Monday, January 19, 2026

व्लादमीर पुतिन

 व्लादमीर पुतिन

परिचय

व्लादमीर पुतिन रुस के वर्तमान राष्ट्रपति है।पुतिन पहली बार 1999 मे रूस के प्रधानमंत्री बने। उसके बाद साल 2000 मे पहली बार राष्ट्रपति बने और 2008 तक राष्ट्रपति रहे। 2008 से 2012 तक फिर प्रधानमंत्री चुने गये। और 7 मई 2012 से अभी तक रूस के राष्ट्रपति है। पुतिन अपने देश के ही नहीं पूरी दुनिया सबसे ताकतवर नेता है।

पुतिन रूस पर अपना दबदबा बनाए रखने के लिए कभी राष्ट्पति बनते है तो कभी प्रधानमंत्री। रूस का मुख्य कार्यकारी नेता राष्ट्पति होता है। जैसा भारत मे प्रधानमंत्री होता है। लेकिन पुतिन दो दशक से रूस का नेतृत्व कर रहे है चाहे राष्ट्पति बनकर करें या प्रधानमंत्री बनकर करें।


व्लादिमीर पुतिन का प्रारम्भिक जीवन :-

व्लादमीर पुतिन का जन्म 7 अक्टूबर 1952 मे सेन्ट पीटर्सबर्ग, रूस मे हुआ था। उनके पिता का नाम स्पीरीदोनोविच पुतिन था , और माँ का नाम मरिया सेलोमोवा था। उनके तीन बच्चे थे जिसमे पुतिन तीसरे पुत्र थे। पुतिन दोनो बड़े भाई( विक्टर और अल्बर्ट ) का बचपन मे देहांत होगया था। पुतिन के पिता नेवी मे थे, और माँ फैक्टरी मे काम करती थी।

द्वितीय विश्व युद्ध मे पुतिन के पिता पनडुब्बी के हमलावर दस्ते मे थे। द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद पुतिन के पिता सेवा निवित्त होगए और लेनिनगार्द (आज का पीटर्सबर्ग) मे एक कारखाने मे काम करने लगे। पुतिन की शुरुआती शिक्षा सेंट पीटर्सबर्ग के लोकल स्कूल से प्राप्त की थी। पुतिन पढ़ने मे बहुत अच्छे थे और वह बचपन से ही गंभीर स्वाभाव के थे। उन्होंने बचपन से ही जुडो और सेम्बो की ट्रेनिंग शुरु कर दी थी। जुडो मे इन्हें ब्लैक बेल्ट मिला है।

उनके पिता चाहते थे पुतिन भी आर्मी मे जाये, पर उनकी माँ ऐसा नहीं चाहती थी। पुतिन अभी आगे पढ़ना चाहते थे, उनकी माँ भी चाहती थी पुतिन और पढ़े इसलिए उन्होंने लेनिनग्राद राजकीय विश्विविद्यालय मे एडमिशन लिया। और 1975 मे लॉ डिग्री हासिल की। 28 जुलाई 1983 मे पुतिन ने ल्यूडमिला शकरेबनेवा से सादी कर ली। इनकी दो बच्चिया है जिनके नाम मारिया पुतिन और एकातेरिना पुतिन है।



पुतिन ने केजीबी मे कैसे ज्वाइन किया:-

डिग्री हासिल करने के कुछ दिन बाद ही उन्होने केजीबी ज्वाइन कर ली। पुतिन का केजीबी ज्वाइन करने की कहानी भी फिल्म जैसी है पुतिन जब छोटे थे तब वह फिल्म देखना बहुत पसंद था। उन्हें जासूसी फिल्म देखने का बहुत शौक था। वह इन फिल्मों से इतने प्रभावित हुये की 16 साल की उम्र मे वह रूस की गुप्तचर संस्थान केजीबी के ऑफिस पहुंच गये।

वहां के अफसरों से उन्होंने बोला मुझे ज्वाइन करना है। केजीबी के अफसरों ने मजाक समझ कर उन्हें बोला बच्चे जब आप बड़े होजाए तब आना। तब तो पुतिन वापस चले गये, लेकिन इस बात को वह नहीं भुले। सात साल बाद जब उन्होंने 1975 मे अपना स्नातक पूरा किया उसके कुछ दिनों बाद ही उन्होंने केजीबी ज्वाइन कर ली। उन्होंने 16 साल तक केजीबी मे अधिकारी के रूप मे काम किया। जहाँ वह लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से 1991 मे सेवा निवित्त हुये।


पुतिन का प्रधानमंत्री के रूप मे पहला कार्यकाल :-

पुतिन ने 1996 मे राजनीती मे कदम रखा। बोरिस येल्तसिन रूस के तत्कालीन राष्ट्पति के साथ उनके प्रसासन मे शामिल होगए। और पहली बार प्रधानमंत्री बने।

येल्तसिन बहुत जय्दा करप्ट नेता थे, 1999 मे उनका बहुत जय्दा विरोध होने लगा। विरोध के कारण उन्होंने 1999 मे इस्तीफा दे दिया। उसके बाद उन्होंने अपना पद 31 दिसंबर 1999 मे पुतिन को दे दिया। पुतिन प्रधानमंत्री थे अब उन्हें प्रधानमंत्री के साथ कार्यवाहक राष्ट्पति भी बना दिया गया।


राष्ट्रपति के रूप पहला कार्यकाल :-

पुतिन ने साल 2000 मे अपना पहला राष्ट्पति चुनाव जीता, तब वह पहली बार पूर्ण कलिक राष्ट्पति बने। इस चुनाव मे पुतिन को 53% वोट मिले थे। पुतिन ने अपने पहले कार्यकाल मे बहतरीन काम किया रूस की गिरती अर्थ व्यवस्था और गिरती साख को पुनः ऊपर पहुंचाया। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस को कमजोर समझा जाने लगा था। लेकिन पुतिन ने पुनः रूस को बुलंदियों मे पहुंचाया।


पुतिन का राष्ट्रपति के रूप मे दूसरा कार्यकाल :-

जिससे रूस की जनता ने उन्हें फिर से 2004 मे राष्ट्रपति चुनाव जिताया। इस चुनाव मे तो पुतिन को पहले चुनाव से ज्यादा 72% वोट मिले थे। पुतिन ने अपने दूसरे कार्यकाल मे भी बेहतरीन काम किया। लेकिन रूस के संविधान के अनुसार कोई भी राष्ट्पति लगातार तीन बार राष्ट्पति नहीं बन सकता था। इसलिए उन्होंने 2008 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपने विस्वास पात्र सहायक दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्पति पद के लिए चुना।


पुतिन प्रधानमंत्री के रूप मे दूसरा कार्यकाल :-

पुतिन का सहायक होने के कारण दिमित्री मेदवेदेव को जनता का भारी समर्थन मिल रहा था। वह बड़ी आसानी से चुनाव जीत गये। और उन्होंने पुतिन को अपना प्रधानमंत्री चुना। पुतिन भले ही राष्ट्पति नहीं थे लेकिन सरकार मे उनकी ही चलती थी। दिमित्री मेदवेदेव के कार्यकाल के खत्म होने से पहले साल 2011 मे पुतिन के कहने पर मेदवेदेव ने रूस के संविधान मे कई बदलाव किये।

जिसके परिणाम स्वरुप रूस मे राष्ट्रपति के कार्यकाल चार साल से बढ़ाकर छः साल कर दिया गया। लेकिन इस तरह संविधान मे किये गये। सभी जानते थे पुतिन करवा रहे है और अगली बार फिर से राष्ट्रपति बनने के लिये वह यह सब कर रहे है। बदलाव से जनता के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। शहर-शहर मे इस बदलाव के विरोध मे प्रदर्शन किये गये। लेकिन पुतिन विरोध मे कोई बड़ा राजनेता खड़ा नहीं हो सका जिससे यह विरोध कुछ दिन मे ही खत्म होगया।


पुतिन का राष्ट्रपति के रूप मे तीसरा कर्यकाल :-

2012 मे पुतिन राष्ट्रपति पद के तीसरे चुनाव के लिये फिर खड़े हुये। और मार्च 2012 मे उन्होंने यह चुनाव जीत कर तीसरी बार राष्ट्रपति बने। लेकिन इस बार उनकी लोकप्रियता मे कमी आई और पिछली बार से कम 64% वोट प्राप्त हुये। अब वह 4 साल की जगह 6 साल तक राष्ट्रपति रह सकते थे। इस कार्यकाल मे उनपर कई घोटालों के आरोप लगे, और उन्हें दुनिया का सबसे अमीर नेता कहाँ जाने लगा, लेकिन पुतिन ने कभी यह बात नहीं स्वीकारा की उन्होंने घोटाले किये है।

इस बार पुतिन को अपने देश से ही नहीं दूसरे देशों से भी चुनौती मिल रही थी। सीरिया मे अमेरिका और रूस कोल्ड वॉर के बाद पहली बार सामने आगये थे। क्योंकी अमेरिका 'बशर अल असद' की सरकार गिरना चाहता था और रूस ऐसा नहीं होने देना चाहता था। अमेरिका रूस से तो सीधे नहीं भिड़ सकता था।

ऐसे मे अमेरिका सीरिया के विद्रोहीयों को हथियार और पैसे देने लगा तो रूस भी बशर अल असद की सरकार को बचाने के लिए सीरिया की आर्मी को पैसे और हथियार देने लगा। पुतिन की रड़नीति काम कर गई और अमेरिका बशर अल असद की सरकार नहीं गिरा पाया। इससे पुतिन की छवि पूरी दुनिया मे मजबूत हुई और रूस मे वह और भी अधिक माने जाने लगे।


पुतिन का राष्ट्रपति के रूप मे चौथा कार्यकाल :-

इस बात का अंदाजा तब लगा जब पुतिन 2018 मे के चुनाव मे खड़े थे। पुतिन अपने राष्ट्पति के चौथे कार्यकाल के लिये 2018 मे फिर चुनाव मे खड़े हुये। इस बार तो उनके सामने कोई नहीं टिक पाया और उन्होंने इतिहास बनाते हुये 81% मत के साथ चुनाव जीता। और पुतिन चौथी बार रूस के राष्ट्रपति बने। और वह 2020 मे भी रूस के राष्ट्पति है। और 2024 तक वह राष्ट्रपति रहने वाले है।

ऐसा नहीं है की रूस मे पुतिन ने सब अच्छा ही किया है। उनके साथ कई विवाद भी जुड़े है। उन्हें रूस का सबसे करप्ट नेता और दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति कहाँ जाता है। लेकिन कोई साबित नहीं कर पाया। कर भी कैसे पाता है कहाँ जाता है जो भी उनके वरोध मे खड़ा होता है उन्हें गायब कर दिया जाता है या फिर मार ही दिया जाता है। फिर भी रूस की जनता पुतिन को चुनती है क्योंकी उन्होंने रूस को जिन हालतों से निकाला है वह बहुत मुश्किल काम था।

पुतिन की अमीरी का अंदाजा आप उनकी लग्जरी लाइफ स्टाइल से लगा सकते है। पुतिन के पास एक या दो नहीं 43 ऐरोप्लेन , 5 सुपर यॉट, 15 हेलीकाप्टर, 83 कार (जिनमे से जय्दातर सुपर कार है), 20 पैलेसे है। एक पैलेस तो इनके पास ऐसा है जिसके सामने बड़े-बड़े होटल भी कही नहीं टिकते। हलाकि पुतिन बोलते है ऐसा कुछ नहीं है ये सब गलत है। मुझे फसाने के लिये मेरे विरोधी यह सब फैलाते है। पुतिन ने 2014 मे यह बताया की उनके पास सिर्फ 1 एकड़ जमीन है, 900 फिट का घर है, और 200 फिट का एक गरज है, जिसमे उनकी एक कार है। बांकी सब जो आप देखते है वह मुझे राष्ट्रपति के तौर पर मिला है।


 


नरेंद्र मोदी

 नरेंद्र मोदी

परिचय

मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं जिनका जन्म 'स्वतंत्र भारत' में हुआ था, यानी 15 अगस्त, 1947 के बाद। वे पहले भारतीय प्रधानमंत्री भी हैं, जिनकी माँ पद संभालने के समय जीवित थीं। उनके पास सर्वाधिक मार्जिन (लगभग 5.70 लाख वोट ) द्वारा लोकसभा सीट जीतने का रिकॉर्ड है।

नरेंद्र दामोदरदास मोदी भारत के 14वें प्रधानमंत्री हैं। जिन्होंने 2014 में और फिर 2019 में भारतीय जनता पार्टी की प्रभावशाली जीत का नेतृत्व किया। मोदी के बारे में एक दिलचस्प तथ्य यह है कि वह पहली बार विधायक के रूप में गुजरात के मुख्यमंत्री बने। इसी तरह वह पहली बार सांसद के रूप में सीधे भारत के प्रधानमंत्री बने। 2014 में बीजेपी की बहुमत से जीत के लिये मोदी को श्रेय दिया जाता है और यह साल 1984 के बाद पहली बार हुआ था।


नरेंद्र मोदी का शुरुआती जीवन

नरेन्द्र मोदी का जन्म 17 सितम्बर 1950 को वडनगर मेहसाणा जिले मे हुआ था । नरेंद्र मोदी के पिता का नाम दामोदरदास मूलचंद मोदी एवं माता का नाम हीराबेन मोदी है।

नरेंद्र मोदी के पिता एक साधारण तेली जाति के व्यक्ति थे। जिनकी 6 संताने थी जिनमें तीसरें नरेंद्र मोदी थे। नरेंद्र मोदी अपने पिता के साथ रेलवे स्टेशन पर चाय का स्टॉल लगाते थे। उन्हें पढ़ने का बहुत शौक था और उनके शिक्षक के अनुसार वे कुशल वक्ता थे।

वाद-विवाद में नरेंद्र मोदी को कोई पकड़ नहीं सकता था। मोदी जी ने वडनगर के एक स्कूल से पढ़ाई पूरी की थी और सन् 1980 में गुजरात के विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में ग्रेजुएशन किया। उस समय वो RSS के प्रचारक भी थे। नरेंद्र मोदी जी का बचपन बड़ी ही गरीबी में गुजरा। उनके पिता की चाय की दुकान थी और उनकी माँ दूसरों के घरों में बर्तन साफ किया करती थीं। दो वक्त का खाना भी बहुत मुश्किल से मिलता था। यह सब बाते मोदी ने अमेरिका मे फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग से बात करते वक्त खुद भी बताई थी यह बताते-बताते उनकी आंखे भर आई थी।

मोदी जी का बहुत छोटे एवं कच्चे घर में उनका बचपन बीता। उनका जीवन बहुत संघर्ष वाला था उन्होंने अपने बचपन में ही बहुत उतार चढ़ाव देखे थे।

नरेन्द्र मोदी बचपन से ही साधु-संतों से काफी प्रभावित हुआ करते थे। और वह स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानते थे । वे बचपन से ही संन्यासी बनना चाहते थे।

संन्यासी बनने के लिए मोदी स्कूल की पढ़ाई के बाद 1967 में 17 वर्ष की आयु मे घर छोड़ दिया था । इस दौरान वह पश्चिम बंगाल के रामकृष्ण आश्रम सहित कई जगहों पर घूमते रहे। और कई वर्ष हिमालय मे बिताये.

