Monday, January 19, 2026

अमिताभ बच्चन

 

अमिताभ बच्चन की जीवनी

अमिताभ बच्चन


अमिताभ बच्चन का जन्म अक्टूबर 11, 1942 को उतरप्रदेश के जिले इलाहबाद में हिन्दू परिवार में हुआ और इनके बचपन का नाम “इन्कलाब” था जो बाद में बदल कर अमिताभ रख दिया गया। “इन्कलाब” नाम जो है वो आजादी की लड़ाई में इस्तेमाल होने वाले नारे “इन्कलाब जिंदाबाद“ से प्रेरित था। अमिताभ नाम का मतलब होता है “ऐसा दीपक जो कभी नहीं बुझे“। अमिताभ के पिता हरिवंश राय बच्चन जो खुद एक महशूर हिन्दी के कवि थे और उनकी माता तेजी बच्चन जो कराची से वास्ता रखती है ने ही उन्हें स्टेज की दुनिया में आने के प्रेरित किया। वैसे आपके जानने लायक एक दिलचस्प बात और भी है कि अमिताभ का उपनाम श्रीवास्तव है लेकिन इनके पिता ने अपनी रचनाओं को बच्चन नाम से प्रकाशित करवाया जिसके कारण उसके बाद पूरे परिवार के साथ यह नाम जुड़ गया।


करियर और फिल्म इंडस्ट्री:-

शुरू में अमिताभ के लिए चीजे आसान थी क्योंकि इन्हें फिल्मों की दुनिया में आने के लिए किसी भी तरह की दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा और इसकी वजह है अमिताभ बच्चन की राजीव गाँधी से मित्रता होना क्योंकि इसी वजह से इंदिरा गाँधी के हाथ का लिखा सिफारिशी ख़त की वजह से उन्हें के ए अब्बास की फिल्म “सात हिन्दुस्तानी“ में आराम से काम करने का मौका मिल गया। वैसे हम यह कह सकते है कि ऐसा तो है कि अमिताभ ने अपने टैलेंट और अभिनय के दम पर इंडस्ट्री में बादशाह का मुकाम हासिल किया हो या किसी और भी पैमाने पर अमिताभ बच्चन को हम महान कह सकते है लेकिन एक बात तो है जितनी आसानी से अमिताभ को बॉलीवुड में काम मिला वो भी इंदिरा गाँधी के सिफारिशी ख़त की वजह से तो मेरे गले से अमिताभ को महान कहने की बात गले नहीं उतरती है क्योंकि अगर हम रणवीर सिंह (Ranveer singh) जैसे सितारों की बात करें तो मुझे तो उनके सरीखें सितारे ही महान लगते है आज के समय में जिन्होंने एक संघर्ष के बाद सितारा बनने का मुकाम हासिल किया है। हालाँकि अमिताभ ने फिल्मों में दुनिया में अपना हाथ अजमाने से पहले एक शिपिंग कम्पनी में नौकरी की थी और बाद में इनके माँ के द्वारा उत्साहित करने के बाद ये नौकरी छोड के मुंबई आ गये थे। वंहा इन्हें काम करने के लिए 800/- रूपये महीना वेतन मिलता था।

शिक्षा:-

अमिताभ बॉलीवुड के उन अभिनेताओं में भी है जिन्होंने अच्छी खासी पढ़ाई करी है क्योंकि बॉयज हाई स्कूल में पढ़ाई के बाद इन्होने शेरवूड कॉलेज जो नैनीताल में है से आर्ट में अपनी ग्रेजुएशन की हुई है साथ ही इसके बाद विज्ञानं में स्नातक स्तर की पढ़ाई के लिए दिल्ली के प्रसिद्द KMC कॉलेज से पढ़ाई की और इसके बाद MA के लिए ज्ञान प्रबोधिनी कॉलेज जो इलाहाबाद में है से की।

सफलता के लिए संघर्ष:-

वैसे अमिताभ को भले ही फिल्मों में आने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ा लेकिन बाद के दिनों में चीजे इनके लिए मुश्किल थी और यही वजह है कि न केवल अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म ने कोई अच्छा प्रदर्शन कमाई के हिसाब से नहीं किया लेकिन इस फिल्म में इनकी भूमिका के लिए इन्हें “सर्वश्रेष्ठ नवागन्तुक अभिनेता“ के लिए पुरस्कार मिला और इसके बाद करीब सात साल तक के अपने संघर्ष में इन्हें कोई विशेष सफलता नहीं मिली और तब तक ऐसा कहा जाता है कि वो निर्माता और निर्देशक महमूद साहब के घर में रुके।

स्टार बनने:-

स्टार बनने:-अमिताभ बच्चन की जिन्दगी में स्टार बनने के लिए महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब 1973 में आई प्रकाश मेहरा की एक फिल्म में इन्हें एक इंस्पेक्टर का रोल मिला जिसमें इनके किरदार का नाम “इंस्पेक्टर खन्ना“ था और उस किरदार में अमिताभ बच्चन एकदम अलग तरह के रोल में थे और साथ ही इनकी भारी आवाज जिसके लिए इन्हें आल इंडिया रेडियो में बोलने वाले के पद के लिए निकाल दिया गया था वही इनकी खासियत भी बनी ऐसे में जनता के लिए अमिताभ का यह रूप बहुत पसंद आने वाला था और इसके बाद बॉलीवुड के एक्शन हीरो और “अंगरी यंगमैन“ की रूप में एक नई छवि अमिताभ की जनता के बीच में बनी जिसने इन्हें बेहद लोकप्रिय बना दिया। यह वही साल था जिसमें अमिताभ ने जय भादुड़ी से शादी करी और कह सकते है कि अमिताभ के साथ अब उनका “लेडी लक” भी था क्योंकि इसी साल अमिताभ बच्चन ने जया के साथ 3 जून को बंगाली संस्कार से विवाह भी किया था।



लाइफ चेंजिंग इवेंट्स:-

लाइफ चेंजिंग इवेंट्स:-1976 से लेकर 1984 तक अमिताभ को अपनी कई सारी कामयाब फिल्मों की वजह से बहुत सारे पुरस्कार भी मिले जिसमें उनकी बेहद कामयाब दीवार और शोले जैसी फिल्म भी है शोले तो बॉलीवुड के इतिहास में सबसे कामयाब फिल्मों में से एक है। यही एक वजह है कि अमिताभ फिल्म इंडस्ट्री के सबसे कामयाब और पहचान वाले अभिनेता और सबसे अधिक फिल्मफेयर अवार्ड्स पाने वाले अभिनेताओं में से एक है और साथ ही आपको बता दें कि अमिताभ ने अब तक तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और बारह सर्वश्रेष्ठ फिल्म अभिनेता के फिल्मफेयर पुरस्कार शामिल है और एक तरह से यह रिकॉर्ड है। 1984-1987 तक संसद के निर्वाचित सदस्य के रूप में भी इन्होने अपनी भूमिका दी है असल में 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद अपने दोस्त राजीव गाँधी की सलाह पर वो राजनीती में उतरे और इलाहाबाद की लोकसभा सीट से चुनाव लड़े और राजनीती के चाणक्य कहे जाने वाले हेमवती नंदन बहुगुणा को हरा दिया लेकिन कुछ समय बाद ही यानि राजनीति में आने के तीन साल बाद ही अमिताभ बच्चन ने राजनीती को अलविदा कह दिया। अमिताभ बच्चन ने एक्टिंग के अलावा भी पार्श्वगायक के रूप में भी अपना योगदान दिया है साथ ही एक अच्छे विज्ञापन करता के रूप में भी अमिताभ की पहचान बनी हुई है और उम्र के इस दौर में भी जब वो 73 साल के हो चुके है अभी भी सक्रिय है। “कौन बनेगा करोडपति“ शो में भी इन्होने होस्ट के तौर पर काम किया है और अमिताभ बच्चन को पसंद करने वाले करोडो में है। अमिताभ ने 12 से अधिक फिल्मों में डबल रोल किया है और एक फिल्म “महान“ के लिए तो उन्होंने triple role भी किया है। आज के दिन में अमिताभ के पास एक खास मुकाम है और इसी वजह से इन्हें फ़्रांस के एक शहर द्युविले की मानद नागरिकता भी इनके योगदान को देखकर मिली है जो किसी भी विदेशी नागरिक के लिए न केवल सम्मान की बात है बल्कि बहुत ही दुर्लभ लोगों के पास ये है क्योंकि यह केवल ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय के पास और पहली बार अंतरिक्ष में प्रवेश करने वाले रूसी अंतरिक्ष यात्री यूरी गागारिन तथा पोप जॉन पॉल द्वितीय को ही दिया गया है।


बच्चों और परिवार:-

बच्चों और परिवार:-अमिताभ बच्चन की दो संताने है अभिषेक बच्चन और श्वेता नंदा बच्चन जिसमें से अभिषेक बच्चन भी खुद अभिनेता है और अभिषेक का विवाह ऐश्वर्या राय के साथ हुआ है जो बेहद खूबसूरत अभिनेत्री रह चुकी है और सलमान खान की एक्स – गर्लफ्रेंड भी रह चुकी है। हालाँकि एक्टिंग की दुनिया में अभिषेक का सिक्का जरुर नहीं चला लेकिन अगर लड़की के मामले में बात करें तो करोड़ो दिलो को धड़कन रह चुकी ऐश्वर्या को अपने हमसफ़र के रूप में पाने वाले अभिषेक बच्चन बेइंतिहा लकी है।


लव लाइफ और अफेयर्स:-

अमिताभ के अफेयर्स की बात करें तो सन 1978 में अमिताभ और रेखा की बीच बढती नजदीकियों को लेकर न केवल अमिताभ के घर में बहुत हंगामा हुआ बल्कि देशभर के अख़बारों में भी यह सुर्खियाँ बनती जा रही थी इस बारे में सुना गया है कि रेखा दिल ही दिल में अमिताभ बच्चन को बहुत पसंद करती थी लेकिन उन्होंने सही तरीके से कभी इसे जाहिर नहीं किया और न ही अमिताभ ने इस रिश्ते के बारे में कभी कुछ कहा जिसकी वजह से मामला रहस्मयी होता गया और शायद इसी वजह से जय ने रेखा को इस बारे में बात करने के लिए डिनर पर बुलाया था।


सामाजिक रूप से सक्रिय:-

अमिताभ बच्चन सोशल साइट्स पर भी काफी एक्टिव रहते है और अपने फेंस के साथ जुड़े रहने के लिए ब्लॉग और फेसबुक और ट्विटर पर भी काफी सक्रिय रहते है। अमिताभ बच्चन के बारे में शिवसेना प्रमुख रह चुके स्वर्गीय बाल ठाकरे यहाँ तक कह चुके है कि अमिताभ के योगदान को देखते हुए उन्हें भारत रत्न देना तो बनता है क्योंकि ऐसे भी देश है जहाँ लोग भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बारे में नहीं जानते लेकिन वो अमिताभ बच्चन को जानते है ऐसे में उन्हें भारत रत्न दिया जाना सही है साथ ही यह बात भी गौर करने लायक है कि उन्होंने यह बात ऐसे समय में कही थी जब महाराष्ट्र में मराठी बनाम उतर भारतीय विवाद चल रहा था।

Lessons to take:-

अगर किसी चीज़ को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने में लग जाती है|



धीरूभाई अंबानी

 

धीरूभाई अंबानी की जीवनी

धीरूभाई अंबानी


एक आदमी जो हाईस्कूल की शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाया। वह इतने गरीब परिवार से था कि खर्चा चलाने के लिए उसे अपनी किशोरावस्था से ही नाश्ते की रेहड़ी लगाने से लेकर पेट्रोल पंप पर तेल भरने तक का काम करना पड़ा। ऐसे लड़के ने जब एक वृद्ध के तौर पर दुनिया को अलविदा कहा तो उसकी सम्पति का मूल्य 62 हजार करोड़ रूपये से भी ज्यादा था। अगर आप अब भी इस शख्सशियत को नहीं पहचान पाएं तो हम बात कर रहे हैं, धीरूभाई अंबानी की। एक ऐसा सफल चेहरा जिसने हरेक गरीब को उम्मीद दी कि सफल होने के लिए पैसा नहीं नियत चाहिए। सफलता उन्हीं को मिलती है जो उसके लिए जोखिम उठाते हैं। धीरूभाई ने बार — बार साबित किया कि जोखिम लेना व्यवसाय का नहीं आगे बढ़ने का मंत्र है।


शुरूआती जीवन:-

28 दिसम्बर, 1932 को गुजरात के जूनागढ़ के छोटे से गांव चोरवाड़ में धीरजलाल हीरालाल अंबानी का जन्म हुआ। पिता गोर्धनभाई अंबानी एक शिक्षक थे। माता जमनाबेन एक सामान्य गृहिणी थी। धीरूभाई के चार भाई—बहन और थे। इतने बड़े परिवार का लालन—पालन करना अध्यापक गोर्धनभाई के लिए सरल काम न था। एक समय ऐसा आया कि आर्थिक परेशानियों की वजह से धीरू भाई को पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और उनकी स्कूली शिक्षा भी अधूरी रह गई। पिता की मदद करने के लिए धीरूभाई ने छोटे—मोटे काम करने शुरू कर दिए।

व्यवसायिक सफर की शुरूआत:-

यह उदाहरण कि हरेक सफलता के पीछे ढेरों असफलताएं छुपी हुई होती है, धीरूभाई अंबानी पर एकदम सटीक खरी उतरती हैं। पढ़ाई छोड़ने के बाद पहले पहल धीरूभाई ने फल और नाश्ता बेचने का काम शुरू किया, लेकिन कुछ खास फायदा नहीं हुआ। उन्होंने दिमाग लगाया और गांव के नजदीक स्थित धार्मिक पर्यटन स्थल गिरनार में पकोड़े बेचने का काम शुरू कर दिया। यह काम पूरी तरह आने वाले पर्यटकों पर निर्भर था, जो साल के कुछ समय तो अच्छा चलता था बाकि समय इसमें कोई खास लाभ नहीं था। धीरूभाई ने इस काम को भी कुछ समय बाद बंद कर दिया। बिजनेस में मिली पहली दो असफलताओं के बाद उनके पिता ने उन्हें नौकरी करने की सलाह दी।

