“हम अपने पिता को कभी जान ही न पाए”
कभी सोचा था, पिता क्यों इतने चुप रहते हैं?
क्यों उनके शब्द हमेशा नियमों में बंधे लगते हैं?
क्यों उनकी आँखों में प्रेम नहीं, कठोरता दिखती थी?
क्यों उनका चेहरा जैसे किसी अदृश्य बोझ से झुका दिखता था?
हमने समझा वो सख्त हैं, ठंडे हैं, दूर हैं।
पर अब समझ आता है वो थके हुए थे, टूटे नहीं थे।
वो भावहीन नहीं थे, बस थकान में छिपे हुए इंसान थे।
जो मुस्कुराना भूल गए थे क्योंकि ज़िन्दगी ने मुस्कुराने की वजहें छीन ली थीं।
१. हमने आदमी देखा, उसका युद्ध नहीं
हमने पिता को देखा मगर उनका संघर्ष नहीं।
हमने उनके आदेश सुने मगर उनके डर नहीं।
हमने उनका गुस्सा देखा मगर उनकी भूख नहीं देखी।
सुबह के नाश्ते में जब रोटी कम पड़ती थी,
वो कहते थे “मुझे भूख नहीं”
पर सच ये था वो भूख निगल लेते थे,
ताकि हम भर पेट खा सकें।
रात को जब हम सो जाते थे,
वो छत की ओर देख सोचते थे
“कल की फीस कहाँ से आएगी?”
“किराया कैसे दूँगा?”
“क्या बच्चों को मुझसे बेहतर ज़िन्दगी मिलेगी?”
हम कहते थे “पापा मुस्कुराते नहीं।”
पर कौन मुस्कुराए जब ज़िन्दगी रोज़ सज़ा सुनाए?
हम कहते थे “पापा बात नहीं करते।”
पर किससे करें? कौन सुनता था उनका दिल?
उनकी ख़ामोशी कमजोरी नहीं थी
वो उनका कवच थी।
वो टूट सकते थे, मगर टूटे नहीं।
क्योंकि अगर वो गिरते,
तो पूरा घर बिखर जाता।
२. हमने माँ के आँसू देखे पिता के ज़ख्म नहीं
माँ ने दर्द रोकर जताया, पिता ने सहकर।
माँ ने शिकायत की, पिता ने सहमति दी।
माँ के आँसू हमें दिखे, पिता का रक्त नहीं।
क्योंकि औरत की पीड़ा आवाज़ बन जाती है,
और आदमी की पीड़ा खामोशी।
वो सुने गए क्योंकि वो बोले।
वो भूले गए क्योंकि वो चुप रहे।
हमने सुना “वो गुस्सैल हैं, ज़िद्दी हैं।”
पर कभी किसी ने नहीं कहा
“वो टूटे हुए हैं, मगर टिके हुए हैं।”
वो हर तूफ़ान में दीवार बन खड़े रहे,
जबकि भीतर से वे भी बिखरे हुए थे।
वो आख़िरी इंसान थे जो हार नहीं माने,
और शायद पहला जो कभी धन्यवाद नहीं पाया।
३. वो नायक नहीं बनना चाहते थे बस ज़िन्दा रहना चाहते थे
बचपन में हमने उन्हें सुपरहीरो समझा,
बाद में कठोर इंसान कहा।
पर अब समझ आता है
वो बस जीवित रहने की जंग लड़ रहे थे।
हम उनके समय चाहते थे
और वो हमारे भविष्य के लिए समय बेच रहे थे।
हम हँसी चाहते थे
और वो हमारी सुरक्षा खरीदने जा रहे थे।
हर “ना” जो उन्होंने कहा प्यार था।
हर सख़्ती परवाह थी।
हर चुप्पी ममता का दूसरा नाम थी।
हमने उनकी कड़वाहट को गलत समझा,
अब ज़िन्दगी ने वही स्वाद हमें चखाया।
अब जब थकान हड्डियों में उतरती है,
तो हम समझते हैं
वो क्यों देर से घर आते थे,
क्यों कभी मुस्कुराते नहीं थे।
४. जब बड़े हुए तब समझ पाए
अब जब हम पिता बने हैं,
बिल चुकाते हैं,
रातों को करवटें बदलते हैं,
तो समझ आता है
मर्द होना कोई गर्व नहीं, एक तपस्या है।
ज़िन्दगी हर दिन थोड़ा-थोड़ा छीनती है
सपने, सुकून, और संवेदनाएँ।
और फिर भी दुनिया कहती है “और दो, और सहो।”
अब आईने में अपनी ही आँखों में वो थकान दिखती है,
जो कभी पिता की आँखों में दिखती थी।
वो चुप्पी अब हमारे भीतर भी बस गई है।
वो कठोरता अब हमारी ढाल बन गई है।
हमने कहा था “वो और अच्छे पिता हो सकते थे।”
अब हम कहते हैं “पता नहीं, वो कैसे संभल गए थे।”
५. जब समझ आया तब वो चले गए
जब वो थे हम व्यस्त थे।
जब वो गए हम टूटे थे।
उन्होंने घर बनाया,
हमने कोना दिया।
उन्होंने जीवन लगाया,
हमने जज किया।
वो हमें छोड़ गए बिना कुछ कहे,
और अब उनकी चुप्पी हमारे दिल में गूंजती है।
अब जब हम अपने बच्चों को सुलाते हैं,
तो उनकी याद जैसे सिरहाने बैठ जाती है।
अब समझ आता है
उनकी डांट में दुआ थी,
उनके नियमों में रक्षा थी,
उनकी सख़्ती में स्थिरता थी।
वो खलनायक नहीं थे
वो नींव थे, जिस पर ये घर खड़ा है।
हमने पिता को कभी जाना ही नहीं।
हमने उनके स्वभाव को देखा, उनके संघर्ष को नहीं।
हमने उनके शब्दों को सुना, उनके मौन को नहीं।
हमने माँ के आँसू समझे पिता के बलिदान नहीं।
अब जब वही बोझ हमारे कंधों पर है,
अब जब वही थकान हमारे दिल में है,
तब समझ आता है
वो मर्द नहीं, एक मौन योद्धा थे।
अगर वो ज़िंदा हैं तो गले लगाओ।
अगर वो चले गए हैं तो सिर झुका कर दुआ करो।
क्योंकि इस धरती पर कोई रिश्ता इतना सच्चा नहीं,
जितना पिता का
जो सब कुछ देता है,
और बदले में “धन्यवाद” भी नहीं माँगता।
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