हिमालय से लौटने के बाद उन्होने ने अपने भाई के साथ मिलकर अहमदाबाद मे चाय की दुकान भी लगाईं। और कई महीनों तक वहाँ पर काम किया। उन्होंने हर कठिनाई को सहते हुए चाय बेची।

18 साल की उम्र में नरेन्द्र मोदी का विवाह उनकी मां ने बांसकाठा जिले के राजोसाना गांव में रहने वाली जसोदा बेन से कर दिया था। पर वह पारिवारिक बंधन मे बंध कर नही रहना चाहते थे इसलिए मोदी ने विवाह के कुछ दिन बाद दुबारा घर छोड़ दिया था।

और कुछ दिनों बाद नरेन्द्र मोदी में संघ के प्रचारक बन गए। नरेन्द्र मोदी अहमदाबाद संघ मुख्यालय में रहते थे तो वहां सारे छोटे काम करते जैसे साफ-सफाई, चाय बनाना,खाना बनाना और बुर्जुग नेताओं के कपड़े धोना शामिल है। आप इस बात से भारत के महान लोकतंत्र का अंदाजा लगा सकते है की कोई भी व्यक्ति चाहे जितना भी गरीब हो या किसी भी जाती का हो प्रधानमंत्री अथवा किसी भी उच्च स्थान पर पहुंच सकता है।



राजनैतिक जीवन

नरेंद्र मोदी का मुख्यमंत्री के रूप मे कार्यकाल:-

2001 में गुजरात में भयानक भूकंप आया और पूरे गुजरात में भारी विनाश हुआ. गुजरात सरकार के राहत कार्य से ना खुश होकर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने नरेन्द्र मोदी जी को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया. मोदी ने काफी कुशलता से राहत कार्य संभाला और गुजरात को फिर से मज़बूत किया। मोदी जी ने गुजरात को भारत का सबसे बेहतरीन राज्य बना दिया। उन्होंने गुजरात के हर गाँव तक बिजली पहुँचाई।

मोदी जब मुख्यमंत्री बने थे तब गुजरात मे पानी की बहुत कमी थी कई इलाकों मे सूखा पड़ता था। मोदी ने यह जल समस्या खत्म करने के लिए बहुत सराहनीय काम किया उन्होंने गुजरात की सभी नदियों को एक दूसरे से जोड़ दिया इससे यह हुआ की जो नदिया जल्दी सुख जाया करती थी उनमे साल भर पानी रहने लगा। देश मे पहली बार किसी राज्य की सभी नदियों को जोड़ा गया जिससे पूरे राज्य में पानी की कमी दूर हुई।

एशिया के सबसे बड़े सोलर पार्क का निर्माण गुजरात में हुआ। गुजरात के सभी गाँवों को इंटरनेट से जोड़ा गया और टूरिज़्म को भी बढ़ावा दिया गया। मोदी के कार्यकाल में गुजरात में बेरोज़गारी काफी कम हुई और महिलाओं की सुरक्षा में काफी मज़बूती आई। इन्ही कारणों की वजह से गुजरात की जनता ने मोदी को 2001 से 2014 तक चार बार लगातार अपना मुख्यमंत्री नियुक्त किया।


प्रधानमंत्री के रूप मे नरेन्द्र मोदी का कार्यकाल

पहला कार्यकाल (2014-2019)

21 मई 2014 मे नरेंद्र मोदी भारत के 14वें प्रधान मंत्री के रूप में चुने गए। मोदी ने 26 मई 2014 को भारत के प्रधान मंत्री के रूप में शपथ ली थी। वह ब्रिटिश साम्राज्य से भारत की आजादी के बाद पैदा हुए पहले प्रधान मंत्री बने। पहले कार्यकाल मे मोदी ने कई बड़े फैसले किए जिनकी बहुत चर्चा हुई जैसे नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, जी एस टी,

दूसरा कार्यकाल (2014--- )

23 मई 2019 को नरेंद्र मोदी एक बार फिर वाराणसी से सांसद चुने गये। उन्‍होंने लोकसभा चुनाव में वाराणसी सीट पर कांग्रेस के नेता अजय राय को हराया। इसी जीत के साथ उन्‍हें फिर से भारत का प्रधानमंत्री चुना गया।

30 मई 2019 को नरेंद्र मोदी ने फिर से प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और 31 मई को कैबिनेट का विस्‍तार किया। पीएमओ के अलावा डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी, मिनिस्‍ट्री ऑफ पर्सनल, पब्लिक ग्रिएवांसेस एंड पेंशन, डिपार्टमेंट ऑफ स्‍पेस और वो सभी मंत्रालय स्‍वयं के पास रखे, जो किसी अन्‍य मंत्री को आवंटित नहीं हुए। दूसरा कार्यकाल अभी चल ही रहा है ज्यादा समय नही हुआ है पर इस कम समय मे काफी बड़े काम किए है जैसे धारा 370, 35A को हटाना, जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाना, लद्दाख को अलग करना आदि।


नरेंद्र मोदी की योजनाएं

सन 2014 से लेकर अब तक के कार्यकाल में मोदी जी ने कई महत्वपूर्ण योजनाओ की शुरुआत की। जिनमें से कुछ के बारे में जानकारी इस प्रकार है –

1: मेक इन इंडिया( Make in India)-

मेक इन इंडिया की शुरुआत 25 सितंबर 2014 मे की गई थी। प्रधानमंत्री मोदी जी ने सत्ता में आने के बाद कुछ बहुत ही अहम अभियान चलाये, उन्हीं में से एक ‘मेक इन इंडिया’ अभियान था। जिसके तहत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को प्रोत्साहित कर उनके विकास के लिए कार्य किये गये।

2: प्रधानमंत्री जन-धन योजना-

प्रधानमंत्री जन धन योजना की शुरुआत 15 अगस्त 2014 मे की गई थी। इस योजना को दो चरणों मे पूरा किया गया। पहला चरण 15 अगस्त 2014 से 14 अगस्त 2015 तक चला, और दूसरा चरण 15 अगस्त 2015 से 14 अगस्त 2018 तक चला। यह योजना देश के हर व्यक्ति के बैंकों में खाते खुलवाने के लिए शुरू की गई थी। जिसके तहत सभी के मुफ्त में खाते खोले गए। गरीबों और किसानों को दी जाने वाली सहायता राशि सीधे उनके बैंक खाते में जमा की गई। जिससे बिच मे गरीबों का पैसा खाने वालों का सफाया होगया।

3:प्रधानमंत्री उज्जवाला योजना-

प्रधानमंत्री उज्जवाला योजना की शुरुआत 1 मई 2016 मे की गई थी। इस योजना के तहत गरीब परिवार की महिलाओं को एलपीजी गैस सिलिंडर प्रदान किये गये। इस योजना को काफी सफल माना जा सकता है क्योंकि आज पुरे भारत मे घर - घर तक सिलेंडर पहोच गये है। जिससे हमारी माताओ बहनों को पहले जैसे धुएँ मे परेशान नही होना पड़ता।

4: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना-

इस योजना की शुरुआत 1 जुलाई 2015 को की गई थी। इस योजना के तहत फसलों की अच्छी तरह से सिंचाई हो सकें एवं कृषि कार्य को बेहतर दिशा मिल सके. इसलिए इस योजना की शुरुआत की गई।

5: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना -

इस योजना की शुरुआत 13 जनवरी 2016 मे की गई थी। इस योजना में फसल के लिए किसानों को बीमा प्रदान किया गया। ताकि यदि उनकी फसलें प्राकृतिक आपदाओं के कारण ख़राब हो जाती है तो उन्हें बीमा का पैसा मिल सके।

6: स्वच्छ भारत अभियान-

स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत 2अक्टूबर 2014 मे की गई थी। इस अभियान को भारत मे बड़े स्तर पर शुरू किया गया था , जिसके अंतर्गत देश में स्वच्छता और ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों शौचालय का निर्माण किया गया।

7: प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना-

इस योजना की शुरुआत 15 जुलाई 2015 मे की गई थी। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के अंतर्गत युवाओं के कौशल के विकास के लिए उन्हें प्रशिक्षण देने की सुविधा दी गई।

8: सुकन्या समृद्धि योजना -

इस योजना को 4 दिसम्बर 2014 मे की गई थी। इस योजना को शुरू करने का प्रधानमंत्री जी का उद्देश्य छोटी बच्चियों के सशक्तिकरण के लिए उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान करना था। इस योजना मे 10 साल से कम बच्चियों के खाता खुलवाया जा सकता है।

9: डिजिटल इंडिया प्रोग्राम-

इस योजना की शुरुआत 1 जुलाई 2015 मे की गई थी। प्रधानमंत्री जी ने इस प्रोग्राम को शुरू कर देश में अर्थव्यवस्था को डिजिटल करने के लिए प्रेरित किया। इसके साथ ही उन्होंने लोगों से भी डिजिटल टेक्नोलॉजी का उपयोग करने के लिए अपील की थी। तब से अब तक मे भारत का डिजिटल मे बहोत तेजी से विकास कर रहा है। और इस प्रोग्राम मे आम जनता के साथ रिलायंस जिओ का बहोत बड़ा योगदान है क्योंकि जिओ के आने से पहले तक डाटा बहोत महगा था तो आम जनता इंटरनेट का इस्तमाल जादा नही कर पाती थी।

10: प्रधानमंत्री आवास योजना-

प्रधानमंत्री आवास योजना की शुरुआत 25 जून 2015 मे की गई थी। इस योजना के तहत गरीबों को किस्तों मे 260,000रूपये दिए जाते है खुद का घर बनने के लिए। इससे आज देश के गांव हो या शहर जहाँ पहले कच्चे घर थे आज उनके पक्के घर दीखते है।

इस तरह से नरेंद्र मोदी जी ने अपने अब तक के कार्यकाल में और भी कई अन्य महत्वपूर्ण योजनायें एवं अभियान जैसे नमामि गंगे, बेटी बचाओ बेटी पढाओ योजना, सर्व शिक्षा अभियान, आदि चलाये जोकि पूरी तरह से देश के विकास के लिए थे.