नौकरी के दौरान भी बिजनेस:-

धीरूभाई के बड़े भाई रमणीक भाई उन दिनों यमन में नौकरी किया करते थे। उनकी मदद से धीरूभाई को भी यमन जाने का मौका मिला। वहां उन्होंने शेल कंपनी के पेट्रोल पंप पर नौकरी की शुरूआत की और महज दो साल में ही अपनी योग्यता की वजह से प्रबंधक के पद तक पहुंच गए। इस नौकरी के दौरान भी उनका मन इसमें कम और व्यवसाय करने के मौकों की तरफ ज्यादा रहा। उन्होंने उस हरेक संभावना पर इस समय में विचार किया कि किस तरह वे सफल बिजनेस मैन बन सकते हैं। दो छोटी घटनाएं बिजनेस के प्रति उनके जूनून को बयां करती हैं। यह दोनों घटनाएं उस समय की है जब वे शेल कंपनी में अपनी सेवाएं दे रहे थे। जहाँ वे काम करते थे, वहां काम करने वाला कर्मियों को चाय महज 25 पैसे में मिलती थी, लेकिन धीरूभाई पास ही एक बड़े होटल में चाय पीने जाते थे, जहाँ चाय के लिए 1 रूपया चुकाना पड़ता था। उनसे जब इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उसे बड़े होटल में बड़े—बड़े व्यापारी आते हैं और बिजनेस के बारे में बाते करते हैं। उन्हें ही सुनने जाता हूं ताकि व्यापार की बारीकियों को समझ सकूं। धीरूभाई ने अपने ही तरीके से बिजनेस मैनेजमेंट की शिक्षा ली। जिन्होंने आगे चलकर व्हाटर्न और हावर्ड से पारम्परिक तरीके से डिग्री लेने वाले को नौकरी पर रखा। इसी तरह दूसरी घटना उनकी पारखी नजर और अवसर भुनाने की क्षमता की ओर इशारा करती है। हुआ यूं कि उन दिनों में यमन में चांदी के सिक्कों का प्रचलन था। धीरूभाई को एहसास हुआ कि इन सिक्कों की चांदी का मूल्य सिक्कों के मूल्य से ज्यादा है और उन्होंने लंदन की एक कंपनी को इन सिक्कों को गलाकर आपूर्ति करनी शुरू कर दी। यमन की सरकार को जब तक इस बात का पता चलता वे मोटा मुनाफा कमा चुके थे। ये दोनों घटनाएं इशारा कर रही थी कि धीरूभाई अंबानी के पास एक सफल बिजनेसमैन बनने के सारे गुण हैं।

चुनौतियां और सफलता:-

यमन में धीरूभाई का समय बीत रहा था कि वहां आजादी के लिए लड़ाई शुरू हो गई और ढेरों भारतीयों को यमन छोड़ना पड़ा। इस परेशानी के आलम में धीरूभाई को भी यमन छोड़ना पड़ा। ईश्वर ने एक सफल बिजनेसमैन बनाने के लिए परिस्थितियां गढ़नी शुरू कर दी। इस नौकरी के चले जाने के बाद उन्होंने नौकरी की जगह बिजनेस करने का निर्णय लिया, लेकिन व्यवसाय शुरू करने के लिए पैसों की जरूरत थी। धीरूभाई के पास निवेश के लिए बड़ी रकम नहीं थी इसलिए उन्होंने अपने मामा त्रयम्बकलाल दामाणी के साथ मसालों और शक्कर के व्यापार की शुरूआत की। यहीं पर रिलायंस कमर्शियल कॉरर्पोरेशन की नींव पड़ी। इसके बाद रिलायंस ने सूत के कारोबार में प्रवेश किया। यहाँ भी सफलता ने धीरूभाई के कदम चूमें और जल्दी ही वे बॉम्बे सूत व्यपारी संघ के कर्ता—धर्ता बन गए। यह बिजनेस जोखिमों से भरा हुआ था और उनके मामा को जोखिम पसंद नहीं था इसलिए जल्दी ही दोनों के रास्ते अलग हो गए। इससे रिलायंस पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा और 1966 में रिलायंस टैक्सटाइल्स अस्तित्व में आया। इसी साल रिलायंस ने अहमदाबाद के नरोदा में टेक्सटाइल मिल की स्थापना की। विमल की ब्रांडिंग इस तरह की गई कि जल्दी ही यह घर—घर में पहचाना जाने लगा और विमल का कपड़ा बड़ा भारतीय नाम बन गया। विमल दरअसल उनके बड़े भाई रमणीक लाल के बेटे का नाम था। इन्हीं सब संघर्षों के बीच उनका विवाह कोकिलाबेन से हुआ जिनसे उन्हें दो बेटे मुकेश और अनिल तथा दो बेटियां दीप्ती और नीना हुईं। उन्होंने इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और रिलायंस कपड़े के साथ ही पेट्रोलियम और दूरसंचार जैसी कंपनियों के साथ भारत की सबसे बड़ी कंपनी बन गई। इन सबके बीच धीरूभाई अंबानी पर सरकार की नीतियों को प्रभावित करने और नीतियों की कमियों से लाभ कमाने के आरोप भी लगते रहे। उनके और नुस्ली वाडिया के बीच होने वाले बिजनेस घमासान पर भी बहुत कुछ लिखा गया। उनके जीवन से प्रेरित एक फिल्म गुरू बनाई गई जिसमें अभिषेक बच्चन ने उनकी भूमिका का निर्वाह किया। लगातार बढ़ते बिजनेस के बीच उनका स्वास्थ्य खराब हुआ और 6 जुलाई 2002 को उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के बाद उनके काम को बड़े बेटे मुकेश अंबानी ने संभाला।


Lessons to take:-

ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं| वो हमीं हैं जो अपनी आँखों पर हाँथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अन्धकार है|


थॉमस एडिसन

 

थॉमस एल्वा एडिसन

थॉमस एल्वा एडिसन की जीवनी


थॉमस एल्वा एडिसन एक महान अमरीकी आविष्कारक एवं व्यवसायी थे। संपूर्ण विश्व में अपनी महानतम उपलब्धियों के लिए जाने वाले इस महान वैज्ञानिक (scientist) के नाम पर 1093 आविष्कारों के पेटेंट दर्ज हैं। विद्युत-बल्ब का अविष्कार करने के कारण इन्हे विश्वभर में प्रकाश का फरिश्ता कहा जाता हैं। थॉमस एल्वा एडिसन का जन्म 11 फरवरी 1847 में अमेरिका के ओहियो शहर के मिलान गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम सेमुएल एडिसन और माँ का नाम नैन्सी एलियट था। एडिसन अपने माता-पिता की सात संतानों में से सबसे छोटे थे। इनके पिता ने हर प्रकार के व्यवसाय करने का प्रयास किया लेकिन उन्हे किसी में भी सफलता ना मिली। जिस समय एडिसन की उम्र सात वर्ष की थी, तब उनका परिवार पोर्ट ह्यूरोंन, मिशिगेज चला गया, जहाँ पर उनके पिता एक बढ़ई के रूप में फोर्ट ग्रेरियेट में नियुक्त किये गये थे। एडीसन बचपन में बहुत कमजोर थे और उनका व्यक्तित्व बहुत जटिल था। लेकिन इनका मस्तिष्क सदा पश्नो से भरा रहता था। वह किसी भी चीज़ को तब तक नही मानते थे जब तक उसका स्वंय परीक्षण न कर ले। इस प्रकार के दृष्टिकोण के कारण ही इन्हे स्कूल से निकाल दिया गया। इनके अध्यापक ने कहा था कि इस लड़के का दिमाग़ बिल्कुल खाली हैं। स्कूल से निकाले जाने के बाद इन्हे इनकी माँ ने घर पर ही शिक्षा दी थी, जो कि खुद अध्यापिका थी। एडिसन ने अपनी ज्यादातर शिक्षा आर.जी. पार्कर स्कूल से और दी कूपर यूनियन स्कूल ऑफ़ साइंस एंड आर्ट से ग्रहण किया। एडिसन को बचपन से ही सुनने में तकलीफ होती थी। ये सब तब से चल रहा था जब से बचपन में उन्हें एक तेज़ बुखार आया था और उससे उबरते समय उनके दाहिने कान में चोट आ गयी थी। तभी से उन्हें सुनने में थोड़ी-बहुत परेशानी होती थी। उनके करियर के मध्य, उन्होंने अपनी बीमारी के बारे में बताया की जब वे ट्रेन में सफ़र कर रहे थे तभी एक केमिकल में आग लग गयी, जिस वजह से वे ट्रेन के बाहर फेंके गये और उनके कान में चोट आ गयी। कुछ साल बाद ही, उन्होंने इस कहानी को तोड़ते हुए एक नयी कहानी बनाई और कहने लगे की जब चलती ट्रेन में कंडक्टर उनकी मदद कर रहा था, तभी अचानक उनके कान में चोट लगी थी। सन 1862 की बात हैं जब इन्होने अपनी जान पर खेलकर स्टेशन मास्टर के बच्चे को एक रेल दुर्घटना में मरने से बचाया। एडीसन के इस कारनामे से स्टेशन मास्टर बहुत प्रसन्न हुआ। उसके पास धन के रूप में तो कुछ देने को था नही, लेकिन उसने एडीसन को टेलिग्राफ सिखाने का वचन दिया। एडीसन ने इस व्यक्ति से टेलिग्राफ सीखी और सन 1868 में उन्होने अपना टेलिग्राफ पर पहला पेटेंट कराया। उसी वर्ष उन्होने वोट रेकॉर्ड करने की मशीन का अविष्कार किया। इसके अगले वर्ष वे न्यूयॉर्क चले गये। वहाँ पर भी उन्होने कुछ समय ग़रीबी में गुज़रा, लेकिन कुछ दिन बाद उन्हे स्टॉक एक्सचेंज के टेलिग्राफ ऑफीस में नौकरी मिल गयी। उन्होने अपना टेलिग्राफ उपकरण एक्सचेंज के प्रेसीडेंट को इस आशा में भेंट किया की उन्हे इसके लिए 2,000 डॉलर मिल जाएँगे, लेकिन एक्सचेंज का प्रेसीडेंट उनके इस टेलिग्राफ उपकरण से इतना प्रभावित हुआ की उसने एडीसन को इसके 40 हज़ार डॉलर दिए, यही से उनके सौभाग्य का आरंभ हुआ। सन 1876 में न्यूजर्सी के मैनलो पार्क में इन्होने अपनी प्रयोगशाला स्थापित की। वहाँ इन्होने इतने अनुसंधान किए की इन्हे मैनलो पार्क का जादूगर कहा जाने लगा। सन 1877 में एडीसन ने ग्रामोफ़ोन का अविष्कार किया। इसी प्रयोगशाला में सन् 1879 में एडीसन ने विद्युत बल्ब का अविष्कार किया। जब ये विद्युत बल्ब पर कार्य कर रहे थे तभी इन्होने तापायनिक उत्सर्जन (Thermionic Emission) के सिद्धांत का अविष्कार किया और बाद में इसी सिद्धांत पर एलेक्ट्रॉनिक बल्ब बनाए गए। एडिसन ने विद्युत प्रकाश के अलावा सिनेमा, टेलीफोन, रिकॉर्ड और सीडी का सृजन किया और योगदान दिया था। उनके समस्त अविष्कार आज किसी न किसी रूप में उपयोग में है। एडीसन के शोधो के आधार पर ही बाद में रेमिँगटन टाइप रायटर विकसित किया गया। इन्होने एक विद्युत से चलने वाला पेन भी खोजा, जो बाद में मिमोग्राफ के रूप में विकसित हुआ। सन् 1889 में उन्होने चलचित्र कैमरा भी विकसित किया। एडिसन एक महान अविष्कारक थे, उनके समय में उन्होंने पुरे US के 1093 पेटेंट्स अपने कब्जे में कर रखे थे, और इसके अलावा यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और जर्मनी में भी उनके कई सारे पेटेंट्स है। उनके इन सभी पेटेंट्स का उनके आविष्कारों पर बहुत प्रभाव पड़ा। वे एक वैज्ञानिक ही नही बल्कि एक सफल उद्यमी भी थे। वे हर दिन अपने काम करने के बाद बचे समय को प्रयोग और परिक्षण में लगते थे। उन्होंने अपनी कल्पना शक्ति और स्मरण शक्ति का उपयोग अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने में लगाया। उनके इसी टैलेंट की बदौलत उन्होंने 14 कंपनियों की स्थापना की जिनमें जनरल इलेक्ट्रिक भी शामिल है, जो आज भी दुनिया की सबसे बड़ी व्यापर करने वाली कंपनी के नाम से जानी जाती है। प्रथम विश्वयुद्ध में एडिसन ने जलसेना सलाहकार बोर्ड का अध्यक्ष बनकर 40 युद्धोपयोगी आविष्कार किए। पनामा पैसिफ़िक प्रदर्शनी ने 21 अक्टूबर 1915 ई. को एडिसन दिवस का आयोजन करके विश्वकल्याण के लिए सबसे अधिक अविष्कारों के इस उपजाता को संमानित किया। 1927 ई. में एडिसन नैशनल ऐकैडमी ऑव साइंसेज़ के सदस्य निर्वाचित हुए। 21 अक्टूबर 1929 को राष्ट्रपति दूसरे ने अपने विशिष्ट अतिथि के रूप में एडिसन का अभिवादन किया। सन् 1912 में इन्हे अपने पुराने सहयोगी टेल्सा के साथ नोबेल पुरूस्कार मिलने को था लेकिन टेल्सा एडीसन के साथ नोबेल पुरूस्कार लेने से इनकार कर दिए, इस कारण दोनो ही वैज्ञानिक नोबेल पुरूस्कार से वंचित रह गए। वे जीवन की अंतिम सांसो तक खोज कार्य में लगे रहे। मृत्यु को भी उन्होंने गुरुतर प्रयोगों के लिए दूसरी प्रयोगशाला में पदार्पण समझा। ”मैंने अपना जीवनकार्य पूर्ण किया। अब मैं दूसरे प्रयोग के लिए तैयार हूँ”, इस भावना के साथ विश्व की इस महान उपकारक विभूति ने 18 अक्टूबर 1931 को संसार से विदा ली।

मेजर ध्यान चंद

 

