पिता और बेटियाँ
हम उस समय की बेटियाँ हैं
जब पिता मित्र नहीं,
मर्यादा की ऊँची दीवार होते थे।
उनकी आँखों की एक कड़ी रेखा
पूरे घर में अनुशासन की लकीर खींच देती थी।
हमने उनके खौफ में ही
अपनी इच्छाओं को तह कर रखा,
असहमति को कभी स्वर नहीं मिला
“अरे यार पापा” कहना
हमारे शब्दकोष में था ही नहीं।
बस सिर झुका कर कहना आता था
“ठीक है पापा…”
और उसी में हमने
अपने मन की बहुत-सी बातें
चुपचाप विदा कर दीं।
उन बाहों का स्पर्श
कभी माँ की तरह सहज न था,
गले लगाना कोई संस्कार नहीं,
बस एक अधूरा सपना रहा।
प्यार था, पर
वह आदेशों की ओट में छिपा रहा,
स्नेह था, पर
शब्दों में नहीं, जिम्मेदारियों में बँधा रहा।
आज समय ने
पिता की काया से कठोरता छीन ली है,
कंधों पर उम्र का बोझ रख दिया है।
वही पिता
जिनके नाम से कभी
हमारी आवाज़ काँपती थी,
आज हमारे कंधे का सहारा ढूँढते हैं।
अब हम उनकी बेटी ही नहीं,
उनकी साथी बन गई हैं।
चुपचाप उनका हाथ थाम कर
भीड़ पार करवा देती हैं,
उनकी थकान को
अपने आँचल में समेट लेती हैं।
जो कभी कह न सकीं
वह स्नेह अब स्पर्श बन गया है,
जो कभी रोका गया
वह प्रेम अब सेवा में ढल गया है।
हम उस समय की लड़कियाँ हैं
जिन्होंने पिता को
खौफ से सम्मान तक,
और सम्मान से
करुणा तक आते देखा है।
शायद इसी का नाम
परिपक्व प्रेम है
जो शब्दों से नहीं,
कंधों से निभाया जाता है।
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