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Monday, January 19, 2026
डॉ. वर्गीज कुरियन
डॉ. कुरियन एक इंजिनियर थे और मार्केटिंग, ब्रांडिंग इत्यादि पर इतना ध्यान नहीं देते थे। ऐसे में उनके साले K.M. Philip ने उन्हें इन चीजों की महत्ता बतायी। इसके बाद ही उन्होंने एक ब्रांड नेम की खोज शुरू की और बहुत विचार विमर्श किया और अंत में अमूल नाम का चयन किया गया, जो संस्कृत भाषा के एक शब्द “अमूल्य” से लिया गया है। इसका अर्थ अनमोल होता है।
साठ और सत्तर के दशक की बात करें तो इस दौर में हमारे देश में दूध उत्पादन की बड़ी कमी थी। इसी समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए वर्गीज कुरियन कटिबद्ध थे। वर्ष 1970 में ऑपरेशन फ़्लड का आगाज़ हुआ। जिसे तीन चरण में समप्न्न किया गया। इस महा अभियान के फल स्वरूप हमारा देश विश्व का सबसे प्रबल और बड़ा दूध उत्पादक केंद्र बन गया और डॉ. कुरियन को “the man with billion-litre idea” नाम से फेमस हुए।
डॉ॰ वर्गीज कुरियन द्वारा लिखी गयी प्रसिद्ध किताबों की बात करें तो उन्होने अपने जीवनकाल में
वर्ष 1963 में रमन मेंगसेसे अवार्ड से सम्मानित हुए।
उपरी तौर पर अमूल एक बेहद सफल डेयरी ब्रांड लग सकता है, लेकिन अमूल ने ऐसा बनने के सफ़र में कई ऐसी चीजें कर डालीं जिनकी कोई कीमत नहीं, जो सचमुच अमूल्य हैं-
इंद्रा नूई
इंद्रा नूई
इंद्रा नूई
भारत में पैदा हुई इंदिरा कृष्णमूर्ति नूई एक वरिष्ठ बिज़नेस एग्जीक्यूटिव और वर्तमान में पेप्सिको कंपनी की अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। पेप्सिको खाद्य और पेय पदार्थों के व्यवसाय में संलग्न दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी है। प्रसिद्ध पत्रिका फोर्ब्स की ‘दुनिया की प्रभावशाली महिलाओं’ की सूचि में उनका नाम लगातार कई साल तक होता रहा। सन 2014 में वे फ़ोर्ब्स के इस सूचि में 14वें स्थान पर थीं। इसके अलावा वे येल कारपोरेशन में सक्सेसर फेलो, न्यूयॉर्क फेडरल रिजर्व के निदेशक बोर्ड की स्तर बी की निदेशक, कैटेलिस्ट के बोर्ड और लिंकन प्रदर्शन कला केंद्र की एक सदस्य हैं। इंद्रा एइसेन्होवेर फैलोशिप के न्यासी बोर्ड की सदस्य हैं और यू.एस-भारत व्यापार परिषद में भी अपनी सेवाएँ दी हैं।
प्रारंभिक जीवन
इंदिरा कृष्णमूर्ति नूई का जन्म 28 अक्टूबर 1955 में तमिल नाडु के मद्रास शहर (वर्तमान में चेन्नई) में एक तमिल परिवार में हुआ था। उनके पिता ‘स्टेट बैंक ऑफ़ हैदराबाद’ में कार्यरत थे और उनके दादा जिला न्यायाधीश थे। नूई की प्रारंभिक शिक्षा मद्रास के होली एन्जिल्स एंग्लो इंडियन हायर सेकेंडरी स्कूल में हुई इसके बाद उन्होने सन 1974 में मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से भौतिकी, रसायन विज्ञान और गणित विषय में स्नातक की डिग्री प्राप्त की और फिर भारतीय प्रबंध संस्थान, कोलकाता, में दाखिला लिया जहाँ से सन 1976 में उन्होंने प्रबंधन में स्नात्त्कोत्तर किया।भारतीय प्रबंध संस्थान, कोलकाता (आई.आई.एम. कोलकाता) से स्नात्त्कोत्तर की डिग्री हासिल करने के बाद इंद्रा नूई ने भारत में अपना करियर जॉनसन एंड जॉनसन के साथ प्रारंभ किया और प्रोडक्ट मेनेजर के तौर पर कंपनी को अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने टेक्सटाइल फर्म ‘मेत्टर बर्डसेल’ के साथ भी कार्य किया। इसके बाद इंद्रा ने सन 1978 में अमेरिका स्थित प्रसिद्ध येल यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया जहाँ से उन्होंने ‘पब्लिक और प्राइवेट मैनेजमेंट’ का अध्ययन किया।
करियर
येल यूनिवर्सिटी में अध्ययन के दौरान उन्होंने ‘बूज एलन हैमिलटन’ में समर इंटर्नशिप भी किया। सन 1980 में उन्होंने येल से अपनी प्रबंधन की पढ़ाई पूरी की जिसके पश्चात नूई ने अमेरिका में कार्य करने का फैसला किया और बोस्टन कंसल्टेशन ग्रुप ज्वाइन कर लिया और ‘मोटोरोला’ और ‘एसिया ब्राउन बोवेरी’ जैसी कंपनियों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। इंद्रा ने वर्ष 1986-90 के बीच मोटोरोला कंपनी में कॉरपोरेट स्ट्रैटजी के उपाध्यक्ष के तौर पर कार्य किया और मोटोरोला के ऑटोमोटिव और इंडस्ट्रियल इलेक्ट्रॉनिक्स के विकास की जिम्मेदारी संभाली।
पेप्सिको में करियर
इंद्रा नूई सन 1994 में पेप्सिको में शामिल हुईं और सन 2001 में कंपनी का अध्यक्ष और मुख्य वित्त अधिकारी (सी.एफ.ओ.) बनायी गयीं। वे पेप्सिको की दीर्धकालिक विकास रणनीति की शिल्पकार मानी जाती हैं जिसके अंतर्गत उन्होने एक दशक से अधिक समय तक कंपनी की वैश्विक रणनीति का निर्देशन किया है। इंद्रा ने पेप्सीको के पुनर्गठन का भी नेतृत्व किया जिसमें शामिल हैं ट्रोपिकाना (1998) का अधिग्रहण और क्वेकर ओट्स कंपनी का विलय (2001)। सन 2006 में इंद्रा नूई पेप्सिको की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सी.इ.ओ.) बनीं। इस प्रकार वे पेप्सी के इतिहास में पांचवीं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सी.इ.ओ.) हैं।फार्च्यून पत्रिका ने सन 2014 में उन्हें ‘दुनिया की प्रभावशाली व्यवसायिक महिलाओं’ में तीसरे स्थान पर रखा।
सन 2001 में इंद्रा पेप्सिको का मुख्य वित्त अधिकारी (सी.एफ.ओ.) बनाई गयीं जिसके बाद कंपनी का लाभांस 2.5 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 6.5 अरब अमेरिकी डॉलर पहुँच गया है।
सन 2007 और 2008 में ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ ने उन्हें अपने ’50 वीमेन तो वाच’ सूचि में रखा था।
सन 2007 और 2008 में फोर्ब्स ने उन्हें ‘दुनिया की प्रभावशाली महिलाओं’ के सूचि में स्थान दिया। सन 2008 में फ़ोर्ब्स ने उन्हें ‘सबसे प्रभावशाली महिलाओं’ की सूचि में तीसरा स्थान और 2014 में तेरहवां स्थान दिया। सन 2009 और 2010 में फार्च्यून पत्रिका ने उन्हें ‘व्यवसाय के क्षेत्र में सबसे प्रभावशाली महिला’ की सूचि में पहला स्थान दिया। अक्टूबर 2010 में फार्च्यून पत्रिका ने उन्हें ‘दुनिया की प्रभावशाली महिलाओं’ की सूचि में छठा स्थान दिया।
पेप्सिको को आगे ले जाने की इंदिरा नूई की लगभग सभी रणनीतियां सफल रही हैं और उनकी इन सब योजनाओं को निवेशक भी मिले हैं।
नूई येल कारपोरेशन में ‘सुक्सेसर फैलो’ हैं। वे वर्ल्ड इकनोमिक फोरम, इंटरनेशनल रेस्क्यू कमेटी (कैटेलिस्ट) और लिंकन सेण्टर फॉर द परफोर्मिंग आर्ट्स के संस्थापक बोर्ड की सदस्य हैं। वे एइसेन्होवेर फैलोशिप के न्यासी बोर्ड की सदस्य हैं और यू.एस-भारत व्यापार परिषद में भी अपनी सेवाएँ दी हैं। वे वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट के मानद को-चेयर भी हैं।
इंदिरा नूई का वेतन
सन 2011 में पेप्सिको के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सी.इ.ओ.) के तौर पर इंद्रा नूई को वेतन के रूप में लगभग 1.7 करोड़ अमेरिकी डॉलर दिया गया। सन 2014 तक उनका वेतन बढ़कर लगभग 1.9 करोड़ अमेरिकी डॉलर हो गया था।
पुरस्कार और सम्मान
सन 2008, 2009, 2010, 2011, 2012, 2013, और 2014 में फ़ोर्ब्स पत्रिका ने उन्हें ‘100 सबसे अधिक प्रभावशाली व्यक्ति’ की सूचि में रखा। सन 2006, 2007, 2008, 2009 और 2010 में फार्च्यून पत्रिका ने इंद्रा नूई को ‘व्यवसाय के क्षेत्र में सबसे प्रभावशाली महिला’ के सूचि में स्थान दिया। सन 2008 में ‘यू.एस. न्यूज़ एंड वर्ल्ड रिपोर्ट’ ने उन्हें ‘अमेरिका के सबसे बेहतरीन नेताओं’ की सूचि में रखा।
