ध्यान : होने की यात्रा
ध्यान कोई क्रिया नहीं है।
ध्यान कोई प्रयास नहीं है।
ध्यान वह क्षण है जहाँ करने वाला धीरे-धीरे मौन हो जाता है
और जो बचता है, वही सत्य होता है।
आज की यह विधि
तुम्हें कुछ सिखाने नहीं आई....
यह तुम्हें तुमसे मिलाने आई है।
1. शरीर को धरती को सौंप देना
एक शांत स्थान चुनो।
पीठ के बल आराम से लेट जाओ।
अपने पास एक सिक्का या छोटा पत्थर रखो
और उसे अपने सिर के ऊपर, दोनों भृकुटियों के बीच के क्षेत्र में रख दो।
यह कोई भार नहीं है।
यह एक स्मरण है...
कि तुम्हारी चेतना यहीं ठहरनी है।
हाथों को जाँघों के बगल में
स्वाभाविक रूप से रख दो।
अब शरीर का भार
पूरी तरह धरती को सौंप दो।
आँखें बंद हो जाती हैं
या कहो, बाहर की दुनिया
यहाँ से विदा लेती है।
2. साँस : जीवन को जैसा है वैसा स्वीकारना
अब साँस की ओर ध्यान जाने दो।
साँस आती है।
साँस जाती है।
न उसे गहरा करना है,
न रोकना है,
न सुधारना है।
यही ध्यान का पहला दर्शन है
जो अपने आप घट रहा है
उसे घटने देना।
जैसे-जैसे साँस को छेड़ना छूटता है,
वैसे-वैसे मन
थक कर शांत होने लगता है।
3. विचार : विरोध नहीं, साक्षी भाव
अब विचार आएँगे।
यह स्वाभाविक है।
कोई स्मृति,
कोई आवाज़,
कोई छवि,
या कोई प्रश्न
“मैं ध्यान क्यों कर रहा हूँ?”
“मुझे इससे क्या मिलेगा?”
मुस्कराओ।
विचार शत्रु नहीं हैं।
वे तुम्हें भटकाने नहीं आए
वे बस दिखना चाहते हैं।
उन्हें देखो।
उनके साथ बहो।
उनसे लड़ो मत।
ध्यान संघर्ष नहीं सिखाता,
ध्यान मैत्री सिखाता है।
4. हल्केपन की अनुभूति
कुछ समय बाद
तुम अनुभव करोगे
शरीर हल्का हो रहा है।
जैसे भार की परिभाषा बदल रही हो।
अब सिक्का या पत्थर
भार नहीं लगता।
वह बस मौजूद है
जैसे चिड़िया का पंख
हवा पर टिका हो।
यहाँ ध्यान तुम्हें नहीं देख रहा
यहाँ तुम स्वयं को देख रहे हो।
5. स्पर्श और दृश्य
कभी-कभी
तुम्हारी उँगलियाँ
अपनी जाँघों को हल्का स्पर्श करेंगी।
यह कोई हरकत नहीं,
यह एक मौन संवाद है।
और हर स्पर्श के साथ
कोई दृश्य उभर सकता है।
सिक्का अब
तुम्हारी चेतना का केंद्र है
वह तुम्हें
इधर-उधर बिखरने से रोकता है।
6. खुजली : द्वार की परीक्षा
अचानक
शरीर के किसी हिस्से में
खुजली होगी
अक्सर मुँह या कान के पास।
यह बाधा नहीं है।
यह द्वार है।
यहीं अधिकतर लोग
ध्यान से बाहर चले जाते हैं।
खुजली को हटाने की कोशिश मत करो।
उसे पूरी तरह महसूस करो।
तुम पाओगे
जिसे इंद्रियाँ भटकाना कहती थीं
वही इंद्रियाँ
अब तुम्हें और गहराई में ले जा रही हैं।
7. ऊर्जा का आरोहण
अब एक सूक्ष्म परिवर्तन घटता है।
ऊर्जा
पैरों से उठती है,
शरीर के हर अंग से
ऊपर की ओर बहने लगती है।
साँस लेने से भी
और छोड़ने से भी
यह ऊर्जा बढ़ती जाती है।
और अंततः
सारी ऊर्जा
ठीक वहीं एकत्र होती है
जहाँ सिक्का रखा है।
यह अब केवल शरीर का केंद्र नहीं
यह अस्तित्व का केंद्र है।
इस अनुभूति में
जितनी देर रह सको,
रहो।
8. दृश्य, विस्तार और अंतर्दृष्टि
अब जो दिखाई देता है
वह कल्पना नहीं।
कभी तुम्हारा जीवन,
कभी समाज,
कभी देश,
कभी पूरा ब्रह्मांड।
कभी भविष्य की झलक भी।
यह भविष्यवाणी नहीं
यह संभावना का दर्शन है।
यह तभी घटता है
जब चाहना
धीरे-धीरे गिर जाता है।
9. अंत नहीं, आरंभ
ध्यान कोई अनुभव नहीं
जिसे पकड़ लिया जाए।
ध्यान वह भूमि है
जहाँ पकड़ने वाला
अपने आप गिर जाता है।
इस विधि से
कुछ माँगना मत।
बस लेट जाओ।
साँस को आने दो।
जो है, उसे देखने दो।
बाक़ी...
ध्यान जानता है।
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