नरेंद्र मोदी के द्वारा किए मुख्य कार्य-

गुजरात के मुख्यमंत्री एवं प्रधानमंत्री दोनों के रूप में मोदी जी ने कई सारे महत्वपूर्ण फैसले लिए, एवं इनके कार्यकाल में लिए गये कुछ फैसलों की जानकारी इस प्रकार है–

1: भूमिजल संरक्षण प्रोजेक्ट -

गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनके शासन के दौरान सरकार ने भूमिजल संरक्षण प्रोजेक्ट के निर्माण का समर्थन किया। इससे कॉटन की खेती में मदद मिली, जिससे नल कूपों से सिंचाई की जा सकती थी। इस तरह से गुजरात कॉटन का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया।

2: नोटबंदी-

प्रधानमंत्री मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान नोटबंदी जैसा बहुत ही अहम फैसला लिया। जिसके तहत मोदी जी ने 500 एवं 1000 के पुराने नोट बंद कर दिये एवं इसके स्थान पर 2000 एवं 500 के नये नोट जारी किये। यह मोदी जी द्वारा लिया गया एक ऐतिहासिक फैसला था।

3: जीएसटी-

नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी करने के कुछ समय बाद देश में जितने भी टैक्स लगाये जाते थे उन्हें एक साथ सम्मिलित कर दिया और एक टैक्स जीएसटी यानि गुड्स एंड सर्विस टैक्स लागू किया। इस टैक्स सिस्टम को शुरुआत मे समझने मे काफी दिक्कते हुई पर अब यह फैसला देश के लिए लाभ दायक सिद्ध हो रहा है। जी एस टी मे पट्रोलियम उत्पादों को भी जोड़ने की मांग होती रहती है जिससे पेट्रोल डीज़ल के भी दाम कम होजाए।

4: सर्जिकल स्ट्राइक-

प्रधानमंत्री मोदी जी ने 2016 में उरी हमले के बाद पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए भारतीय सेना के साथ मिलकर सर्जिकल स्ट्राइक करने के फैसला लिया। तो सेना ने बिना किसी नुकसान के पाकिस्तान मे घुसकर वहां के कई आतंकीओ और उनके कैम्पों को खत्म कर सुरछित अपनी सीमा पर वापस आगए।

5: एयर स्ट्राइक (Air strike)-

मोदी जी ने 2019 में हुए पुलवामा हमले के बाद देश के सभी सुरक्षा बलों को पाकिस्तान के खिलाफ किसी भी प्रकार का एक्शन लेने के लिए खुली छूट दे दी, जोकि बहुत ही बड़ा ऐलान था। इसके बाद वायुसेना द्वारा एयर स्ट्राइक की गई थी।

6: अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुरुआत

7: गुजरात में स्टेचू ऑफ़ यूनिटी का निर्माण

8: राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का निर्माण

9: जापान के साथ मिलकर भारत में बुलेट ट्रेन लाने जैसे कार्यों में भी मोदी जी ने अपनी अहम भूमिका निभाई है।

इन सभी के साथ ही मोदी जी ने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने और दुनिया के अन्य देशों के साथ संबंधों को सुधारने के लिए बहुत बड़ा संकल्प भी दिखाया है।


नरेंद्र मोदी की उपलब्धियां

नरेंद्र मोदी जी ने अपने अभी तक के जीवन में निम्न उपलब्धियां हासिल की हैं –

1: सन 2007 में इंडिया टुडे मैगज़ीन द्वारा किये गये एक सर्वे में मोदी जी को देश के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री के रूप में चुना गया था।

2: 2009 में एफडी मैगज़ीन में उन्हें एफडीआई पर्सनालिटी ऑफ़ द ईयर पुरस्कार के एशियाई विजेता के रूप में सम्मानित किया गया।

3: इसके बाद मार्च 2012 में जारी टाइम्स एशियाई एडिशन के कवर पेज पर मोदी जी की फोटो छापी गई थी।

4: 2014 में मोदी जी का नाम फोर्ब्स मैगज़ीन में दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोगों की सूची में 15 वें स्थान पर था।

5: 2015 में ब्लूमबर्ग मार्केट मैगज़ीन में मोदी जी का नाम दुनिया के 13 सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में था। और साथ ही इन्हें इसी साल टाइम मैगज़ीन द्वारा जारी इन्टरनेट सूची में ट्विटर और फेसबुक पर 30 सबसे प्रभावशाली लोगों में दूसरे सबसे अधिक फॉलो किये जाने वाले राजनेता के रूप में इन्हें नामित किया गया था।

6: 2014 एवं 2016 में मोदी जी का नाम टाइम मैगज़ीन के पाठक सर्वे के विजेता के रूप में घोषित किया गया था।

7: 3 अप्रैल 2016 को मोदी जी को सऊदी अरब का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार अब्दुलाज़िज़ – अल – सऊद दिया गया था। और 4 जून 2016 को ही अफ़ग़ानिस्तान के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार 'घाज़ी आमिर अमानुल्लाह खान' दिया गया था।

8: 2014, 2015 एवं 2017 में भी मोदी जी का नाम टाइम मैगज़ीन में दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल था। और 2015, 2016 एवं 2018 को फोर्ब्स मैगज़ीन में दुनिया के 9 सबसे शक्तिशाली लोगों में मोदी जी का नाम शामिल था।

9: 10 फरवरी 2018 में मोदी जी को विदेशी डिग्निटरीस के लिए पलेस्टाइन का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘पलेस्टाइन राज्य के ग्रैंड कोलार’ के साथ सम्मानित किया गया था।

10: 27 सितंबर 2018 को नरेंद्र मोदी जी को चैंपियंस ऑफ़ अर्थ अवार्ड प्रदान किया गया था। जोकि यूनाइटेड नेशन का सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान है और यह अवार्ड 5 अन्य व्यक्तियों और संगठनों को भी प्रदान किया गया था। जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस की लीडरशिप के लिए और सन 2022 तक प्लास्टिक के उपयोग को खत्म करने के लिए संकल्प लिया था।

11: 2018 में 24 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय सहयोग और ग्लोबल आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए मोदी जी के योगदान के लिए उन्हें सीओल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

12: पिछले साल 22 फरवरी 2019 को मोदी जी ने प्रतिष्ठित सीओल शांति पुरस्कार प्राप्त किया। और साथ ही मोदी जी का नाम दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सेवा योजना शुरू करने के लिए पिछले साल के ‘नॉबेल शांति पुरस्कार’ के लिए भी नामंकित किया गया था।

13: नरेंद्र मोदी सोसल मीडिआ मे सबसे जय्दा फॉलो किये जाने वाले राजनेता है।


नरेन्द्र मोदी द्वारा लिखी गई किताबें

1: एग्जाम वारियर्स इन इंग्लिश एंड हिन्दी

2: अ जर्नी : पोयम्स बाई नरेन्द्र मोदी

3: ज्योतिपुंज अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषा में

4: वक्त की मांग

5: प्रेमतीर्थ

6: सोशल हारमनी

7: सामाजिक समरसता

8: सेतुबंध

9: भवयात्रा

10: आपात काल मे गुजरात;


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लक्ष्य

2024 तक भारत की 'जी डी पी' को 5 ट्रिलियन तक पहुंचाना।

2024 तक भारत के हर घर मे बिजली, पानी पहुँचाना।

2024 तक भारत के मेगा प्रोजेक्ट जैसे सागरमाला, मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रैन, गिफ्ट सिटी, स्मार्ट सिटी, ट्रेन रुट को पूरी तरह इलेक्ट्रिफाइड करना।

यह कुछ मेगा प्रोजेक्ट है जिन्हे प्रधानमंत्री मोदी ने 2024 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है।


नरेन्द्र मोदी की संपत्ति

नरेंद्र मोदी के पास 1.34Crore रुपए है, और गुजरात मे एक छोटा सा मकान जिसमे उनकी माँ रहती है। इनके पास कोई निजी कार नहीं है। इनके ऊपर कोई लोन नहीं है। इनके पास 4 सोने की अँगूठिया है जिनकी कीमत लगभग डेढ़ लाख रुपए है।

नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री के रूप मे चुने गये थे तो उन्होंने साथ काम करने वाले गरीब व्यक्तियों को 40 लाख रुपए उनकी बेटियों की शादी के लिए देदीये थे।


नरेंद्र मोदी जी की पसंद और नापसंद

खाने में पसंद:- खिचड़ी , दाल चावल, गुजराती व्यंजन|

पसंदीदा राजनेता:- स्यामा प्रसाद मुखर्जी, अटल बिहारी वाजपेयी, मोहनदास करमचंद गांधी एवं स्वामी विवेकानंद


 


हेनरी फोर्ड

 हेनरी फोर्ड की जीवनी

हेनरी फोर्ड एक अमेंरिकन उद्योगपति, फोर्ड मोटर कंपनी के संस्थापक और मास (Mass) उत्पादन असेंबली लाइन के स्पोंसर भी थे। फोर्ड ने पहली ऑटोमोबाइल कंपनी विकसित की और निर्मित भी की जिसे अमेरिका के मध्यम वर्गीय लोग भी आसानी से ले सकते थे। उनके द्वारा निर्मित ऑटोमोबाइल कंपनी को उन्ही के उपनाम पर रखा गया था और जल्द ही इस कंपनी ने पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना ली और साधारण ऑटोमोबाइल कंपनी ने जल्द ही बहुमूल्य कार बनाना शुरू किया और 20 वी शताब्दी में अपनी एक प्रभावशाली छाप छोड़ी। इसके बाद उन्होंने मॉडल टी नामक गाड़ी निकाली जिसने यातायात और अमेरिकी उद्योग में क्रांति ला दी। फोर्ड कंपनी के मालक होने के साथ ही दुनिया के सबसे धनि और समृद्ध लोगों में से एक थे।

उन्हें “फोर्डीजम” की संज्ञा भी दी गयी थी। फोर्ड अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी व्यापकता को बढ़ाना चाहती थी इसीलिए उन्होंने अपनी गाडियों की कीमतों में कमी कर बहुत से ग्राहकों को आकर्षित भी किया था। इसके बाद फोर्ड की फ्रेंचाईसी भी उत्तरी अमेरिका के बहुत से भागो में खोली गयी। उन्होंने अपनी अधिकांश संपत्ति भी फोर्ड फाउंडेशन के नाम पर कर दी थी और ऐसी व्यवस्था भी करा दी थी कि वह स्थायी रूप से उनके ही परिवार के नियंत्रण में बनी रहे।


प्रारंभिक जीवन:-

हेनरी फोर्ड का जन्म 30 जुलाई 1863 को मिशिगन के ग्रीनफ़ील्ड फार्म में हुआ था। असल में उनका परिवार इंग्लैंड के सॉमरसेट से था। फोर्ड के 15 साल की आयु में ही उनके माता-पिता की मृत्यु हो गयी थी। हेनरी फोर्ड के भाई-बहनों में मार्गरेट फोर्ड (1867-1938), जेन फोर्ड (1868-1945), विलियम फोर्ड (1871-1917) और रोबर्ट फोर्ड (1873-1934) शामिल है। किशोरावस्था में उनके पिताजी ने उन्हें एक जेब घडी दी थी। 15 साल की आयु में फोर्ड पूरी तरह गिर चुके थे लेकिन दोस्त और पड़ोसियों की सहायता से वे फिर उठकर खड़े हुए और घडी ठीक करने वाले के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनायी। परिस्थिति को देखकर उनके पिता उन्हें पारिवारिक फार्म देना चाहते थे लेकिन फोर्ड को फार्म पर काम करना पसंद नही था। बाद में उन्होंने लिखा की, “मुझे कभी भी फार्म से प्यार ही नही था – बल्कि फार्म में काम करने वाली मेरी माँ से मुझे प्यार था।” 1879 में जेम्स एफ. फ्लावर & ब्रदर्स और बाद में 1882 में ड्राई डॉक कंपनी के साथ काम करने के लिये उन्होंने घर छोड़ दिया था। बाद में उन्होंने वेस्टिंगहाउस में भी स्टीम इंजन पर काम किया। इस समय में फोर्ड ने गोल्डस्मिथ, ब्रायंट & स्ट्रेटन बिज़नस कॉलेज में बुक कीपिंग का भी अभ्यास किया था।


विवाह और परिवार:-

फोर्ड ने क्लारा जेन ब्रायंट (1866-1950) से 11 अप्रैल 1888 को शादी हुई थी और उनकी पत्नी की सहायता से ही वे एक सॉमिल भी चलाते थे। उनका एक बेटा भी है : एड्सेल फोर्ड (1893-1943)।


करियर:-

1891 में फोर्ड एडिसन ज्ञानवर्धन कंपनी के इंजिनियर बने। 1893 में मुख्य इंजिनियर के रूप में उनका प्रमोशन होने के बाद उनके पास पर्याप्त समय और पैसे दोनों थे। और तभी उन्होंने गैसोलीन इंजन पर खोज करना भी शुरू किया। उनकी यह खोज 1896 में पूरी हुई और उन्होंने एक गाड़ी का भी निर्माण किया जिसका नाम फोर्ड क्वैडसाइकिल रखा गया था। उन्होंने 4 जून को इसका सफल प्रशिक्षण भी किया था। बहुत सी टेस्ट ड्राइव के बाद फोर्ड ने अपनी क्वैडसाइकिल में बहुत से सुधार भी किये।

1896 फोर्ड ने एडिसन के एग्जीक्यूटिव की मीटिंग भी अटेंड की, वहाँ उनका परिचय थॉमस एडिसन से हुआ था। वहाँ उन्होंने फोर्ड ऑटोमोबाइल के प्रोजेक्ट को सभी के सामने रखा। एडिसन ने उनके इस प्रोजेक्ट को सराहना भी की और फोर्ड के आकार और गाड़ी बनाने का काम भी 1898 में पूरा हुआ। डेट्रॉइट लंबर बैरन विलियम एच. मर्फी की पूँजी के समर्थन से चलने वाले फोर्ड ने एडिसन कंपनी से इस्तीफा भी दे दिया था और 5 अगस्त 1899 को नयी डेट्रॉइट ऑटोमोबाइल कंपनी की स्थापना भी की थी। उस समय पहले कम गुणवत्ता वाली गाडियों के निर्माण में भी बहुत लागत लगती थी इसी वजह से उनकी कीमत भी ज्यादा होती थी। इसी वजह से इस कंपनी को सफलता नही मिल सकी और जनवरी 1901 में कंपनी खत्म हो गयी थी। बाद में सी. हेरोल्ड विल्स की सहायता से फोर्ड को फिर से डिजाईन किया गया, इसे पुनर्निर्मित किया गया और सफलतापूर्वक अक्टूबर 1901 में 26 हॉर्सपावर के साथ चलाया गया था। इसी सफलता के साथ मर्फी और दुसरे सहकर्मियों ने डेट्रॉइट ऑटोमोबाइल कंपनी को बदलकर हेनरी फोर्ड कंपनी की स्थापना 30 नवम्बर 1901 को की थी, जिसके फोर्ड मुख्य इंजिनियर थे।