सन 2008 में उन्हें ‘अमेरिकन एकेडेमी ओद आर्ट्स एंड साइंसेज’ के फ़ेलोशिप के लिए चुना गया। जनुअरी 2008 में उन्हें अमेरिका–इंडिया बिज़नस कौंसिल का अध्यक्ष चुना गया।
सन 2009 में लीडर्स ग्रुप ने उन्हें ‘सी.इ.ओ. ऑफ़ द इयर चुना। सन 2009 में सलाहकार संस्था ‘ब्रेंडन वुड इंटरनेशनल’ ने उन्हें ‘द टॉपगन ‘सी.इ.ओ.’ माना।
सन 2007 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया।
व्यक्तिगत जीवन
इंद्रा नूई राज कुमार नूई से विवाहित हैं। नूई दंपत्ति की दो बेटियाँ है, जो ग्रीनविच कनेक्टिकट में रहती हैं। उनकी एक बेटी एक वर्तमान में येल विश्विद्यालय से प्रबंधन की पढ़ाई कर रही हैं। उनकी बड़ी बहन चंद्रिका कृष्णमूर्ति टंडन एक प्रसिद्ध गायिका हैं। वे शाकाहारी हैं।
रॉबर्ट जॉन
Robert Downey Jr Success Story
Introduction
रॉबर्ट जॉन डॉनी जुनियर एक मुल अमरिकी अभिनेता व निर्माता है। डॉनी ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरूआत १९७० में पाँच वर्ष की आयु में अपने पिता की फ़िल्म पाउंड से की थी जिसके बाद वे लगातार फ़िल्मों व टेलिविज़न पर काम करते रहे। लेस दैन ज़ीरो (१९८७) में अपनी भूमिका के लिए पहली बार डॉनी के अभिनय पर समीक्षकों ने ध्यान दिया। ज़ीरो के बाद डॉनी को कई बड़ी फ़िल्मों में मुख्य भूमिका डी गई जिनमे एयर अमेरिका (१९९०), सोपडिश (१९९१) और नैचुरल बोर्न किलर (१९९४) शामिल है। उन्होंने १९९२ में बनी फ़िल्म चैप्लिन में चार्ली चैप्लिन की भूमिका साकरी जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के अकादमी पुरस्कार के लिए नामांकन प्राप्त हुआ।
रॉबर्ट का जन्म
रॉबर्ट का जन्म 4 अप्रैल 1965 को न्यू यॉर्क शहर में हुआ था रॉबर्ट के पिता का नाम रॉबर्ट डॉउनी सीनियर था जो एक फिल्म निर्माता थे और उनकी माँ का नाम एल्सी फोर्ड था और वो एक एक्ट्रेस थी जिन्होंने रॉबर्ट को एक्टिंग सिखाई और उनका एक्टिंग की तरफ इंटरेस्ट बढ़ाया रॉबर्ट ने भी छोटी सी उम्र में ही एक्टिंग करनी शुरू कर दी थी सिर्फ 5 साल की उम्र में ही उन्होंने पाउंड नाम की फिल्म में काम किया था और ये फिल्म रोबर्ट के पिता ने ही बनाई थी रोबर्ट ने इसके बाद भी अपने पिता की कई फिल्मों में छोटे मोटे रोल किये रॉबर्ट के पिता ड्रग सेवन किया करते थे
रोबर्ट की पढ़ाई
रोबर्ट ने अपनी स्कूल की पढ़ाई सांता मोनिका हाई स्कूल से की थी लेकिन जब वो 16 साल के हुए तब उन्होंने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और अपनी माँ के पास वापस न्यूयॉर्क आ गए और फिर से फिल्मों की तरफ गए और 1983 से 1990 तक उन्होंने कई फिल्मों में काम किया जिसकी वजह से वो लोगों की नजरों में आने लगे थे लेकिन अबतक उन्हें ड्रग्स की लत से निजात नहीं मिली थी साल 1990 में रोबर्ट ने कई बार नशे से पीछा छुड़ाने की कोशिश की लेकिन हर बार उन्हें निराशा मिली लेकिन इसके साथ ही उनका हॉलीवुड करियर काफी तेज़ी से आगे बढ़ रहा था उन्होंने मीडिया की नजरों में बेहतरीन एक्टर की इमेज बनाली थी और इस समय उनकी कुछ फिल्म काफी हिट रही जिनमे सॉपडिश और शॉर्टकट फिल्म शामिल है
फ़िल्मी करियर
रॉबर्ट डॉनी जुनियर बचपन में ही चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर फिल्मों से जुड़ चुके थे लेकिन एक परिपक्व अभिनेता के तौर पर करियर बनाने के लिए उन्होंने सबसे पहले थिएटर का सहारा लिया. उन्होंने थिएटर की शुरुआत नॉर्मन लेयर के प्ले “अमेरिकन पैशन” से की. उन्हें फिल्मों में पहली कमियाबी साल 1985 में आई फिल्म “टफ टफ” से मिली जिसमे उन्होंने जेम्स स्पेडर के सहयोगी की भूमिका निभाई थी. जिसके बाद वह कुछ और फिल्मों में सहायक अभिनेता के रूप में देखे गए. फिल्मों में लीड एक्टर के रूप में रॉबर्ट डॉनी जुनियर की शुरुआत वर्ष 1987 मे जॉन हूग्स की फिल्म “द पिक-अप आर्टिस्ट” के जरिये हुई. इस फिल्म में उनके रॉबर्ट द्वारा निभाए गए किरदार जैक जेरिको को सभी ने खूब सराहा. इस फिल्म के बाद रॉबर्ट डॉनी जुनियर ने ज़ीरो, चैप्लिन, हार्ट एंड सोल, ओनली यु, नैचुरल बॉर्न किलर्स, चांसेस आर , रिस्टोरेशन, टू गर्ल्स एंड अ गाए, एयर अमेरिका, ब्लैक एंड वाईट, शोर्ट कट्स, रिचर्ड III और द लास्ट पार्टी फिल्मों में काम किया.
रॉबर्ट डॉनी जुनियर की लोकप्रियता
5 सालों के बाद नशीले पदार्थो के सेवन का इलाज और गिरफ्तारियों की सजा काट लेने के बाद रॉबर्ट डॉनी जुनियर ने 2001 में उन्होंने फिर से वापसी की. ठीक होने के बाद उन्हें पहला काम अगस्त 2001 में एल्टन जॉन के गाने “आई वांट लव” के वीडियो में मिला. उनकी फिल्मी परदे पर दूसरी पारी की शुरुआत “एयर अमेरिका” फिल्म के मित्र मेल गिब्सन की मदद से हुयी. उन्होंने “द सिंगिंग डिटेक्टिव” में रोल दिलवाने के लिए रॉबर्ट की मदद की. इस फिल्मे के बाद रॉबर्ट ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. जिसके बाद उन्होंने “किस किस बैंग बैंग”, डिज़्नी की “द शैगी डॉग” और डेविड फिनचर की 2007 में बनी फ़िल्म “जोडियाक” में काम किया. रॉबर्ट डॉनी जुनियर को दुनियाभर में लोकप्रियता साल 2008 में आई मार्वल की फिल्म “आयरन मैन” से मिली. इस फिल्म में रॉबर्ट डॉनी जुनियर ने आयरनमैन का किरदार निभाया. इस फिल्म से पहले तक रॉबर्ट डॉनी जुनियर के नाम से इस तरह की एक भी ब्लॉकबस्टर फिल्म नहीं थी. रॉबर्ट डॉनी जुनियर ने आयरन मैन के लिए 5 महीने में करीब 10 किलो वजन बढाया. इस फिल्म के लिए रॉबर्ट डॉनी जुनियर को फिल्म समीक्षको ने खूब सराहा.
ऑस्कर अवॉर्ड
दोस्तों साल 1992 में रोबर्ट की लाइफ में ऐसा भी समय आया जब उन्हें चैपलिन फिल्म में एक्टिंग की वजह से ऑस्कर अवॉर्ड से नवाज़ा गया सभी लोग रोबर्ट की एक्टिंग से काफी प्रभावित थे और दोस्तों अभी रोबर्ट जिस भी मकाम पर थे वो सब उनकी मेहनत का नतीजा था दोस्तों जहां एक तरफ उनकी एक्टिंग की तारीफ़ हुआ करती थी वहीं दूसरी तरफ उनके ड्रग एडिक्शन विवादों में घिरे रहने की वजह से वो काफी परेशान रहा करते थे
रॉबर्ट डॉनी जुनियर की पर्सनल लाइफ
रॉबर्ट ने अपनी जिंदगी में कई सारे उतार चड़ाव देखें हैं. उनका बचपन पिता के नशे की लत के बीच बिता. जिसका वह भी शिकार बने. फिल्मों में करियर बनाने के बाद साल 1992 में उन्होंने Deborah Falconer से शादी की. शादी के कुछ साल बाद ही उनका सबसे बुरा वक़्त शुरू हुआ. रॉबर्ट डॉनी जुनियर पर नशा करने के चार्ज लगे. जिसके चलते उन्हें जेल में रहना पड़ा. जेल में रहने के दौरान उन्हें दुसरे कैदी बुरी तरह पिटा करते थे. एक साल बाद जब वह पेरोल पर जेल से बाहर आये तब उनकी पत्नी ने उन्हें तलाक का नोटिस भेज दिया. साल 2001 तक आते वह कई बार जेल जा चुके थे. उनकी सामाजिक छवि इससे बुरी तरह प्रभावित हुयी लेकिन साल 2004 के बाद उनकी ज़िन्दगी में नए बदलाव आने लगे. उनकी मुलाकात Susan levin से हुई. रॉबर्ट डॉनी जुनियर ने सूजन को प्रोपोस किया लेकिन रॉबर्ट डॉनी जुनियर से सामने सूजन एक एक शर्त रखी कि जब तक वह नशे की लत नहीं छोड़ देते वह उनसे शादी नहीं करेगी रॉबर्ट ने नशे से खुद को पूरी तरह अलग किया और साल 2005 में सुजन के साथ शादी कर ली.
