Mindful Eating - कब खाओ, कैसे खाओ: सेहत यहीं बनती–बिगड़ती है
मान लो आपने खाना खाया।
डेढ़–दो घंटे हुए हैं।
वो खाना अभी पूरा पचा ही नहीं है। पेट के अंदर सिस्टम लगा हुआ है - जठराग्नि काम कर रही है।
और ठीक उसी टाइम आप ऊपर से नया खाना ठूंस देते हैं।
अब क्या होगा?
ना पहला खाना पचेगा,
ना दूसरा।
दोनों आपस में भिड़ेंगे।
और फिर शुरू होगी पूरी लिस्ट - एसिडिटी, गैस, भारीपन, चक्कर, सुस्ती, कोलेस्ट्रॉल वगैरह-वगैरह।
आयुर्वेद इसे “विदग्ध अवस्था” कहता है।
आज अगर ईमानदारी से देखें, तो 60% से ज्यादा लोग एसिडिटी के मरीज हैं, और बड़ी वजह यही आदत है - बिना भूख के खाना।
पाचन अग्नि जली तो सब जलेगा
आयुर्वेद सीधा बोलता है -
अगर ये आदत लंबे समय तक चली, तो पाचन अग्नि कमजोर हो जाती है।
फिर क्या?
एंजाइम की गोलियां,
पाचन पाउडर,
कभी सिरप, कभी टैबलेट।
जबकि नियम एक ही था -
भूख लगे तभी खाओ।
पहला खाना पच जाए, तभी दूसरा।
वाग्भट ऋषि का फ्री डाइट प्लान
आज लोग डाइटिशियन को 5–10 हजार देकर प्लान लेते हैं।
जबकि वाग्भट ऋषि ने हजारों साल पहले 6–7 लाइनों में सब लिख दिया।
उनके बेसिक नियम:
समय पर खाना खाओ
साफ-सुथरा होकर खाओ
शांति से खाओ
इतनी सिंपल बात, पर असर सबसे बड़ा।
सफाई छोटी लगती है, असर बड़ा करती है
खाने से पहले:
हाथ धोना
पैर धोना
मुंह कुल्ला करना
पैर धोने से जठराग्नि एक्टिव होती है - भूख सही लगती है।
मुंह साफ होगा तो बैक्टीरिया अंदर नहीं जाएगा।
आज हम इंफेक्शन पर अरबों खर्च करते हैं,
जबकि समाधान हाथ धोने में था।
रूखा मत खाओ, स्निग्ध खाओ
आजकल लोग बोलते हैं -
“तेल मत खाओ, घी मत खाओ।”
आयुर्वेद बोलता है -
भोजन स्निग्ध होना चाहिए, यानी उसमें तेल या घी हो।
क्यों?
क्योंकि शरीर का हर एक सेल बनने में फैट चाहिए।
रूखा खाओगे तो:
शरीर रूखा
दिमाग रूखा
और फिर छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन
आज जो असहिष्णुता (Intolerance) है,
जो हर आवाज से चिढ़ है -
उसकी जड़ भी यही है।
खाना खाते वक्त खाना ही खाओ
आजकल क्या होता है?
फोन
टीवी
मीटिंग
रील
फोटो
लाइक
खाना तो बस साइड एक्टिविटी बन गया।
आयुर्वेद साफ बोलता है -
खाने को अटेंशन दो।
अमेरिका में लोग 40–50 हजार देकर “Mindful Eating” सीखते हैं -
यहां ये ज्ञान फ्री में पड़ा है।
छह रस: असली न्यूट्रिशन
आयुर्वेद कहता है -
हर भोजन में 6 रस होने चाहिए:
मीठा
खट्टा
नमकीन
तीखा
कड़वा
कसैला
आज हम खाते हैं:
मीठा
खट्टा
तीखा
पर कड़वा और कसैला?
कोई पूछता ही नहीं।
यहीं से शुरू होता है:
कोलेस्ट्रॉल
यूरिक एसिड
विटामिन की कमी
आंवला: सबसे सस्ता एंटी-एजिंग टॉनिक
अगर जवान रहना है,
तो महंगे जूस, टॉनिक, मल्टीविटामिन भूल जाओ।
आंवला खाओ।
चरक संहिता में आंवला को
वयस स्थापक कहा गया है -
जो उम्र बढ़ने के रोग रोकता है।
कैंडी, च्यवनप्राश, कुछ भी -
बस आंवला होना चाहिए।
खाने की स्पीड भी बीमारी बनाती है
जो लोग 10–15 मिनट में खाना खत्म कर लेते हैं -
उनका मोटापा कभी नहीं जाएगा।
दिमाग को पेट भरने का सिग्नल
20 मिनट बाद मिलता है।
इसलिए:
बहुत तेज मत खाओ
बहुत धीरे भी मत खाओ
20–25 मिनट में
चबा-चबा कर खाओ।
खाना और स्नान का सही क्रम
अगर नहाए नहीं हो - पहले नहाओ, फिर खाओ
अगर खा लिया - 3 घंटे तक स्नान मत करो
वरना:
जोड़ दर्द
वात विकार
शरीर भारी
ताजा खाना = हल्का शरीर
एक बार गरम किया खाना
ठंडा हुआ
दोबारा गरम किया
आयुर्वेद इसे विष समान मानता है।
गीता में इसे तामसिक आहार कहा गया है -
जो आलस, कफ और बीमारी बढ़ाता है।
इसलिए:
ताजा बनाओ
45–60 मिनट में खाओ
Conclusion: सेहत कोई दवा नहीं, आदत है
बीमारी अचानक नहीं आती।
हर दिन की छोटी गलतियाँ मिलकर आती हैं।
भूख पर खाना,
साफ-सुथरा खाना,
शांति से खाना -
यही असली हेल्थ इंश्योरेंस है।
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