ओशो कहते हैं
इस संसार में और सब तो घटित होने के लिए समय लेता है, लेकिन ध्यान समयातित है। पल भी नहीं लगता। दो पलों के बीच में जो अंतराल है वही ध्यान का जगत है। जब ध्यान घटित होता है तो ऐसे ही घटित होता है कि पल भर भी नहीं लगता।
ध्यान #समय की प्रक्रिया नहीं है। ध्यान की कोई सीढ़ियां नहीं हैं।
ध्यान क्रांति है, विकास नहीं।
और क्यों ऐसा है? क्योंकि मन की सारी व्यवस्था मूलतः समय की व्यवस्था है। मन का अर्थ होता है: अतीत, भविष्य। और अतीत और भविष्य के बीच में दबा हुआ छोटा सा वर्तमान। मन जीता है अतीत में, जो हो चुका। वहीं खोदता रहता, खोजता रहता, तलाश करता रहता--स्मृतियों में; या फिर उन्हीं स्मृतियों के जो प्रतिफलन बनते हैं, प्रतिध्वनियां होती हैं भविष्य में, जो कल हुआ था, वह कल फिर हो--मीठा था, मधुर था; या कल जो हुआ था, बहुत कड़वा था, बहुत तिक्त था--अब कभी न हो।
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मन अतीत को ही दोहराना चाहता है भविष्य में--सुंदरतम रूप में; अतीत को ही सजाना चाहता है भविष्य में। भविष्य अतीत का ही विस्तार है। और आश्चर्य यही कि मन उस अतीत में जीता है जो अब नहीं है और उस भविष्य में जो अभी नहीं है।
#मन इन दो अभावों में जीता है, दो शून्यताओं में। इसलिए तो मन की कोई उपलब्धि नहीं है। और मन जिसे वर्तमान जानता है, वह ना-कुछ है; वह तो केवल अतीत के भविष्य बनने की प्रक्रिया है--बड़ी पतली सी रेखा! तुम वर्तमान को पकड़ थोड़े ही सकते हो। क्योंकि जब तक तुमने पकड़ा वह अतीत हो गया; जब तक नहीं पकड़ा तब तक #भविष्य है। इतना छोटा वर्तमान, झूठा वर्तमान है।
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#वर्तमान तो केवल वही जानता है जो ध्यान को उपलब्ध हुआ है। वह शाश्वत वर्तमान जानता है।
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ध्यान का अर्थ है मन से मुक्त हो जाना। मन से मुक्त होने का अर्थ है अतीत और भविष्य से मुक्त हो जाना। यह एक क्षण में ही घटती है बात--बस ऐसे जैसे हवा का झोंका आया और उड़ा ले गया धूल; ऐसे कि किसी ने दर्पण पोंछ दिया और स्वच्छ हो गया!
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हंसा, जो तुझे हुआ ठीक हुआ। ध्यान की पहली अवधारणा ऐसी ही होती है। ध्यान जब पहली बार उतरता है तो इतना ही विस्मय-विमुग्ध कर देता है, भरोसा नहीं आता।
क्योंकि हम तो सोचते थे सदियों-सदियों की तपश्चर्या से ध्यान मिलता है।
#तपश्चर्या से ध्यान नहीं मिलता, तपश्चर्या से केवल तपस्वी का अहंकार मिलता है। और अहंकार ध्यान में बाधा है। #श्रम से ध्यान नहीं मिलता; और सब कुछ मिल जाए, धन मिले, पद मिले, ध्यान नहीं मिलता।
ध्यान तो विश्राम का क्षण है, श्रम का नहीं। और ध्यान तपश्चर्या नहीं है, न त्याग है। ध्यान तो परम भोग है, परम #उत्सव है, परम आनंद है।
फिर ध्यान कोई ऐसी चीज नहीं है जो बाहर से हमारे तक आती है; आती तो समय लगता। ध्यान कोई ऐसी चीज भी नहीं है जिस तक हम जाते हैं; जाते तो समय लगता, यात्रा करनी पड़ती। या तो ध्यान यात्रा करता हम तक या हम यात्रा करते ध्यान तक। ध्यान हमारा #स्वभाव है। ध्यान को लेकर ही हम पैदा हुए हैं।
#ध्यान की तरह ही हम पैदा हुए हैं। ध्यान हमारी #आत्मा है। इसलिए समय के लगने का सवाल ही नहीं है। हमारे भीतर ही पड़ा है खजाना; जरा आंख मुड़ी कि मालिक से मिलन हुआ।
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