Monday, January 19, 2026

सोलह कलाओं का अर्थ क्या है

 सोलह कलाओं का अर्थ क्या है


श्री राम 12 कलाओं के ज्ञाता थे तो भगवान श्रीकृष्ण सभी 16 कलाओं के ज्ञाता हैं। चंद्रमा की सोलह कलाएं होती हैं। सोलह श्रृंगार के बारे में भी आपने सुना होगा। आखिर ये 16 कलाएं क्या है? उपनिषदों अनुसार 16 कलाओं से युक्त व्यक्ति ईश्‍वरतुल्य होता है।


आपने सुना होगा कुमति, सुमति, विक्षित, मूढ़, क्षित, मूर्च्छित, जाग्रत, चैतन्य, अचेत आदि ऐसे शब्दों को जिनका संबंध हमारे मन और मस्तिष्क से होता है, जो व्यक्ति मन और मस्तिष्क से अलग रहकर बोध करने लगता है वहीं 16 कलाओं में गति कर सकता है।


*चन्द्रमा की सोलह कला : अमृत, मनदा, पुष्प, पुष्टि, तुष्टि, ध्रुति, शाशनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्सना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्ण और पूर्णामृत। इसी को प्रतिपदा, दूज, एकादशी, पूर्णिमा आदि भी कहा जाता है।


उक्तरोक्त चंद्रमा के प्रकाश की 16 अवस्थाएं हैं उसी तरह मनुष्य के मन में भी एक प्रकाश है। मन को चंद्रमा के समान ही माना गया है। जिसकी अवस्था घटती और बढ़ती रहती है। चंद्र की इन सोलह अवस्थाओं से 16 कला का चलन हुआ। व्यक्ति का देह को छोड़कर पूर्ण प्रकाश हो जाना ही प्रथम मोक्ष है।


*मनुष्य (मन) की तीन अवस्थाएं : प्रत्येक व्यक्ति को अपनी तीन अवस्थाओं का ही बोध होता है:- जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति। क्या आप इन तीन अवस्थाओं के अलावा कोई चौथी अवस्था जानते हैं? जगत तीन स्तरों वाला है- 1.एक स्थूल जगत, जिसकी अनुभूति जाग्रत अवस्था में होती है। 2.दूसरा सूक्ष्म जगत, जिसका स्वप्न में अनुभव करते हैं और 3.तीसरा कारण जगत, जिसकी अनुभूति सुषुप्ति में होती है।


तीन अवस्थाओं से आगे: सोलह कलाओं का अर्थ संपूर्ण बोधपूर्ण ज्ञान से है। मनुष्‍य ने स्वयं को तीन अवस्थाओं से आगे कुछ नहीं जाना और न समझा। प्रत्येक मनुष्य में ये 16 कलाएं सुप्त अवस्था में होती है। अर्थात इसका संबंध अनुभूत यथार्थ ज्ञान की सोलह अवस्थाओं से है। इन सोलह कलाओं के नाम अलग-अलग ग्रंथों में भिन्न-भिन्न मिलते है।


जानिए 16 कलाओं के नाम।


इन सोलह कलाओं के नाम अलग-अलग ग्रंथों में अलगे अलग मिलते हैं।


*1.अन्नमया, 2.प्राणमया, 3.मनोमया, 4.विज्ञानमया, 5.आनंदमया, 6.अतिशयिनी, 7.विपरिनाभिमी, 8.संक्रमिनी, 9.प्रभवि, 10.कुंथिनी, 11.विकासिनी, 12.मर्यदिनी, 13.सन्हालादिनी, 14.आह्लादिनी, 15.परिपूर्ण और 16.स्वरुपवस्थित।


*अन्यत्र 1.श्री, 3.भू, 4.कीर्ति, 5.इला, 5.लीला, 7.कांति, 8.विद्या, 9.विमला, 10.उत्कर्शिनी, 11.ज्ञान, 12.क्रिया, 13.योग, 14.प्रहवि, 15.सत्य, 16.इसना और 17.अनुग्रह।


*कहीं पर 1.प्राण, 2.श्रधा, 3.आकाश, 4.वायु, 5.तेज, 6.जल, 7.पृथ्वी, 8.इन्द्रिय, 9.मन, 10.अन्न, 11.वीर्य, 12.तप, 13.मन्त्र, 14.कर्म, 15.लोक और 16.नाम।


16 कलाओं का रहस्य जानिए...