मेजर ध्यान चंद

मेजर ध्यान चंद की कहानी


हॉकी के जादूगर के नाम से प्रसिद्ध मेजर ध्यान चंद बहु प्रतिष्ठित बेहतरीन हॉकी प्लेयर थे। गोल करने की उनके क्षमता अद्भुत थी और अक्सर विरोधी टीम भारत के इस खिलाड़ी के सामने घुटने टेकते हुए नजर आते थे। 29 अगस्त को आने वाला उनका जन्मदिन भारत में राष्ट्रिय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है और भारत के राष्ट्रपति ने भी उन्होंने राजीव गाँधी खेल रत्न, अर्जुन और द्रोणाचार्य अवार्ड से इस दिन सम्मानित भी किया गया है। हॉकी फील्ड में तीन ओलिंपिक मैडल जीतने वाला, भारतीय हॉकी खिलाड़ी ध्यान चंद बेशक हॉकी के सबसे बेहतरीन और हरफनमौला खिलाड़ी थे। वे उस समय भारतीय अंतरराष्ट्रीय हॉकी टीम के सदस्य थे, जिस समय भारतीय हॉकी टीम ने पूरी दुनिया में अपना दबदबा बनाया हुआ था। एक खिलाड़ी के रूप में गोल करने की उनकी शैली और कला दुसरे सभी खिलाडियों से बिल्कुल अलग और अद्भुत थी। इसीलिए उन्हें “हॉकी के जादूगर” के नाम से भी जाना जाता है। हर मैच में हॉकी की गेंद पर उनकी अद्भुत पकड़ होती थी और गेंद को घसीटने में भी वे बेहतर थे। बल्कि गेंद को घसीटने की उनकी कला अविश्वसनीय थी। लोग उन्हें हॉकी की स्टिक से खेलने वाला जादूगर कहकर ही बुलाते थे। कई बार विरोधी टीम ने उनकी स्टिक को भीतर से देखने के लिए मैच के दौरान तोड़ने की भी कोशिश की थी। हॉकी के प्रति उनका प्रेम तब बढ़ने लगा था जब किशोरावस्था में ही वे आर्मी में शामिल हो चुके थे। शुरू-शुरू में आर्मी टीम की तरफ से खेलते थे, जहाँ उन्होंने अच्छा खेलकर अपना नाम भी कमाया। जिस भारतीय टीम ने 1928 के एम्स्टर्डम ओलिंपिक और 1932 के लोंस एंजेल्स ओलिंपिक में गोल्ड मैडल जीता था, उस भारतीय टीम के कप्तान ध्यान चंद ही थे। 1932 के ओलिंपिक में भारत का पहला मैच जापान के खिलाफ था, जिसे उन्होंने 11-1 से जीता था। इससे सिद्ध हुआ की भारतीय टीम काफी अच्छा प्रदर्शन कर रही है और सबको यकीन था कि टीम फाइनल में जाकर एक बार फिर गोल्ड मैडल जरुर जीतेंगी। ओलिंपिक के बाद भारतीय टीम ने यूनाइटेड स्टेट, इंग्लैंड और दुसरे देशों से खेलने के लिए बहुत से इंटरनेशनल टूर भी किये। टूर के अंत में, भारत खेले गये 37 मैचों में से 34 जीता था। इस टूर में चंद ने भारत द्वारा किये गये 338 गोल में से 133 गोल दागे थे। 1934 में उन्हें भारतीय हॉकी टीम का कप्तान बनाया गया और अपने अपनी कप्तानी में टीम को 1936 के बर्लिन ओलिंपिक में ले गये। वहाँ भी उन्होंने अपना जादू दिखाया और भारत को तीसरा ओलिंपिक गोल्ड मैडल जीताया। 1940 के अंत तक वे लगातार हॉकी खेलते रहे और फिर इसके बाद 1956 में आर्मी के मेजर के रूप में सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्त होने के बाद वे भारतीय टीम के कोच बने।


अंतिम दिन:-

1956 में, 51 साल की उम्र में मेजर के पद पर कार्य करते हुए वे सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद उसी साल भारत सरकार ने उन्हें भारत के तीसरे सर्वोच्च सम्मान पद्म भूषण देकर सम्मानित किया। सेवानिवृत्ति के बाद वे राजस्थान के माउंट आबू में कोच का काम करने लगे। बाद में उन्होंने पटियाला के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्पोर्ट के मुख्य हॉकी कोच होने के पद को स्वीकार किया और कई वर्षों तक उसी पद रहते हुए काम भी किया। चंद ने अपने अंतिम दिन अपने गाँव झाँसी, उत्तर प्रदेश, भारत में बिताए थे। मेजर ध्यान चंद की मृत्यु 3 दिसम्बर 1979 को ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेंडिकल साइंस, दिल्ली में हुई। झाँसी के शहीदों के मैदान पर उनका दाह संस्कार किया गया था।

मेजर ध्यान चंद को मिले हुए अवार्ड और उपलब्धियाँ:-

• वे उन तीनों भारतीय टीम के सदस्य थे जिन्होंने 1928, 1932 और 1936 के ओलिंपिक में गोल्ड मैडल जीता था। अपने पूरे हॉकी करियर में उन्होंने तक़रीबन 1000 से भी ज्यादा गोल किये थे, जिनमें से 400 उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किये थे। • 1956 में हॉकी फील्ड में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें भारत के तीसरे सर्वोच्च अवार्ड पद्म भूषण से सम्मानित किया था। किसी भी खिलाड़ी की महानता को गिनने का सबसे का पैमाना यही है कि उस खिलाड़ी के साथ कितनी घटनाएं जुडी हुई है। उस हिसाब से तो मेजर ध्यान चंद का कोई जवाब ही नही। हौलेंड में तो लोगों ने उनकी हॉकी स्टिक तुड़वा कर भी देख ली थी के कही उसमें चुम्बक तो नही। यही घटना हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी लोकप्रियता को दर्शाती है। वक्त अगर किसी चीज को लौटाना चाहे तो बेशक भारतीय खेल जगत मेजर ध्यानचंद को मांगना चाहेगा। उनसा न कोई हुआ और हो सकता है और ना भविष्य में कोई होगा। खेल से खिलाड़ी की पहचान बनती है लेकिन ध्यानचंद तो हॉकी का आइना बन गए।

Lessons to take:-

जीवन में कठिनाइयाँ हमे बर्बाद करने नहीं आती है, बल्कि यह हमारी छुपी हुई सामर्थ्य और शक्तियों को बाहर निकलने में हमारी मदद करती है| कठिनाइयों को यह जान लेने दो की आप उससे भी ज्यादा कठिन हो।


बिल गेट्स

 बिल गेट्स की कहानी

बिल गेट्स को किसी परिचय कि आवश्यकता नहीं है, वह पूरी दुनिया में अपने कार्यों से जाने जाते हैं। हम सभी यह भली भांति जानते हैं कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ Software Company “माइक्रोसॉफ्ट” की नींव भी बिल गेट्स के द्वारा ही रखी गयी है।

बिल गेट्स का परिवार:-

बिल गेट्स का वास्तविक तथा पूर्ण नाम विलियम हेनरी गेट्स है। इनका जन्म 28 अक्टूबर, 1955 को वाशिंगटन के सिएटल में हुआ। इनके परिवार में इनके अतिरिक्त चार और सदस्य थे – इनके पिता विलियम एच गेट्स जो कि एक मशहूर वकील थे, इनकी माता मैरी मैक्‍सवेल गेट्स जो प्रथम इंटरस्टेट बैंक सिस्टम और यूनाइटेड वे के निदेशक मंडल की सदस्य थी तथा इनकी दो बहनें जिनका नाम क्रिस्टी और लिब्बी हैं। बिल गेट्स ने अपने बचपन का भी भरपूर आनंद लिया तथा पढ़ाई के साथ वह खेल कूद में भी सक्रिय रूप से भाग लेते रहे।

बिल गेट्स का बचपन:-

उनके माता – पिता उनके लिए क़ानून में करियर बनाने का स्वप्न लेकर बैठे थे परन्तु उन्हें बचपन से ही कंप्यूटर विज्ञान तथा उसकी प्रोग्रामिंग भाषाओं में रूचि थी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा लेकसाइड स्कूल में हुई। जब वह आठवीं कक्षा के छात्र थे तब उनके विद्यालय ने ऐएसआर – 33 दूरटंकण टर्मिनल तथा जनरल इलेक्ट्रिक (जी.ई.) कंप्यूटर पर एक कंप्यूटर प्रोग्राम खरीदा जिसमें गेट्स ने रूचि दिखाई। तत्पश्चात मात्र तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला कंप्यूटर प्रोग्राम लिखा जिसका नाम “टिक-टैक-टो” (tic-tac-toe) तथा इसका प्रयोग कंप्यूटर से खेल खेलने हेतु किया जाता था। बिल गेट्स इस मशीन से बहुत अधिक प्रभावित थे तथा जानने को उत्सुक थे कि यह सॉफ्टवेयर कोड्स किस प्रकार कार्य करते हैं।

कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के प्रति बिल गेट्स की लगन:-

इसके पश्चात गेट्स डीईसी (DEC), पीडीपी (PDP), मिनी कंप्यूटर नामक सिस्टमों में दिलचस्पी दिखाते रहे, परन्तु उन्हें कंप्यूटर सेंटर कॉरपोरेशन द्वारा ऑपरेटिंग सिस्टम में हो रही खामियों के लिए 1 महीने तक प्रतिबंधित कर दिया गया। इसी समय के दौरान उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर सीसीसी के सॉफ्टवेयर में हो रही कमियों को दूर कर लोगों को प्रभावित किया तथा उसके पश्चात वह सीसीसी के कार्यालय में निरंतर जाकर विभिन्न प्रोग्रामों के लिए सोर्स कोड का अध्ययन करते रहे और यह सिलसिला 1970 तक चलता रहा। इसके पश्चात इन्फोर्मेंशन साइंसेस आइ.एन.सी. लेकसाइड के चार छात्रों को जिनमें बिल गेट्स भी शामिल थे, कंप्यूटर समय एवं रॉयल्टी उपलब्ध कराकर कोबोल (COBOL), पर एक पेरोल प्रोग्राम लिखने के लिए किराए पर रख लिया। इसके पश्चात उन्हें रोकना नामुमकिन था। मात्र 17 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने मित्र एलन के साथ मिलकर ट्राफ़- ओ- डाटा नामक एक उपक्रम बनाया जो इंटेल 8008 प्रोसेसर (Intel 8008 Processor) पर आधारित यातायात काउनटर (Traffic Counter) बनाने के लिए प्रयोग में लाया गया। 1973 में वह लेकसाइड स्कूल से पास हुए तथा उसके पश्चात बहु- प्रचलित हारवर्ड कॉलेज में उनका दाखिला हुआ। परन्तु उन्होंने 1975 में ही बिना स्नातक किए वहाँ से विदा ले ली जिसका कारण था उस समय उनके जीवन में दिशा का अभाव। उसके पश्चात उन्होंने Intel 8080 चिप बनाया तथा यह उस समय का व्यक्तिगत कंप्यूटर के अन्दर चलने वाला सबसे वहनयोग्य चिप था, जिसके पश्चात बिल गेट्स को यह एहसास हुआ कि समय द्वारा दिया गया यह सबसे उत्तम अवसर है जब उन्हें अपनी स्वयं की कंपनी का आरम्भ करना चाहिए।

माइक्रोसॉफ्ट कंपनी का उत्थान:-

MITS (Micro Instrumentation and Telemetry Systems) जिन्होंने एक माइक्रो कंप्यूटर का निर्माण किया था, उन्होंने गेट्स को एक प्रदर्शनी में उपस्थित होने की सहमती दी तथा गेट्स ने उनके लिए अलटेयर एमुलेटर (Emulator) निर्मित किया जो Mini Computer और बाद में इंटरप्रेटर में सक्रिय रूप से कार्य करने लगा। इसके बाद बिल गेट्स व उनके साथी को MITS के अल्बुकर्क स्थित कार्यालय में काम करने की अनुमति दी गयी। उन्होंने अपनी जोड़ी का नाम Micro-Soft रखा तथा अपने पहले कार्यालय की स्थापना अल्बुकर्क में ही की। 26 नवम्बर, 1976 को उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट का नाम एक व्यापारिक कंपनी के तौर पर पंजीकृत किया। माइक्रोसॉफ्ट Basic कंप्यूटर के चाहने वालों में सबसे अधिक लोकप्रिय हो गया था। 1976 में ही माइक्रोसॉफ्ट MITS से पूर्णत: स्वतंत्र हो गया तथा Gates और Allen ने मिलकर कंप्यूटर में प्रोग्रामिंग भाषा Software का कार्य जारी रखा। इनसे बाद माइक्रोसॉफ्ट ने अल्बुकर्क में अपना कार्यालय बंद कर बेलेवुए, वाशिंगटन में अपना नया कार्यालय खोला। माइक्रोसॉफ्ट ने उन्नति की ओर बढ़ते हुए प्रारंभिक वर्षों में बहुत मेहनत व लगन से कार्य किया। गेट्स भी व्यावसायिक विवरण पर भी ध्यान देते थे, कोड लिखने का कार्य भी करते थे तथा अन्य कर्मचारियों द्वारा लिखे गए व जारी किये गए कोड की प्रत्येक पंक्ति की समीक्षा भी वह स्वयं ही करते थे। इसके बाद जानी-मानी कंपनी IBM ने माइक्रोसॉफ्ट के साथ काम करने में रूचि दिखाई, उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट से अपने पर्सनल कंप्यूटर के लिए बेसिक इंटरप्रेटर बनाने का अनुरोध किया। कई कठिनाइयों से निकलने के बाद गेट्स ने Seattle कंप्यूटर प्रोडक्ट्स के साथ एक समझौता किया जिसके बाद एकीकृत लाइसेंसिंग एजेंट और बाद में 86-DOS के वह पूर्ण आधिकारिक बन गए और बाद में उन्होंने इसे आईबीएम को $80,000 के शुल्क पर PC-DOS के नाम से उपलब्ध कराया। इसके पश्चात माइक्रोसॉफ्ट का उद्योग जगत में बहुत नाम हुआ। 1981 में माइक्रोसॉफ्ट को पुनर्गठित कर बिल गेट्स को इसका चेयरमैन व निदेशक मंडल का अध्यक्ष बनाया गया। जिसके बाद माइक्रोसॉफ्ट ने अपना माइक्रोसॉफ्ट विंडोज का पहला संस्करण पेश किया। 1975 से लेकर 2006 तक उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट के पद पर बहुत ही अदभुत कार्य किया, उन्होंने इस दौरान माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के हित में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए।