सबीर भाटिया
सबीर भाटिया
सबीर भाटिया की जीवनी
सबीर भाटिया एक भारतीय उपक्रमी और इ-मेंल सेवा हॉटमेंल (जो अब आउटलुक.कॉम है) के सह-संस्थापक हैं। सबीर द्वारा स्थापित यह इ-मेंल सेवा आज विश्व के लगभग 106 भाषाओं में है और फरवरी 2013 तक लगभग 42 करोड़ लोग इसका उपयोग कर रहे थे। हॉटमेंल की स्थापना सन 1996 में सबीर भाटिया और अमरीका के जैक स्मिथ ने तीन लाख डॉलर की पूंजी से की थी और सन 1997 में इसका अधिग्रहण दुनिया के तत्कालीन सबसे बड़ी आई.टी. कम्पनी माइक्रोसॉफ्ट ने लगभग 2500 करोड़ रूपयों में किया। इस अधिग्रहण के बाद सबीर भाटिया रातोंरात सिलिकॉन वैली के सुपरस्टार बन गए और पूरे विश्व पर छा गए। हॉटमेंल के माइक्रोसॉफ्ट द्वारा अधिग्रहण के बाद सबीर ने सन 1999 में एक इ-कॉमर्स कंपनी आरजू.कॉम प्रारंभ किया। बाद में उनकी कंपनी सबसेबोलो ने मुफ्त में मैसेज भेजने वाली कंपनी jaxtr का अधिग्रहण किया। हॉट-मेंल के बाद सबीर भाटिया के कई उपक्रम प्रारंभ किये पर उनमें से किसी को भी हॉट-मेंल जैसी सफलता नहीं मिल सकी।
प्रारंभिक जीवन:-
सबीर भाटिया का जन्म 30 दिसम्बर 1968 को पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ में एक पंजाबी परिवार में हुआ था। उनके पिता बलदेव भाटिया भारतीय सेना में एक अधिकारी थे जो बाद में रक्षा मंत्रालय में शामिल हो गए और उनकी माता दमन भाटिया सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में वरिष्ठ अधिकारी थीं। सबीर की प्रारंभीक शिक्षा बेंगलोर के सेंट जोसफ बॉयज़ हाई स्कूल से हुई और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उन्होंने सन 1986 में पिलानी के बिड़ला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान (BITS) में दाखिला लिया पर दो वर्ष के बाद ही एक कार्यक्रम के तहत अमेरिका के प्रसिद्ध कैलिफोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (Caltech) में तबादला ले लिया। कैलटेक से स्नातक होने के बाद सन 1989 में उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनीयरिंग में एम.एस. करने के लिए स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। यहाँ उन्होंने “अल्ट्रा लो पावर वीएलएसआई डिजाइन” पर कार्य किया।
Success Story
स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में रहते हुए सबीर स्टीव जॉब्स और स्कॉट मैकनेली जैसे उद्यमियों से प्रेरित हुए और स्नातकोत्तर के बाद पी.एच.डी. करने के बजाय, एप्पल में शामिल होने का फैसला किया। सन 1995 में सबीर ने जावासॉफ्ट नाम की एक इन्टरनेट कंपनी प्रारंभ की। यह कंपनी लोगों की व्यक्तिगत इनफॉर्मेंशन इंटरनेट पर स्टोर करती थी और इन सूचनाओं को इन्टरनेट के माध्यम से किसी भी कंप्यूटर पर देखा जा सकता था। इसी दौरान सबीर जिस कंपनी में कार्य कर रहे थे उसने कंपनी के इंटर्नल नेटवर्क में फायर वॉल लगा दिया जिसके कारण ऑफिस कार्य करते हुए लोग अपना पर्सनल मेंल चैक नहीं कर सकते थे। इसी क्षण सबीर के मन में एक विचार आया कि क्यों न ई-मेंल को भी इन्टरनेट पर डाल दिया जाए, ताकि किसी भी स्थान से और किसी भी कंप्यूटर पर आप अपनी मेंल देख सकें।
वे अपने एक सहयोगी जैक स्मिथ के साथ मिलकर इस पर काम करने लगे। दोनों ने पहले वेब आधारित ई-मेंल सिस्टम की क्षमता का परिक्षण किया और सिद्ध किया और उसके बाद हॉटमेंल बनाने का फैसला किया। ज्यादा से ज्यादा लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए, यह ई-मेंल सेवा बिलकुल मुफ़्त रखी गयी और वेबसाइट पर विज्ञापन के माध्यम से राजस्व प्राप्त किया जाने लगा। इस प्रकार हॉट मेंल का जन्म हुआ और बाकी इतिहास है। इससे पहले दुनिया में इस तरह की कोई भी ई-मेंल प्रणाली नहीं थी। 16 फरवरी 1996 को हॉट मेंल का जन्म हुआ और 30 दिसंबर 1997 को सबीर भाटिया ने अपनी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट को बेच दी।
सेवा प्रारंभ करने के छह महीनों के अन्दर ही, हॉटमेंल ने दस लाख से अधिक लोगों को आकर्षित किया और जैसे ही यूजर्स की संख्या में वृद्धि होने लगी, मशहूर आई.टी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट का ध्यान इस पर गया और 30 दिसम्बर 1997 को हॉटमेंल को 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर में माइक्रोसॉफ्ट को बेच दिया गया।
सबीर भाटिया के अन्य उपक्रम:-
माइक्रोसॉफ्ट द्वारा हॉटमेंल के अधिग्रहण के बाद सबीर ने लगभग एक साल तक माइक्रोसॉफ्ट में कार्य किया और अप्रैल 1999 में उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट छोड़कर एक इ-कॉमर्स कंपनी आरजू.कॉम प्रारंभ की पर यह कंपनी चल नहीं पायी और इसे बंद करना पड़ा। बाद में सन 2010 में इसे एक ट्रैवेल पोर्टल के रूप में दोबारा शुरू किया गया।
इसके पश्चात उभरते हुए ब्लॉगॉसफियर को भुनाने के उद्देश्य से उन्होंने BlogEverywhere की शुरूआत की (सह-संस्थापक शिराज कांगा और विराफ जैक के साथ) पर यह भी कुछ ख़ास नहीं चल पायी।
सन 2006 में उन्होंने एक नेटवर्क सुरक्षा विक्रेता और एसएसएल वीपीएन-प्लस के निर्माता, निओऐक्सेल में निवेश कर एंजल निवेशक बन गए। सन 2008 में सबीर भाटिया ने सबसेबोलो.कॉम बाज़ार में उतारा जो एक मुफ्त वेब-आधारित टेलीकन्फरेनसिंग प्रणाली उपलब्ध कराती थी। जून 2009 में सबीर भाटिया की कंपनी सबसेबोलो ने जैक्सटर (एक इंटरनेट टेलीफोन सेवा स्टार्टअप) का अधिग्रहण कर लिया। उनके जैक्सटर को भी आशातीत सफलता नहीं मिल पायी और सबसेबोलो भी नहीं चल पाया।
व्यक्तिगत जीवन:-
सन 2008 में, उन्होंने भारत के प्रसिद्द उद्योग घराने बैद्यनाथ ग्रुप की उत्तराधिकारिणी, तान्या शर्मा के साथ विवाह कर लिया। विवाह से पहले वे एक दूसरे को आठ साल से जानते थे। उनका विवाह मलेशिया के लंग्कावी में एक निजी समारोह में संपन्न हुआ।
पुरस्कार:-
उद्यम पूंजी फर्म ड्रेपर फिशर जुरवेत्सन ने उन्हें “वर्ष के उद्यमी” (1998) द्वारा सम्मानित किया।
उप्सिदे पत्रिका के न्यू इकॉनमी के शीर्ष ट्रेंडसेटर की सूची में “एलिट 100,” के लिए नामांकित किया गया।
उनके एमआईटी का TR100 पुरस्कार प्रदान किया गया।
टाइम पत्रिका द्वारा नामांकित “पीपल टू वॉच” में से एक (2002)
टाइम लाइन (जीवन घटनाक्रम):-
1968: 30 दिसम्बर को चंडीगढ़ में जन्म हुआ।
1986: पिलानी के बिड़ला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान (BITS) में दाखिला लिया।
1996: जुलाई माह में हॉट-मेंल की सेवा प्रारंभ हो गई।
1997: माइक्रोसॉफ्ट ने सबीर भाटिया के हॉटमेंल का 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर में अधिग्रहण कर लिया।
1999: इ-कॉमर्स कंपनी आरजू.कॉम प्रारंभ की।
2008: सबीर ने सबसेबोलो.कॉम लांच किया।
2008: तान्या शर्मा के साथ विवाह कर लिया।
2009: जून 2009 में सबीर भाटिया की कंपनी सबसेबोलो ने जैक्सटर (एक इंटरनेट टेलीफोन सेवा स्टार्टअप) का अधिग्रहण कर लिया।
टिम बर्नर्स-ली
टिम बर्नर्स-ली
जीवन परिचय
टिम बर्नर्स-ली एक ब्रिटिश कंप्यूटर वैज्ञानिक हैं जिन्होंने वर्ल्ड वाइड वेब (World Wide Web) का आविष्कार किया था। टिम बर्नर्स-ली की यह जीवनी उनके बचपन, जीवन, उपलब्धियों, कार्यों और समय के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करती है।
सर टिम बर्नर्स-ली एक ब्रिटिश कंप्यूटर वैज्ञानिक हैं जिन्होंने वर्ल्ड वाइड वेब (WWW) आविष्कार किया था । टिम बर्नर्स-ली 20 वीं सदी के सबसे क्रांतिकारी आविष्कारों में से एक है। एक योग्य सॉफ्टवेयर इंजीनियर जो CERN में काम कर रहा था जब वह एक वैश्विक नेटवर्क प्रणाली के विचार के साथ आया था । सर टिम को दुनिया का पहला वेब ब्राउज़र और संपादक बनाने के लिए भी श्रेय दिया जाता है। उन्होंने वर्ल्ड वाइड वेब फाउंडेशन की स्थापना की और वर्ल्ड वाइड वेब कंसोर्टियम (W3C) का निर्देशन किया। उनके माता-पिता दोनों ने पहले व्यावसायिक कंप्यूटर फेरेंटी मार्क I पर काम किया, और इस तरह यह आश्चर्य की बात नहीं है कि उन्होंने भी कंप्यूटर के क्षेत्र को चुना। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि सूचना और प्रौद्योगिकी की दुनिया पर एक वैश्विक नेटवर्क के उनके विचार का अभूतपूर्व प्रभाव पड़ा है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र, उन्होंने CERN में काम करते हुए एक वैश्विक संचार नेटवर्क की आवश्यकता का एहसास किया, क्योंकि दुनिया भर के शोधकर्ताओं को अपने डेटा को एक दूसरे के साथ साझा करने की आवश्यकता थी। 1980 के दशक के अंत तक उन्होंने इंटरनेट का उपयोग करते हुए एक वैश्विक हाइपरटेक्स्ट दस्तावेज़ प्रणाली बनाने का प्रस्ताव तैयार किया था। इस क्षेत्र में अग्रणी काम करने के कुछ और साल वर्ल्ड वाइड वेब के जन्म के कारण बर्नर्स-ली आधुनिक युग के सबसे महत्वपूर्ण आविष्कारकों में से एक बन गए।
बचपन और प्रारंभिक जीवन
उनका जन्म 8 जून, 1955 को टिमोथी बर्नर्स-ली के रूप में मैरी ली वुड्स और कॉनवे बर्नर्स-ली के रूप में हुआ था। उसके तीन भाई-बहन हैं। उनके माता-पिता दोनों ने पहले व्यावसायिक रूप से निर्मित कंप्यूटर, फेरेंटी मार्क पर काम किया और इस प्रकार टिम कम उम्र से कंप्यूटर पर मोहित हो गए।
उन्होंने लंदन के स्वतंत्र एमानुएल स्कूल में जाने से पहले शीन माउंट प्राइमरी स्कूल से अपनी प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की, जहाँ उन्होंने 1969 से 1973 तक पढ़ाई की।
