अगर आप यह पूरा लेख पढ़ लेते हैं, तो जितने समय में आप इसे पढ़ेंगे, उतने में पृथ्वी पर सैकड़ों लोग मर चुके होंगे। हाँ, सर्वेक्षणों के अनुसार, हर मिनट पृथ्वी पर लगभग 100 लोग मरते हैं।
अब सवाल यह है कि मरने के बाद मानव शरीर, मन और विचारों का क्या होता है? शरीर के अंदर मौजूद matter और energy का क्या परिणाम होता है? इस प्रश्न के कई पारंपरिक उत्तर हैं। धार्मिक कहानियों और अवैज्ञानिक व्याख्याओं के माध्यम से लोग “आत्मा” जैसी एक अलौकिक और पूरी तरह से अवैज्ञानिक धारणा पर विश्वास करने लगते हैं। जबकि विज्ञान के दृष्टिकोण से देखें, तो इस प्रश्न का बहुत ही तार्किक और वैज्ञानिक उत्तर मौजूद है। आइए, उसे समझते हैं।
मनुष्य के शरीर में लगभग 15% प्रोटीन, 20% वसा (fat), 2% कार्बोहाइड्रेट, 2% लवण, 1% विभिन्न गैसें और शेष लगभग 60% जल होता है। ये सभी तत्व मूलभूत कणों से बने होते हैं यानी हमारे शरीर की हड्डियाँ, मांस, त्वचा, बाल, नाखून सब इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन जैसे कणों का समूह हैं। हालांकि standard model of particle physics के अनुसार, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन मूलभूत कण नहीं हैं, फिर भी सरलता के लिए हम उन्हें यहाँ प्राथमिक कण मान लेते हैं।
जब कोई व्यक्ति मरता है, तो आमतौर पर उसका शरीर या तो जलाया जाता है या दफनाया जाता है। हम जानते हैं कि matter और energy न तो उत्पन्न की जा सकती है, न ही नष्ट की जा सकती है। इसका मतलब यह है कि मृत्यु के बाद भी आपके शरीर का कोई भी कण पूरी तरह से गायब नहीं होता। विश्वास करें या न करें आपके मरने के बाद भी आपके शरीर के हर कण किसी न किसी रूप में इस ब्रह्मांड में सदा के लिए मौजूद रहेंगे। कैसे? आइए, इसे थोड़ा विस्तार से समझते हैं।
यदि शरीर को जलाया जाता है, तो उसमें मौजूद सारा जल तेजी से वाष्पित होकर वातावरण में मिल जाता है और water cycle के नियमों के अनुसार बाद में वर्षा, नदी, समुद्र आदि में शामिल हो जाता है। अगर शरीर को दफनाया जाए, तो यह प्रक्रिया धीमी होती है, लेकिन होती ज़रूर है। यानी, आपके शरीर का हर जलकण पृथ्वी के वातावरण में बना रहेगा। हो सकता है कि आज आपने जो पानी पिया, उसका कोई अंश किसी समय गांधीजी या अकबर के शरीर में रहा हो! और 1000 साल बाद वही जलकण आपके किसी दूर के वंशज के शरीर में हो सकता है।
इसी प्रकार, जब पौधे मिट्टी से पानी सोखते हैं, तो वही जलकण photosynthesis के जरिए ऑक्सीजन और कार्बोहाइड्रेट में बदल जाते हैं। यानी, आपके मरने के बाद भी आपकी देह के अणु हवा में, पौधों में, जानवरों में और आने वाली पीढ़ियों में जीवित रहते हैं।
अब जल के अलावा शरीर में जो बाकी matter है, वह भी किसी न किसी रूप में पृथ्वी पर रहता है। हालांकि, एक छोटा अपवाद है हमारे शरीर में थोड़ी मात्रा में रेडियोधर्मी (radioactive) पदार्थ होते हैं, जैसे पोटेशियम, यूरेनियम आदि, जो decay होकर अन्य तत्वों में बदल जाते हैं और इस प्रक्रिया में कुछ helium gas उत्पन्न होती है। चूँकि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण हीलियम को रोकने में सक्षम नहीं है, यह गैस अंतरिक्ष में निकल जाती है। इस तरह, आपके शरीर के कुछ परमाणु हमेशा के लिए ब्रह्मांड में घूमते रहेंगे!
अब बात करते हैं energy की।
यहीं से आत्मा, भूत, पिशाच जैसी कल्पनाएँ जन्म लेती हैं। कई लोग “आत्मा” के अस्तित्व को साबित करने की कोशिश करते रहे हैं विज्ञान के कुछ शब्दों का उपयोग करके अपनी बात को “वैज्ञानिक” बताने की कोशिश की गई है। उदाहरण के लिए, स्वामी अभेदानंद ने अपनी पुस्तक “मरणेर पार” (मरण के पार) में आत्मा की कल्पना को “वैज्ञानिक तर्क” के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की थी, लेकिन वास्तविकता में वह कल्पना मात्र है।
1907 में अमेरिकी चिकित्सक डंकन मैकडूगल (Duncan Macdougall) ने छह मृतप्राय व्यक्तियों पर प्रयोग किया और दावा किया कि आत्मा का वजन 21.3 ग्राम होता है। The New York Times ने इस पर समाचार भी प्रकाशित किया था, जिससे दुनिया भर में चर्चा हुई। लेकिन विज्ञान ने इस प्रयोग को अस्वीकार कर दिया क्योंकि यह प्रयोग वैज्ञानिक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण था और परिणाम असंगत थे।
अब सवाल उठता है मरने के बाद हमारे शरीर की energy का क्या होता है?
विज्ञान के अनुसार, energy भी नष्ट नहीं होती, बस उसका रूप बदल जाता है। यह First Law of Thermodynamics से स्पष्ट होता है:
Change in Energy = Heat - Work
मनुष्य के शरीर में तीन प्रकार की ऊर्जा होती है:
1. Electrical energy जो हमारे मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र (nervous system) को चलाती है।
2. Heat energy जो मांसपेशियों की गतिविधि से उत्पन्न होती है।
3. Chemical energy जो प्रोटीन, वसा और कार्बोहाइड्रेट के रूप में संग्रहीत रहती है (यानी हमारी देह की "मेद")।
जीवित रहते हुए यही chemical energy शरीर की क्रियाओं में kinetic और heat energy में परिवर्तित होती रहती है।
मृत्यु के बाद, यह प्रक्रिया बंद हो जाती है न कोई श्वास, न कोई रक्त प्रवाह, न ही कोई electrical activity।
इसलिए सोचने, महसूस करने या “चेतना” (consciousness) की कोई संभावना नहीं रहती।
आपके शरीर की सारी ऊर्जा अंततः heat energy में परिवर्तित होकर वातावरण में फैल जाती है। यही कारण है कि entropy (अव्यवस्था) हमेशा बढ़ती रहती है और यही Second Law of Thermodynamics का मूल सिद्धांत है।
तो अब सोचिए जब कोई व्यक्ति मर जाता है, तो “आत्मा की शांति” की प्रार्थना करने या “पिंडदान” करने का क्या वैज्ञानिक अर्थ रह जाता है?
थोड़ा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचिए आप पाएँगे कि “आत्मा” जैसी कोई वस्तु नहीं है, यह सिर्फ़ मनुष्य की कल्पना है, जो भय और परंपरा से उपजी है।
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