बिल गेट्स का विवाह व आगे का जीवन:-

1994 में बिल गेट्स का विवाह फ्रांस में रहने वाली Melinda से हुआ तथा 1996 में इन्होंने जेनिफर कैथेराइन गेट्स को जन्म दिया। इसके बाद मेंलिंडा तथा बिल गेट्स के दो और बच्चे हुए जिनके नाम रोरी जॉन गेट्स तथा फोएबे अदेले गेट्स हैं। वर्तमान में बिल गेट्स अपने परिवार के साथ वाशिंगटन स्थित मेंडिना में उपस्थित अपने सुन्दर घर में रहते हैं, जिसकी कीमत 1250 लाख डॉलर है।

बिल एंड मेंलिंडा गेट्स फाउंडेशन का उदय:-

वर्ष 2000 में उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर बिल एंड मेंलिंडा गेट्स फाउंडेशन की नींव रखी जो कि पारदर्शिता से संचालित होने वाला विश्व का सबसे बड़ा Charitable फाउंडेशन था। उनका यह फाउंडेशन ऐसी समस्याओं के लिए कोष दान में देता था जो सरकार द्वारा नज़रअंदाज़ कर दी जाती थीं जैसे कि कृषि, कम प्रतिनिधित्व वाले अल्पसंख्यक समुदायों के लिये कॉलेज छात्रवृत्तियां, एड्स जैसी बीमारियों के निवारण हेतु, इत्यादि।

परोपकारी कार्य:-

सन 2000 में इस फाउंडेशन ने Cambridge University को 210 मिलियन डॉलर गेट्स कैम्ब्रिज छात्रवृत्तियों हेतु दान किये। वर्ष 2000 तक बिल गेट्स ने 29 बिलियन डॉलर केवल परोपकारी कार्यों हेतु दान में दे दिए। लोगों की उनसे बढती हुई उम्मीदों को देखते हुए वर्ष 2006 में उन्होंने यह घोषणा की कि वह अब माइक्रोसॉफ्ट में अंशकालिक रूप से कार्य करेंगे और बिल एंड मेंलिंडा गेट्स फाउंडेशन में पूर्णकालिक रूप से कार्य करेंगे। वर्ष 2008 में गेट्स ने माइक्रोसॉफ्ट के दैनिक परिचालन प्रबंधन कार्य से पूर्णतया विदा ले ली परन्तु अध्यक्ष और सलाहकार के रूप में वह माइक्रोसॉफ्ट में विद्यमान रहे।

Conclusion:-

Never Forever, Give Up..!!!


सोलह कलाओं का अर्थ क्या है

 सोलह कलाओं का अर्थ क्या है


श्री राम 12 कलाओं के ज्ञाता थे तो भगवान श्रीकृष्ण सभी 16 कलाओं के ज्ञाता हैं। चंद्रमा की सोलह कलाएं होती हैं। सोलह श्रृंगार के बारे में भी आपने सुना होगा। आखिर ये 16 कलाएं क्या है? उपनिषदों अनुसार 16 कलाओं से युक्त व्यक्ति ईश्‍वरतुल्य होता है।


आपने सुना होगा कुमति, सुमति, विक्षित, मूढ़, क्षित, मूर्च्छित, जाग्रत, चैतन्य, अचेत आदि ऐसे शब्दों को जिनका संबंध हमारे मन और मस्तिष्क से होता है, जो व्यक्ति मन और मस्तिष्क से अलग रहकर बोध करने लगता है वहीं 16 कलाओं में गति कर सकता है।


*चन्द्रमा की सोलह कला : अमृत, मनदा, पुष्प, पुष्टि, तुष्टि, ध्रुति, शाशनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्सना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्ण और पूर्णामृत। इसी को प्रतिपदा, दूज, एकादशी, पूर्णिमा आदि भी कहा जाता है।


उक्तरोक्त चंद्रमा के प्रकाश की 16 अवस्थाएं हैं उसी तरह मनुष्य के मन में भी एक प्रकाश है। मन को चंद्रमा के समान ही माना गया है। जिसकी अवस्था घटती और बढ़ती रहती है। चंद्र की इन सोलह अवस्थाओं से 16 कला का चलन हुआ। व्यक्ति का देह को छोड़कर पूर्ण प्रकाश हो जाना ही प्रथम मोक्ष है।


*मनुष्य (मन) की तीन अवस्थाएं : प्रत्येक व्यक्ति को अपनी तीन अवस्थाओं का ही बोध होता है:- जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति। क्या आप इन तीन अवस्थाओं के अलावा कोई चौथी अवस्था जानते हैं? जगत तीन स्तरों वाला है- 1.एक स्थूल जगत, जिसकी अनुभूति जाग्रत अवस्था में होती है। 2.दूसरा सूक्ष्म जगत, जिसका स्वप्न में अनुभव करते हैं और 3.तीसरा कारण जगत, जिसकी अनुभूति सुषुप्ति में होती है।


तीन अवस्थाओं से आगे: सोलह कलाओं का अर्थ संपूर्ण बोधपूर्ण ज्ञान से है। मनुष्‍य ने स्वयं को तीन अवस्थाओं से आगे कुछ नहीं जाना और न समझा। प्रत्येक मनुष्य में ये 16 कलाएं सुप्त अवस्था में होती है। अर्थात इसका संबंध अनुभूत यथार्थ ज्ञान की सोलह अवस्थाओं से है। इन सोलह कलाओं के नाम अलग-अलग ग्रंथों में भिन्न-भिन्न मिलते है।


जानिए 16 कलाओं के नाम।


इन सोलह कलाओं के नाम अलग-अलग ग्रंथों में अलगे अलग मिलते हैं।


*1.अन्नमया, 2.प्राणमया, 3.मनोमया, 4.विज्ञानमया, 5.आनंदमया, 6.अतिशयिनी, 7.विपरिनाभिमी, 8.संक्रमिनी, 9.प्रभवि, 10.कुंथिनी, 11.विकासिनी, 12.मर्यदिनी, 13.सन्हालादिनी, 14.आह्लादिनी, 15.परिपूर्ण और 16.स्वरुपवस्थित।


*अन्यत्र 1.श्री, 3.भू, 4.कीर्ति, 5.इला, 5.लीला, 7.कांति, 8.विद्या, 9.विमला, 10.उत्कर्शिनी, 11.ज्ञान, 12.क्रिया, 13.योग, 14.प्रहवि, 15.सत्य, 16.इसना और 17.अनुग्रह।


*कहीं पर 1.प्राण, 2.श्रधा, 3.आकाश, 4.वायु, 5.तेज, 6.जल, 7.पृथ्वी, 8.इन्द्रिय, 9.मन, 10.अन्न, 11.वीर्य, 12.तप, 13.मन्त्र, 14.कर्म, 15.लोक और 16.नाम।


16 कलाओं का रहस्य जानिए...


16 कलाएं दरअसल बोध प्राप्त योगी की भिन्न-भिन्न स्थितियां हैं। बोध की अवस्था के आधार पर आत्मा के लिए प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक चन्द्रमा के प्रकाश की 15 अवस्थाएं ली गई हैं। अमावास्या अज्ञान का प्रतीक है तो पूर्णिमा पूर्ण ज्ञान का।


19 अवस्थाएं : भगवदगीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने आत्म तत्व प्राप्त योगी के बोध की उन्नीस स्थितियों को प्रकाश की भिन्न-भिन्न मात्रा से बताया है। इसमें अग्निर्ज्योतिरहः बोध की 3 प्रारंभिक स्थिति हैं और शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ की 15 कला शुक्ल पक्ष की 01..हैं। इनमें से आत्मा की 16 कलाएं हैं।


आत्मा की सबसे पहली कला ही विलक्षण है। इस पहली अवस्था या उससे पहली की तीन स्थिति होने पर भी योगी अपना जन्म और मृत्यु का दृष्टा हो जाता है और मृत्यु भय से मुक्त हो जाता है।


अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ ।


तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥


अर्थात : जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।- (8-24)


भावार्थ : श्रीकृष्ण कहते हैं जो योगी अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण के छह माह में देह त्यागते हैं अर्थात जिन पुरुषों और योगियों में आत्म ज्ञान का प्रकाश हो जाता है, वह ज्ञान के प्रकाश से अग्निमय, ज्योर्तिमय, दिन के सामान, शुक्लपक्ष की चांदनी के समान प्रकाशमय और उत्तरायण के छह माहों के समान परम प्रकाशमय हो जाते हैं। अर्थात जिन्हें आत्मज्ञान हो जाता है। आत्मज्ञान का अर्थ है स्वयं को जानना या देह से अलग स्वयं की स्थिति को पहचानना।


विस्तार से...


1.अग्नि:- बुद्धि सतोगुणी हो जाती है दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव विकसित होने लगता है।


2.ज्योति:- ज्योति के सामान आत्म साक्षात्कार की प्रबल इच्छा बनी रहती है। दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव ज्योति के सामान गहरा होता जाता है।


3.अहः- दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव दिन के प्रकाश की तरह स्थित हो जाता है।


16 कला - 15कला शुक्ल पक्ष + 01 उत्तरायण कला = 16


1.बुद्धि का निश्चयात्मक हो जाना।


2.अनेक जन्मों की सुधि आने लगती है।


3.चित्त वृत्ति नष्ट हो जाती है।


4.अहंकार नष्ट हो जाता है।


5.संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाते हैं। स्वयं के स्वरुप का बोध होने लगता है।


6.आकाश तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। कहा हुआ प्रत्येक शब्द सत्य होता है।


7.वायु तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। स्पर्श मात्र से रोग मुक्त कर देता है।


8.अग्नि तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। दृष्टि मात्र से कल्याण करने की शक्ति आ जाती है।


9.जल तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। जल स्थान दे देता है। नदी, समुद्र आदि कोई बाधा नहीं रहती।


10.पृथ्वी तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। हर समय देह से सुगंध आने लगती है, नींद, भूख प्यास नहीं लगती।


11.जन्म, मृत्यु, स्थिति अपने आधीन हो जाती है।


12.समस्त भूतों से एक रूपता हो जाती है और सब पर नियंत्रण हो जाता है। जड़ चेतन इच्छानुसार कार्य करते हैं।


13.समय पर नियंत्रण हो जाता है। देह वृद्धि रुक जाती है अथवा अपनी इच्छा से होती है।


14.सर्व व्यापी हो जाता है। एक साथ अनेक रूपों में प्रकट हो सकता है। पूर्णता अनुभव करता है। लोक कल्याण के लिए संकल्प धारण कर सकता है।


15.कारण का भी कारण हो जाता है। यह अव्यक्त अवस्था है।


16.उत्तरायण कला- अपनी इच्छा अनुसार समस्त दिव्यता के साथ अवतार रूप में जन्म लेता है जैसे राम, कृष्ण यहां उत्तरायण के प्रकाश की तरह उसकी दिव्यता फैलती है।


सोलहवीं कला पहले और पन्द्रहवीं को बाद में स्थान दिया है। इससे निर्गुण सगुण स्थिति भी सुस्पष्ट हो जाती है। सोलह कला युक्त पुरुष में व्यक्त अव्यक्त की सभी कलाएं होती हैं। यही दिव्यता है।


सत्कर्म करते रहना ही सही अर्थों में,,, जीवन से प्रेम,, है !


सुप्रभात ,,,,आपका दिवस मंगलमय हो !


मंगलकामना : प्रभु आपके जीवन से अन्धकार (अज्ञान )को मिटायें एवं प्रकाश (ज्ञान )से भर दें !


" जीवन का सत्य आत्मिक कल्याण है ना की भौतिक सुख !"


"सत्य वचन में प्रीति करले,सत्य वचन प्रभु वास।


सत्य के साथ प्रभु चलते हैं, सत्य चले प्रभु साथ।। "


( मनुष्य पद की गरिमा को क्यों खोता है और उसके क्या परिणाम होते है ?


उत्तर -- मनुष्य पद की गरिमा को तामसिक प्रवृतियों ( वासना , लालच एवं अहंकार ) के आधीन होने के कारण खोता है ! पवित्र गीता के अनुसार ये प्रवृतिया नरक का द्वार है ! हमारे मत में ये प्रवृतिया हमारे जीवन में तामस के उदय का आरम्भ है और यही तामस मानवो के जीवन में अज्ञानता , जड़ता एवं मूढ़ता के उदय का कारण है जो हमें नरक लोक ले जाने में सक्षम है ! अतः भ्रष्टाचार से बचो यानि पद की गरिमा को मत खोओ ! कोई भी पद या सम्मान (गरिमा ) इस जन्म में (पूर्व में संचित ) पुण्य कर्मो की देन है !पुण्य कर्मो के ह्यास के साथ ही गरिमा भी समाप्त हो जाती है और मानव को फिर अनेक योनियों में भटकना पड़ता है )


"एक माटी का दिया सारी रात अंधियारे से लड़ता है,


तू तो प्रभु का दिया है फिर किस बात से डरता है..."


हे मानव तू उठ और सागर (प्रभु ) में विलीन होने के लिए पुरुषार्थ कर ,,,,,,,


शरीर परमात्मा का दिया हुआ उपहार है ! चाहो तो इससे " विभूतिया " (अच्छाइयां / पुण्य इत्यादि ) अर्जित करलो चाहे घोरतम " दुर्गति " ( बुराइया / पाप ) इत्यादि !


परोपकारी बनो एवं प्रभु का सानिध्य प्राप्त करो !


प्रभु हर जीव में चेतना रूप में विद्यमान है अतः प्राणियों से प्रेम करो !


शाकाहार अपनाओ , करुणा को चुनो !


* परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥


तनु तिज तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा॥


भावार्थ:- जिनके मन में दूसरे का हित बसता है (समाया रहता है), उनके लिए जगत्‌ में कुछ भी (कोई भी गति) दुर्लभ नहीं है। हे तात! शरीर छोड़कर आप मेरे परम धाम में जाइए। मैं आपको क्या दूँ? आप तो पूर्णकाम हैं (सब कुछ पा चुके हैं)॥


भवसागर से पार होने के लिये मनुष्य शरीर रूपी सुन्दर नौका मिल गई है।


सतर्क रहो कहीं ऐसा न हो कि वासना की भँवर में पड़कर नौका डूब जाय।


जिस प्रकार मैले दर्पण में सूर्य देव का प्रकाश नहीं पड़ता है उसी प्रकार मलिन अंतःकरण में ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता है अर्थात मलिन अंतःकरण में शैतान अथवा असुरों का राज होता है ! अतः ऐसा मनुष्य ईश्वर द्वारा प्रदत्त " दिव्यदृष्टि " या दूरदृष्टि का अधिकारी नहीं बन सकता एवं अनेको दिव्य सिद्धियों एवं निधियों को प्राप्त नहीं कर पाता या खो देता है !