उन्होंने 1973 में द क्वीन्स कॉलेज ऑफ़ ऑक्सफ़ोर्ड में दाखिला लिया और 1976 में भौतिकी में प्रथम श्रेणी में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।
करियर
उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद दूरसंचार कंपनी, प्लेस में प्लेसी के इंजीनियर के रूप में नियुक्त किया गया था। वह दो साल तक वहाँ रहा, वितरित लेनदेन प्रणाली, संदेश रिले और बार कोड तकनीक पर काम करता रहा।
उन्होंने 1978 में प्लेसी छोड़ दी और डी। जी। नैश लिमिटेड में शामिल हो गए। इस नौकरी में उन्होंने बुद्धिमान प्रिंटर और मल्टीटास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए टाइपसेटिंग सॉफ्टवेयर लिखा।
1970 के दशक के उत्तरार्ध में उन्होंने एक स्वतंत्र सलाहकार के रूप में काम करना शुरू किया और सर्न सहित कई कंपनियों के लिए काम किया, जहाँ उन्होंने जून से दिसंबर 1980 तक सलाहकार सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम किया।
सर्न में रहते हुए उन्होंने अपने स्वयं के निजी उपयोग के लिए “पूछताछ” नामक एक कार्यक्रम लिखा। यह एक सरल हाइपरटेक्स्ट कार्यक्रम था जिसने भविष्य में वर्ल्ड वाइड वेब के विकास के लिए वैचारिक नींव रखी।
उन्होंने 1981 में John Poole’s Image Computer Systems, Ltd. में काम करना शुरू किया। अगले तीन वर्षों तक उन्होंने कंपनी के तकनीकी पक्ष पर काम किया, जिससे उन्हें कंप्यूटर नेटवर्किंग में अनुभव हासिल करने में मदद मिली। उनके काम में वास्तविक समय नियंत्रण फर्मवेयर, ग्राफिक्स और संचार सॉफ्टवेयर और एक सामान्य मैक्रो भाषा शामिल थी।
1984 में वह वहां फैलोशिप प्राप्त करने के बाद सर्न लौट आए। 1980 के दशक के दौरान हजारों लोग सर्न में काम कर रहे थे और उन्हें एक दूसरे के साथ जानकारी और डेटा साझा करने की आवश्यकता थी। बहुत से काम ईमेल द्वारा किए गए थे और वैज्ञानिकों को अलग-अलग चीजों का ध्यान रखना था। टिम ने महसूस किया कि डेटा साझा करने का एक सरल और अधिक कुशल तरीका तैयार करना होगा।
1989 में, उन्होंने संगठन के भीतर एक अधिक प्रभावी संचार प्रणाली के लिए एक प्रस्ताव लिखा, जिसके कारण अंततः वर्ल्ड वाइड वेब की अवधारणा-एक सूचना साझाकरण प्रणाली को लागू किया गया जिसे दुनिया भर में लागू किया जा सकता है।
दुनिया की पहली वेबसाइट, Info.cern.ch, CERN में बनाया गया था और 6 अगस्त 1991 को संचार और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत करते हुए ऑनलाइन रखा गया था। साइट ने वर्ल्ड वाइड वेब क्या था और जानकारी साझा करने के लिए इसका उपयोग कैसे किया जा सकता है, इसकी जानकारी प्रदान की।
उन्होंने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की प्रयोगशाला में कंप्यूटर साइंस के लिए 1994 में वर्ल्ड वाइड वेब कंसोर्टियम (W3C) की स्थापना की। W3C ने फैसला किया कि इसकी प्रौद्योगिकियों को रॉयल्टी-मुक्त किया जाना चाहिए ताकि कोई भी उन्हें अपना सके।
वह दिसंबर 2004 में यूके के साउथैम्पटन विश्वविद्यालय में कंप्यूटर विज्ञान विभाग में प्रोफेसर बन गए। वहां उन्होंने सेमेटिक वेब पर काम किया।
2006 में, वह वेब साइंस ट्रस्ट के सह-निदेशक बने, जिसे वर्ल्ड वाइड वेब का विश्लेषण करने और इसके उपयोग और डिजाइन को अनुकूलित करने के लिए समाधान तैयार करने के लिए लॉन्च किया गया था। उन्होंने 2009 में शुरू किए गए वर्ल्ड वाइड वेब फाउंडेशन के निदेशक के रूप में भी काम किया।
प्रोफेसर निगेल श्डबोल्ट के साथ, वह data.gov.uk के पीछे के प्रमुख आंकड़ों में से एक है, जो गैर-व्यक्तिगत यूके सरकार के डेटा को जनता के लिए अधिक सुलभ बनाने के लिए यूके सरकार का प्रोजेक्ट है।
प्रमुख कार्य
उनका आविष्कार, वर्ल्ड वाइड वेब, 20 वीं शताब्दी के सबसे महत्वपूर्ण आविष्कारों में गिना जाता है। वेब ने सूचना और प्रौद्योगिकी की दुनिया में क्रांति ला दी है और कई नए रास्ते खोल दिए हैं।
पुरस्कार और उपलब्धियां
उन्हें 1995 में एसोसिएशन फॉर कम्प्यूटिंग मशीनरी (एसीएम) से सॉफ्टवेयर सिस्टम पुरस्कार के साथ प्रस्तुत किया गया था।
उन्हें 1999 में टाइम पत्रिका द्वारा 20 वीं शताब्दी के 100 सबसे महत्वपूर्ण लोगों में से एक के रूप में नामित किया गया था।
उन्हें 2004 में “इंटरनेट के वैश्विक विकास के लिए सेवाओं” के लिए नए साल के सम्मान में ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर (KBE) का कमांडर बनाया गया था।
2013 में, वह पाँच इंटरनेट और वेब अग्रदूतों में से एक बन गए जिन्होंने इंजीनियरिंग के लिए उद्घाटन क्वीन एलिजाबेथ पुरस्कार से सम्मानित किया।
व्यक्तिगत जीवन और विरासत
उन्होंने ऑक्सफोर्ड में भौतिकी का अध्ययन करते हुए जेन से मुलाकात की और 1976 में स्नातक होने के तुरंत बाद उनसे शादी कर ली। हालांकि, यह विवाह तलाक में समाप्त हो गया।
सर्न के लिए काम करते हुए वे नैन्सी से परिचित हो गए, जो एक अमेरिकी सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे। वे प्यार में पड़ गए और 1990 में शादी के बंधन में बंध गए। यह शादी भी कुछ सालों बाद खत्म हो गई।
वर्तमान में उन्होंने रोसमेरी लेथ से शादी की है जो उन्होंने जून 2014 में शादी की थी।
श्रीनिवास रामानुजन
श्रीनिवास रामानुजन
श्रीनिवास रामानुजन की जीवनी
श्रीनिवास रामानुजन इयंगर एक महान भारतीय गणितज्ञ थे। उन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। उन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी उन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिये। उन्होंने गणित के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण प्रयोग किये थे जो आज भी उपयोग किये जाते है। उनके प्रयोगों को उस समय जल्द ही भारतीय गणितज्ञो ने मान्यता दे दी थी। जब उनका हुनर ज्यादातर गणितज्ञो के समुदाय को दिखाई देने लगा, तब उन्होंने इंग्लिश गणितज्ञ जी.एच्. हार्डी से भागीदारी कर ली। उन्होंने पुराने प्रचलित थ्योरम की पुनः खोज की ताकि उसमें कुछ बदलाव करके नया थ्योरम बना सके। श्रीनिवास रामानुजन ज्यादा उम्र तक तो जी नही पाये लेकिन अपने छोटे जीवन में ही उन्होंने लगभग 3900 के आस-पास प्रमेयों का संकलन किया।
इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके है। और उनके अधिकांश प्रमेय लोग जानते है। उनके बहुत से परीणाम जैसे कि रामानुजन प्राइम और रामानुजन थीटा बहुत प्रसिद्ध है। ये उनके महत्वपूर्ण प्रमेयों में से एक है। उनके काम को उन्होंने उनके अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशन रामानुजन जर्नल में भी प्रकाशित किया है, ताकि उनके गणित प्रयोगों को सारी दुनिया जान सके और पूरी दुनिया में उनका उपयोग हो सके। उनका यह अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशन पुरे विश्व में प्रसिद्ध हो गया था, और काफी लोग गणित के क्षेत्र में उनके अतुल्य योगदान से प्रभावित भी हुए थे।
श्रीनिवास रामानुजन का प्रारंभिक जीवन:-
श्रीनिवास रामानुजन का जन्म 22 दिसम्बर 1887 को भारत के दक्षिणी भू-भाग में स्थित कोयंबटूर के ईरोड, मद्रास (अभी का तमिलनाडु) नाम के गांव में हुआ था। वह पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में जन्में थे। उनके पिता श्रीनिवास अय्यंगर जिले की ही एक साड़ी की दुकान में क्लर्क थे। उनकी माता, कोमल तम्मल एक गृहिणी थी और साथ ही स्थानिक मंदिर की गायिका थी। वे अपने परिवार के साथ कुम्भकोणम गाव में सारंगपाणी स्ट्रीट के पास अपने पुराने घर में रहते थे। उनका पारिवारिक घर आज एक म्यूजियम है। जब रामानुजन 1/5 साल के थे, तभी उनकी माता ने एक और बेटे सदगोपन को जन्म दिया, जिसका बाद में तीन महीनो के भीतर ही देहांत हो गया। दिसंबर 1889 में, रामानुजन को चेचक की बीमारी हो गयी, इस बीमारी से पिछले एक साल में उनके जिले के हजारों लोग मारे गए थे, लेकिन रामानुजन जल्द ही इस बीमारी से ठीक हो गये थे।
इसके बाद वे अपने माता के साथ मद्रास (चेन्नई) के पास के गाव कांचीपुरम में माता-पिता के घर में रहने चले गए। नवंबर 1891 और फिर 1894 में, उनकी माता ने दो और बच्चों को जन्म दिया, लेकिन फिर से उनके दोनों बच्चो की बचपन में ही मृत्यु हो गयी। 1 अक्टूबर 1892 को श्रीनिवास रामानुजन को स्थानिक स्कूल में डाला गया। मार्च 1894 में, उन्हें तामील मीडियम स्कूल में डाला गया। उनके नाना के कांचीपुरम के कोर्ट में कर रहे जॉब को खो देने के बाद, रामानुजन और उनकी माता कुम्भकोणम गाव वापिस आ गयी और उन्होंने रामानुजन को कंगयां प्राइमरी स्कूल में डाला। जब उनके दादा का देहांत हुआ, तो रामानुजन को उनके नाना के पास भेज दिया गया, जो बाद में मद्रास में रहने लगे थे। रामानुजन को मद्रास में स्कूल जाना पसन्द नही था, इसीलिए वे ज्यादातर स्कूल नही जाते थे। उनके परिवार ने रामानुजन के लिये एक चौकीदार भी रखा था ताकि रामानुजन रोज स्कूल जा सके। और इस तरह 6 महीने के भीतर ही रामानुजन कुम्भकोणम वापिस आ गये। जब ज्यादातर समय रामानुजन के पिता काम में व्यस्त रहते थे, तब उनकी माँ उनकी बहुत अच्छे से देखभाल करती थी।
रामानुजन को अपनी माता से काफी लगाव था। अपनी माँ से रामानुजन ने प्राचीन परम्पराओं और पुराणों के बारे में सीखा था। उन्होंने बहुत से धार्मिक भजनों को गाना भी सीख लिया था ताकि वे आसानी से मंदिर में कभी-कभी गा सके। ब्राह्मण होने की वजह से ये सब उनके परिवार का ही एक भाग था। कंगयां प्राइमरी स्कूल में, रामानुजन एक होनहार छात्र थे। बस 10 साल की आयु से पहले, नवंबर 1897 में, उन्होंने इंग्लिश, तमिल, भूगोल और गणित की प्राइमरी परीक्षा उत्तीर्ण की और पुरे जिले में उनका पहला स्थान आया। उसी साल, रामानुजन शहर की उच्च माध्यमिक स्कूल में गये जहां पहली बार उन्होंने गणित का अभ्यास किया।