1902 में फोर्ड के कंपनी छोड़कर चले जाने के बाद मर्फी ने फिर से कंपनी का नाम बदलकर किडिलैक ऑटोमोबाइल कंपनी रखा। 1902 में ही 8+ हॉर्सपावर के साथ फोर्ड ने साइकिलिस्ट कूपर के साथ मिलकर रेस “999” में जीत भी हासिल की। इसके बाद फोर्ड को एलेग्जेंडर व्हाय. मलकोम्सों का समर्थन मिला जो डेट्रॉइट के ही कोल्-डीलर थे। उन्होंने पार्टनरशिप में फोर्ड & मलकोम्सों लिमिटेड की स्थापना भी की जो ऑटोमोबाइल का उत्पादन करती थी। इसके बाद फोर्ड बहुमूल्य गाडियों के निर्माण और उन्हें डिजाईन करने में लग गये।


रोचक बाते:-

अल्दौस हक्सले के ब्रेव न्यू वर्ल्ड (1932) में फोर्डीस्ट का आयोजन किया। और तभी फोर्ड ने अपने पहले मॉडल टी का भी अनावरण किया।

ओप्टन सिंक्लैर ने 1937 में फोर्ड की काल्पनिक कहानी का वर्णन अपने नॉवेल दी फ्लिवर किंग में किया था।

बहुत से इतिहासिक नॉवेल में फोर्ड का उपयोग किसी व्यक्तिगत चरित्र को दर्शाने के लिये भी किया गया था, जिसने मुख्य रूप से इ.एल. डोक्टोरो का रागटाइम (1975) और रिचर्ड पॉवर का नॉवेल थ्री फार्मर ऑन दी वे ऑफ़ डांस (1985) शामिल है।

1986 में रोबर्ट लकी की बायोग्राफी में फोर्ड, उनके परिवार और उनकी कंपनी तीनो का ही वर्णन था और उसका शीर्षक था, “फोर्ड : दी मैन एंड दी मशीन” इस किताब को 1987 में अपनाया गया था।

2005 में इतिहासिक उपन्यास दी प्लाट अगेंस्ट अमेरिका में फिलिप रोथ ने फोर्ड को एक बहुदिमागी व्यक्तित्व भी बताया था।

ब्रिटिश लेखक डगलस गालब्रेथ ने फोर्ड के शांति जहाज का उपयोग उपन्यास किंग हेनरी (2007) के मौत की जगह के रूप में किया था।

2008 में ही फोर्ड ने दुनिया में अपनी पहचान बनवा ली थी और दुनिया की सबसे कीमती और बहुमूल्य गाड़िया बनाने वाली कंपनियों में भी शामिल हो गयी।

1946 में वे ऑटोमेंटिव हॉल ऑफ़ फेम भी रह चुके है।

समस्वर संगीतकार फेर्ड़े ग्रोफ़ ने हेनरी फोर्ड के सम्मान में एक टोन कविता की रचना भी की थी।

Never Forever, Give Up..


स्टीफन हॉकिंग

 स्टीफन हॉकिंग की जीवनी

स्टीफन हॉकिंग


मशहूर साइंटिस्ट स्टीफन हॉकिंग ने विज्ञान क्षेत्र में काफी योगदान दिया है। स्टीफन हॉकिंग का जीवन शुरू से ही काफी कठिनाइयों से भरा हुआ था, लेकिन फिर भी उन्होंने वैज्ञानिक बनने के अपने सपने को पूरा किया और विज्ञान के क्षेत्र में अपना अनगिनत योगदान दिया। उनके योगदान के चलते कई ऐसी चीजों के बारे में खोज की गई जिसकी कल्पना शायद ही पहले किसी ने की हो।


स्टीफन हॉकिंग का जन्म और परिवार:-


स्टीफन हॉकिंग का जन्म इंग्लैंड देश में सन् 1942 में हुआ था। जिस वक्त हॉकिंग का जन्म हुआ था उस वक्त दुनिया में द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। स्टीफन हॉकिंग के माता और पिता का घर नॉर्थ लंदन में हुआ करता था। लेकिन इस युद्ध के कारण उन्हें अपना घर बदलना पड़ा और वो लंदन की एक सुरक्षित जगह पर आकर रहने लगे।

स्टीफन के पिता एक चिकित्सा शोधकर्ता के रूप में कार्य करते थे, जिनका नाम फ्रेंक था। वहीं इनकी माता का नाम इसोबेल था और जो चिकित्सा अनुसंधान संस्थान में बतौर एक सचिव के रूप में काम करती थी। हॉकिंग के माता-पिता की मुलाकात चिकित्सा अनुसंधान संस्थान में कार्य करने के दौरान ही हुई थी। जिसके बाद इन्होंने शादी कर ली थी और इनके कुल चार बच्चे थे। जिनका नाम स्टीफन, फिलिपा, मैरी और एडवर्ड था। एडवर्ड इनका गोद लिया हुआ बेटा था।

स्टीफन हॉकिंग की शिक्षा:-


स्टीफन जब आठ वर्ष के थे तब उनके परिवार वाले सेंट अल्बान में आकर रहने लगे और यहाँ के ही एक स्कूल में स्टीफन का दाखिला करवा दिया गया। अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद स्टीफन ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और यहाँ पर इन्होंने भौतिकी (Physics) विषय पर अध्ययन किया। जिस वक्त इन्होंने इस विश्वविद्यालय में दाखिला लिया था, उस वक्त इनकी आयु महज 17 वर्ष की थी।

कहा जाता है कि स्टीफन को गणित विषय में रुचि थी और वो इसी विषय में अपनी पढ़ाई करना चाहते थे। लेकिन उस वक्त ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में ये विषय नहीं हुआ करता था। जिसके कारण उन्हें भौतिकी विषय को चुनना पड़ा। भौतिकी विषय में प्रथम श्रेणी में डिग्री हासिल करने बाद इन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अपनी आगे की पढ़ाई की। साल 1962 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में डिपार्टमेंट ऑफ एप्लाइड मैथेमैटिक्स एंड थ्योरिटिकल फिजिकल (डीएएमटीपी) में इन्होंने ब्रह्माण्ड विज्ञान पर अनुसंधान किया।

साल 1963 में खराब हुई सेहत:-


स्टीफन हाकिंग आम लोगों के जैसे ही अपना जीवन जी रहे थे लेकिन साल 1963 में इनकी सेहत खराब होने लगी। 21 वर्ष स्टीफन की बिगड़ती हालत देख उनके पिता उन्हें अस्पताल ले गए जहाँ पर उनकी जांच की गई और जांच में पाया गया कि स्टीफन को एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (amyotrophic lateral sclerosis (ALS) ) नामक बीमारी है। इस बीमारी के कारण शरीर के हिस्से धीरे-धीरे कार्य करना बंद कर देते हैं और इस बीमारी का कोई भी इलाज नहीं है। जिस वक्त स्टीफन को इस बीमारी का पता चला था उस वक्त वो कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई कर रहे थे। लेकिन उन्होंने अपनी इस बीमारी को अपने सपनों के बीच नहीं आने दिया। बीमार होने के बावजूद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई को पूरा किया और साल 1965 में उन्होंने अपनी पीएचडी की डिग्री हासिल की। पीएचडी में इनके थीसिस का शीर्षक “प्रॉपर्टीज ऑफ एक्सपांडिंग यूनिवर्स“ था।

स्टीफन हॉकिंग की पत्नी:-


जिस साल स्टीफन को अपनी बीमारी के बारे में पता चला उसी साल उनकी मुलाकात अपनी पहली पत्नी यानी जेन वाइल्ड हुई थी। हॉकिंग के इस बुरे वक्त में जेन ने उनका साथ दिया और साल 1965 में इन्होंने शादी कर ली। जेन और हॉंकिग के कुल तीन बच्चे थे और इनके नाम रॉबर्ट, लुसी और तीमुथियस है। हॉकिंग की ये शादी 30 सालों तक चली थी और साल 1995 में जेन और हॉकिंग ने तलाक ले लिया था। तलाक लेने के बाद हॉकिंग ने ऐलेन मेंसन(Elaine Mason) से विवाह कर लिया था और साल 1995 में हुई ये शादी साल 2016 तक ही चली थी।



स्टीफन हॉकिंग का करियर :-


कैम्ब्रिज से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद भी हॉकिंग इस कॉलेज से जुड़े रहे और इन्होंने एक शोधकर्ता के रूप में यहाँ कार्य किया। इन्होंने साल 1972 में डीएएमटीपी में बतौर एक सहायक शोधकर्ता अपनी सेवाएं दी और इसी दौरान इन्होंने अपनी पहली अकादमिक पुस्तक, “द लाज स्केल स्ट्रक्चर ऑफ स्पेस-टाइम” लिखी थी। यहाँ पर कुछ समय तक कार्य करने के बाद साल 1974 में इन्हें रॉयल सोसायटी (फैलोशिप) में शामिल किया गया। जिसके बाद इन्होंने साल 1975 में डीएएमटीपी में बतौर गुरुत्वाकर्षण भौतिकी रीडर के तौर पर भी कार्य किया और साल 1977 में गुरुत्वाकर्षण भौतिकी के प्रोफेसर के रूप में भी यहाँ पर अपनी सेवाएं दी। वहीं इनके कार्य को देखते हुए साल 1979 में इन्हें कैम्ब्रिज में गणित के लुकासियन प्रोफेसर (Lucasian Professor) नियुक्त किया गया था, जो कि दुनिया में सबसे प्रसिद्ध अकादमी पद है और इस पद पर इन्होंने साल 2006 तक कार्य किया।


स्टीफन हॉकिंग को मिले पुरस्कार और उपलब्धियां:-


प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंग के पास कुल तेरह (13) मानद डिग्रियां हैं। वहीं उनके योगदान के लिए इन्हें कई अवार्ड भी दिए गए हैं और इन्हें अभी तक दिए गए पुरस्कारों की जानकारी नीचे दी गई है-

•साल 1966 में स्टीफन हॉकिंग को एडम्स पुरस्कार दिया गया था। इस पुरस्कार के बाद इन्होंने साल 1975 में एडिंगटन पदक और साल 1976 में मैक्सवेल मेंडल एंड प्राइज मिला था।

•हेइनीमान पुरस्कार (Heineman Prize) हॉकिंग को साल 1976 में दिया गया था। इस पुरस्कार को पाने के बाद इन्हें साल 1978 में एक ओर पुरस्कार से नवाजा गया था और इस पुरस्कार का नाम अल्बर्ट आइंस्टीन मेंडल था।

•साल 1985 में हॉकिंग को आरएएस गोल्ड मेंडल और साल 1987 डिराक मेंडल ऑफ द इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिकल भी दिया गया था। इसके बाद सन् 1988 में इस महान वैज्ञानिक को वुल्फ पुरस्कार भी दिया गया था।

•प्रिंस ऑफ अस्टुरियस अवार्ड भी हॉकिंग ने साल 1989 में अपने नाम किया था। इस अवार्ड को मिलने के कुछ समय बाद इन्होंने एंड्रयू जेमेंट अवार्ड (1998), नायलोर पुरस्कार और लेक्चरशिप (1999) भी दिया गया था।

•साल 1999 में जो अगला पुरस्कार इन्हें मिला था उसका नाम लिलाइनफेल्ड पुरस्कार (Lilienfeld Prize) था और रॉयल सोसाइटी ऑफ आर्ट की तरफ से इसी साल इन्हें अल्बर्ट मेंडल भी दिया गया था।

•ऊपर बताए गए अवार्ड के अलावा इन्होंने कोप्ले मेंडल (2006), प्रेसिडेंटियल मेंडल ऑफ फ्रीडम (2009), फंडामेंटल फिजिक्स प्राइज (2012) और बीबीवीए फाउंडेशन फ्रंटियर्स ऑफ नॉलेज अवार्ड (2015) भी दिया गया हैं।


स्टीफन हॉकिंग द्वारा किए गए कार्य:-



•प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंग ने ब्रह्मांड को नियंत्रित करने वाले बुनियादी लॉ पर कई शोध किए हैं। हॉकिंग ने अपने साथी रोजर पेनरोस के साथ मिलकर एक शोध किया था और दुनिया को बताया था अंतरिक्ष और समय, ब्रह्मांड के जन्म के साथ शुरू हुए हैं और ब्लैक होल के भीतर समाप्त होंगे।

•आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी और क्वांटम थ्योरी का प्रयोग करके, हॉकिंग ने ये भी निर्धारित किया कि ब्लैक होल पूरी तरह से शांत नहीं हैं बल्कि उत्सर्जन विकिरण (emit radiation) करता है।

•इसके अलावा हॉकिंग ने ये भी प्रस्ताव किया था कि ब्रह्मांड की कोई सीमा नहीं है और विज्ञान की मदद से ये भी पता किया जा सकता है कि ब्रह्माण्ड की शुरूआत कब हुई थी और कैसे हुई थी।


स्टीफन हॉकिंग द्वारा लिखी गई किताबें:-



स्टीफन हॉकिंग ने अपने जीवन काल में कई किताबें भी लिखी हैं और उनकी ये किताब अंतरिक्ष के विषय में ही लिखी गई है। उनके द्वारा लिखी गई कुछ किताबों की जानकारी दी है-

•“ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम”– हॉकिंग द्वारा लिखी गई सबसे पहली किताब का नाम “ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम” था। ये किताब बिग बैंग और ब्लैक होल के विषय पर आधारित थी और साल 1988 में प्रकाशित हुई ये किताब 40 भाषाओं में उपलब्ध है।