स्टीव जॉब्स

 

स्टीवन पॉल स्टीव जॉब्स की जीवनी

स्टीवन पॉल स्टीव जॉब्स


24 फरवरी 1955 को केलिफोर्निया में जन्में स्टीव जॉब्स का जीवन जन्म से ही संघर्ष पूर्ण था, उनकी माँ अविवाहित कॉलेज छात्रा थी। और इसी कारण वे उन्हें रखना नहीं चाहती थी, और स्टीव जॉब्स को किसी अच्छे परिवार में गोद देने का फैसला कर दिया। लेकिन जो गोद लेने वाले थे उन्होंने ये कहकर मना कर दिया की वे लड़की को गोद लेना चाहते हैं। फिर स्टीव जॉब्स को केलिफोर्निया में रहने वाले पॉल और कालरा जॉब्स ने गोद ले लिया। पॉल और कालरा दोनों ही ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे और मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखते थे। जब स्टीव जॉब्स 5 साल के हुए, तब उनका परिवार केलिफोर्निया के पास ही स्थित माउंटेन व्यू चला गया। पॉल मैकेनिक थे, और स्टीव को इलेक्ट्रॉनिक की चीजों के बारे में और कालरा एकाउंटेंट थी इसलिए वे स्टीव की पढ़ाई में मदद किया करती थी। स्टीव ने मोंटा लोमा स्कूल में दाखिला लिया और वही पर अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी की।
इसके बाद वे उच्च शिक्षा कूपटिर्नो जूनियर हाई स्कूल से पूरी की। और सन 1972 में अपनी कॉलेज की पढ़ाई के लिए ओरेगन के रीड कॉल में दाखिला लिया जो कि वहां की सबसे महंगी कॉलेज थी। स्टीव पढने में बहुत ही ज्यादा अच्छे थे लेकिन, उनके माता-पिता पूरी फीस नहीं भर पाते थे, इसलिए स्टीव ने फीस भरने के लिए बोतल के कोक को बेचकर पैसे जुटाते, और पैसे की कमी के कारण मंदिरों में जाकर वहाँ मिलने वाले मुफ्त खाना खाया करते थे। और अपने होस्टल का किराया बचाने के लिए अपने दोस्तों के कमरों में जमीन पर ही सो जाया करते थे। इतनी बचत के बावजूद फीस के पैसे पुरे नहीं जुटा पाते और अपने माता-पिता को कड़ी मेहनत करता देख उन्होंने कॉलेज छोड़कर उनकी मदद करने की सोची। लेकिन उनके माता-पिता उनसे सहमत नहीं थे। इसलिए अपने माता-पिता के कहने पर कॉलेज में नहीं जाने के स्थान पर क्रेटीव क्लासेज (creative classes) जाना स्वीकार किया। जल्दी ही उसमें स्टीव को रूचि बढ़ने लगी। क्लासेस जाने के साथ-साथ वे अटारी नाम की कंपनी में technician का काम करने लगे। स्टीव आध्यात्मिक जीवन में बहुत विश्वास करते थे, इसलिए स्टीव अपने धर्म गुरु से मिलने भारत आए। और काफी समय भारत में गुजारा। भारत में रहने के दौरान उन्होंने पूरी तरह बौद्ध धर्म को अपना लिया और बौद्ध भिक्षु के जैसे कपड़े पहनना शुरू किया। और पूरी तरह आध्यात्मिक हो गये। और भारत से वापिस कैलिफ़ोर्निया चले गए।


एप्पल कंपनी की शुरुआत:-


सन 1976 में मात्र 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने एप्पल Apple कंपनी की शुरुआत की। स्टीव ने अपने स्कूल के सहपाठी मित्र वोजनियाक के साथ मिलकर अपने पिता के गैरेज में ऑपरेटिंग सिस्टम मैकिनटोश तैयार किया। और इसे बेचने के लिए एप्पल कंप्यूटर का निर्माण करना चाहते थे। लेकिन पैसों की कमी के कारण समस्या आ रही थी। लेकिन उनकी ये समस्या उनके एक मित्र माइक मर्कुल्ला ने दूर कर दी साथ ही वे कंपनी में साझेदार भी बन गये। और स्टीव ने एप्पल कंप्यूटर बनाने की शुरुआत की। साथ ही उन्होंने अपने साथ काम करने के लिए Pepsi, Coca Cola कंपनी के मुख्य अधिकारी जॉन स्कली को भी शामिल कर लिया। स्टीव और उनके मित्रों की कड़ी मेहनत के कारण कुछ ही सालों में एप्पल कंपनी गैराज से बढ़कर 2 अरब डॉलर और 4000 कर्मचारियों वाली कंपनी बन चुकी थी।

एप्पल कंपनी से इस्तीफा:-


लेकिन उनकी ये उपलब्धि ज्यादा देर तक नहीं रही, उनके साझेदारों द्वारा उनको ना पसंद किये जाने और आपस में कहासुनी के कारण एप्पल कंपनी की लोकप्रियता कम होने लगी। धीरे-धीरे कंपनी पूरी तरह कर्ज में डूब गयी। और बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर की मीटिंग में सारे दोष स्टीव का ठहराकर सन 1985 में उन्हें एप्पल कंपनी से बाहर कर दिया। ये उनके जीवन का सबसे दुखद पल था। क्योकि जिस कंपनी को उन्होंने कड़ी मेहनत और लग्न से बनाया था उसी से उन्हें निकाल दिया गया था। स्टीव के जाते ही कंपनी पूरी तरह कर्ज में डूब गयी। एप्पल से इस्तीफा देने के 5 साल बाद उन्होंने Next-ink नाम की और Pixer नाम की दो कंपनियों की शुरुआत की।
Next-ink में उपयोग की जाने वाली तकनीक उत्तम थी। और उनका उद्देश्य बेहतरीन सॉफ्टवेर बनाना था। और Pixer कंपनी में animation का काम होता था। एक साल तक काम करने के बाद पैसों की समस्या आने लगी और Rosh perot के साथ साझेदारी कर ली। और पेरोट ने अपने पैसों का निवेश किया। सन 1990 में Next-ink ने पहला कंप्यूटर बाज़ार में उतारा लेकिन बहुत ही ज्यादा महंगा होने के कारण बाजार में नहीं चल सका। फिर Next-ink ने Inter personal computer बनाया जो बहुत ही ज्यादा लोकप्रिय हुआ। और Pixer ने एनिमेटेड फिल्म Toy story बनायीं जो अब तक की सबसे बेहतरीन फिल्म हैं।

एप्पल कंपनी में वापसी:-


सन 1996 में एप्पल ने स्टीव की Pixer को ख़रीदा इस तरह उनके एप्पल में वापसी हुई। साथ ही वे एप्पल के chief executive officer बन गये। सन 1997 में उनकी मेहनत के कारण कंपनी का मुनाफा बढ़ गया और वे एप्पल के सी.इ.ओ. बन गये। सन 1998 में उन्होंने आईमैक I-mac को बाज़ार में लॉन्च किया, जो काफी लोकप्रिय हुआ। और एप्पल ने बहुत ही बड़ी सफलता हासिल कर ली। उसके बाद I-pad, I-phone, I-tune भी लॉन्च किये। सन 2011 में सी.इ.ओ. पद से इस्तीफा दे दिया और बोर्ड के अध्यक्ष बन गये। उस वक्त उनकी प्रॉपर्टी $7.0 बिलियन हो गयी थी। और apple दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी बन गयी थी।

निधन:-


स्टीव को सन 2003 से Pancreatic नाम की कैंसर की बिमारी हो गयी थी। लेकिन फिर भी वे रोज कंपनी में जाते ताकि लोगों को बेहतरीन से बेहतरीन टेक्नोलॉजी प्रदान कर सके और कैंसर की बिमारी के चलते 5 Oct. 2011 को Paalo Aalto केलिफोर्निया में उनका निधन हो गया।


एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल

 

एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल की जीवनी

एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल


एक स्कॉटिश वैज्ञानिक, खोजकर्ता, इंजिनियर और प्रवर्तक थे जो पहले वास्तविक टेलीफोन के अविष्कार के लिये जाने जाते है।


टेलीफोन के अविष्कार की कहानी


एलेग्जेंडर बेल का जन्म 3 मार्च 1847 को स्कॉटलैंड के एडिनबर्घ में हुआ था। उनका पारिवारिक घर 16 साउथ शेर्लोट स्ट्रीट में था और वहाँ एलेग्जेंडर के जन्म को लेकर कई तरह के शिलालेख भी मौजूद है। उनके पिता प्रोफेसर एलेग्जेंडर मेंलविल्ले बेल स्वरवैज्ञानिक और उनकी माता एलिजा ग्रेस थी। उनका जन्म एलेग्जेंडर बेल के नाम से हुई हुआ था और 10 साल की उम्र में अपने पिता से अपने दो भाइयोंं के मध्य नाम की तरह अपना भी मध्य नाम रखने का निवेदन किया था। उनके 11 वें जन्मदिन पर उनके पिता ने उनका मध्यनाम “ग्रैहम” रहने की उन्हें अनुमति भी दी थी, इसका सुझाव उनके पिता के एक कैनेडियन पारिवारिक दोस्त ने उनके पिता को ही दिया था।

उनके परिवार और सहकर्मियों के अनुसार बेल बचपन से ही बहुत होशियार थे। बेल के पिता, दादा और भाई वक्तुत्व्कला और भाषणों से संबंधित काम से जुड़े हुए थे और उनकी माँ और पत्नी दोनों ही बहरे थे। बेल लगातार भाषण और बात करने वाले उपकरणों के अविष्कार में लगे रहते थे और ऐसा करने से ही उनके दिमाग को चालना मिलती भी गयी। और इसी वजह से 1876 में टेलीफोन की खोज करने वाले बेल को यूनाइटेड स्टेट के पहले पेटेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया था। बेल ने टेलीफोन का अविष्कार कर विज्ञान की दुनिया का सबसे बेहतरीन और सबसे प्रसिद्ध अविष्कार भी कर दिया था। टेलीफोन की खोज करने के बाद बेल ने अपने जीवन में और बहुत से अविष्कार भी किये है जिनमें मुख्य रूप से टेलीकम्यूनिकेशन, हीड्रोफ़ोइल और एरोनॉटिक्स शामिल है। नेशनल जियोग्राफिक सोसाइटी में 1898 से 1903 तक उन्होंने वहाँ रहते हुए सेवा की थी और सोसाइटी के दुसरे प्रेसिडेंट के पद पर कार्यरत रहे।

एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल की शिक्षा:-युवा बालक के रूप में बेल अपने भाइयों की ही तरह थे, उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही अपने पिता से ही ग्रहण की थी। अल्पायु में ही उन्हें स्कॉटलैंड के एडिनबर्घ की रॉयल हाई स्कूल में डाला गया था और 15 साल की उम्र में उन्होंने वह स्कूल छोड़ दी थी। उस समय उन्होंने पढ़ाई के केवल 4 प्रकार ही पुरे किये थे। उन्हें विज्ञान में बहुत रूचि थी, विशेषतः जीवविज्ञान में, जबकि दुसरे विषयों में वे ज्यादा ध्यान नही देते थे। स्कूल छोड़ने के बाद बेल अपने दादाजी एलेग्जेंडर बेल के साथ रहने के लिये लन्दन चले गये थे। जब बेल अपने दादा के साथ रह रहे थे तभी उनके अंदर पढ़ने के प्रति अपना प्यार जागृत हुए और तभी से वे घंटो तक पढ़ाई करते थे। युवा बेल ने बाद में अपनी पढ़ाई में काफी ध्यान दिया था। उन्होंने अपने युवा छात्र दृढ़ विश्वास के साथ बोलने के लिये काफी कोशिशे भी की थी। और उन्होंने जाना की उनके सभी सहमित्र उन्होंने एक शिक्षक की तरह देखना चाहते है और उनसे सीखना चाहते है।

16 साल की उम्र में ही बेल वेस्टन हाउस अकादमी, मोरे, स्कॉटलैंड के वक्तृत्वकला और संगीत के शिक्षक भी बने। इसके साथ-साथ वे लैटिन और ग्रीक के विद्यार्थी भी थे। इसके बाद बेल ने एडिनबर्घ यूनिवर्सिटी भी जाना शुरू किया, और वही अपने भाई मेंलविल्ले के साथ रहने लगे थे। 1868 में अपने परिवार के साथ कनाडा शिफ्ट होने से पहले बेल ने अपनी मेंट्रिक की पढ़ाई पूरी कर ली थी और फिर उन्होंने लन्दन यूनिवर्सिटी में एडमिशन भी ले लिया था।

एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल का पहला अविष्कार:-एक बच्चे के रूप में बेल ने इस दुनिया की प्राकृतिक जिज्ञासा को प्रदर्शित किया था और अल्पायु में ही वानस्पतिक नमूनों को इकट्टा कर उनपर प्रयोग करते रहते थे। उनका सबसे अच्छा दोस्त बेन हेर्डमैन था, जो उनका पड़ोसी भी था और उनके परिवार की एक फ्लौर मिल भी थी। बेल हमेशा अपने दोस्त से पूछा करते थे कि मिल में किन-किन चीजों की जरुरत पड़ती है। तब उनका दोस्त कहता था कि कामगारों की सहायता से गेहूं का भूसा बनाया जाता है और उसे पिसा जाता है। 12 साल की उम्र में बेल ने घर पर ही घुमने वाले दो कठोर पहियों को जोड़कर, (जिनके बिच घर्षण हो सके) एक ऐसी मशीन बनायी जिससे गेहूं को आसानी से पिसा जा सकता था। उनकी इस मशीन का उपयोग कई सालों तक होता रहा। बदले में बेन के पिता जॉन हेर्डमैन ने दोनों बच्चो को खोज करने के लिये एक वर्कशॉप भी उपलब्ध करवायी थी।

एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल के अविष्कार:-मई, 1874 में टेलीफोन का अविष्कार। बाद में उन्होंने फ़ोनोंऑटोग्राफ पर प्रयोग करना शुरू किया, एक ऐसी मशीन जो स्वर की लहरों को रुपरेखा दे सके। इसी साल की गर्मियों में उन्होंने टेलीफोन बनाने की योजना भी बनायी। इसके बाद उन्होंने अपने असिस्टेंट थॉमस वाटसन को भी काम पर रख लिया था। 2 जून 1875 को बेल ने टेलीफोन पर चल रहे अपने काम को सिद्ध किया। इसके बाद वाटसन ने बेल के फ़ोनोंऑटोग्राफ में लगी धातु की एक नलिका को खिंचा। अचानक हुई इस घटना से यह भी पता चला की टेलीफोन से हम ध्वनि को भी स्थानांतरित कर सकते है। 7 मार्च 1876 को बेल में अपने विचारों का पेटेंट हासिल किया।

बेल को यूनाइटेड स्टेट पेटेंट ऑफिस पेटेंट नंबर 174,465 मिला। इससे उनके विचारों को भी कॉपी नही कर सकता था और वे आसानी से टेलेग्राफी तरंगो से मशीन से आवाज को स्थानांतरित कर सकते थे। 3 अगस्त 1876 को उन्होंने पहला लंबी दुरी का कॉल लगाया। इसके बाद बेल को दूर के किसी ब्रन्तफोर्ड गाँव से एक ध्वनि-सन्देश भी मिला, यह सन्देश तक़रीबन 4 मिल दूर से आया था। इस घटना के बाद बेल ने अपनी योजनाओं को लोगों के सामने बोलना शुरू किया और अपनी खोजों को सार्वजनिक रूप से जाहिर भी किया। 11 जुलाई 1877 को बेल ने पहली टेलीफोन कंपनी की स्थापना की। बेल के टेलीफोन कंपनी की स्थापना हुई। इसी साल बेल ने कैम्ब्रिज के मबेल हब्बार्ड से शादी की। लेकिन अभी भी उनकी कमाई का जरिया पढाना ही था क्योंकि उस समय टेलीफोन उनके लिए ज्यादा लाभदायी नही था। 1881 को बेल ने दुसरे कई अविष्कार भी किये। बेल ने फोनोग्राफ, मेंटल डिटेक्टर, मेंटल जैकेट की भी खोज की और साथ ही ऑडियोमीटर की भी खोज की ताकि लोगों को सुनने में परेशानी ना हो, इसके बाद उनके नाम पर 18 पेटेंट दर्ज किये गए।

उनके अविष्कारों को देखते हुए उन्हें बहुत से सम्मानों और पुरस्कारों से नवाजा भी गया था और आज भी उन्हें कई पुरस्कार दिये जाते है। 1897 में बेल प्रसिद्ध हुए और बहुत सी संस्थाओ में भी उन्हें शामिल किया गया। 25 जनवरी 1915 को बेल ने पहला ट्रांस-अटलांटिक फ़ोन कॉल लगाया। पहली बार बेल ने उपमहाद्वीप के बाहर से भी वाटसन को कॉल लगाया। इस कॉल के 38 साल पहले, बेल और वाटसन ने फ़ोन पर बात की थी। लेकिन यह कॉल उस फ़ोन से काफी बेहतर था और आवाज भी साफ़ थी।

एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल की मृत्यु:-2 अगस्त 1922 को 75 साल की उम्र में अपनी व्यक्तिगत जगह बेंनभ्रेअघ, नोवा स्कॉटिया में डायबिटीज की वजह से उनकी मृत्यु हुई थी। बेल एनीमिया से भी ग्रसित थे। आखरी बार उन्होंने रात को 2.00 बजे अपनी माउंटेन एस्टेट के दर्शन किये थे। लम्बी बीमारी के बाद उनकी पत्नी मबेल ने उनके गानों में गुनगुनाते हुए कहा था, “मुझे छोड़कर मत जाओ।” जवाब में बेल ने “नहीं…।” कहा और कुछ ही समय बाद उनकी मृत्यु भी हो गयी थी। बेल की अंतिम यात्रा को सम्मान देते हुए उत्तरी अमेरिका उपमहाद्वीप के सभी फ़ोन को उनके सम्मान में साइलेंट पर रखा गया था, वे एक ऐसे अविष्कारक थे जिन्होंने अपने अविष्कार से लाखों मील दूर रह रहे इंसान को भी जोड़ा था।

Lessons to take:-

सफलता हमारा परिचय दुनिया को करवाती है और असफलता हमें दुनिया का परिचय करवाती है|


चार्ल्स बैबेज

 

चार्ल्स बैबेज

जीवन परिचय

चार्ल्स बैबेज का जन्म 26 दिसंबर 1791 को इंग्लैंड देश के लंदन में हुआ था । उनके पिता का नाम बेंजामिन बैबेज था जो एक बैंकर थे । चार्ल्स बैबेज के तीन भाई थे , यह चौथे नंबर के थे । इनका परिवार समृद्ध परिवार था । चार्ल्स्स बैबेज ने अच्छी पढ़ाई करके एक अच्छे गणितज्ञ , अविष्कारक , दार्शनिक , यांत्रिक इंजीनियर बने थे ।

चार्ल्स बैबेज को कंप्यूटर का जनक कहा जाता है । इन्हीं की कल्पना से आधुनिक कंप्यूटर का निर्माण किया गया था । चार्ल्स बैबेज ने हीं पहले यांत्रिक कंप्यूटर का निर्माण किया था ।


विवाह & शिक्षा

चार्ल्स बैबेज ने 1814 को जार्जियाना व्हिटमोर नामक महिला से विवाह किया था । जिनके द्वारा चार्ल्स बैबेज के 8 बच्चेेे हुए थे । इन 8 बच्चों में से सिर्फ तीन बच्चे ही जीवित रह पाए थे ।

चार्ल्स बैबेज ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई घर से ही प्रारंभ की थी । चार्ल्स बैबेज को पढ़ाने के लिए घर पर ही एक शिक्षक आया करता था । घर से ही उन्होंने शिक्षा प्राप्त करने का सफर प्रारंभ किया था । इसके बाद उनको आगे की शिक्षा दिलाने के लिए उनके माता-पिता ने उनको होल्मबुड़ स्कूल में भर्ती करा दिया था । यहां से उन्होंने इंटर पास किया था।

इंटर पास करने के बाद चार्ल्स बैबेज आगे की पढ़ाई करने के लिए अक्टूबर 1810 को ट्रिनिटी कॉलेज कैंब्रिज में पढ़ाई करने के लिए चले गए थे । यहां पर वह गणित एवं इंग्लिश की पढ़ाई करने लगे थे । उनकी रुचि पहले से ही गणित विषय में अधिक थी । विज्ञान विषय में भी उन्होंने सफलता प्राप्त की थी । कैंब्रिज कॉलेज से उन्होंने अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी ।



चार्ल्स का वैज्ञानिक सफर:-

चार्ल्स ने स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद कई पदों पर नौकरी करने के लिए आवेदन किए थे लेकिन वह आवेदन अस्वीकार किए गए थे क्योंकि चार्ल्स के पास सिफारिश नहीं थी । कई बार चार्ल्स ने कॉलेज के प्राध्यापक के लिए आवेदन किया था लेकिन चार्ल्स का यह आवेदन स्वीकार नहीं किया गया था । 1815 को चार्ल्स को रॉयल इंस्टीट्यूट में भाषण देने का चांस मिला था । जहां पर चार्ल्स ने खगोल विज्ञान पर भाषण दिया था ।

चार्ल्स बैबेज और उनके कई मित्रों ने मिलकर एक रॉयल सोसायटी बनाई थी और 1816 को चार्ल्स बैबेज को इस रॉयल सोसायटी का साथी चुना गया था । चार्ल्स बैबेज को जब किसी भी पद पर नौकरी करने के लिए नहीं रखा गया था तब चार्ल्स ने अपने खुद के आविष्कार करना प्रारंभ कर दिया था । 1819 को चार्ल्स बैबेज ने अपनी गणना से अपना पहला गणना इंजन बनाने का काम प्रारंभ किया था और उनकी मेहनत एवं लगन से यह गणना इंजन 1822 को बन के तैयार हो गया था ।

जब मशीन का गणितीय सिद्धांत पूरा हो जाता है तब इस मशीन को अंतर इंजन कहा जाता है और इस मशीन का अंतर इंजन नाम चार्ल्स बैबेज ने ही दिया था । चार्ल्स बैबेज ने अपने कई साथियों के साथ मिलकर रॉयल एनालिटिकल एवं घोस्ट क्लब सोसाइटी का भी गठन किया था । इसके बाद 1820 में एस्ट्रोनॉमीकल सोसायटी भी चार्ल्स बैबेज ने बनाई थी । चार्ल्स ने अविष्कार करना बंद नहीं किया था । इसके बाद वह अपना दिमाग कई तरह की मशीन बनाने में लगाते थे और 1822 को चार्ल्स बैबेज ने पहले कंप्यूटर का आविष्कार किया था ।


आविष्कार

चार्ल्स ने जब एनालिटिकल इंजन का आविष्कार किया था तब गणितीय गणना करने में बहुत आसानी हुई थी क्योंकि यह इंजन गणितीय गणना करने में बहुत सक्षम था । यह मशीन बहुत ही बड़ी मशीन थी । इस मशीन को बनाने में बहुत अधिक खर्चा आया था । चार्ल्स बैबेज को यह मशीन बनाने के लिए ब्रिटिश शासन ने पैसेे दिए थे । यह मशीन बहुत ही भारी थी । इस मशीन का साइज एक घर के बराबर था ।

इस मशीन का इंजन भाप से चलता था । इस मशीन में क्रैंक , शाफ़्ट लगी थी । इसके बाद चार्ल्स बैबेज में कई और मशीनें भी बनाई थी । जिनमें से एक और मशीन थी जिसका नाम डिफरेंशियल इंजन । इस मशीन का नाम चार्ल्स बैबेज ने ही डिफरेंशियल इंजन रखा था । इसी मशीन के कारण ही आधुनिक कंप्यूटर का निर्माण हुआ था ।

Conclusion:-

Never Forever, Give Up..!!!  


राजीव गाँधी

 

राजीव गाँधी


राजीव गाँधी की जीवनी


राजीव गाँधी (अंग्रेज़ी:Rajiv Gandhi, जन्म: 20 अगस्त, 1944 - मृत्यु: 21 मई, 1991) भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के पुत्र और भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पौत्र और भारत के नौवें प्रधानमंत्री थे। इनका पूरा नाम राजीव रत्न गांधी था। राजीव गांधी भारत की कांग्रेस (इ) पार्टी के अग्रणी महासचिव (1981 से) थे और अपनी माँ की हत्या के बाद भारत के प्रधानमंत्री (1984-1989) बने। 40 साल की उम्र में देश के सबसे युवा और नौवें प्रधानमंत्री होने का गौरव हासिल करने वाले राजीव गांधी आधुनिक भारत के शिल्पकार कहे जा सकते हैं। यह पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने देश में तकनीक के प्रयोग को प्राथमिकता देकर कंप्यूटर के व्यापक प्रयोग पर जोर डाला। भारत में कंप्यूटर को स्थापित करने के लिए उन्हें कई विरोधों और आरोपों को भी झेलना पड़ा, लेकिन अब वह देश की ताकत बन चुके कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं। राजीव गांधी देश के युवाओं में काफ़ी लोकप्रिय नेता थे। उनका भाषण सुनने के लिए लोग काफ़ी इंतज़ार भी करते थे। राजीव देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री थे। उन्‍होंने अपने प्रधानमंत्रित्‍व काल में कई ऐसे फैसले लिए जिसका असर देश के विकास पर देखने को मिला।  


जीवन परिचय :

राजीव गाँधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को बंबई (वर्तमान मुंबई), भारत में हुआ था। कैम्ब्रिज में पढ़ाई के दौरान राजीव गांधी की मुलाकात एंटोनिया मैनो से हुई, विवाहोपरांत जिनका नाम बदलकर सोनिया गांधी रखा गया। राजीव गाँधी के दो सन्तानें है, पुत्र राहुल गाँधी और पुत्री प्रियंका गाँधी। राजीव तथा उनके छोटे भाई संजय गाँधी (1946-1980) की शिक्षा-दीक्षा देहरादून के प्रतिष्ठित दून स्कूल में हुई थी। इसके बाद राजीव गांधी ने लंदन के इंपीरियल कॉलेज में दाख़िला लिया तथा केंब्रिज विश्वविद्यालय (1965) से इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम पूरा किया, भारत लौटने पर उन्होंने व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस प्राप्त किया और 1968 से इंडियन एयरलाइन्स में काम करने लगे।  





राजनीतिक सफ़र :

राजीव गांधी ने अपनी राजनीतिक आरुचि के बाद भी मां इंदिरा गाँधी के आदेश पर राजनीति जीवन शुरू किया। छोटे भाई संजय के स्थान पर 1981 में अमेठी से पहला चुनाव जीता और लोकसभा में पहुंचे। जब तक उनके भाई जीवित थे, राजीव राजनीति से बाहर ही रहे, लेकिन एक शक्तिशाली राजनीति व्यक्तित्व के धनी संजय की 23 जून, 1980 को एक वायुयान दुर्घटना में मृत्यु हो जाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी राजीव को राजनीतिक जीवन में ले आईं। जून 1981 में वह लोकसभा उपचुनाव में निर्वाचित हुए और इसी महीने युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए। राजनीतिक पृष्ठभूमि होने के बावजूद राजीव गांधी ने कभी भी राजनीति में रुचि नहीं ली। भारतीय राजनीति और शासन व्यवस्था में राजीव गांधी का प्रवेश केवल हालातों की ही देन था। दिसंबर 1984 के चुनावों में कांग्रेस को जबरदस्त बहुमत हासिल हुआ। इस जीत का नेतृत्व भी राजीव गांधी ने ही किया था। अपने शासनकाल में उन्होंने प्रशासनिक सेवाओं और नौकरशाही में सुधार लाने के लिए कई कदम उठाए। कश्मीर और पंजाब में चल रहे अलगाववादी आंदोलनकारियों को हतोत्साहित करने के लिए राजीव गांधी ने कड़े प्रयत्‍‌न किए। भारत में ग़रीबी के स्तर में कमी लाने और ग़रीबों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए 1 अप्रैल 1989 को राजीव गांधी ने जवाहर रोजगार गारंटी योजना को लागू किया जिसके अंतर्गत इंदिरा आवास योजना और दस लाख कुआं योजना जैसे कई कार्यक्रमों की शुरुआत की।[1]  


असाधारण व्यक्तित्व :