श्रीनिवास रामानुजन बचपन:-
11 वर्ष की आयु से ही श्रीनिवास रामानुजन अपने ही घर पर किराये से रह रहे दो विद्यार्थियों से गणित का अभ्यास करना शुरू किया था। बाद में उन्होंने एस.एल. लोनी द्वारा लिखित एडवांस ट्रिग्नोमेट्री का अभ्यास किया। 13 साल की अल्पायु में ही वे उस किताब के मास्टर बन चुके थे और उन्होंने खुद कई सारे थ्योरम की खोज की। 14 वर्ष की आयु में उन्हें अपने योगदान के लिये मेरिट सर्टिफिकेट भी दिया गया और साथ ही अपनी स्कूल शिक्षा पूरी करने के लिए कई सारे अकादमिक पुरस्कार भी दिए गए और सांभर तंत्र की स्कूल में उन्हें 1200 विद्यार्थी और 35 शिक्षकों के साथ प्रवेश दिया गया। गणित की परीक्षा उन्होंने दिए गए समय से आधे समय में ही पूरी कर ली थी। और उनके उत्तरों से ऐसा लग रहा था जैसे ज्योमेट्री और अनंत सीरीज से उनका घरेलु सम्बन्ध हो। रामानुजन ने 1902 में घनाकार समीकरणों को आसानी से हल करने के उपाय भी बताये और बाद में क्वार्टीक (Quartic) को हल करने की अपनी विधि बनाने में लग गए।
उसी साल उन्होंने जाना की क्विन्टिक (Quintic) को रेडिकल्स (Radicals) की सहायता से हल नही किया जा सकता। सन् 1905 में श्रीनिवास रामानुजन मद्रास विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में सम्मिलित हुए परंतु गणित को छोड़कर शेष सभी विषयों में वे अनुत्तीर्ण हो गए। कुछ समय बाद 1906 एवं 1907 में रामानुजन ने फिर से बारहवीं कक्षा की प्राइवेट परीक्षा दी और अनुत्तीर्ण हो गए। रामानुजन 12वीं में दो बार फेल हुए थे और इससे पहले उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पहले दरजे से पास की थी।
जिस गवर्नमेंट कॉलेज में पढ़ते हुए वे दो बार फेल हुए, बाद में उस कॉलेज का नाम बदल कर उनके नाम पर ही रखा गया। श्रीनिवास रामानुजन जब मैट्रिक कक्षा में पढ़ रहे थे उसी समय उन्हें स्थानीय कॉलेज की लाइब्रेरी से गणित का एक ग्रन्थ मिला, “ए सिनोप्सिस आफ एलीमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर एंड एप्लाइड मैथमेटिक्स (Synopsis of Elementary Results in Pure and Applied Mathematics)” लेखक थे “जार्ज एस. कार्र (George Shoobridge Carr)” रामानुजन ने जार्ज एस. कार्र की गणित के परिणामों पर लिखी किताब पढ़ी और इस पुस्तक से प्रभावित होकर स्वयं ही गणित पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया। इस पुस्तक में उच्च गणित के कुल 5000 फार्मूले दिये गये थे। जिन्हें रामानुजन ने केवल 16 साल की आयु में पूरी तरह आत्मसात कर लिया था। 1904 में हायर सेकेंडरी स्कूल से जब रामानुजन ग्रेजुएट हुए तो गणित में उनके अतुल्य योगदान के लिये उन्हें स्कूल के हेडमास्टर कृष्णास्वामी अय्यर द्वारा उन्हें के. रंगनाथ राव पुरस्कार दिया गया। जिसमें रामानुजन को एक होनहार और बुद्धिमान विद्यार्थी बताया गया था। उन्होंने उस समय परीक्षा में सर्वाधिक गुण प्राप्त किये थे। इसे देखते हुए गवर्नमेंट आर्ट कॉलेज, कुम्बकोणं में पढ़ने के लिये उन्हें शिष्यवृत्ति दी गयी।
लेकिन गणित में ज्यादा रूचि होने की वजह से रामानुजम दुसरे विषयों पर ध्यान नही दे पाते थे। 1905 में वे घर से भाग गए थे, और विशाखापत्तनम में 1 महीने तक राजमुंदरी के घर रहने लगे। और बाद में मद्रास के महाविद्यालय में पढ़ने लगे। लेकिन बाद में बीच में ही उन्होंने वह कॉलेज छोड़ दिया। विद्यालय छोड़ने के बाद का पांच वर्षों का समय इनके लिए बहुत हताशा भरा था। भारत इस समय परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा था। चारों तरफ भयंकर ग़रीबी थी। ऐसे समय में रामानुजन के पास न कोई नौकरी थी और न ही किसी संस्थान अथवा प्रोफ़ेसर के साथ काम करने का मौका। बस उनका ईश्वर पर अटूट विश्वास और गणित के प्रति अगाध श्रद्धा ने उन्हें कर्तव्य मार्ग पर चलने के लिए सदैव प्रेरित किया।
श्रीनिवास रामानुजन के प्रमुख कार्य:-
रामानुजन और इनके द्वारा किए गए अधिकांश कार्य अभी भी वैज्ञानिकों के लिए अबूझ पहेली बने हुए हैं। एक बहुत ही सामान्य परिवार में जन्म लेकर पूरे विश्व को आश्चर्यचकित करने की अपनी इस यात्रा में इन्होने भारत को अपूर्व गौरव प्रदान किया। श्रीनिवास रामानुजन अधिकतर गणित के महाज्ञानी भी कहलाते है। उस समय के महान व्यक्ति लोन्हार्ड यूलर और कार्ल जैकोबी भी उन्हें खासा पसंद करते थे। जिनमें हार्डी के साथ रामानुजन ने विभाजन फंक्शन P(n) का अभ्यास किया था। इन्होने शून्य और अनन्त को हमेशा ध्यान में रखा और इसके अंतर्सम्बन्धों को समझाने के लिए गणित के सूत्रों का सहारा लिया। वे अपनी विख्यात खोज गोलीय विधि (Circle Method) के लिए भी जाने जाते है।
श्रीनिवास रामानुजन की 7 हकीकत:-
1) श्रीनिवास रामानुजन स्कूल में हमेशा ही अकेले रहते थे, उनके सहयोगी उन्हें कभी समझ नही पाये थे। रामानुजन गरीब परिवार से सम्बन्ध रखते थे और अपने गणितो का परीणाम देखने के लिए वे पेपर की जगह कलमपट्टी का उपयोग करते थे। शुद्ध गणित में उन्हें किसी प्रकार का प्रशिक्षण नही दिया गया था।
2) गवर्नमेंट आर्ट कॉलेज में पढ़ने के लिये उन्हें अपनी शिष्यवृत्ति खोनी पड़ी थी और गणित में अपने लगाव से बाकी दुसरे विषयों में वे फेल हुए थे।
3) रामानुजन ने कभी कोई कॉलेज डिग्री प्राप्त नही की। फिर भी उन्होंने गणित के काफी प्रचलित प्रमेयों को लिखा। लेकिन उनमें से कुछ को वे सिद्ध नही कर पाये।
4) इंग्लैंड में हुए जातिवाद के वे गवाह बने थे।
5) उनकी उपलब्धियों को देखते हुए 1729 नंबर हार्डी-रामानुजन नंबर के नाम से जाना जाता है।
6) 2014 में उनके जीवन पर आधारीत तमिल फ़िल्म “रामानुजन का जीवन” बनाई गयी थी।
7) उनकी 125 वीं एनिवर्सरी पर गूगल ने अपने लोगों को इनके नाम पर करते हुए उन्हें सम्मान अर्जित किया था।
मिल्खा सिंह
मिल्खा सिंह
मिल्खा सिंह की जीवनी
मिल्खा सिंह का जन्म पाकिस्तान के लायलपुर में 8 अक्टूबर, 1935 को हुआ था। उन्होंने अपने माता-पिता को भारत-पाक विभाजन के समय हुए दंगों में खो दिया था। वह भारत उस ट्रेन से आए थे जो पाकिस्तान का बॉर्डर पार करके शरणार्थियों को भारत लाई थी। अत: परिवार के नाम पर उनकी सहायता के लिए उनके बड़े भाई-बहन थे। मिल्खा सिंह का नाम सुर्ख़ियों में तब आया जब उन्होंने कटक में हुए राष्ट्रीय खेलों में 200 तथा 400 मीटर में रिकॉर्ड तोड़ दिए। 1958 में ही उन्होंने टोकियो में हुए एशियाई खेलों में 200 तथा 400 मीटर में एशियाई रिकॉर्ड तोड़ते हुए स्वर्ण पदक जीते। इसी वर्ष अर्थात 1958 में कार्डिफ (ब्रिटेन) में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भी स्वर्ण पदक जीता। उनकी इन्हीं सफलताओं के कारण 1958 में भारत सरकार द्वारा उन्हें “पद्मश्री” से सम्मानित किया गया। मिल्खा सिंह का नाम “फ़्लाइंग सिख” पड़ने का भी एक कारण था। वह तब लाहौर में भारत-पाक प्रतियोगिता में दौड़ रहे थे। वह एशिया के प्रतिष्ठित धावक पाकिस्तान के अब्दुल खालिक को 200 मीटर में पछाड़ते हुए तेज़ी से आगे निकल गए, तब लोगों ने कहा- ”मिल्खा सिंह दौड़ नहीं रहे थे, उड़ रहे थे।” बस उनका नाम “फ़्लाइंग सिख” पड़ गया।
मिल्खा सिंह ने अनेक बार अपनी खेल योग्यता सिद्ध की। उन्होंने 1968 के रोम ओलंपिक में 400 मीटर दौड़ में ओलंपिक रिकॉर्ड तोड़ दिया। उन्होंने ओलंपिक के पिछले 59 सेकंड का रिकॉर्ड तोड़ते हुए दौड़ पूरी की। उनकी इस उपलब्धि को पंजाब में परी-कथा कि भांति याद किया जाता है और यह पंजाब की समृद्ध विरासत का हिस्सा बन चुकी है। इस वक्त अनेक ओलंपिक खिलाड़ियों ने रिकॉर्ड तोड़ा था। उनके साथ विश्व के श्रेष्ठतम एथलीट हिस्सा ले रहे थे। 1960 में रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर दौड़ की प्रथम हीट में द्वितीय स्थान (47.6 सेकंड) पाया था। फिर सेमी फाइनल में 45.90 सेकंड का समय निकालकर अमेरिकी खिलाड़ी को हराकर द्वितीय स्थान पाया था। फाइनल में वह सबसे आगे दौड़ रहे थे। उन्होंने देखा कि सभी खिलाड़ी काफी पीछे हैं अत: उन्होंने अपनी गति थोड़ी धीमी कर दी। परन्तु दूसरे खिलाड़ी गति बढ़ाते हुए उनसे आगे निकल गए। अब उन्होंने पूरा जोर लगाया, परन्तु उन खिलाड़ियों से आगे नहीं निकल सके। अमेरिकी खिलाड़ी ओटिस डेविस और कॉफमैन ने 44.8 सेकंड का समय निकाल कर प्रथम व द्वितीय स्थान प्राप्त किया। दक्षिण अफ्रीका के मैल स्पेन्स ने 45.4 सेकंड में दौड़ पूरी कर तृतीय स्थान प्राप्त किया। मिल्खा सिंह ने 45.6 सेकंड का समय निकाल कर मात्र 0.1 सेकंड से कांस्य पदक पाने का मौका खो दिया।