•“द यूनिवर्स इन ए नटशेल” – ये किताब साल 2001 में प्रकाशित की गई थी और हॉकिंग द्वारा लिखी गई इस किताब को साल 2002 में एवेंटिस प्राइस ऑफ साइंस बुक्स मिला था।

•“द ग्रैंड डिज़ाइन”- हॉकिंग द्वारा लिखी गई “द ग्रैंड डिज़ाइन” किताब साल 2010 में प्रकाशित हुई थी और इस किताब में भी अंतरिक्ष से जुड़ी जानकारी दी गई थी। ये किताब भी काफी सफल किताब साबित हुई थी।

•“ब्लैक होल और बेबी यूनिवर्स” – ये किताब साल 1993 में आई थी और इस पुस्तक में हॉकिंग द्वारा ब्लैक होल से संबंधित लिखे गए निबंधों और व्याख्यानों का जिक्र था। इसके अलावा हॉकिंग ने बच्चों के लिए भी एक किताब लिखी थी। जिसका नाम ”जॉर्ज और द बिग बैंग” था और ये किताब साल 2011 में आई थी।


स्टीफन हॉकिंग के उद्धरण :-



•जीवन दुर्भाग्यपूर्ण होगा यदि ये अजीब और रोचक भरा ना हो तो।

•अगर आप हमेशा नाराज़ रहेंगे एवं कोसते ही रहेंगे तो किसी के पास आपके लिए टाइम नहीं होगा।

•मेंरे जीवन का लक्ष्य बहुत ही आसान है और ये लक्ष्य इस ब्रह्मांड को समझना है और ये पता लगाना है कि ये ऐसा क्यों है और ये क्यों हैं।

•अज्ञानता दुश्मन नहीं हैं, जबकि दुश्मन वो भ्रम हैं जो ये कहे कि आपको सब कुछ आता हैं।


स्टीफन हॉकिंग के जीवन पर बनीं फिल्म:-



साल 2014 में इन पर एक मूवी बनाई गई, जिसका नाम नाम “द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग” हैं । इस फिल्म में उनकी जिंदगी के संघर्ष को दिखाया गया था और बताया गया था कि किस तरह से इन्होंने अपने सपनों के पूरा किया था।


स्टीफन हॉकिंग की कुल संपत्ति:-



इंग्लैंड के कैम्ब्रिज शहर में स्टीफन हॉकिंग का खुद का एक घर है और इस वक्त उनके पास कुल $ 20 मिलियन की संपत्ति है। उन्होंने ये संपत्ति अपने कार्य, पुरस्कारों और किताबों के जरिए कमाई हैं।


स्टीफन हॉकिंग की मृत्यु:-



हॉकिंग लंबे समय से बीमार चल रहे थे। एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस बीमारी के कारण इन्होंने अपने जीवन के लगभग 53 साल व्हील चेयर पर बताए हैं। वहीं 14 मार्च 2018 को इस महान वैज्ञानिक ने अपनी अंतिम सांस इग्लैंड में ली है और इस दुनिया से विदाई ले ली। लेकिन वैज्ञानिक में इनके द्वारा दिए गए योगदानों को कभी भी भुला नहीं जा सकेगा।


अल्बर्ट आइन्स्टाइन

 अल्बर्ट आइन्स्टाइन

अल्बर्ट आइन्स्टाइन की जीवनी की जीवनी


आधुनिक भौतिक विज्ञान के जन्मदाता अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने भौतिक विश्व को उसके यतार्थ स्वरूपों में ही समझने का प्रयास किया था। इस सम्बन्ध में उन्होंने कहा था कि “शब्दों का भाषा को जिस रूप में लिखा या बोला जाता है मेरी विचार पद्दति में उनकी उस रूप में कोई भूमिका नही है। पारम्परिक शब्दों अथवा अन्य चिन्हों के लिए दुसरे चरण में मात्र तब परिश्रम करना चाहिए जब सम्बंधिकरण का खेल फिर से दोहराया जा सके ”।


अल्बर्ट आइन्स्टाइन का प्रारम्भिक जीवन:-


अल्बर्ट आइन्स्टाइन का जन्म 14 मार्च 1879 को जर्मनी के उल्क नामक छोटे से कस्बे में हुआ था। उनके पिता का नाम हर्मन आइन्स्टाइन और माता का नाम पौलिन था। पौलीन को अपने पुत्र से बहुत प्यार था और कभी वो उसको अपने से दूर नही करती थी। एल्बर्ट तीन वर्ष का हुआ तो उसकी माता के लिए एक समस्या खड़ी हो गयी कि वो बोलता नही था। सामान्यत: तीन वर्ष के बालक तुतलाकर बोलना सीख जाते है। फिर भी माँ ने उम्मीद नही छोड़ी और उसे पियानो बजाना सिखाया। बचपन में एल्बर्ट शांत स्वाभाव का और शर्मीला बच्चा था और उसका कोई मित्र नही था। वह अपने पडोस में रहने वाले बच्चो के साथ भी खेलना पसंद नही करता था। एल्बर्ट के माता -पिता म्यूनिख रहने लगे थे। बच्चे म्यूनिख की सड़को पर सेना की परेड को देखकर उनकी नकल उतारा करते थे जबकि [Albert Einstein] अल्बर्ट सिपाहियों को देखते ही रोने लगता था।

उस समय दुसरे सभी बच्चे बड़ा होकर सिपाही बनने की बात करते थे लेकिन उसकी सिपाही बनने में कोई रूचि नही थी। अब एल्बर्ट पांच वर्ष का हो गया था और उसके जन्मदिन पर उसके माता-पिता ने मैग्नेटिक कम्पस उपहार में दिया जिसे देखकर वो बहुत प्रसन्न हुआ था। जब उस मैग्नेटिक कम्पस की सुई हमेशा उत्तर दिशा की तरफ रहती तो उसके दिमाग में प्रश्न आते थे कि ऐसा कैसे और क्यों होता है। अल्बर्ट बचपन से ही पढने लिखने में होशियार था लेकिन शिक्षको के साथ उसका तालमेंल नही बैठता था क्योंकि वो रटंत विद्या सीखाते थे। अल्बर्ट इसाई नही यहूदी था जिसके कारण स्कूल में इसाई लडके उसे परेशान करते थे इसी वजह से उसके दिमाग में अकेलेपन की भावना आ गयी थी। उसका बचपन में एक ही मित्र बना था जिसका नाम मैक्स टेमले था जिससे वो अपने मन की बाते करता था और तर्कसंगत प्रश्न करता रहता था। एक दिन अल्बर्ट ने मैक्स से पूछा कि “ये ब्रह्मांड कैसे काम करता है ” इसका उत्तर मैक्स के पास नहीं था। इस तरह बचपन से उसका भौतिकी में बहुत रूचि रही थी। एल्बर्ट के चाचा जैकब एक इंजिनियर थे जिन्होंने अल्बर्ट के मन में गणित के प्रति रूचि दिखाई थी। उन्होंने उसे सिखाया था कि जब भी बीजगणित में कुछ अज्ञात वस्तु को ढूँढना चाहते है तो उसे बीजगणित में X मान लेते है और तब तक ढूंढते रहते है जब तक कि पता नही लगा लेते है।

एल्बर्ट जब 15 वर्ष का हुआ तो उसके पिता के कारोबार में समस्याए आ गयी जिसके कारण उन्हें कारोबार बंद करना पड़ा। अब उसके माता पिता उसको जिम्नेजियम स्कूल में दाखिला दिलाकर नौकरी की तलाश में दुसरे शहर चले गये। अब माता पिता के जाने के बाद अल्बर्ट उदास रहने लगा और उसका पढ़ाई में ध्यान नही लगा इसलिए वो भी अपने परिवार के पास इटली चला गया। इटली में उसने बहुत सुखद समय बिताया उसके बाद सोलह वर्ष की उम्र में अल्बर्ट को स्विट्ज़रलैंड के एक स्कूल में पढने के लिए रखा गया। यहाँ पर उसने भौतिकी में गहरी रूचि दिखाना शुरू कर दिया और उसे योग्य अध्यापक भी मिले। यही पर उन्होंने सापेक्षता का सिद्धांत का पता लगाया था। एल्बर्ट ने ज्यूरिख से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी।


अल्बर्ट आइन्स्टाइन अध्यापक के रूप में :-



स्नातक की डिग्री लेने के बाद उन्होंने विद्यार्थियों को पढ़ाने के बारे में विचार किया लेकिन अल्बर्ट के अधिक ज्ञान की वजह से प्रारम्भ में उन्हें नौकरी नही मिली। सन 1902 में अल्बर्ट आइन्स्टाइन को स्विज़रलैंड के बर्न शहर में एक अस्थाई नौकरी मिल गयी। अब उन्हें अपने शोध लेखो को लिखने और प्रकाशित कराने का बहुत समय मिला। उन्होंने डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त करने के लिए मेहनत करना शुरू कर दिया और अंत में उन्हें डाक्टरेट की उपाधि मिल ही गयी।


अल्बर्ट आइन्स्टाइन वैज्ञानिक के रूप में:-


ज्यूरिख विश्वविद्यालय में उनको प्रोफेसर की नियुक्ति मिली और लोगों ने उन्हें महान वैज्ञानिक मानना शुरू कर दिया। सं 1905 में 26 वर्ष की आयु में उन्होंने सापेक्षता का सिद्धांत प्रतिपादित किया जिसने उन्हें विश्वविख्यात कर दिया। इस विषय पर उन्होंने केवल चार लेख लिखे थे जिन्होंने भौतिकी का चेहरा बदल दिया। इस सिद्धांत का प्रसिद्ध समीकरण E=mc2 है जिसके कारण ही परमाणु शक्ति प्राप्त हो सकी। इसी के कारण इलेक्ट्रिक ऑय की बुनियाद रखी गयी। इसी के कारण ध्वनि चलचित्र और टीवी पर शोध हो सके। आइन्स्टाइन को अपनी इसी खोज के लिए विश्व प्रसिद्ध नोबल पुरुस्कार मिला था। सारा संसार आइन्स्टाइन की प्रशंसा करने लगा और जगह-जगह पर समारोह आयोजित किये जाने लगे। इतना सब कुछ होने के बाद भी वो हमेशा नम्रता से रहते थे। आइन्स्टाइन विश्व शान्ति और समानता में विश्वास रखते थे इसी कारण उन्हें गांधीजी की तरह महान पुरुष कहा जाता था। आइन्स्टाइन को अपने जीवन में सबसे ज्यादा दुःख तब हुआ जब उनके वैज्ञानिक अविष्कारों के कारण बाद में परमाणु शक्ति का आविष्कार हुआ था जिससे हिरोशिमा और नागासाकी जैसे नगर ध्वस्त हो गये थे।


आइन्स्टाइन का परिवार:-


1903 में अल्बर्ट आइन्स्टाइन का विवाह मिलवा मैरिक से हुआ था। उनके यहाँ दो पुत्रों एल्बर्ट और एडूआई ने जन्म लिया था। आइन्स्टाइन के विवाह से पहले भी पुत्री थी जिसे आइन्स्टाइन ने गोद लिया था लेकिन उसकी बचपन में ही मौत हो गयी थी। 14 फरवरी 1919 ने उनका मैरिक से तलाक हो गया और इसी वर्ष में उन्होंने दुसरी शादी कर ली थी। उनकी दुसरी पत्नी का नाम एलसा था लेकिन वो भी 1936 में चल बसी। वैसे भी उनकी पारिवारिक जीवन में रूचि कम थी और अपना ज्यादातर समय अपनी वैज्ञानिक खोजों में लगाते थे।


आइन्स्टाइन की मृत्यु:-


18 अप्रैल 1955 में महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टाइन की अमेरिका के न्यू जर्सी शहर में मृत्यु हो गयी। वह अपने जीवन एक अंत तक कार्य करते रहे और मानवता की भलाई में उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया था। इतना सब होने के बाद भी वो किसी के घनिष्ट मित्र नही बन सके क्योंकि उनका लक्ष्य हमेशा सृष्टि को जानने का रहा था। आइन्स्टाइन की प्रतिभा से प्रभावित होने के कारण मृत्यु के बाद उनके दिमाग का अध्ययन किया गया लेकिन कुछ विशेष तथ्य हाथ नही आये।

Lessons to take:-

"बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है|"


निकोला टेस्ला

 

निकोला टेस्ला

जीवन परिचय

निकोला टेस्ला सर्बियाई-अमेरिकी आविष्कारक थे, जिन्हें वर्तमान विद्युत प्रणालियों को बारी-बारी से विकसित करने के लिए जाना जाता था। निकोला टेस्ला की यह जीवनी उनके बचपन, जीवन, उपलब्धियों, कार्यों और समय के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करती है।
निकोला टेस्ला सर्बियाई-अमेरिकी आविष्कारक थे, जिन्हें वर्तमान विद्युत प्रणालियों को बारी-बारी से विकसित करने के लिए जाना जाता था। उन्होंने विद्युत चुंबकत्व और वायरलेस रेडियो संचार के क्षेत्र में भी असाधारण योगदान दिया। वह एक कौतुक बालक था और मानव जाति के लिए एक भविष्यवादी दृष्टि के साथ एक काल्पनिक स्मृति रखता था जो उसकी अधिकांश खोजों और शोधों से स्पष्ट है।
वह एक प्रशिक्षित इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंजीनियर थे, जिनकी खोजों और आविष्कारों में आधुनिक इलेक्ट्रिक मोटर, ऊर्जा का वायरलेस ट्रांसमिशन, बुनियादी लेजर और रडार तकनीक, पहला नीयन और फ्लोरोसेंट रोशनी और टेस्ला कॉइल (व्यापक रूप से रेडियो, टेलीविज़न सेट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण में उपयोग किया जाने वाला उपकरण) शामिल थे। एक महान आविष्कारक होने के बावजूद, उनका जीवन ज्यादातर गरीबी से छाया रहा क्योंकि वे एक भयानक व्यापारी थे।
वह अपने पैसे के साथ अव्यावहारिक था और उसके पास अपनी विरासत को पारित करने के लिए कोई नहीं था क्योंकि वह कभी किसी के साथ रिश्ते में शामिल नहीं हुए थे। यद्यपि उन्हें अपने दोस्तों द्वारा एक उदार और विनम्र व्यक्ति के रूप में माना जाता था, लेकिन उनकी दृढ़ दिनचर्या के कारण उनके साथ बहुत सीमित सामाजिक संपर्क था।
वह अपने पूरे जीवन में एक अकेला व्यक्ति थे। वह निस्संदेह 20 वीं सदी के सबसे प्रभावशाली अन्वेषकों में से एक थे जिनकी बिजली के क्षेत्र में खोज अपने समय से पहले हुई थी और आज भी तकनीक को प्रभावित करना जारी है।