कोई व्यक्ति मानसिक रूप से कितना सुदृढ़ हो सकता है, इसकी मिसाल राजीव गाँधी थे। पहले छोटे भाई की मृत्यु और चार वर्षों बाद मॉं की नृशंस हत्या, इस सब के बाद भी उनके कदम डगमगाए नहीं और वे और शक्ति के साथ भारत निर्माण की मंजिल की ओर बढ़ते गए। इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद लोकसभा में कांग्रेस का पूर्ण बहुमत था, राजीव गांधी लोकसभा के निर्वाचित सदस्य थे, फिर भी राजनीतिक शुचिता का परिचय देते हुए, उन्होंने पुनः लोकसभा में चुनाव समय पूर्व करवाए ताकि कोई यह अंगुली न उठा सके कि जनता ने इंदिरा जी को देखकर कांग्रेस को बहुमत दिया था, राजीव को नहीं। और राजीव गांधी के नेतृत्व में भारत के लोकतंत्र में इतिहास में कांग्रेस ने 542 में से 411 सीटें जीतकर एक नया रिकार्ड बनाया। राजीव गांधी के गद्दी संभालने के समय उन्हें आतंकवाद से जलता झुलसता भारत मिला था। उत्तरी भाग में पंजाब तो उत्तरपूर्व में असम जैसे राज्य के आम नागरिक आतंकवादी और आतंकी घटनाओं से संघर्ष कर रहे थे और यह राजीव गांधी के लिए एक बड़ी पीड़ा का कारण था। उन्होंने पंजाब में आतंकवाद के हल करने की दिशा में अग्रसर होते हुए संत हरचरण सिंह लोंगोवाल से आग्रह किया कि ऐसा कुछ सार्थक किया जाए कि जिसके परिणामस्वरूप पंजाब की जनता को आतंक की आग से बचाया जा सके और इसकी परिणिति के रूप में राजीव-लोंगोवाल समझौता सामने आया जिसका त्वरित प्रभाव यह रहा कि पंजाब के लोगों ने पहली बार मानसिक रूप से यह स्वीकार कर लिया कि पंजाब से आतंकवाद खत्म हो सकता है, और पंजाब के युवा पुनः देश के मुख्य धारा में सम्मिलित हो सकते हैं। यद्यपि संत लोंगोवाल के निधन से समझौते के परिणाम प्राप्त होने में समय जरूर लगा पर इस मानसिक दृढ़ता के बल पर ही पंजाब के लोगों ने धीरे-धीरे आतंकवाद पर विजय प्राप्त करी और आज पंजाब में सब कुछ सामान्य है।[2]  


प्रधानमंत्री के रूप में :

31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश की डांवाडोल होती राजनीतिक परिस्थितियों को संभालने के लिए उन्हें प्रधानमंत्री बनाया गया। उस समय कई लोगों ने उन्हें नौसिखिया भी कहा लेकिन जिस तरह से उन्होंने यह जिम्मेदारी निभाई उससे सभी अचंभित रह गए। राजीव को सौम्य व्यक्ति माना जाता था। जो पार्टी के अन्य नेताओं से विचार-विमर्श करते थे और जल्दबाज़ी में निर्णय नहीं लेते थे। जब उनकी माँ की हत्या हुई, तो राजीव को उसी दिन प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई और उन्हें कुछ दिन बाद कांग्रेस (इं) पार्टी का नेता चुन लिया गया। उनका शासनकाल कई आरोपों से भी घिरा रहा जिसमें बोफोर्स घोटाला सबसे गंभीर था। इसके अलावा उन पर कोई ऐसा दाग़ नहीं था जिसकी वजह से उनकी निंदा हो। पाक दामन होने की वजह से ही लोगों के बीच राजीव गांधी की अच्छी पकड़ थी। श्रीलंका में चल रहे लिट्टे और सिंघलियों के बीच युद्ध को शांत करने के लिए राजीव गांधी ने भारतीय सेना को श्रीलंका में तैनात कर दिया। जिसका प्रतिकार लिट्टे ने तमिलनाडु में चुनावी प्रचार के दौरान राजीव गांधी पर आत्मघाती हमला करवा कर लिया। 21 मई, 1991 को सुबह 10 बजे के क़रीब एक महिला राजीव गांधी से मिलने के लिए स्टेज तक गई और उनके पांव छूने के लिए जैसे ही झुकी उसके शरीर में लगा आरडीएक्स फट गया। इस हमले में राजीव गांधी की मौत हो गई। देश में राजीव गांधी की मौत के बाद बहुत बड़ा रोष देखने को मिला।राजनीतिक सफ़र और पद :दिनांक / वर्ष पद1981 लोकसभा (सातवीं) के लिए निर्वाचित1984 लोकसभा (आठवीं) के लिए पुन: निर्वाचित19 अक्टूबर, 1984 से 2 दिसम्बर, 1984 तक प्रधानमंत्री एवं अन्य सभी मंत्रालय विभाग जो कि अन्य किसी मंत्री को आंवटित किए गए।31 दिसम्बर, 1984 से 14 जनवरी, 1985 वाणिज्य और आपूर्ति, विदेश, उद्योग व कम्पनी मामले, विज्ञान व प्रौद्योगिकी, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, इलैक्ट्रानिक्स, महासागर, विकास, कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार, युवा मामले एवं खेल, संस्कृति, पर्यटन एवं नागर विमानन मंत्रालय का भी पदभार सम्भाला।31 दिसम्बर, 1984 से 20 अक्टूबर, 1986 पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के भी प्रभारी।25 दिसम्बर, 1985 से 24 जनवरी, 1987 रक्षा मंत्रालय के भी प्रभारी।4 जून, 1986 से 24 जून, 1986 परिवहन मंत्रालय के भी प्रभारी।24 जनवरी, 1987 से 25 जुलाई, 1987 वित्त मंत्रालय के भी प्रभारी।4 मई, 1987 से 25 जुलाई, 1987 कार्याक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के भी प्रभारी।15 जुलाई, 1987 से 28 जुलाई, 1987 पर्यटन मंत्रालय के भी प्रभारी।25 जुलाई, 1987 से 26 जून, 1988 विदेश मंत्रालय का भी कार्यभार सम्भाला।22 अगस्त, 1987 से 10 नवम्बर, 1987 जल संसाधन मंत्रालय का कार्यभार भी सम्भाला।मई, 1989 से जुलाई, 1989 संचार मंत्रालय का भी कार्यभार सम्भाला।1989 लोक सभा (नौवीं) के लिए तीसरी बार निर्वाचित।18 दिसम्बर, 1989 से 24 दिसम्बर, 1990 लोक सभा (नौवीं) में विपक्ष के नेता।24 जनवरी, 1990 सदस्य, सामान्य प्रयोजन समिति।1991 लोक सभा (दसवीं) के लिए चौथी बार निर्वाचित।  


योगदान:

राजीव गांधी अपनी इच्छा के विपरीत राजनीति में आए थे। वह खुद राजनीति को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे लेकिन यह विडंबना ही है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज्यादा आलोचना झेलनी पड़ी। उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल और शुरुआत की जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल है। राजीव ने कई साहसिक कदम उठाए जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिजोरम समझौता आदि शामिल है।[3]

 

अलगाववादी आन्दोलन:

दिसम्बर 1984 के आम चुनाव में उन्होंने पार्टी की ज़बरदस्त जीत का नेतृत्व किया और उनके प्रशासन ने सरकारी नौकरशाही में सुधार लाने तथा देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए ज़ोरदार क़दम उठाए। लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आन्दोलन को हतोत्साहित करने की राजीव की कोशिश का उल्टा असर हुआ तथा कई वित्तीय साज़िशों में उनकी सरकार के उलझने के बाद उनका नेतृत्व लगातार अप्रभावी होता गया। 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस (इं) पार्टी के नेता पद पर बने रहे। आगामी संसदीय चुनाव के लिए तमिलनाडु में चुनाव प्रचार के दौरान एक आत्मघाती महिला के बम विस्फोट में उनकी मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि यह महिला तमिल अलगाववादियों से संबद्ध थी।

 

निधन :

अपने राजनीतिक फैसलों से कट्टरपंथियों को नाराज कर चुके राजीव पर श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक्त हमला किया गया लेकिन वह बाल-बाल बच गए थे पर 1991 में ऐसा नहीं हो सका। 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर में एक आत्मघाती हमले में वह मारे गए। उनके साथ 17 और लोगों की जान गई। राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जिसे सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया।

Conclusion:-

Never Forever, Give Up..!!!  


जमशेदजी टाटा

 

Jamsetji Tata Success Story


परिचय


जमशेदजी टाटा भारत के प्रसिद्ध उद्योगपति तथा औद्योगिक घराने टाटा समूह के संस्थापक थे। भारतीय औद्योगिक क्षेत्र में जमशेदजी ने जो योगदान दिया वह अति असाधारण और बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। जब सिर्फ यूरोपीय, विशेष तौर पर अंग्रेज़, ही उद्योग स्थापित करने में कुशल समझे जाते थे, जमशेदजी ने भारत में औद्योगिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया था। टाटा साम्राज्य के संस्थापक जमशेदजी द्वारा किए गये कार्य आज भी लोगों प्रोत्साहित करते हैं। उनके अन्दर भविष्य को भाँपने की अद्भुत क्षमता थी जिसके बल पर उन्होंने एक औद्योगिक भारत का सपना देखा था। उद्योगों के साथ-साथ उन्होंने विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा के लिए बेहतरीन सुविधाएँ उपलब्ध करायीं।


प्रारंभिक जीवन

जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा का जन्म 3 मार्च 1839 में दक्षिणी गुजरात के नवसारी में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम नुसीरवानजी तथा माता का नाम जीवनबाई टाटा था। उनके पिता अपने ख़ानदान में अपना व्यवसाय करने वाले पहले व्यक्ति थे। मात्र चौदह वर्ष की आयु में ही जमशेदजी अपने पिता के साथ बंबई आ गए और व्यवसाय में क़दम रखा। छोटी उम्र में ही उन्होंने अपने पिता का साथ देना शुरू कर दिया था। जब वे सत्रह साल के थे तब उन्होंने मुंबई के ‘एलफ़िंसटन कॉलेज’, में प्रवेश ले लिया और दो वर्ष बाद सन 1858 में ‘ग्रीन स्कॉलर’ (स्नातक स्तर की डिग्री) के रूप में उत्तीर्ण हुए और पिता के व्यवसाय में पूरी तरह लग गए। इसके पश्चात इनका विवाह हीरा बाई दबू के साथ करा दिया गया। व्यापार के सम्बन्ध में जमशेदजी ने इंग्लैंड, अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों की यात्राएं की जिससे उनके व्यापार सम्बन्धी ज्ञान और सूझ-बूझ में बृद्धि हुई। इन यात्राओं से उनको यह अनुभव हो गया था कि ब्रिटिश आधिपत्य वाले कपड़ा उद्योग में भारतीय कंपनियां भी सफल हो सकती हैं।



उद्योग में प्रवेश

29 साल की अवस्था तक उन्होंने अपने पिता की कंपनी में कार्य किया फिर उसके बाद सन 1868 में 21 हज़ार की पूँजी लगाकर एक व्यापारिक प्रतिष्ठान स्थापित किया। सन 1869 में उन्होने एक दिवालिया तेल मिल ख़रीदा और उसे एक कॉटन मिल में तब्दील कर उसका नाम एलेक्जेंडर मिल रख दिया! लगभग दो साल बाद जमशेदजी ने इस मिल को ठीक-ठाक मुनाफे के साथ बेच दिया और इन्ही रुपयों से उन्होंने सन 1874 में नागपुर में एक कॉटन मिल स्थापित किया। उन्होंने इस मिल का नाम बाद में ‘इम्प्रेस्स मिल’ कर दिया जब महारानी विक्टोरिया को ‘भारत की रानी’ का खिताब दिया गया। जमशेदजी एक ऐसे भविष्य-द्रष्टया थे जिन्होंने न सिर्फ देश में औद्योगिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया बल्कि अपने कारखाने में काम करने वाले श्रमिकों के कल्याण का भी बहुत ध्यान रखा। श्रमिकों और मजदूरों के कल्याण के मामले में वे अपने समय से कहीँ आगे थे। वे सफलता को कभी केवल अपनी जागीर नही समझते थे, बल्कि उनके लिए सफलता का मतलब उनकी भलाई भी थी जो उनके लिए काम करते थे। दादाभाई नौरोजी और फिरोजशाह मेहता जैसे अनेक राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी नेताओं से उनके नजदीकी संबंध थे और दोनों पक्षों ने अपनी सोच और कार्यों से एक दूसरे को बहुत प्रभावित किया था। वे मानते थे कि आर्थिक स्वतंत्रता ही राजनीतिक स्वतंत्रता का आधार है। जमशेद जी के जीवन के बड़े लक्ष्यों में थे – एक स्टील कंपनी खोलना, एक विश्व प्रसिद्ध अध्ययन केंद्र स्थापित करना, एक अनूठा होटल खोलना और एक जलविद्युत परियोजना लगाना। हालाँकि उनके जीवन काल में इनमें से सिर्फ एक ही सपना पूरा हो सका – होटल ताज महल का सपना। बाकी की परियोजनाओं को उनकी आने वाली पीढ़ी ने पूरा किया। होटल ताज महल दिसंबर 1903 में 4,21,00,000 रुपये के भारी खर्च से तैयार हुआ। उस समय यह भारत का एकमात्र होटल था जहाँ बिजली की व्यवस्था थी। इस होटल की स्थापना उनके राष्ट्रवादी सोच के कारण हुई। भारत में उन दिनों भारतीयों को बेहतरीन यूरोपिय होटलों में घुसने नही दिया जाता था – ताजमहल होटल का निर्माण कर उन्होंने इस दमनकारी नीति का करारा जवाब दिया था।


देश के औद्योगिक विकास में योगदान

देश के औद्योगिक क्षेत्र में जमशेदजी का असाधारण योगदान है। इन्होंने भारत में औद्योगिक विकास की नीवं उस समय डाली जब देश गुलामी की जंजीरों से जकड़ा था और उद्योग-धंधे स्थापित करने में अंग्रेज ही कुशल समझे जाते थे। भारत के औद्योगीकरण के लिए उन्होंने इस्पात कारखानों की स्थापना की महत्वपूर्ण योजना बनाई। उनकी अन्य बड़ी योजनाओं में पश्चिमी घाटों के तीव्र धाराप्रपातों से बिजली उत्पन्न करने की योजना (जिसकी नींव 8 फ़रवरी 1911 को रखी गई) भी शामिल है। इन विशाल योजनाओं की परिकल्पना के साथ-साथ उन्होंने बंबई में शानदार ताजमहल होटल खड़ा किया जो उनके राष्ट्रवाद को दर्शाता है। एक सफल उद्योगपति और व्यवसायी होने के साथ-साथ जमशेदजी बहुत ही उदार प्रवित्ति के व्यक्ति थे इसलिए उन्होंने अपने मिलों और उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों और कामगारों के लिए कई कल्याणकारी नीतियाँ भी लागू की। इसी उद्देश्य से उन्होंने उनके लिए पुस्तकालयों, पार्कों, आदि की व्यवस्था के साथ-साथ मुफ्त दवा आदि की सुविधा भी उन्हें प्रदान की।