मिल्खा सिंह को बाद में अहसास हुआ कि गति को शुरू में कम करना घातक सिद्ध हुआ। विश्व के महान एथलीटों के साथ प्रतिस्पर्धा में वह पदक पाने से चूक गए। मिल्खा सिंह ने खेलों में उस समय सफलता प्राप्त की जब खिलाड़ियों के लिए कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं, न ही उनके लिए किसी ट्रेनिंग की व्यवस्था थी। आज इतने वर्षों बाद भी कोई एथलीट ओलंपिक में पदक पाने में कामयाब नहीं हो सका है। रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह इतने लोकप्रिय हो गए थे कि जब वह स्टेडियम में घुसते थे, दर्शक उनका जोशपूर्वक स्वागत करते थे। यद्यपि वहाँ वह टॉप के खिलाड़ी नहीं थे, परन्तु सर्वश्रेष्ठ धावकों में उनका नाम अवश्य था। उनकी लोकप्रियता का दूसरा कारण उनकी बढ़ी हुई दाढ़ी व लंबे बाल थे। लोग उस वक्त सिख धर्म के बारे में अधिक नहीं जानते थे। अत: लोगों को लगता था कि कोई साधु इतनी अच्छी दौड़ लगा रहा है। उस वक्त “पटखा” का चलन भी नहीं था, अत: सिख सिर पर रूमाल बाँध लेते थे। मिल्खा सिंह की लोकप्रियता का एक अन्य कारण यह था कि रोम पहुंचने के पूर्व वह यूरोप के टूर में अनेक बड़े खिलाडियों को हरा चुके थे और उनके रोम पहुँचने के पूर्व उनकी लोकप्रियता की चर्चा वहाँ पहुंच चुकी थी।
मिल्खा सिंह के जीवन में दो घटनाए बहुत महत्व रखती हैं। प्रथम-भारत-पाक विभाजन की घटना जिसमें उनके माता-पिता का कत्ल हो गया तथा अन्य रिश्तेदारों को भी खोना पड़ा। दूसरी-रोम ओलंपिक की घटना, जिसमें वह पदक पाने से चूक गए। इसी प्रथम घटना के कारण जब मिल्खा सिंह को पाकिस्तान में दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेने का आमंत्रण मिल्खा तो वह विशेष उत्साहित नहीं हुए। लेकिन उन्हें एशिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के साथ दौड़ने के लिए मनाया गया। उस वक्त पाकिस्तान का सर्वश्रेष्ठ धावक अब्दुल खादिक था जो अनेक एशियाई प्रतियोगिताओं में 200 मीटर की दौड़ जीत चुका था। ज्यों ही 200 मीटर की दौड़ शुरू हुई यूं लगा कि मानो मिल्खा सिंह दौड़ नहीं, उड़ रहें हों। उन्होंने अब्दुल खादिक को बहुत पीछे छोड़ दिया। लोग उनकी दौड़ को आश्चर्यचकित होकर देख रहे थे। तभी यह घोषणा की गई कि मिल्खा सिंह दौड़ने के स्थान पर उड़ रहे थे और मिल्खा सिंह को “फ़्लाइंग सिख” कहा जाने लगा। उस दौड़ के वक्त पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अय्यूब भी मौजूद थे। इस दौड़ में जीत के पश्चात मिल्खा सिंह को राष्ट्रपति से मिलने के लिए वि.आई.पी. गैलरी में ले जाया गया। मिल्खा सिंह द्वारा जीती गई ट्राफियां, पदक, उनके जूते (जिन्हें पहन कर उन्होंने विश्व रिकार्ड तोड़ा था), ब्लेजर यूनीफार्म उन्होंने जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में बने राष्ट्रीय खेल संग्रहालय को दान में दे दिए थे। 1962 में एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह ने स्वर्ण पदक जीता। खेलों से रिटायरमेंट के पश्चात वह इस समय पंजाब में खेल, युवा तथा शिक्षा विभाग में अतिरिक्त खेल निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।
उनका विवाह पूर्व अन्तरराष्ट्रीय खिलाड़ी निर्मल से हुआ था। मिल्खा सिंह के एक पुत्र तथा तीन पुत्रियां है। उनका पुत्र चिरंजीव मिल्खा सिंह (जीव मिल्खा सिंह भी कहा जाता है) भारत के टॉप गोल्फ खिलाड़ियों में से एक है तथा राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेकों पुरस्कार जीत चुका है। उसने 1990 में बीजिंग के एशियाई खेलों में भी भाग लिया था। मिल्खा सिंह की तीव्र इच्छा है कि कोई भारतीय एथलीट ओलंपिक पदक जीते, जो पदक वह अपनी छोटी-सी गलती के कारण जीतने से चूक गए थे। मिल्खा सिंह चाहते हैं कि वह अपने पद से रिटायर होने के पश्चात एक एथलेटिक अकादमी चंडीगढ़ या आसपास खोलें ताकि वह देश के लिए श्रेष्ठ एथलीट तैयार कर सकें। मिल्खा सिंह अपनी लौह इच्छा शक्ति के दम पर ही उस स्थान पर पहुँच सके, जहाँ आज कोई भी खिलाड़ी बिना औपचारिक ट्रेनिंग के नहीं पहुँच सका।
उपलब्धियां:-
1957 में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर में 47.5 सेकंड का नया रिकॉर्ड बनाया।
टोकियो जापान में हुए तीसरे एशियाड (1958) में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर तथा 200 मीटर में दो नए रिकॉर्ड स्थापित किए।
जकार्ता (इंडोनेशिया) में हुए चौथे एशियाड (1959) में उन्होंने 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीता।
1959 में भारत सरकार ने उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें “पद्मश्री” से सम्मानित किया।
1960 में रोम ओलंपिक में उन्होंने 400 मीटर दौड़ का रिकॉर्ड तोड़ा।
1962 के एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह ने स्वर्ण पदक जीता।
हर्लेन सैंडर्स
हर्लेन सैंडर्स
हर्लेन सैंडर्स की कहानी
ये तो सभी को पता हैं KFC यानि चिकन का सबसे अनूठा स्वाद। सड़क किनारे चिकन बेचने वाले शख्स को अपनी मसालों पर इतना भरोसा रहा कि वह कुकर और मसाले कार में लेकर होटल-होटल चक्कर लगाता रहा 1009 होटलों ने नकार दिया। फिर 1010 वी होटल ने उससे कहा हां और फिर चल पड़ा कारवां। आज 125 देशों में 18000 से ज्यादा kfc रेस्तरां है। आइए जाने इसकी कहानी.. हर्लेन सैंडर्स, यह नाम है उस शख्स का हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि इसने पैदा होते ही मां-बाप नहीं चिकन बोला होगा। 16 साल की उम्र में स्कूल छोड़ा, 17 साल की उम्र में 4 बार नौकरियो से निकाला गया, इसके बाद जीवन में और कई काम करने के बाद सैंडर्स ने एक सर्विस स्टेशन खोला। वहां कोई रेस्टोरेंट नहीं था इसलिए उन्हें वहां आने वाले लोगों को खाना भी खिलाना पड़ता था। कुछ समय में लोग इस सवाद को पसंद करने लगे रेस्तरां चल निकला। अब वह 142 लोगों के बैठने वाला रेस्टोरेंट बन गया। नौ साल तक सैंडर्स चिकन के साथ प्रयोग करते रहें। आखिर उन्हें सफलता हाथ लगी उन्होंने गरम मसालों का एक मिश्रण तैयार किया जो लोगों को दीवाना कर गया। यह मिश्रण आज भी रहस्य है KFC अपना मसाला खुद तैयार करके सभी फ्रेंचाइजी को देता है। वर्षों तक सैंडर्स ने यह फार्मूला किसी को नहीं दिया। कहा जाता है कि जिंदगी का असली स्वाद संघर्ष के मसालों से ही निकलता हैं। सब कुछ ठीक चलते अचानक एक दिन सैंडर्स का रेस्टोरेंट बंद हो गया। 62 साल की उम्र में सैंडर्स बेरोजगार हो गए हाथ खाली धंधा चौपट। 62 साल की उम्र में हाथ पर हाथ धरे बैठने के बजाए सैंडर्स ने अपने चिकन हुनर पर भरोसा जताया। मसालो वाले चिकन रेसिपी इससे बेहतर कुछ नहीं। बस वे निकल पड़े, अपना चिकन रेसिपी बेचने अपनी पुरानी कार में एक कुकर और मसाले लेकर 1009 रेस्टोरेंट के बाद मिली पहली हाँ के बाद उन्होंने मुड़कर नहीं देखा। 12 साल तक घूमते रहें अमेरिका और कनाडा में घूम-घूम कर ही 600 फ्रेंचाइजी बाँट दी। यह भी एक मिसाल है अपना खुद का कोई आउटलेट नहीं वह फ्रेंचाइजी बांट रहा है। 1964 में सैंडर्स ने अपनी कंपनी को एक अमेरिकी कंपनी को 20000 डॉलर में बेच दी। हर दिन लगभग डेढ़ करोड़ लोग सैंडर्स की नायाब रेसिपी का मजा लेते हैं। दुनिया में फ्राइड चिकन का ब्रांड यदि कोई है तो वह है सिर्फ kfc एक सड़क किनारे से शुरु हुआ kfc आज लगभग 18 अरब का ब्रांड बन चुका है। भारत में 100 शहरों में 335 kfc आउटलेट है. फिलहाल केंटकी फ्राइड चिकन यम ब्रांड(pepsico) का हिस्सा है।
KFC नाम कैसे पड़ा:-
1991 में दुनिया में बेहतर स्वास्थ के लिए तली चीजों के खिलाफ चले अभियान के बाद केंटकी फ्राइड चिकन का नाम बदलकर kfc कर दिया गया। यह बेहतर साबित हुए क्योंकि कंपनी अभी इस ब्रांड नेम के साथ दूसरे प्रोडक्ट भी बेच सकती थी। पुराना नाम केवल चिकन तक सीमित है। भारत के लिए खास वेज आइटम्स वह कुछ शेक भी तैयार किए गए। नवंबर 2006 में कंपनी नए लोगो के साथ सामने आई। इस लोगो में कर्नल का सफ़ेद कपड़ों में फोटो लगाया गया। भले ही कर्नल सैंडर्स ने कंपनी बेच दी हो पर उनके नाम और उनके बनाए स्वाद को कभी कोई नहीं भूल सकता इसलिए नए मालिकों ने तस्वीर पुरानी ही रखी।
कैसी मिली हर्लेन सैंडर्स को कर्नल की उपाधि:-
हर्लेन सैंडर्स का बनाया चिकन केंटकी के गवर्नर को इतना पसंद आया कि उन्होंने सैंडर्स को कर्नल की उपाधि से सम्मानित किया।
तिजोरी में बंद है फॉर्मूला:-
सैंडर्स के 11 मसालो का गोपनीय फ़ॉर्मूला आज भी लुइवल की तिजोरी में बंद हैं। बहुत कम लोग ही जानते हैं कि उसमें कौन से मसाले कितने मात्रा में मिलाएं जाते हैं।
राजीव दीक्षित
राजीव दीक्षित
राजीव दीक्षित की जीवनी
राजीव राधेश्याम दीक्षित भारत के महान व्यक्तित्व थे। वह एक भारतीय समाजिक कार्यकर्त्ता थे। वो गरीब और जरूरतमंद भारतीयों के समर्थक थे। बहुत सालों से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खिलाफ़ संघर्ष कर रहे थे। वह भारतीय स्वतंत्रता के समर्थक थे और भारत में स्वाभिमान आन्दोलन, आजादी आन्दोलन और स्वदेशी आन्दोलन के माध्यम से देश में जागरूकता फ़ैलाने के लिए प्रयासरत थे। वह भारतीयता के एक मजबूत आस्तिक और उपदेशक थे।
राजीव दीक्षित का जन्म और जीवन:-
राजीव दीक्षित का जन्म भारत के उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के नाह गाँव में 30 नवम्बर 1967 को हुआ था। वह स्वतंत्रता सेनानीयों के परिवार से थे। वह एक भारतीय वैज्ञानिक थे, उन्होंने एपीजे अब्दुल कलाम के साथ भी काम किया है। साथ ही वे फ्रांस के दूर संचार क्षेत्र में भी वैज्ञानिक के तौर पर काम कर चुके थे। उन्होंने भारतीय इतिहास के बारे में, भारतीय संविधान के मुद्दों और भारतीय आर्थिक नीति के बारे में भी जागरूकता फ़ैलाने के लिए प्रयास किया।
राजीव दीक्षित का पारिवारिक जीवन:-