बचपन और प्रारंभिक जीवन

उनका जन्म 10 जुलाई, 1856 को ऑस्ट्रियाई साम्राज्य के स्मिलजन गांव में, ऑल्टोडॉक्स पुजारी और उनकी पत्नी, ज़ुका मैंडिक के घर में पैदा हुए थे । वह अपने परिवार में पाँच बच्चों में से चौथे थे। उनके पास विद्युत आविष्कारों के लिए एक अल्पकालिक स्मृति थी। उन्होंने हमेशा अपनी रचनात्मक क्षमताओं के लिए अपनी मां के आनुवंशिक प्रभाव का श्रेय दिया।
उन्होंने स्माइलजान में प्राथमिक स्कूल से जर्मन, अंकगणित और धर्म की अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। 1870 में, उन्हें कार्लोवाक में हायर रियल जिमनैजियम में दाखिला लिया गया और अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता की मदद से 1873 में तीन साल के भीतर चार साल का कोर्स करवाया।
1875 में, उन्होंने ग्राज़, ऑस्ट्रिया में एक सैन्य फ्रंटियर छात्रवृत्ति पर ऑस्ट्रियाई पॉलिटेक्निक में भाग लिया। वह अपने पहले वर्ष में एक शानदार छात्र थे, लेकिन कॉलेज में अपने दूसरे वर्ष में जुआ खेलने का आदी हो गए, जिसने उसकी स्नातक की पढ़ाई को बर्बाद कर दिया और वह एक डिग्री प्राप्त करने में सक्षम नहीं नहीं



करियर

1881 में, उन्होंने बुडापेस्ट में सेंट्रल टेलीग्राफ कार्यालय में एक ड्राफ्ट्समैन के रूप में काम किया। बाद में वह बुडापेस्ट टेलीफोन एक्सचेंज में मुख्य इलेक्ट्रीशियन बने और सेंट्रल स्टेशन उपकरण में महत्वपूर्ण सुधार किया।
1882 में, वह फ्रांस में कॉन्टिनेंटल एडिसन कंपनी द्वारा विद्युत उपकरण के एक डिजाइनर के रूप में कार्यरत थे। दो साल बाद, उन्हें थॉमस एडिसन के लिए काम करने के लिए न्यूयॉर्क स्थानांतरित कर दिया गया, जिससे उन्हें प्रत्यक्ष वर्तमान जनरेटर को फिर से डिज़ाइन करने में मदद मिली।
बारी-बारी से वर्तमान प्रणाली के माध्यम से एडिसन की अक्षम मोटर्स और जनरेटर को बेहतर बनाने के उनके विचार ने एडिसन को उन्हें पचास हजार डॉलर की पुरस्कार राशि का वादा करने के लिए प्रेरित किया और उन्होंने इसे सफलतापूर्वक किया। उन्होंने अपना कार्य पूरा किया और पुरस्कार राशि की मांग की, जिसके लिए एडिसन ने जवाब दिया कि उनकी चुनौती अमेरिकी हास्य का एक रूप था।
टेस्ला ने तुरंत अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। 1888 में, उन्हें उद्योगपति जॉर्ज वेस्टिंगहाउस द्वारा नियुक्त किया गया था, जो कि पॉलिफ़ेज़ सिस्टम के लिए अपने विचार से प्रभावित थे, बारी-बारी से चालू विद्युत आपूर्ति प्रणाली विकसित करने के लिए। अंतत: उन्होंने बारी-बारी से विद्युत उपकरणों के चमत्कारों का प्रदर्शन करके एडीसन की डीसी प्रणाली के साथ धाराओं का युद्ध जीता। जल्द ही उन्होंने अपनी प्रयोगशाला स्थापित की और ‘टेस्ला कॉइल’, कार्बन बटन लैंप, विद्युत अनुनाद की शक्ति और विभिन्न प्रकार के प्रकाश व्यवस्था सहित कई प्रयोगों पर अपना समय और ऊर्जा लगाई।
1899 में, वह कोलोराडो स्प्रिंग्स में चले गए जहां उन्होंने एक वायरलेस ग्लोबल एनर्जी ट्रांसमिशन सिस्टम बनाने के लिए अपनी प्रयोगशाला स्थापित की। उन्होंने सूचनाओं को साझा करने और दुनिया भर में मुफ्त बिजली प्रदान करने के लिए मानव निर्मित बिजली पर प्रयोग किया। 1900 में, उन्होंने शोरेन्हम, लॉन्ग आईलैंड के पास वार्डेनक्लिफ़ में ट्रांस-अटलांटिक वायरलेस दूरसंचार सुविधा स्थापित करने पर अपना काम शुरू किया।
उन्होंने सुविधा में कई प्रयोग किए लेकिन धन की कमी के कारण, उन्हें प्रथम विश्व युद्ध के समय इसे बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। बाद में जीवन में, उन्होंने किसी भी स्थलीय दूरी पर न्यूनतम नुकसान के साथ यांत्रिक ऊर्जा को प्रसारित करने की विधि और भूमिगत खनिज जमा के स्थान का सटीक निर्धारण करने की एक विधि की घोषणा की।


प्रमुख कार्य

उनका सबसे उल्लेखनीय योगदान आधुनिक वैकल्पिक चालू (एसी) बिजली आपूर्ति प्रणाली को डिजाइन करने में है। एक ग्रिड में बिजली पहुंचाने में एडिसन की प्रत्यक्ष वर्तमान (डीसी) प्रणाली की तुलना में यह अधिक कुशल और प्रभावी तरीका साबित हुआ।
उनके सबसे प्रसिद्ध आविष्कारों में से एक था ‘टेस्ला कॉइल’, एक सर्किट जो बेहद उच्च वोल्टेज चार्ज में ऊर्जा को परिवर्तित करता है, जिससे शक्तिशाली विद्युत क्षेत्र बनते हैं जो शानदार विद्युत चाप बनाने में सक्षम होते हैं। 1943 में, रेडियो के विकास में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें “रेडियो का जनक” कहा गया। उन्होंने रडार प्रौद्योगिकी, एक्स-रे प्रौद्योगिकी और घूर्णन चुंबकीय क्षेत्र के विकास में अग्रणी भूमिका निभाई।


व्यक्तिगत जीवन और विरासत

उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का एक सख्त शेड्यूल था। उन्होंने दिन में लगभग 15 घंटे काम किया और दो घंटे से ज्यादा नहीं सोए। वह हर दिन आठ से दस मील की दूरी तय करता था और उसके पास सामाजिक जीवन नहीं था। उनके पास आठ भाषाओं में बोलने की प्रतिभा के साथ एक फोटोग्राफिक मेमोरी थी।
उन्होंने कभी शादी नहीं की और इस तथ्य के बावजूद कोई भी ज्ञात संबंध नहीं था कि कई महिलाएं उनके प्यार में पागल थीं। वह अपने बाद के वर्षों में एक शाकाहारी बन गया, केवल दूध, रोटी, शहद, और सब्जियों के रस के साथ। वह अपने जीवन के अंत के करीब हर रोज कबूतरों को दाना खिलाता था। 7 जनवरी, 1943 को न्यूयॉर्क शहर के एक होटल के कमरे में अज्ञात कारणों से उनकी मृत्यु हो गई। बाद में यह जांचने से पुष्टि की गई कि कोरोनरी घनास्त्रता के कारण उनकी मृत्यु हो गई। उनके नाम पर निकोला टेस्ला अवार्ड, बिजली के उत्पादन या उपयोग में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रतिवर्ष प्रदान किया जाता है।


पुरस्कार और उपलब्धियां

टेस्ला (इकाई), एसआई व्युत्पन्न चुंबकीय प्रवाह घनत्व (या चुंबकीय सक्रियता) की इकाई, उनके सम्मान में नामित है।
1894 में, उन्हें ‘इलियट क्रेसन मेडल’ से सम्मानित किया गया।
1895 में, उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ़ प्रिंस डेनिलो I ’से सम्मानित किया गया।
1934 में, उन्हें ‘जॉन स्कॉट मेडल’ से सम्मानित किया गया।
1936 में, वह ऑर्डर ऑफ द व्हाइट ईगल, आई क्लास, यूगोस्लाविया सरकार के प्राप्तकर्ता बन गए।
1937 में उन्हें ‘यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेरिस मेडल’ से सम्मानित किया गया.

जवाहरलाल नेहरू

 

जवाहरलाल नेहरू

 

★★★ जन्म :

 

14 नवम्बर, 1889

 

★★★ स्वर्गवास :

 

27 मई, 1964

 

★★★ उपलब्धियां :

 

भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के महान सेनानी एवं स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री (1947-1964) थे। जवाहर लाल नेहरू, संसदीय सरकार की स्थापना और विदेशी मामलों में 'गुटनिरपेक्ष' नीतियों के लिए विख्यात हुए। 1930 और 1940 के दशक में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से वह एक थे।

★★★ जन्म :

 

नेहरू कश्मीरी ब्राह्मण परिवार के थे, जो अपनी प्रशासनिक क्षमताओं तथा विद्वत्ता के लिए विख्यात थे और जो 18वीं शताब्दी के आरंभ में इलाहाबाद आ गये थे। इनका जन्म इलाहाबाद में 14 नवम्बर 1889 ई. को हुआ। वे पं. मोतीलाल नेहरू और श्रीमती स्वरूप रानी के एकमात्र पुत्र थे। अपने सभी भाई-बहनों में, जिनमें दो बहनें थीं, जवाहरलाल सबसे बड़े थे। उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।

★★★ शिक्षा :

 

उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई 14 वर्ष की आयु में नेहरू ने घर पर ही कई अंग्रेज़ अध्यापिकाओं और शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त की। इनमें से सिर्फ़ एक, फ़र्डिनैंड ब्रुक्स का, जो आधे आयरिश और आधे बेल्जियन अध्यात्मज्ञानी थे, उन पर कुछ प्रभाव पड़ा। जवाहरलाल के एक समादृत भारतीय शिक्षक भी थे, जो उन्हें हिन्दी और संस्कृत पढ़ाते थे। 15 वर्ष की उम्र में 1905 में नेहरू एक अग्रणी अंग्रेज़ी विद्यालय इंग्लैण्ड के हैरो स्कूल में भेजे गये। हैरो में दाख़िल हुए, जहाँ वह दो वर्ष तक रहे। नेहरू का शिक्षा काल किसी तरह से असाधारण नहीं था।



पंडित जवाहरलाल नेहरू


परिचय


पंडित जवाहरलाल नेहरू (अंग्रेज़ी: Jawaharlal Nehru, जन्म: 14 नवम्बर, 1889 - मृत्यु: 27 मई, 1964) भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के महान सेनानी एवं स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री (1947-1964) थे। जवाहर लाल नेहरू, संसदीय सरकार की स्थापना और विदेशी मामलों में 'गुटनिरपेक्ष' नीतियों के लिए विख्यात हुए। 1930 और 1940 के दशक में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से वह एक थे।


जन्म

नेहरू कश्मीरी ब्राह्मण परिवार के थे, जो अपनी प्रशासनिक क्षमताओं तथा विद्वत्ता के लिए विख्यात थे और जो 18वीं शताब्दी के आरंभ में इलाहाबाद आ गये थे। इनका जन्म इलाहाबाद में 14 नवम्बर 1889 ई. को हुआ। वे पं. मोतीलाल नेहरू और श्रीमती स्वरूप रानी के एकमात्र पुत्र थे। अपने सभी भाई-बहनों में, जिनमें दो बहनें थीं, जवाहरलाल सबसे बड़े थे। उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।





शिक्षा

उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई 14 वर्ष की आयु में नेहरू ने घर पर ही कई अंग्रेज़ अध्यापिकाओं और शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त की। इनमें से सिर्फ़ एक, फ़र्डिनैंड ब्रुक्स का, जो आधे आयरिश और आधे बेल्जियन अध्यात्मज्ञानी थे, उन पर कुछ प्रभाव पड़ा। जवाहरलाल के एक समादृत भारतीय शिक्षक भी थे, जो उन्हें हिन्दी और संस्कृत पढ़ाते थे। 15 वर्ष की उम्र में 1905 में नेहरू एक अग्रणी अंग्रेज़ी विद्यालय इंग्लैण्ड के हैरो स्कूल में भेजे गये। हैरो में दाख़िल हुए, जहाँ वह दो वर्ष तक रहे। नेहरू का शिक्षा काल किसी तरह से असाधारण नहीं था। और हैरो से वह केंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, जहाँ उन्होंने तीन वर्ष तक अध्ययन करके प्रकृति विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। उनके विषय रसायनशास्त्र, भूगर्भ विद्या और वनस्पति शास्त्र थे। केंब्रिज छोड़ने के बाद लंदन के इनर टेंपल में दो वर्ष बिताकर उन्होंने वकालत की पढ़ाई की और उनके अपने ही शब्दों में परीक्षा उत्तीर्ण करने में उन्हें 'न कीर्ति, न अपकीर्ति' मिली।


