समझौता करे,
अपने हिस्से की आग को
पानी से बुझा दे।
इस परिभाषा ने
लाखों स्त्रियों को
अंदर से खामोश कर दिया।
8. स्त्री की हार नहीं, व्यवस्था की जीत
जब स्त्री रुक जाती है,
तो कहा जाता है...
“देखो, वह कर नहीं पाई।”
कोई यह नहीं देखता
कि उसके रास्ते में
कितनी बार डर बिछाया गया,
कितनी बार अपराधबोध फैलाया गया,
कितनी बार उसे
खुद से छोटा महसूस कराया गया।
9. आज की स्त्री : नई चमक, पुरानी बेड़ियाँ
आज स्त्री पढ़ी-लिखी है,
काम कर रही है,
नेतृत्व में है।
लेकिन
अंदर की आवाज़ अब भी पूछती है
“क्या मैं सही कर रही हूँ?”
“क्या मुझे इतना चाहिए?”
यही उस पुरानी व्यवस्था की
सबसे बड़ी सफलता है
वह बाहर नहीं,
अब भीतर बोलती है।
10. सफलता की असली लड़ाई
स्त्री की असली लड़ाई
दुनिया से नहीं,
उस भीतर बैठी आवाज़ से है
जो कहती है
“तू ज़्यादा नहीं बन सकती।”
जिस दिन स्त्री
उस आवाज़ को पहचान लेती है,
उसी दिन उसकी जीत शुरू हो जाती है।
“स्त्री को बदलने की ज़रूरत नहीं, व्यवस्था को तोड़ने की है”
स्त्री में कमी कभी नहीं थी।
कमी उस सोच में थी
जो उसे सीमित देखना चाहती थी।
इसलिए सवाल यह नहीं है
कि स्त्री सफल हो सकती है या नहीं।
सवाल यह है
क्या हम उस व्यवस्था को पहचानने का साहस रखते हैं
जो उसकी उड़ान से डरती है?
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