उनके पिता का नाम राधेश्याम दीक्षित था। वे मानवीय सभ्यता का दुनिया भर में प्रसार करते थे। वे ब्रह्मचारी थे उन्होंने कभी शादी नहीं की। 1997 में जब उनकी पहली मुलाकात प्रोफ़ेसर धर्मपाल से हुई तो वो उनसे काफ़ी प्रभावित हुए। वो 1999 से बाबा रामदेव के साथ सहयोग करते रहे थे। वो चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और उधम सिंह जैसे क्रांतिकारियों से प्रेरित थे। बाद में वो महात्मा गाँधी के शुरुआती कार्यों के सराहना करते हुए और नशा इत्यादि के उत्पादन के विरुद्ध में कार्य करते हुए गौ रक्षा और सामाजिक अन्यायों के विरुद्ध लडाई लड़ते अपने जीवन को समर्पित कर दिए।
राजीव दीक्षित की शिक्षा:-
अपने पिता के देख रेख में उन्होंने फिरोजाबाद जिले के गाँव में स्कूली शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद पी.डी. जैन इंटर कॉलेज से उन्होंने 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई की। उन्होंने अपनी स्नातक की पढ़ाई की शुरुआत 1984 में के. के. एम. कॉलेज, जमुई बिहार से इलेक्ट्रॉनिक और संचार में बी. टेक की डिग्री लेकर पूरी की। उन्होंने एम. टेक की डिग्री भी आई. आई. टी खड़गपुर से प्राप्त की थी, लेकिन मातृभूमि की सेवा का जूनून हमेशा ही उन्हें अपनी ओर खींचता रहा, इसलिए वो सामाजिक सेवा के कार्य में अपने योगदान दिए।
राजीव दीक्षित का करियर:-
भारत में लगभग 8000 बहुराष्ट्रीय कंपनियां है, जो भारत में अपना प्रसार कर रही है। उस कंपनी के उत्पादों के लिए भारतीय कड़ी मेहनत करते है, लेकिन सभी उत्पाद उनके देश में भेज दिए जाते है इसलिए उन्होंने स्वदेशी आन्दोलन शुरू किया और हर भारतीय से आग्रह किये कि वो स्वदेशी उत्पादों को अपनाये। उन्होंने कोका कोला, पेप्सी, यूनिलीवर और कोलगेट जैसी कम्पनी के खिलाफ़ लडाई लड़ी और शीतल पेय पदार्थों में विषैला होने की बात कही। इसके लिए उन्होंने लम्बी लडाई भी लड़ी और ये साबित भी कर दिया कि इन पेय पदार्थों में विषैला पदार्थ है। इन्हें पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। उनका ऐसा मानना था कि इन कंपनियों ने अपने देश में धन को कम कर दिया है, जिससे भारत और गरीब होता जा रहा है। दीक्षित ने सुझाव दिया था कि भारतीय सर्वोच्च न्यायालय को स्विस बैकों में जमा भारतीय काली सम्पति को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर देनी चाहिए। भारत में स्विस बैंक में जमा पूंजी को लाने के लिए अपनी मुहीम में उन्होंने 495 लाख लोगों के हस्ताक्षर को भी इकठ्ठा किया था। 9 जनवरी 2009 को वह भारत के स्वाभिमान ट्रस्ट के सचिव बन गए थे। स्वदेशी में उनका विश्वास था। नई दिल्ली में उन्होंने एक स्वदेशी जागरण मंच का नेतृत्व किया जिसमें 50,000 से भी अधिक लोगों को उन्होंने संबोधित किया। इसके अलावा उन्होंने कलकत्ता में भी विभिन्न संगठनो और प्रमुख व्यक्तियों द्वारा समर्थित आयोजित कार्यक्रम का नेतृत्व किया। उन्होंने जनरल स्टोर की एक ऐसी श्रृंखला को खोलने के लिए आन्दोलन किया जहां सिर्फ़ भारतीयों द्वारा बनाये गए उत्पाद की बिक्री हो। वह आजादी बचाओं आन्दोलन के प्रवक्ता थे। उन्होंने कराधान प्रणाली के विकेंद्रीकरण की मांग करते हुए कहा था कि वर्तमान प्रणाली में जो नौकरशाही है, वह भ्रष्टाचार के मुख्य कारण थे, साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया था कि राजस्व कर का 80% तक राजनेताओं और नौकरशाहों के भुगतान के लिए इस्तेमाल किया गया था। आम जनता के विकास उदेश्यों के लिए सिर्फ़ 20% का ही उपयोग किया जाता है। उन्होंने सरकार के मौजूदा बजट प्रणाली की तुलना भारत के पहले ब्रिटिश बजट प्रणाली से करते हुए यह दर्शाया था कि जो भी आंकड़े बजट में पेश किये जाते है वो उस वक्त की बजट प्रणाली के समान ही थे। उन्होंने अमेरिकी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले को लेकर सवाल भी उठाया था और हमले पर संदेह किया था। उन्होंने दावा किया था कि यह अमेरिका के सरकार द्वारा ही कराया गया था उन्होंने यू. एस. के लोन लालटेन सोसाइटी के दावों का समर्थन किया था। राजीव दीक्षित ने ये कहा था कि वर्तमन में हमारे पास तीन बुराइयां आ रही है। यह उन्होंने वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण को एक राज्य की ओर धकेलने वाली बुराई के रूप में बताया था। 1998 में उपनिवेशवाद के हिंसक इतिहास पर एक प्रदर्शनी पेश करते हुए कहा था यह आधुनिक भारत के लिए भयावह है। इसके साथ ही उन्होंने यह तर्क दिया था और कहा था कि आधुनिक विचारकों ने कृषि क्षेत्र की उपेक्षा की है, जिस वजह से किसान स्वयं मानसिक दबाव में के लिए मजबूर हो रहे है और उन्हें ऐसा करने के लिए छोड़ दिया गया है। उन्होंने भारतीय न्यायपालिका और क़ानूनी व्यवस्था के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा था कि भारत अब भी ब्रिटिश युग के दौरान लागु किये गए कानूनों का पालन कर रहा है और भारतीय आवश्यकताओं के अनुसार उन्हें बदलने की कोशिश भी नहीं कर रहा है। राजीव दीक्षित ने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार पर यू. एस. ए. के एजेंट होने का आरोप लगाया। उन्होंने यह दावा किया कि रेडियो सक्रिय तत्वों का एक बड़ा भंडार भारतीय समुन्द्र के सेतु पुल के नीचे मौजूद है, जिसकी इतनी विशाल मात्रा है कि 150 वर्षों तक इन रेडियो सक्रिय तत्वों का इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए किया जा सकता है। और उन्होंने यह भी कहा की भारत सरकार उस पुल को तोड़ने की कोशिश कर रही है जो 7,00,000 साल पुराना है।
राजीव दीक्षित की उपलब्धियां:-
•सभी समय के नागरिक अधिकार नेता और सबसे लोकप्रिय नेता के रूप 28 वें स्थान तथा सबसे मशहुर व्यक्ति के रूप में 5877 वें स्थान पर उनका नाम आता है।
•राजीव दीक्षित ने कई पुस्तकें लिखी और कई लेक्चर भी दिए जिनका संग्रह सीडी, एसडी कार्ड्स इत्यादि जैसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में संग्रहित है, जिन्हें विभिन्न ट्रस्टों के द्वारा प्रकाशित कराया गया है।
•ऑडियो रूप में उनकी 1999 में भारतीय राष्ट्रवाद और भारतीय अतीत की महानता पर ऑडियो कैसेट बनी थी इसके अलावा ऑडियो में उनकी स्वास्थ्य कथा भी है।
•पुस्तकों में उनके द्वारा रचित है- स्वदेशी चिकित्सा, गौ गौवंश पर आधारित स्वदेशी कृषि, गौ माता, पंचगव्य चिकित्सा। ये सभी उनकी उपलब्धियों में शामिल है।
राजीव दीक्षित की मृत्यु और विवाद:-
राजीव दीक्षित का निधन 30 नवम्बर 2010 को छत्तीसगढ़ के भिलाई में दिल का दौरा पड़ने की वजह से हो गया था। उनकी याद में हरिद्वार में भारत स्वाभिमान बिल्डिंग का निर्माण हुआ है जिसका नाम राजीव भवन रखा गया है। उनकी मृत्यु हुए कई वर्ष बीत चुके है लेकिन अभी भी उनकी मृत्यु के कारणों पर अनिश्चिता बनी हुई है और उनकी मौत का कारण अज्ञात है।
रीतेश अग्रवाल
रीतेश अग्रवाल
रीतेश अग्रवाल की जीवनी
क्या आप यह विश्वास कर सकते हैं कि ऐसी उम्र जब हम और आप खुद को पूरी जिंदगी के लिए तैयार करते है या जब हम सब कड़ाके की ठंड में रजाई में दुबके रहते हैं और जब बरसात के दिनों में नम हवा अलसाकर हमारे दिमाग पर नशे की तरह छा रही होती हैं, जीवन के ऐसे नाजुक पड़ाव पर किसी युवा ने आँखों में स्वयं कुछ बड़ा करने के सपने लिए रोज 16 घंटे काम कर 360 करोड़ से भी ज्यादा की कंपनी की नींव रख दी हो? ऐसा कर दिखाया है उड़ीसा के रीतेश अग्रवाल ने; जिन्होंने 20 वर्ष की कम उम्र में Oyo Rooms नाम की कंपनी की शुरूआत कर बड़े-बड़े अनुभवी उद्यमियों और निवेशकों को भी आश्चर्यचकित कर दिया। ओयो रूम्स का मुख्य उद्देश्य ट्रैवलर्स को सस्ते दामों पर बेहतरीन मूलभूत सुविधाओं के साथ देश के बड़े शहरों के होटलों में कमरा उपलब्ध कराना हैं। व्यक्तिगत तौर पर, रीतेश सामान्य बुद्धि वाले युवा हैं। दिखने में पतले, लंबे और बिखरे बालों वाले बिल्कुल किसी कॉलेज के आम विद्यार्थी की तरह। लेकिन कभी-कभी सामान्य से दिखने वाले लोग भी ऐसे काम कर जाते है जिसकी आपको उम्मीद नहीं होती। रीतेश भी एक ऐसे ही युवा उद्यमी है। जिन्होंने मात्र 21 साल की छोटी सी उम्र में अपने अनुभव, सही अवसर को पहचानने की क्षमता और मेहनत के बल पर अपने विचारों को वास्तविकता का रूप दे दिया।
युवा–उद्यमी की बिज़नेस यात्रा:-
रीतेश अग्रवाल ने बिजनेस के बारे में सोचने और समझने का काम कम उम्र में ही शुरू कर दिया था। इसमें सबसे बड़ी भूमिका उनके पारिवारिक पृष्ठभूमि की थी। उनका जन्म 16 नवम्बर 1993 को उड़ीसा राज्य के जिले कटक बीसाम के एक व्यवसायिक परिवार में हुआ है। बारहवीं तक की पढ़ाई उन्होंने जिले के ही – Scared Heart School में की। इसके बाद उनकी इच्छा IIT में दाखिले की हुई। जिसकी तैयारी के लिए वे राजस्थान के कोटा आ गए। कोटा में उनके बस दो ही काम थे- एक पढ़ना और दूसरा, जब भी अवकाश मिले खूब ट्रैवल करना। यही से उनकी रूची ट्रैवलिंग में बढ़ने लगी। कोटा में ही उन्होंने एक किताब लिखी – Indian Engineering Collages: A complete Encyclopedia of Top 100 Engineering Collages और जैसा कि पुस्तक के नाम से ही लग रहा है, यह पुस्तक देश के 100 सबसे प्रतिष्ठीत इंजनीयरिंग कॉलेजों के बारे में थी। इस किताब को देश की सबसे प्रसिद्ध ई-कमर्स साईट् Flipkart पर बहुत पसंद किया गया। 16 वर्ष की उम्र में उनका चुनाव मुंबई स्थित Tata Institute of Fundamental Research (TIRF) में आयोजित, Asian Science Camp के लिए किया गया। यह कैम्प एक वार्षिक संवाद मंच है जहाँ ऐशियाई मूल के छात्र शामिल किसी क्षेत्र विशेष की समस्याओं पर विचार-विमर्श कर विज्ञान और तकनीक की मदद से उसका हल ढूढ़ा करते हैं। यहाँ भी वे छुट्टी के दिनों में खूब ट्रैवल किया करते और ठहरने के लिए सस्तें दामों पर उपलब्ध होटल्स (Budget Hotels) का प्रयोग करते। पहले से ही रीतेश की रूची बिज़नेस में बहुत थी और इस क्षेत्र में वे कुछ करना चाहते थे। लेकिन बिज़नेस किस चीज का किया जाए, इस बात को लेकर वे स्पष्ट नहीं थे। कई बार वे कोटा से ट्रेन पकड़ दिल्ली आ जाया करते और मुंबई की ही तरह सस्ते होटल्स में रूकते ताकि दिल्ली में होने वाले युवा-उद्यमियों के आयोजनों और सम्मेंलनों में शामिल होकर नए युवा उद्यमियों और स्टार्ट-अप फाउंडर्स से मिल सके। कई बार इन इवेन्टस में शामिल होने का रजिस्ट्रेशन शुल्क इतना ज्यादा होता कि उनके लिए उसे दे पाना मुश्किल हो जाता। इसलिए कभी-कभी वो इन आयोजनों में चोरी-चुपके जा बैठते! यही वो वक्त था, जब उन्होंने ट्रैवलिंग के दौरान ठहरने के लिए प्रयोग किए गए सस्तें होटल्स के बुरे अनुभवों को अपने बिज़नेस का रूप देने की सोची।