परिवार

भारत लौटने के चार वर्ष बाद मार्च 1916 में नेहरू का विवाह कमला कौल के साथ हुआ, जो दिल्ली में बसे कश्मीरी परिवार की थीं। उनकी अकेली संतान इंदिरा प्रियदर्शिनी का जन्म 1917 में हुआ; बाद में वह, विवाहोपरांत नाम 'इंदिरा गांधी', भारत की प्रधानमंत्री बनीं। तथा एक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसकी शीघ्र ही मृत्यु हो गयी थी।


बैरिस्टर के रूप में

1912 ई. में वे बैरिस्टर बने और उसी वर्ष भारत लौटकर उन्होंने इलाहाबाद में वकालत प्रारम्भ की। वकालत में उनकी विशेष रुचि न थी और शीघ्र ही वे भारतीय राजनीति में भाग लेने लगे। 1912 ई. में उन्होंने बाँकीपुर (बिहार) में होने वाले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया।


राजनीति में

भारत लौटने के बाद नेहरू ने पहले वकील के रूप में स्थापित होने का प्रयास किया लेकिन अपने पिता के विपरीत उनकी इस पेशे में कोई ख़ास रुची नहीं थी और उन्हें वकालत और वकीलों का साथ, दोनों ही नापसंद थे। उस समय वह अपनी पीढ़ी के कई अन्य लोगों की भांति भीतर से एक ऐसे राष्ट्रवादी थे, जो अपने देश की आज़ादी के लिए बेताब हो, लेकिन अपने अधिकांश समकालीनों की तरह उसे हासिल करने की ठोस योजनाएं न बना पाया हो।


गाँधी जी से मुलाकात

1916 ई. के लखनऊ अधिवेशन में वे सर्वप्रथम महात्मा गाँधी के सम्पर्क में आये। गांधी उनसे 20 साल बड़े थे। दोनों में से किसी ने भी आरंभ में एक-दूसरे को बहुत प्रभावित नहीं किया। बहरहाल, 1929 में कांग्रेस के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन का अध्यक्ष चुने जाने तक नेहरू भारतीय राजनीति में अग्रणी भूमिका में नहीं आ पाए थे। इस अधिवेशन में भारत के राजनीतिक लक्ष्य के रूप में संपूर्ण स्वराज्य की घोषणा की गई। उससे पहले मुख्य लक्ष्य औपनिवेशिक स्थिति की माँग था।


गाँधी जी के अनुयायी के रूप में

नेहरू की आत्मकथा से भारतीय राजनीति में उनकी गहरी रुचि का पता चलता है। उन्हीं दिनों अपने पिता को लिखे गए पत्रों से भारत की स्वतंत्रता में उन दोनों की समान रुचि दिखाई देती है। लेकिन गांधी से मुलाक़ात होने तक पिता और पुत्र में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए निश्चित योजनाओं का विकास नहीं हुआ था। गांधी ने उन्हें राजनीति में अपना अनुयायी बना लिया। गांधी द्वारा कर्म पर बल दिए जाने के गुण से वह दोनों प्रभावित हुए। महात्मा गांधी का तर्क था कि ग़लती की सिर्फ़ निंदा ही नहीं, बल्कि प्रतिरोध भी किया जाना चाहिए। इससे पहले नेहरू और उनके पिता समकालीन भारतीय राजनीतिज्ञों का तिरस्कार करते थे, जिनका राष्ट्रवाद, कुछ अपवादों को छोड़कर लंबे भाषणों और प्रस्तावों तक सीमित था। गांधी द्वारा ग्रेट ब्रिटेन के ख़िलाफ़ बिना भय या घृणा के लड़ने पर ज़ोर देने से भी जवाहरलाल बहुत प्रभावित हुए।


जेल यात्रा

कांग्रेस पार्टी के साथ नेहरू का जुड़ाव 1919 में प्रथम विश्व युद्ध के तुरंत बाद आरंभ हुआ। इस काल में राष्ट्रवादी गतिविधियों की लहर ज़ोरों पर थी और अप्रैल 1919 को अमृतसर के नरसंहार के रूप में सरकारी दमन खुलकर सामने आया; स्थानीय ब्रिटिश सेना कमांडर ने अपनी टुकड़ियों को निहत्थे भारतीयों की एक सभा पर गोली चलाने का हुक्म दिया, जिसमें 379 लोग मारे गये और कम से कम 1,200 घायल हुए। नेहरू जी के शब्दों में:-भारत की सेवा का अर्थ, करोड़ों पीड़ितों की सेवा है। इसका अर्थ दरिद्रता और अज्ञान, और अवसर की विषमता का अन्त करना है। हमारी पीढ़ी के सबसे बड़े आदमी की यह आकांक्षा रही है-कि प्रत्येक आँख के प्रत्येक आँसू को पोंछ दिया जाए। ऐसा करना हमारी शक्ति से बाहर हो सकता है, लेकिन जब तक आँसू हैं और पीड़ा है, तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा।1921 के आख़िर में जब कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं को कुछ प्रांतों में ग़ैर क़ानूनी घोषित कर दिया गया, तब पहली बार नेहरू जेल गये। अगले 24 वर्ष में उन्हें आठ बार बंदी बनाया गया, जिनमें से अंतिम और सबसे लंबा बंदीकाल, लगभग तीन वर्ष का कारावास जून 1945 में समाप्त हुआ। नेहरू ने कुल मिलाकर नौ वर्ष से ज़्यादा समय जेलों में बिताया। अपने स्वभाव के अनुरूप ही उन्होंने अपनी जेल-यात्राओं को असामान्य राजनीतिक गतिविधि वाले जीवन के अंतरालों के रूप में वर्णित किया है।


चाचा नेहरू

देशभर में जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन 14 नवंबर बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। नेहरू बच्चों से बेहद प्यार करते थे और यही कारण था कि उन्हें प्यार से चाचा नेहरू बुलाया जाता था। एक बार चाचा नेहरू से मिलने एक सज्जन आए। बातचीत के दौरान उन्होंने नेहरू जी से पूछा, पंडित जी, आप सत्तर साल के हो गये हैं, लेकिन फिर भी हमेशा बच्चों की तरह तरोताज़ा दिखते हैं, जबकि आपसे छोटा होते हुए भी मैं बूढ़ा दिखता हूँ। नेहरू जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, इसके तीन कारण हैं।मैं बच्चों को बहुत प्यार करता हूँ। उनके साथ खेलने की कोशिश करता हूँ, इससे मैं अपने आपको उनको जैसा ही महसूस करता हूँ।मैं प्रकृति प्रेमी हूँ, और पेड़-पौधों, पक्षी, पहाड़, नदी, झरनों, चाँद, सितारों से बहुत प्यार करता हूँ। मैं इनके साथ में जीता हूँ, जिससे यह मुझे तरोताज़ा रखते हैं।अधिकांश लोग सदैव छोटी-छोटी बातों में उलझे रहते हैं और उसके बारे में सोच-सोचकर दिमाग़ ख़राब करते हैं। मेरा नज़रिया अलग है और मुझ पर छोटी-छोटी बातों का कोई असर नहीं होता। यह कहकर नेहरू जी बच्चों की तरह खिलखिलाकर हंस पड़े।जवाहरलाल नेहरू हमारी पीढ़ी के एक महानतम व्यक्ति थे। वह एक ऐसे अद्वितीय राजनीतिज्ञ थे, जिनकी मानव-मुक्ति के प्रति सेवाएं चिरस्मरणीय रहेंगी। स्वाधीनता-संग्राम के योद्धा के रूप में वह यशस्वी थे और आधुनिक भारत के निर्माण के लिए उनका अंशदान अभूतपूर्व था।- डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन


पहला चुनाव प्रचार

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पहला चुनाव प्रचार भी यादगार है। एक कमेंटेटर के मुताबिक कांग्रेस का चुनाव प्रचार केवल नेहरू पर केन्द्रित था। चुनाव में नेहरू ने सड़क, रेल, पानी और हवाई जहाज़ सभी का सहारा लिया। उन्होंने 25,000 मील की दूरी तय की। 18,000 मील हवाई जहाज़ से, 5200 मील कार से, 1600 मील ट्रेन से और 90 मील नाव से। चुनाव आयोग के लिए राहत की बात ये थी कि निरक्षरता के बावजूद पूरे देश में 60 प्रतिशत वोटिंग हुई। जबकि पहले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को सबसे ज़्यादा 364 सीटें मिली थी।


भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष

साइमन कमीशन के विरुद्ध लखनऊ के प्रदर्शन में उन्होंने भाग लिया। एक अहिंसात्मक सत्याग्रही होने पर भी उन्हें पुलिस की लाठियों की गहरी मार सहनी पड़ी। 1928 ई. में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महामंत्री बने 1929 के लाहौर अधिवेशन के बाद नेहरू देश के बुद्धिजीवियों और युवाओं के नेता के रूप में उभरे। नेहरू जी ने कहा था:-मेरे विचार में, हम भारतवासियों के लिए- एक विदेशी भाषा को अपनी सरकारी भाषा के रूप में स्वीकारना सरासर अशोभनीय होगा। मैं आपको कह सकता हूँ कि बहुत बार जब हम लोग विदेशों में जाते हैं, और हमें अपने ही देशवासियों से अंग्रेज़ी में बातचीत करनी पड़ती है, तो मुझे कितना बुरा लगता है। लोगों को बहुत ताज्जुब होता है, और वे हमसे पूछते हैं कि हमारी कोई भाषा नहीं है? हमें विदेशी भाषा में क्यों बोलना पड़ता हैं?


द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कारावास

सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने के बाद जब वाइसरॉय लॉर्ड लिनलिथगो ने स्वायत्तशासी प्रांतीय मंत्रिमंडलों से परामर्श किए बिना भारत को युद्ध में झोंक दिया, तो इसके विरोध में कांग्रेस पार्टी के आलाकमान ने अपने प्रांतीय मंत्रिमंडल वापस ले लिए। कांग्रेस की इस कार्रवाई से राजनीति का अखाड़ा जिन्ना और मुस्लिम लीग के लिए साफ़ हो गया।


भारत छोड़ो प्रस्ताव

कांग्रेस पार्टी में अब नेतृव्य गाँधी के हाथों में था, जिन्होंने अंग्रेज़ों को भारत छोड़ देने का आह्वान किया, नेहरू हालांकि युद्ध- प्रयत्नों पर प्रश्न उठाने में संकोच कर रहे थे, लेकिन गाँधी का साथ देने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था। 8 अगस्त 1942 को मुंबई में कांग्रेस पार्टी द्वारा 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित करने के बाद गाँधी जी और नेहरू समेत समूची कांग्रेस कार्यकारिणी समिति को गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया गया। अपने नौवें और अंतिम कारावास से नेहरू 15 जून 1945 को रिहा हुए।


भारत और पाकिस्तान का विभाजन

दो वर्ष के भीतर भारत को स्वतन्त्र और विभाजित होना था। वाइसरॉय लॉर्ड वेवेल द्वारा कांग्रेस पार्टी और मुस्लिम लीग को साथ लाने की अंतिम कोशिश भी नाक़ाम रही। इस बीच लंदन में युद्ध के दौरान सत्तारूढ़ चर्चिल प्रशासन का स्थान लेबर पार्टी की सरकार ने ले लिया था। उसने अपने पहले कार्य के रूप में भारत में एक कैबिनेट मिशन भेजा और बाद में लॉर्ड वेवेल की जगह लॉर्ड माउंटबेटन को नियुक्त कर दिया। अब प्रश्न भारत की स्वतन्त्रता का नहीं, बल्कि यह था कि इसमें एक ही स्वतंत्र राज्य होगा या एक से अधिक होंगे। जहाँ गाँधी ने विभाजन को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। वहीं नेहरू ने अनिच्छा, लेकिन यथार्थवादिता से मौन सहमति दे दी। भारत की स्वतंत्रता दिवस पर प्रकाशित होने वाले उत्तराखण्ड के प्रमुख पत्र युगवाणी में नेहरू जी द्वारा दिनांक 9 अगस्त 1947 को दिल्ली के रामलीला मैदान में दिये गये भाषण का अंश प्रकाशित करते हुये लिखा गया था कि पं. जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि - राज्यों का पुनर्गठन :नेहरू के समय में एक और अहम फ़ैसला भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का था। इसके लिए राज्य पुनर्गठन क़ानून (1956) पास किया गया। आज़ादी के बाद भारत में राज्यों की सीमाओं में हुआ यह सबसे बड़ा बदलाव था। इसके तहत 14 राज्यों और छह केंद्र शासित प्रदेशों की स्थापना हुई। इसी क़ानून के तहत केरल और बॉम्बे को राज्य का दर्जा मिला। संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ा गया जिसके तहत भाषाई अल्पसंख्यकों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिला।