ताज होटल का निर्माण

भारत का प्रसिद्ध ताज होटल केवल मुंबई में ही नही बल्कि पुरे विश्व में प्रसिद्ध है। ताज होटल के बनने के पीछे एक बहुत ही रोचक कहानी छुपी हुई है। बात उन दिनों की है जब भारत आजाद नही हुआ था और सिनेमा घरो की शुरुआत हुई थी और पहली फिल्म मुंबई में लगी हुई थी, जिस होटल में फिल्मे लगी हुई थी उस होटल का नाम वाटसन होटल था। वहां केवल ब्रिटिशो को ही आमंत्रित किया गया था और उस होटल के बाहर एक बोर्ड भी लगा हुआ था जिसमे लिखा हुआ था “भारतीय और कुत्ते अंदर नही आ सकते है”। चूकी भारत में फिल्मे पहली बार लगी थी इसीलिए जमशेद जी भी देखना चाहते थे लेकिन उनको प्रवेश नही मिला सका। शायद ये बात का जमशेद जी को बहुत बुरा लगा और उन्होंने दो साल के अन्दर ही वाटसन होटल को की सुन्दरता को पीछे छोड़ते हुए 1903 में ताज होटल का निर्माण करवा दिया। ताज होटल के बाहर एक बोर्ड लगवाया उसमे लिखा था “अंग्रेज और बिल्लियाँ अंदर नही जा सकते”। ये इमारत बिजली की रोशनी वाली पहली इमारत थी। आज भी ताज होटल की तुलना संसार के सबसे सर्वश्रेष्ट होटलों में किया जाता है।


मृत्यु

जमशेद जी ने भारत में औधोगिक विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया है और इन्होने अपने जीवन में मेहनत और अपनी क़ाबलियत से बहुत कुछ हासिल किया। जमशेद जी अपनी आशाओं के प्रतिकूल 65 साल की अवस्था में 19 मई सन 1904 में इनका देहान्त हो गया।

Conclusion:-

हमेशा उम्मीद से ज्यादा दीजिये।  


ब्रूस ली

 

Bruce Lee Success Story


परिचय


जब भी मार्शल आर्ट्स की बात होती है, सबसे पहले ब्रूस ली का नाम लिया जाता है। यूएस में जन्में ब्रूस ली विश्व के सबसे बेहतरीन मार्शल आर्टिस्ट में से एक थे। इसके साथ ही वे एक प्रोड्यूसर, एक्टर, डायरेक्टर, स्क्रिप्ट राइटर,और फिलोसफर भी थे। ब्रूस ली ने बेहद कम उम्र में ही चाइल्ड आर्टिस्ट के रुप में फिल्मों में अपनी जगह बना ली थी। कई लोग उन्हें 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली मार्शल कलाकार और एक सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में मानते हैं।


ब्रूस ली का शुरुआती जीवन

ब्रूस ली 27 नवंबर साल 1940 में यूएस के सेन फ्रांसिस्को के चाइनाटाउन में ली जुन-फेन के रुप में एक संपन्न और आर्थिक रुप से मजबूत परिवार में जन्में थे। उनके पिता का नाम ली होई छुंए था, वो होंग कोंग में ओपेरा सिंगर के तौर पर काम करते थे और फिल्म बैकग्राउंड से जुड़े हुए थे। जबकि उनकी माता का नाम ग्रेस था। जब वे बेहद छोटे थे, तभी उनका परिवार होंग-कोंग में शिफ्ट हो गया था। ब्रूस ली के अलावा उनके चार भाई और बहन भी थे। ब्रूस ली की शुरु से ही दिलचस्पी मार्शल आर्टस को सीखने में थी। वहीं इसके लिए उनके पिता ने भी उन्हें काफी प्रोत्साहित किया था। महज 13 साल की उम्र में ही ब्रूस ली ने मास्टर यिप मैन से कुंगफू की ट्रेनिंग लेना शुरु कर दिया था।



पढ़ाई-लिखाई

ब्रूस ली ने अपनी शुरुआती पढ़ाई ”ला सल्ले कॉलेज से” की थी। इस स्कूल में उनका खराब प्रदर्शन के चलते उन्हें वहां से निकाल कर ”सेंट फ्रांसिस जेवियर्स कॉलेज” में डाल दिया गया था। पढ़ाई के दौरान भी मार्शल आर्ट्स में रुझान होने की वजह से वे स्ट्रीट फाइ्टस और गैंग रिवलरीस में शामिल होते रहते थे। हालांकि, इसकी वजह से उनके माता-पिता को उनकी काफी टेंशन रहती थी, क्योंकि वे ली को एक हेल्थी और अच्छा माहौल देना चाहते थे, इसके लिए वे होंग कोंग छोड़कर सीएटल चले गए और जहां ब्रूस ली ने एडिसन टेक्नीक स्कूल में अपनी आगे की पढ़ाई की। इस दौरान उन्होंने एक रेस्टोरेंट में लिव-इन वेटर के रुप में भी काम किया और फिर 1961 में उन्होंने वांशिंगटन यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया। हालांकि बाद में मार्शल आर्टस में कैरियर बनाने के लिए उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया था।


फिल्मों में ब्रूस ली

जब एक बच्चा सही से न तो बोल पाता है और न ही चल पाता है उस समय से ब्रूस ली फिल्मों में अपना करियर बनाने की शुरुआत कर दी थी। जी हां जब ब्रूस ली महज 3 महीने के थे, तब उन्होंने ”गोल्डन गेट गर्ल” की फिल्म में काम किया। इसके बाद वे चाइल्ड आर्टिस्ट के रुप में कई फिल्मों में काम करते रहे और अपनी क्यूट अदाओं से दर्शकों के दिल में उन्होंने अपने लिए एक अलग जगह बना ली। इस तरह वे अपने एक्टिंग प्रतिभा को और अधिक निखारते चले गए। उन्होंने 6 साल की उम्र तक करीब 20 फिल्मों में चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर काम कर लिया था, जो कि अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी। इसके अलावा उन्होंने खुद को एक बेहतर डांसर के रुप में भी पेश दिया।


मार्शल आर्टिस्ट

कुछ सालों तक फिल्मों में एक्टिंग करने के बाद उन्होंने एक्टिंग को छोड़ दिया और मार्शल आर्ट्स में अपना करियर बनाने का फैसला लिया। उन्होंने मार्शल आर्ट्स में अपने कैरियर की शुरुआत कुंग-फु के ट्रेनर के रुप में की थी और फिर उन्होंने एक मार्शल आर्ट्स स्कूल “ली जुन फेन गुंग फु इंस्टीट्यूट” खोला। इसके बाद उन्होंने मशहूर मार्शल आर्टस ट्रेनर जेम्स ली के साथ मिलकर मार्शल आर्टस स्टूडियो भी खोला था। साल 1964 में जब वे महज 24 साल के थे उस दौरान उन्होंने लॉन्ग बीच अंतर्राष्ट्रीय कराटे चैंपियनशिप में भागीदारी निभाई और अपने अद्भभुत प्रदर्शन से खूब तारीफें बटोंरी, इसके बाद वे एक अच्छे मार्शल आर्टिस्ट के रुप में पॉपुलर हो गए थे। साल1967 में ब्रूस ली ने अपनी मार्शल आर्ट्स की अद्भुत प्रतिभा से एक बार फिर से सुर्खियां बटोरीं और इससे बाद उन्होंने कई मैच जीते। उनके अद्भुत और आसाधारण प्रदर्शन के चलते वे हॉलीवुड फिल्म डायरेक्टर्स की नजरों में चढ़ गए और फिर उन्हें कई टीवी सीरीज और फिल्मों में काम करने का ऑफर मिलने लगे। ब्रूस ली ने अपनी पहली टीवी सीरीज ‘दी ग्रीन होर्नेट’ में अहम किरदार निभाया था। इस टीवी शो का पहला सीजन 1967 से 1967 तक चला था। इसके बाद ब्रूस ली ने ”आयरनसाइड”, ”ब्लोनडाई”, ”हियर कम्स दी ब्राइड्स” में बतौर गेस्ट अपीरयंस के तौर पर अभिनय किया था। हालांकि, एक्टिंग के दौरान वे मार्शल आर्ट्स में भी ध्यान देते थे और कई नई-नई तकनीक खोजते रहते थे। इसके बाद ब्रूस ली ने साल 1972 में फिल्म ‘वे ऑफ़ ड्रैगन’ में एक एक्टर, डायरेक्टर, राइटर और कोरियोग्राफर के रुप में काम किया। साल 1973 में ब्रूस ली ने ‘इंटर डी ड्रैगन’ फिल्म में शानदार अभिनय किया, यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त हिट हुई और दुनिया की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी। इस तरह उन्होनें अपने अल्प जीवन काल में कई फिल्में और टीवी शो किए एवं एक बेहतरीन मार्शल आर्टिस्ट के रुप में खुद की पहचान पूरे विश्व भर में बनाई। आज भी लोग उनके ताउक्वांडो स्टाइल का लोहा मानते हैं और उन्हें आदर्श मानकर मार्शल आर्टस की कला सीखते हैं।


छोटी सी उम्र में ब्रूस ली दुनिया को कह गए अलविदा

महान मार्शल आर्टिस्ट और सुपरस्टार ब्रूस ली की अचानक मौत ने कई लोगों को आश्चर्य में डाल दिया। दरअसल, 20 जुलाई, 1973 को ब्रूस ली की अचानक मौत हो गई। ब्रूस ली की मौत की वजह से उनके दिमाग में सूजन आने के कारण बताई जाती है। ऐसा कहा जाता है कि सिर दर्द होने पर ब्रूस ली ने पैन किलर खा ली थी, जिसके रिएक्शन की वजह से उनके दिमाग में सूजन आ गई और 32 साल की छोटी सी उम्र में उनकी मौत हो गई। ब्रूस ली की मौत के बाद उनके शव को सीएटल के लेकव्यू कब्रिस्तान में दफना दिया गया था। जबकि उनकी मौत के बाद उनके घर को एक पर्यटक स्थल के रुप में तब्दील कर दिया गया।


ब्रूस ली के जीवन से जुड़े आश्चर्यजनक तथ्य

ब्रसू ली होंगकोंग के सबसे प्रसिद्ध चाइल्ड आर्टिस्ट में से एक थे। वे 18 साल की उम्र तक वे 20 फिल्में कर चुके थे।
ब्रूस ली ने बदमाशों से लड़ने के लिए मार्शल आर्टस की कला सीखना शुरु किया था।
ब्रूस ली की जीवन की आखिरी फिल्म ”गेम्स ऑफ डेथ” उनके मरणोपरांत रिलीज हुई थी, इस फिल्म में उनका वास्तविक अंतिम संस्कार का सीन फिल्माया गया था, जिसमें उन्हें ताबूत के अंदर दिखाया गया है।
ब्रूस ली मार्शल आर्टिस्ट, एक्टर, डायरेक्टर, राइटर होने के साथ-साथ एक बेहद खतरनाक ड्राइवर भी थे। इसके साथ वे इतने तेज थे कि उनकी वीडियो को स्लो मोशन में देखनी पड़ती थी।
ब्रूस ली अपनी उंगली की ताकत से टिन से बनी कैन में छेद कर देते थे।
ब्रूस ली एक दिन में 5 हजार पंच मार कर प्रैक्टिस करते थे और उन्होंने अपने शरीर से पसीने निकालने वाली ग्रंथि को निकलवा दिया था।
ब्रूस ली अपने पिता को अपना आइडियल मानते थे उन्होंने कहा था कि उनके पिता उनके सबसे पहले मार्शल आर्ट्स के गुरु थे।


ब्रूस की जीवन की महान उपलब्धियां और पुरस्कार

वे दुनिया के सबसे बेहतरीन मार्शल आर्टिस्ट थे। साल 2013 में मरणोपरांत उन्हें एशियाई अवॉर्ड्स में प्रतिष्ठित फाउंडर अवॉडर्स से नवाजा गया था।
ब्रूस ली को मरणोपरांत टाइम मैग्जीन द्धारा 20वीं सदी के 100 सबसे ज्यादा प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में शुमार किया गया था।
साल 2013 में मार्शल आर्ट्स के क्षेत्र में ब्रूस ली के उल्लेखनीय योगदानों के चलते चीन के गुंगज्होई में 7 फुट लंबी उनकी विशाल प्रतिमा बनाई गई।
ब्रूस ली होंग-कोंग के चा-चा डांस के भी चैंपियन रह चुके हैं।
मार्शल आर्टिस्ट होने के साथ-साथ ब्रूस ली एक बेहतरीन स्केच आर्टिस्ट भी थे।


ब्रूस ली के अनमोल वचन

हमेशा रियल रहो, खुद को पेश करो, खुद पर विश्वास रखो, बाहर जाकर किसी अन्य सफल व्यक्तित्व को मत तलाशो और इसकी नक़ल मत करो।

एक बुद्धिमान शख्स एक मुर्ख के सवाल से बहुत कुछ सीख सकता है, लेकिन एक मुर्ख एक बुद्धिमान के जवाब से कुछ भी नहीं सीख सकता है।

अगर आप वाकई में अपनी जिंदगी से प्यार करते हैं तो वक्त को बर्बाद न करें, क्योंकि वो वक्त ही है, जिससे जिंदगी बन सकती है।

किसी भी चीज पर अपना अधिकार करना दिमाग से शुरु होता है।

अगर आप किसी चीज के बारे में सोचने से काफी वक्त जाया तकते हैं, तो निश्चित ही आप उसे कभी नहीं कर पाएंगे।

Conclusion:-

असफलता से डरो मत —असफलता नहीं, बल्कि छोटा लक्ष्य बनाना अपराध है। महान प्रयसों में असफल होना भी शानदार होता है।