ORAVEL STAYS से की शुरूआत:-
वर्ष 2012 में उन्होंने अपने पहले स्टार्ट-अप – Oravel Stays की शुरूआत की। इस कंपनी का उद्देश्य ट्रैवलर्स को छोटी या मध्य अवधि के लिए कम दामों पर कमरों को उपलब्ध करवाना था। जिसे कोई भी आसानी से ऑनलाइन आरक्षित कर सकता था। कंपनी के शुरू होने के कुछ ही महीनों के अंदर उन्हें नए स्टार्टपस में निवेश करने वाली कंपनी VentureNursery से 30 लाख का फंड भी प्राप्त हो गया। अब रितेश के पास अपनी कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए प्रर्याप्त पैसे थे। उसी समय-अंतराल में उन्होंने अपने इस बिजनेस आईडिया को Theil Fellowship, जो कि पेपल कंपनी के सह-संस्थापक – पीटर थेल के “थेल फाउनडेशन” द्वारा आयोजित एक वैश्विक प्रतियोगिता है के समक्ष रखा। सौभाग्यवश वे इस प्रतियोगिता में दसवां स्थान प्राप्त करने में सफल रहे और उन्हें फेलोशिप के रूप में लगभग 66 लाख की धनराशि प्राप्त हुई। बहुत ही कम समय में उनके नये स्टार्टप को मिली इन सफलताओं से वे काफी उत्साहित हुए और वे अपने स्टार्ट-अप पर और बारीकी व सावधानी से काम करने लगे। लेकिन पता नहीं क्यों उनका ये बिजनेस मॉडल आपेक्षित लाभ देने में असफल रहा और “ओरावेल स्टे” धीरे-धीरे घाटे में चला गया। वे परिस्थिति को जितना सुधारने का प्रयास करते, स्थिती और खराब होती जाती और अंत में उन्हें इस कंपनी को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा।
जब ORAVEL STAYS बन गया OYO ROOMS:-
रीतेश अपने स्टार्ट-अप के असफल होने से निराश नहीं हुए और उन्होंने दुबारा स्वयं द्वारा अपनाई गई योजना पर विचार करने कि सोची ताकि इसकी कमियों को दूर किया जा सके। इससे उन्हें यह अनुभव हुआ कि भारत में सस्ते होटल्स में कमरे मिलना या न मिलना कोई समस्या नहीं हैं, दरअसल कमी है होटल्स का कम पैसे में बेहतरीन मूलभूल सुविधाओं को प्रदान न कर पाना। विचार करते हुए उन्हें अपनी यात्राओं के दौरान बज़ट होटल्स में ठहरने के उन अनुभवों को भी याद किया जब उन्हें कभी-कभी बहुत ज्यादा पैसे देने के बाद भी गंदे और बदबूदार कमरें मिलते और कभी-कभी कम पैसों में ही आरामदायक और सुविधापूर्ण कमरे मिल जाते। इन्हीं बातों ने उन्हें फिर प्रेरित किया कि वे पुनः Oravel Stays में नये बदलाव करे एवं ट्रैवलर्स की सुविधाओं को ध्यान में रख उसे नये रूप में प्रस्तुत करें और फिर क्या था वर्ष 2013 में फिर ओरावेल लॉन्च हुआ लेकिन इस बार बिल्कुल नये नाम और मकसद के साथ। अब ओरावेल का नया नाम Oyo Rooms (ओयो रूम्स) था। जिसका मतलब होता है “आपके अपने कमरे”। ओयो रूम्स का उद्देश्य अब सिर्फ ट्रैवलर्स को किसी होटल में कमरा मुहैया कराना भर नहीं रह गया। अब वह होटल के कमरों की और वहां मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं की गुणवता का भी ख्याल रखने लगे और इसके लिए कंपनी ने कुछ मानकों को भी निर्धारित किया। अब जो भी होटल ओयो रूम्स के साथ जुड़ अपनी सेवाएं देना चाहता है। उसे सबसे पहले कंपनी से संपर्क करना होता है। इसके पश्चात कंपनी के कर्मचारी उस होटल में जा वहां के कमरों और अन्य सुविधाओं का निरीक्षण करते है। अगर वह होटल ओयो के सभी मानकों पर खरा उतरता है तभी वह ओयो के साथ जुड़ सकता है, अन्यथा नहीं।
रजनीकांत
रजनीकांत
रजनीकांत की जीवनी
रजनीकांत आम लोगों के लिए उम्मीद का प्रतीक। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि रजनीकांत ऐसे इंसान हैं जिन्होंने फर्श से अर्श तक आने की कहावत को सत्य साबित करके बताया हो। दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने बड़ी-बड़ी सफलताएं अर्जित की पर जिस तरह रजनीकांत ने अभावों और संघर्षों में इतिहास रचा है वैसा पूरी दुनिया में कम ही लोग कर पाएं होंगे। एक कारपेंटर से कुली बनने, कुली से बी.टी.एस. कंडक्टर और फिर एक कंडक्टर से विश्व के सबसे ज्यादा प्रसिद्ध सुपरस्टार बनने तक का सफ़र कितना परिश्रम भरा होगा ये हम सोच सकते हैं। रजनीकांत का जीवन ही नहीं बल्कि फिल्मी सफ़र भी कई उतार चढ़ावों से भरा रहा है। जिस मुकाम पर आज रजनीकांत काबिज हैं उसके लिए जितना परिश्रम और त्याग चाहिए होता है शायद रजनीकांत ने उससे ज्यादा ही किया है।
संघर्षपूर्ण बचपन:-
रजनीकांत का जन्म 12 दिसम्बर 1950 को कर्नाटक के बैंगलोर में एक बेहद मध्यमवर्गीय मराठी परिवार में हुआ था। वे अपने चार भाई बहनों में सबसे छोटे थे। उनका जीवन शुरुआत से ही मुश्किलों भरा रहा, मात्र पांच वर्ष की उम्र में ही उन्होंने अपनी माँ को खो दिया था। पिता पुलिस में एक हवलदार थे और घर की माली स्थिति ठीक नहीं थी। रजनीकांत ने युवावस्था में कुली के तौर पर अपने काम की शुरुआत की फिर वे बी.टी.एस में बस कंडक्टर (bus conductor) की नौकरी करने लगे।
रजनीकांत का अंदाज़:-
एक कंडक्टर के तौर पर भी उनका अंदाज़ किसी स्टार से कम नहीं था। वो अपनी अलग तरह से टिकट काटने और सीटी मारने की शैली को लेकर यात्रियों और दुसरे बस कंडक्टरों के बीच विख्यात थे। कई मंचों पर नाटक करने के कारण फिल्मों और एक्टिंग के लिए शौक तो हमेशा से ही था और वही शौक धीरे धीरे जुनून में तब्दील हो गया। लिहाज़ा उन्होंने अपना काम छोड़ कर चेन्नई के अद्यार फिल्म इंस्टिट्यूट में दाखिला ले लिया। वहां इंस्टिट्यूट में एक नाटक के दौरान उस समय के मशहूर फिल्म निर्देशक के. बालचंद्र की नज़र रजनीकांत पर पड़ी और वो रजनीकांत से इतना प्रभावित हुए कि वहीँ उन्हें अपनी फिल्म में एक चरित्र निभाने का प्रस्ताव दे डाला। फिल्म का नाम था अपूर्व रागांगल। रजनीकांत की ये पहली फिल्म थी पर किरदार बेहद छोटा होने के कारण उन्हें वो पहचान नहीं मिल पाई, जिसके वे योग्य थे। लेकिन उनकी एक्टिंग की तारीफ़ हर उस इंसान ने की जिसकी नज़र उन पर पड़ी।
विलेन से हीरो बने:-
रजनीकांत का फिल्मी सफ़र भी किसी फिल्म से कम नहीं। उन्होंने परदे पर पहले नकारात्मक चरित्र और विलेन के किरदार से शुरुआत की, फिर साइड रोल किये और आखिरकार एक हीरो के तौर पर अपनी पहचान बनाई। हालांकि रजनीकान्त, निर्देशक के. बालचंद्र को अपना गुरु मानते हैं पर उन्हें पहचान मिली निर्देशक एस.पी मुथुरामन की फिल्म चिलकम्मा चेप्पिंडी से। इसके बाद एस.पी. की ही अगली फिल्म ओरु केल्विकुर्री में वे पहली बार हीरो के तौर पर अवतरित हुए। इसके बाद रजनीकांत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और दर्जनों हिट फिल्मों की लाइन लगा दी। बाशा, मुथू, अन्नामलाई, अरुणाचलम, थालाप्ति उनकी कुछ बेहतरीन फिल्मों में से एक हैं।
उम्र कोई मायने नहीं रखती:-
रजनीकांत ने यह साबित कर दिया की उम्र केवल एक संख्या है और अगर व्यक्ति में कुछ करने की ठान ले तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। 65 वर्ष के उम्र के पड़ाव पर वे आज भी वे शिवाजी- द बॉस, रोबोट, कबाली जैसी हिट फिल्में देने का माद्दा रखते हैं। 65 वर्षीय रजनीकांत के लोग इतने दीवाने है कि कबाली फिल्म ने रिलीज़ होने से पहले ही 200 करोड़ रूपये कमा लिए। एक समय ऐसा भी था जब एक बेहतरीन अभिनेता होने के बावजूद उन्हें कई वर्षों तक नज़रंदाज़ किया जाता रहा पर उन्होंने अपनी हिम्मत नहीं हारी। ये बात रजनीकांत के आत्मविश्वास को और विपरीत परिस्तिथियों में भी हार न मानने वाले जज्बे का परिचय देती है।
जमीन से जुड़े हुए:-
रजनीकांत आज इतने बड़े सुपर सितारे होने के बावजूद ज़मीन से जुड़े हुए हैं। वे फिल्मों के बाहर असल जिंदगी में एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही दिखते है। वे दूसरे सफल लोगों से विपरीत असल जिंदगी में धोती-कुर्ता पहनते है। शायद इसीलिए उनके प्रशंसक उन्हें प्यार ही नहीं करते बल्कि उनको पूजते हैं। रजनीकांत के बारे में ये बात जगजाहिर है कि उनके पास कोई भी व्यक्ति मदद मांगने आता है वे उसे खाली हाथ नहीं भेजते। रजनीकांत कितने प्रिय सितारे हैं, इस बात का पता इसी से लगाया जा सकता है कि दक्षिण में उनके नाम से उनके प्रशंसकों ने एक मंदिर बनाया है। इस तरह का प्यार और सत्कार शायद ही दुनिया के किसी सितारे को मिला हो। चुटुकलों की दुनिया में रजनीकांत को ऐसे व्यक्ति के रूप में जाना जाता है जिसके लिए नामुनकिन कुछ भी नहीं और रजनीकांत लगातार इस बात को सच साबित करते रहते है। आज वे 65 वर्ष की उम्र में रोबोट-2 फिल्म पर काम कर रहे है, उनका यही अंदाज लोगों के दिलों पर राज करता है।
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