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Monday, January 19, 2026
धीरूभाई अंबानी
धीरूभाई अंबानी की जीवनी
धीरूभाई अंबानी
एक आदमी जो हाईस्कूल की शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाया। वह इतने गरीब परिवार से था कि खर्चा चलाने के लिए उसे अपनी किशोरावस्था से ही नाश्ते की रेहड़ी लगाने से लेकर पेट्रोल पंप पर तेल भरने तक का काम करना पड़ा। ऐसे लड़के ने जब एक वृद्ध के तौर पर दुनिया को अलविदा कहा तो उसकी सम्पति का मूल्य 62 हजार करोड़ रूपये से भी ज्यादा था। अगर आप अब भी इस शख्सशियत को नहीं पहचान पाएं तो हम बात कर रहे हैं, धीरूभाई अंबानी की। एक ऐसा सफल चेहरा जिसने हरेक गरीब को उम्मीद दी कि सफल होने के लिए पैसा नहीं नियत चाहिए। सफलता उन्हीं को मिलती है जो उसके लिए जोखिम उठाते हैं। धीरूभाई ने बार — बार साबित किया कि जोखिम लेना व्यवसाय का नहीं आगे बढ़ने का मंत्र है।
शुरूआती जीवन:-
28 दिसम्बर, 1932 को गुजरात के जूनागढ़ के छोटे से गांव चोरवाड़ में धीरजलाल हीरालाल अंबानी का जन्म हुआ। पिता गोर्धनभाई अंबानी एक शिक्षक थे। माता जमनाबेन एक सामान्य गृहिणी थी। धीरूभाई के चार भाई—बहन और थे। इतने बड़े परिवार का लालन—पालन करना अध्यापक गोर्धनभाई के लिए सरल काम न था। एक समय ऐसा आया कि आर्थिक परेशानियों की वजह से धीरू भाई को पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और उनकी स्कूली शिक्षा भी अधूरी रह गई। पिता की मदद करने के लिए धीरूभाई ने छोटे—मोटे काम करने शुरू कर दिए।
व्यवसायिक सफर की शुरूआत:-
यह उदाहरण कि हरेक सफलता के पीछे ढेरों असफलताएं छुपी हुई होती है, धीरूभाई अंबानी पर एकदम सटीक खरी उतरती हैं। पढ़ाई छोड़ने के बाद पहले पहल धीरूभाई ने फल और नाश्ता बेचने का काम शुरू किया, लेकिन कुछ खास फायदा नहीं हुआ। उन्होंने दिमाग लगाया और गांव के नजदीक स्थित धार्मिक पर्यटन स्थल गिरनार में पकोड़े बेचने का काम शुरू कर दिया। यह काम पूरी तरह आने वाले पर्यटकों पर निर्भर था, जो साल के कुछ समय तो अच्छा चलता था बाकि समय इसमें कोई खास लाभ नहीं था। धीरूभाई ने इस काम को भी कुछ समय बाद बंद कर दिया। बिजनेस में मिली पहली दो असफलताओं के बाद उनके पिता ने उन्हें नौकरी करने की सलाह दी।
नौकरी के दौरान भी बिजनेस:-
धीरूभाई के बड़े भाई रमणीक भाई उन दिनों यमन में नौकरी किया करते थे। उनकी मदद से धीरूभाई को भी यमन जाने का मौका मिला। वहां उन्होंने शेल कंपनी के पेट्रोल पंप पर नौकरी की शुरूआत की और महज दो साल में ही अपनी योग्यता की वजह से प्रबंधक के पद तक पहुंच गए। इस नौकरी के दौरान भी उनका मन इसमें कम और व्यवसाय करने के मौकों की तरफ ज्यादा रहा। उन्होंने उस हरेक संभावना पर इस समय में विचार किया कि किस तरह वे सफल बिजनेस मैन बन सकते हैं। दो छोटी घटनाएं बिजनेस के प्रति उनके जूनून को बयां करती हैं। यह दोनों घटनाएं उस समय की है जब वे शेल कंपनी में अपनी सेवाएं दे रहे थे। जहाँ वे काम करते थे, वहां काम करने वाला कर्मियों को चाय महज 25 पैसे में मिलती थी, लेकिन धीरूभाई पास ही एक बड़े होटल में चाय पीने जाते थे, जहाँ चाय के लिए 1 रूपया चुकाना पड़ता था। उनसे जब इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उसे बड़े होटल में