Tuesday, November 4, 2025

स्त्री क्या है

 "अजन्मी स्वतंत्रता"


कभी वह बस एक देह थी

जिसमें धड़कता था जीवन 

निर्मल, अज्ञात, स्वतन्त्र।


फिर किसी ने कहा 

यह जीवन केवल तुम्हारा नहीं,

यह राष्ट्र का है, समाज का है,

यहाँ जो जन्म लेगा,

वह हमारे स्वप्न का वाहक होगा।


और उस क्षण

गर्भ बन गया प्रयोगशाला,

जहाँ मातृत्व नहीं,

निर्देश अंकुरित होने लगे।


कहा गया 

कौन जन्म ले, कैसे जन्म ले,

कौन से गीत सुनो, कौन सी बात सोचो,

किसे पढ़ो, किसे न सोचो 

सब तय होगा इस गर्भ में।


तुम्हारा शरीर अब तुम्हारा नहीं,

वह किसी और के विचारों की ज़मीन है।


वे बोले 

“शुद्धता” का अर्थ पवित्रता नहीं,

वह नियंत्रण का दूसरा नाम है।

“संस्कार” का अर्थ करुणा नहीं,

वह चयन की भाषा है 

जहाँ प्रेम नहीं, योजना है।


उन्होंने कहा 

स्त्री वह भूमि है

जहाँ से श्रेष्ठ पीढ़ियाँ उपजती हैं।

पर किसने पूछा 

क्या भूमि होना ही उसका भाग्य है?

क्या बीज बोने से पहले

कभी पूछा गया, वह बरसना चाहती है या नहीं?


कभी कहा गया था 

गर्भ एक उपासना है।

अब कहा जाता है 

वह एक कर्तव्य है।

फर्क बस इतना है

कि पहले वह प्रेम की बात थी,

अब आदेश की।


शहर की दीवारों पर लिखा है 

“संस्कारित गर्भ से संस्कारित भविष्य।”

पर कोई नहीं बताता

कि भविष्य संस्कारों से नहीं,

स्वतंत्र इच्छाओं से बनते हैं।


कोई नहीं बताता

कि जब स्त्री सोचने लगती है,

तो वही सबसे बड़ा संस्कार होता है।


हर युग ने स्त्री से कहा 

“तू दे, जन्म दे, पालन कर।”

पर कभी नहीं कहा 

“तू रच, तय कर, चुन।”


हर युग ने उसके भीतर झाँककर

अपनी परछाइयाँ बो दीं 

कभी धर्म के नाम पर,

कभी वंश के नाम पर,

कभी संस्कृति, कभी राष्ट्र के नाम पर।


पर हर बार

उसकी देह, उसकी चुप्पी, उसकी पीड़ा

इतिहास के हाशिए पर लिख दी गई।


अब वह जानती है 

जब विचार गर्भ में उतरते हैं,

तो शरीर स्वतंत्र नहीं रहता।

जब निर्णय बाहर से आता है,

तो जीवन भीतर से मरने लगता है।


और इसलिए

वह आज कहती है 

गर्भ मेरा है।

मेरे भीतर जो जन्म लेगा,

वह किसी सिद्धांत की संतान नहीं,

एक मनुष्य होगा 

अपनी इच्छा, अपने सपनों,

अपने प्रश्नों के साथ।


वह प्रेम से जन्मेगा, आदेश से नहीं।

वह स्वतंत्र होगा, संस्कारित नहीं।

वह किसी वंश की रक्षा नहीं करेगा 

बल्कि हर वंश, हर देह की गरिमा की रक्षा करेगा।


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"जब विचार गर्भ में प्रवेश कर जाते हैं,

तो स्वतंत्रता धीरे-धीरे मिटने लगती है।

और जब स्त्री प्रतिरोध करती है तो भविष्य फिर से जन्म लेता है।"

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