प्रधानमंत्री के रूप में उपलब्धियाँ

1929 में जब लाहौर अधिवेशन में गांधी ने नेहरू को अध्यक्ष पद के लिए चुना था, तब से 35 वर्षों तक- 1964 में प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए मृत्यु तक, 1962 में चीन से हारने के बावजूद, नेहरू अपने देशवासियों के आदर्श बने रहे। राजनीति के प्रति उनका धर्मनिरपेक्ष रवैया गांधी के धार्मिक और पारंपरिक दृष्टिकोण से भिन्न था। गांधी के विचारों ने उनके जीवनकाल में भारतीय राजनीति को भ्रामक रूप से एक धार्मिक स्वरूप दे दिया था। गांधी धार्मिक रुढ़िवादी प्रतीत होते थे, किन्तु वस्तुतः वह सामाजिक उदारवादी थे, जो हिन्दू धर्म को धर्मनिरपेक्ष बनाने की चेष्ठा कर रहे थे। गांधी और नेहरू के बीच असली विरोध धर्म के प्रति उनके रवैये के कारण नहीं, बल्कि सभ्यता के प्रति रवैये के कारण था। जहाँ नेहरु लगातार आधुनिक संदर्भ में बात करते थे। वहीं गांधी प्राचीन भारत के गौरव पर बल देते थे। देश के इतिहास में एक ऐसा मौक़ा भी आया था, जब महात्मा गांधी को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू में से किसी एक का चयन करना था। लौह पुरुष के सख्त और बागी तेवर के सामने नेहरू का विनम्र राष्ट्रीय दृष्टिकोण भारी पड़ा और वह न सिर्फ़ इस पद पर चुने गए, बल्कि उन्हें सबसे लंबे समय तक विश्व के सबसे विशाल लोकतंत्र की बागडोर संभालने का गौरव हासिल भी हुआ।


गुटनिरपेक्ष आंदोलन

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नेहरू का सितारा अक्टूबर 1956 तक बुलंदी पर था। 1956 में सोवियत संघ के ख़िलाफ़ हंगरी के विद्रोह के दौरान भारत के रवैये के कारण उनके गुटनिरपेक्ष नीति की जमकर आलोचना हुई। संयुक्त राष्ट्र में भारत अकेला ऐसा गुटनिरपेक्ष देश था, जिसने हंगरी पर आक्रमण के मामले में सोवियत संघ के पक्ष में मत दिया। इसके बाद नेहरू को गुटनिरपेक्ष आंदोलन के आह्वान की विश्वनियता साबित करने में काफ़ी मुश्किल हुई। स्वतंत्रता के आरंभिक वर्षों में उपनिवेशवाद का विरोध उनकी विदेश- नीति का मूल आधार था, लेकिन 1961 के गुटनिरपेक्ष देशों के बेलग्रेड सम्मेलन तक नेहरू ने प्रतिउपनिवेशवाद की जगह गुटनिरपेक्षता को सर्वोच्च प्राथमिकता देना शुरू कर दिया था। 1962 में लंबे समय से चले आ रहे सीमा-विवाद के फलस्वरूप चीन ने ब्रह्मपुत्र नदी घाटी पर हमले की चेतावनी दी। नेहरू ने अपनी गुटनिरपेक्ष नीति को ताक पर रखते हुए पश्चिमी देशों से सहायता की मांग की और चीन को पीछे हटाना पड़ा। नेहरू जी ने कहा था:- भारत-चीन युद्ध :हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा उस समय बेमानी साबित हो गया जब सीमा विवाद को लेकर 10 अक्तूबर 1962 को चीनी सेना ने लद्दाख़ और नेफ़ा में भारतीय चौकियों पर क़ब्ज़ा कर लिया। नेहरू ने इसे जानबूझ कर की गई कारवाई बताया। नवंबर में एक बार फिर चीन की ओर से हमले शुरू हुए। हालाँकि चीन ने एकतरफ़ा युद्धविराम की घोषणा कर दी। तब तक 1300 से ज़्यादा भारतीय सैनिक मारे जा चुके थे। पंडित नेहरू के करियर का यह सबसे बुरा दौर साबित हुआ। उनकी सरकार के ख़िलाफ़ संसद में पहली बार अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया।


वैज्ञानिक प्रगति के प्रेरणा स्रोत

गांधी जी के विचारों के प्रतिकूल जवाहरलाल नेहरू ने देश में औद्योगीकरण को महत्व देते हुए भारी उद्योगों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया। विज्ञान के विकास के लिए 1947 ई. में नेहरू ने 'भारतीय विज्ञान कांग्रेस' की स्थापना की। उन्होंने कई बार 'भारतीय विज्ञान कांग्रेस' के अध्यक्ष पद से भाषण दिया। भारत के विभिन्न भागों में स्थापित वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अनेक केंद्र इस क्षेत्र में उनकी दूरदर्शिता के स्पष्ट प्रतीक हैं। खेलों में नेहरू की व्यक्तिगत रुचि थी। उन्होंने खेलों को मनुष्य के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए आवश्यक बताया। एक देश का दूसरे देश से मधुर सम्बन्ध क़ायम करने के लिए 1951 ई. में उन्होंने दिल्ली में प्रथम एशियाई खेलों का आयोजन करवाया। समाजवादी विचारधारा से प्रभावित नेहरू ने भारत में लोकतांत्रिक समाजवाद की स्थापना का लक्ष्य रखा। उन्होंने आर्थिक योजना की आवश्यकता पर बल दिया। वे 1938 ई. में कांग्रेस द्वारा नियोजित 'राष्ट्रीय योजना समिति' के अध्यक्ष भी थे। स्वतंत्रता पश्चात वे 'राष्ट्रीय योजना आयोग' के प्रधान बने। नेहरू जी ने साम्प्रदायिकता का विरोध करते हुए धर्मनिरपेक्षता पर बल दिया। उनके व्यक्तिगत प्रयास से ही भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया था।


मृत्यु

चीन के साथ संघर्ष के कुछ ही समय बाद नेहरू के स्वास्थ्य में गिरावट के लक्षण दिखाई देने लगे। उन्हें 1963 में दिल का हल्का दौरा पड़ा, जनवरी 1964 में उन्हें और दुर्बल बना देने वाला दौरा पड़ा। कुछ ही महीनों के बाद तीसरे दौरे में 27 मई 1964 में उनकी मृत्यु हो गई।



Conclusion:-

Never Forever, Give Up..!!!




कस्तूरबा गाँधी

 

कस्तूरबा गाँधी

 

★★★ जन्म :

11 अप्रैल, 1869

★★★ स्वर्गवास :

22 फ़रवरी, 1944

★★★ कार्य: स्वतंत्रता सेनानी :

अगर हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम की बात करें तो हमारे मस्तिष्क में अनेकों महिलाओं का नाम प्रतिबिंबित होता है पर वो महिला जिनका नाम ही स्वतंत्रता का पर्याय बन गया है वो हैं कस्तूरबा गाँधी। बा के नाम से विख्यात कस्तूरबा गाँधी राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की धर्मपत्नी थीं और भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। निरक्षर होने के बावजूद कस्तूरबा के अन्दर अच्छे-बुरे को पहचानने का विवेक था। उन्होंने ताउम्र बुराई का डटकर सामना किया और कई मौकों पर तो गांधीजी को चेतावनी देने से भी नहीं चूकीं।

बकौल महात्मा गाँधी, “जो लोग मेरे और बा के निकट संपर्क में आए हैं, उनमें अधिक संख्या तो ऐसे लोगों की है, जो मेरी अपेक्षा बा पर कई गुना अधिक श्रद्धा रखते हैं”। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन अपने पति और देश के लिए व्यतीत कर दिया। इस प्रकार देश की आजादी और सामाजिक उत्थान में कस्तूरबा गाँधी ने बहुमूल्य योगदान दिया।

★★★ प्रारंभिक जीवन :

कस्तूरबा गाँधी का जन्म 11 अप्रैल सन 1869 में काठियावाड़ के पोरबंदर नगर में हुआ था। कस्तूरबा के पिता गोकुलदास मकनजी एक साधारण व्यापारी थे और कस्तूरबा उनकी तीसरी संतान थी। उस जमाने में ज्यादातर लोग अपनी बेटियों को पढ़ाते नहीं थे और विवाह भी छोटी उम्र में ही कर देते थे। कस्तूरबा के पिता महात्मा गांधी के पिता के करीबी मित्र थे और दोनों मित्रों ने अपनी मित्रता को रिश्तेदारी में बदलने का निर्णय कर लिया था। कस्तूरबा बचपन में निरक्षर थीं और मात्र सात साल की अवस्था में उनकी सगाई 6 साल के मोहनदास के साथ कर दी गई और तेरह साल की छोटी उम्र में उन दोनों का विवाह हो गया।

कस्तूरबा का शुरूआती गृहस्थ जीवन बहुत ही कठिन था। उनके पति मोहनदास करमचंद गाँधी उनकी निरक्षरता से अप्रसन्न रहते थे और उन्हें ताने देते रहते थे। मोहनदास को कस्तूरबा का संजना, संवरना और घर से बाहर निकलना बिलकुल भी पसंद नहीं था। उन्होंने बा पर आरंभ से ही अंकुश रखने का प्रयास किया पर ज्यादा सफल नहीं हो पाए।

★★★ गाँधी जी के साथ जीवन :

विवाह पश्चात पति-पत्नी सन 1888 तक लगभग साथ-साथ ही रहे परन्तु मोहनदास के इंग्लैंड प्रवास के बाद वो अकेली ही रहीं। मोहनदास के अनुपस्थिति में उन्होंने अपने बच्चे हरिलाल का पालन-पोषण किया। शिक्षा समाप्त करने के बाद गाँधी इंग्लैंड से लौट आये पर शीघ्र ही उन्हें दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा। इसके पश्चात मोहनदास सन 1896 में भारत आए और तब कस्तूरबा को अपने साथ ले गए। दक्षिण अफ्रीका जाने से लेकर अपनी मृत्यु तक बा महात्मा गाँधी का अनुसरण करती रहीं।

उन्होंने अपने जीवन को गाँधी की तरह ही सादा और साधारण बना लिया था। वे गाँधी के सभी कार्यों में सदैव उनके साथ रहीं। बापू ने स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान अनेकों उपवास रखे और इन उपवासों में वो अक्सर उनके साथ रहीं और देखभाल करती रहीं। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने गांधीजी का बखूबी साथ दिया। वहां पर भारतियों की दशा के विरोध में जब वो आन्दोलन में शामिल हुईं तब उन्हें गिरफ्तार कर तीन महीनों की कड़ी सजा के साथ जेल भेज दिया गया। जेल में मिला भोजन अखाद्य था अत: उन्होंने फलाहार करने का निश्चय किया पर अधिकारियों द्वारा उनके अनुरोध पर ध्यान नहीं दिए जाने पर उन्होंने उपवास किया जिसके पश्चात अधिकारियों को झुकना पड़ा।

सन 1915 में कस्तूरबा भी महात्मा गाँधी के साथ भारत लौट आयीं हर कदम पर और उनका साथ दिया। कई बार जन गांधीजी जेल गए तब उन्होंने उनका स्थान लिया। चंपारण सत्याग्रह के दौरान वो भी गाँधी जी के साथ वहां गयीं और लोगों को सफाई, अनुशासन, पढाई आदि के महत्व के बारे में बताया। इसी दौरान वो गाँवों में घूमकर दवा वितरण करती रहीं। खेड़ा सत्याग्रह के दौरान भी बा घूम-घूम कर स्त्रियों का उत्साहवर्धन करती रही।

सन 1922 में गाँधी के गिरफ्तारी के पश्चात उन्होंने वीरांगनाओं जैसा वक्तव्य दिया और इस गिरफ्तारी के विरोध में विदेशी कपड़ों के परित्याग का आह्वान किया। उन्होंने गांधीजी का संदेश प्रसारित करने के लिए गुजरात के गाँवों का दौरा भी किया। 1930 में दांडी और धरासणा के बाद जब बापू जेल चले गए तब बा ने उनका स्थान लिया और लोगों का मनोबल बढाती रहीं। क्रन्तिकारी गतिविधियों के कारण 1932 और 1933 में उनका अधिकांश समय जेल में ही बीता। सन 1939 में उन्होंने राजकोट रियासत के राजा के विरोध में भी सत्याग्रह में भाग लिया। वहां के शासक ठाकुर साहब ने प्रजा को कुछ अधिकार देना स्वीकार किया था परन्तु बाद में वो अपने वादे से मुकर गए।

★★★ बिगड़ता स्वास्थ्य और निधन :

भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान अंग्रेजी सरकार ने बापू समेत कांग्रेस के सभी शीर्ष नेताओं को 9 अगस्त 1942 को गिरफ्तार कर लिया। इसके पश्चात बा ने मुंबई के शिवाजी पार्क में भाषण करने का निश्चय किया किंतु वहां पहुँचने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और पूना के आगा खाँ महल में भेज दिया गया। सरकार ने महात्मा गाँधी को भी यहीं रखा था। उस समय वे अस्वस्थ थीं। गिरफ्तारी के बाद उनका स्वास्थ्य बिगड़ता ही गया और कभी भी संतोषजनक रूप से नहीं सुधरा।

जनवरी 1944 में उन्हें दो बार दिल का दौरा पड़ा। उनके निवेदन पर सरकार ने आयुर्वेद के डॉक्टर का प्रबंध भी कर दिया और कुछ समय के लिए उन्हें थोडा आराम भी मिला पर 22 फरवरी, 1944 को उन्हें एक बार फिर भयंकर दिल का दौरा पड़ा और बा हमेशा के लिए ये दुनिया छोड़कर चली गयीं।