बड़े—बड़े व्यापारी आते हैं और बिजनेस के बारे में बाते करते हैं। उन्हें ही सुनने जाता हूं ताकि व्यापार की बारीकियों को समझ सकूं। धीरूभाई ने अपने ही तरीके से बिजनेस मैनेजमेंट की शिक्षा ली। जिन्होंने आगे चलकर व्हाटर्न और हावर्ड से पारम्परिक तरीके से डिग्री लेने वाले को नौकरी पर रखा। इसी तरह दूसरी घटना उनकी पारखी नजर और अवसर भुनाने की क्षमता की ओर इशारा करती है। हुआ यूं कि उन दिनों में यमन में चांदी के सिक्कों का प्रचलन था। धीरूभाई को एहसास हुआ कि इन सिक्कों की चांदी का मूल्य सिक्कों के मूल्य से ज्यादा है और उन्होंने लंदन की एक कंपनी को इन सिक्कों को गलाकर आपूर्ति करनी शुरू कर दी। यमन की सरकार को जब तक इस बात का पता चलता वे मोटा मुनाफा कमा चुके थे। ये दोनों घटनाएं इशारा कर रही थी कि धीरूभाई अंबानी के पास एक सफल बिजनेसमैन बनने के सारे गुण हैं।
चुनौतियां और सफलता:-
यमन में धीरूभाई का समय बीत रहा था कि वहां आजादी के लिए लड़ाई शुरू हो गई और ढेरों भारतीयों को यमन छोड़ना पड़ा। इस परेशानी के आलम में धीरूभाई को भी यमन छोड़ना पड़ा। ईश्वर ने एक सफल बिजनेसमैन बनाने के लिए परिस्थितियां गढ़नी शुरू कर दी। इस नौकरी के चले जाने के बाद उन्होंने नौकरी की जगह बिजनेस करने का निर्णय लिया, लेकिन व्यवसाय शुरू करने के लिए पैसों की जरूरत थी। धीरूभाई के पास निवेश के लिए बड़ी रकम नहीं थी इसलिए उन्होंने अपने मामा त्रयम्बकलाल दामाणी के साथ मसालों और शक्कर के व्यापार की शुरूआत की। यहीं पर रिलायंस कमर्शियल कॉरर्पोरेशन की नींव पड़ी। इसके बाद रिलायंस ने सूत के कारोबार में प्रवेश किया। यहाँ भी सफलता ने धीरूभाई के कदम चूमें और जल्दी ही वे बॉम्बे सूत व्यपारी संघ के कर्ता—धर्ता बन गए। यह बिजनेस जोखिमों से भरा हुआ था और उनके मामा को जोखिम पसंद नहीं था इसलिए जल्दी ही दोनों के रास्ते अलग हो गए। इससे रिलायंस पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा और 1966 में रिलायंस टैक्सटाइल्स अस्तित्व में आया। इसी साल रिलायंस ने अहमदाबाद के नरोदा में टेक्सटाइल मिल की स्थापना की। विमल की ब्रांडिंग इस तरह की गई कि जल्दी ही यह घर—घर में पहचाना जाने लगा और विमल का कपड़ा बड़ा भारतीय नाम बन गया। विमल दरअसल उनके बड़े भाई रमणीक लाल के बेटे का नाम था। इन्हीं सब संघर्षों के बीच उनका विवाह कोकिलाबेन से हुआ जिनसे उन्हें दो बेटे मुकेश और अनिल तथा दो बेटियां दीप्ती और नीना हुईं। उन्होंने इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और रिलायंस कपड़े के साथ ही पेट्रोलियम और दूरसंचार जैसी कंपनियों के साथ भारत की सबसे बड़ी कंपनी बन गई। इन सबके बीच धीरूभाई अंबानी पर सरकार की नीतियों को प्रभावित करने और नीतियों की कमियों से लाभ कमाने के आरोप भी लगते रहे। उनके और नुस्ली वाडिया के बीच होने वाले बिजनेस घमासान पर भी बहुत कुछ लिखा गया। उनके जीवन से प्रेरित एक फिल्म गुरू बनाई गई जिसमें अभिषेक बच्चन ने उनकी भूमिका का निर्वाह किया। लगातार बढ़ते बिजनेस के बीच उनका स्वास्थ्य खराब हुआ और 6 जुलाई 2002 को उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के बाद उनके काम को बड़े बेटे मुकेश अंबानी ने संभाला।
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