विकास की रफ्तार और ठहर गए रिश्ते
इंसान का स्वभाव है आगे बढ़ना। वह जो आज है, कल वैसा नहीं रहता। समय के साथ-साथ उसके हाथों से बनी हर चीज बदलती चली जाती है। कभी जो मोबाइल केवल काले-सफेद अक्षरों तक सीमित था, आज वह रंगों, आवाज़ों और स्पर्श से भरी एक पूरी दुनिया बन चुका है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि छोटे-छोटे प्रयासों, गलतियों और सीखने की प्रक्रिया से गुज़रकर आया है।
यही क्रम इंसान के जीवन के लगभग हर हिस्से में दिखाई देता है। पहनावा बदला, खान-पान बदला, देखने और सोचने का नज़रिया बदला। संघर्ष करने के तरीके बदले, लक्ष्य पाने के रास्ते बदले। खेल बदले, ध्यान के तरीके बदले, जीवन को जीने की गति बदली। इंसान ने अपने बाहर की दुनिया को लगातार बेहतर किया, अधिक सुविधाजनक बनाया, अधिक तेज़ और अधिक चमकदार बनाया।
लेकिन इस निरंतर प्रगति के बीच एक चीज़ है जो समय के साथ कदम नहीं मिला पाई...रिश्ते।
आज भी रिश्तों को संभालने का तरीका वही पुराना है। बातें सामने बैठकर कहने के बजाय पीठ पीछे कही जाती हैं। जो कहना चाहिए, वह दबा लिया जाता है और जो नहीं कहना चाहिए, वही फैलाया जाता है। आमने-सामने बैठकर बात करने से लोग कतराते हैं, क्योंकि वहाँ एक अदृश्य रुकावट खड़ी रहती है मर्यादा का बोझ।
मर्यादा अपने आप में बुरी नहीं है। वह समाज को संतुलन देती है। लेकिन जब वही मर्यादा संवाद को रोकने लगे, तब वह दीवार बन जाती है। लोग सोचते हैं, “अगर मैंने सच कह दिया तो सामने वाला क्या सोचेगा?”, “मेरी छवि खराब न हो जाए”, “रिश्ता टूट न जाए।” इन्हीं सवालों के बीच सच्ची बात दम तोड़ देती है।
इस डर की सबसे खास बात यह है कि यह दिखाई नहीं देता, लेकिन हर बातचीत में मौजूद रहता है। चेहरे पर मुस्कान होती है, शब्दों में शिष्टता होती है, लेकिन भीतर असंतोष जमा होता रहता है। समय के साथ यही असंतोष दूरी बन जाता है। रिश्ते टूटते नहीं, बस चुपचाप ठंडे पड़ जाते हैं।
तकनीक ने इंसान को जोड़ने के लिए हज़ारों साधन दिए, लेकिन दिल से दिल जोड़ने की कला पीछे छूट गई। संदेश भेजना आसान हो गया, पर मन की बात कहना कठिन। स्क्रीन के पीछे बैठकर लोग बहुत कुछ कह लेते हैं, लेकिन सामने बैठकर एक वाक्य बोलने में हिचकिचाते हैं।
शायद वजह यह है कि रिश्तों को भी हमने वस्तुओं की तरह संभालना चाहा। जैसे मशीन खराब हो तो उसे बिना देखे-समझे ठीक करने की कोशिश करते हैं, वैसे ही रिश्तों में भी ऊपर-ऊपर से मरम्मत कर दी जाती है। असली कारण तक जाने का साहस कम ही लोग कर पाते हैं।
रिश्तों का विकास किसी नए नियम या तकनीक से नहीं होगा। उसके लिए सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए सामने बैठकर ईमानदारी से सुनने और कहने की हिम्मत। बिना दोष लगाए, बिना जीत-हार सोचे। यह आसान नहीं है, लेकिन यही वह रास्ता है जो रिश्तों को समय के साथ आगे बढ़ा सकता है।
इंसान ने हर क्षेत्र में यह साबित किया है कि वह बदल सकता है। अगर उसने यह मान लिया कि रिश्ते भी विकास चाहते हैं, तो शायद आने वाला समय ऐसा होगा जहाँ लोग पीठ पीछे नहीं, आमने-सामने बात करेंगे। जहाँ मर्यादा दीवार नहीं, पुल बनेगी। और जहाँ डर की जगह समझ और अपनापन होगा।
विकास की यह यात्रा तब पूरी होगी, जब इंसान बाहर की दुनिया के साथ-साथ अपने रिश्तों को भी समय के अनुसार आगे बढ़ाना सीख लेगा।
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