16 कलाएं दरअसल बोध प्राप्त योगी की भिन्न-भिन्न स्थितियां हैं। बोध की अवस्था के आधार पर आत्मा के लिए प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक चन्द्रमा के प्रकाश की 15 अवस्थाएं ली गई हैं। अमावास्या अज्ञान का प्रतीक है तो पूर्णिमा पूर्ण ज्ञान का।


19 अवस्थाएं : भगवदगीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने आत्म तत्व प्राप्त योगी के बोध की उन्नीस स्थितियों को प्रकाश की भिन्न-भिन्न मात्रा से बताया है। इसमें अग्निर्ज्योतिरहः बोध की 3 प्रारंभिक स्थिति हैं और शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ की 15 कला शुक्ल पक्ष की 01..हैं। इनमें से आत्मा की 16 कलाएं हैं।


आत्मा की सबसे पहली कला ही विलक्षण है। इस पहली अवस्था या उससे पहली की तीन स्थिति होने पर भी योगी अपना जन्म और मृत्यु का दृष्टा हो जाता है और मृत्यु भय से मुक्त हो जाता है।


अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ ।


तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥


अर्थात : जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।- (8-24)


भावार्थ : श्रीकृष्ण कहते हैं जो योगी अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण के छह माह में देह त्यागते हैं अर्थात जिन पुरुषों और योगियों में आत्म ज्ञान का प्रकाश हो जाता है, वह ज्ञान के प्रकाश से अग्निमय, ज्योर्तिमय, दिन के सामान, शुक्लपक्ष की चांदनी के समान प्रकाशमय और उत्तरायण के छह माहों के समान परम प्रकाशमय हो जाते हैं। अर्थात जिन्हें आत्मज्ञान हो जाता है। आत्मज्ञान का अर्थ है स्वयं को जानना या देह से अलग स्वयं की स्थिति को पहचानना।


विस्तार से...


1.अग्नि:- बुद्धि सतोगुणी हो जाती है दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव विकसित होने लगता है।


2.ज्योति:- ज्योति के सामान आत्म साक्षात्कार की प्रबल इच्छा बनी रहती है। दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव ज्योति के सामान गहरा होता जाता है।


3.अहः- दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव दिन के प्रकाश की तरह स्थित हो जाता है।


16 कला - 15कला शुक्ल पक्ष + 01 उत्तरायण कला = 16


1.बुद्धि का निश्चयात्मक हो जाना।


2.अनेक जन्मों की सुधि आने लगती है।


3.चित्त वृत्ति नष्ट हो जाती है।


4.अहंकार नष्ट हो जाता है।


5.संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाते हैं। स्वयं के स्वरुप का बोध होने लगता है।


6.आकाश तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। कहा हुआ प्रत्येक शब्द सत्य होता है।


7.वायु तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। स्पर्श मात्र से रोग मुक्त कर देता है।


8.अग्नि तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। दृष्टि मात्र से कल्याण करने की शक्ति आ जाती है।


9.जल तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। जल स्थान दे देता है। नदी, समुद्र आदि कोई बाधा नहीं रहती।


10.पृथ्वी तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। हर समय देह से सुगंध आने लगती है, नींद, भूख प्यास नहीं लगती।


11.जन्म, मृत्यु, स्थिति अपने आधीन हो जाती है।


12.समस्त भूतों से एक रूपता हो जाती है और सब पर नियंत्रण हो जाता है। जड़ चेतन इच्छानुसार कार्य करते हैं।


13.समय पर नियंत्रण हो जाता है। देह वृद्धि रुक जाती है अथवा अपनी इच्छा से होती है।


14.सर्व व्यापी हो जाता है। एक साथ अनेक रूपों में प्रकट हो सकता है। पूर्णता अनुभव करता है। लोक कल्याण के लिए संकल्प धारण कर सकता है।


15.कारण का भी कारण हो जाता है। यह अव्यक्त अवस्था है।


16.उत्तरायण कला- अपनी इच्छा अनुसार समस्त दिव्यता के साथ अवतार रूप में जन्म लेता है जैसे राम, कृष्ण यहां उत्तरायण के प्रकाश की तरह उसकी दिव्यता फैलती है।


सोलहवीं कला पहले और पन्द्रहवीं को बाद में स्थान दिया है। इससे निर्गुण सगुण स्थिति भी सुस्पष्ट हो जाती है। सोलह कला युक्त पुरुष में व्यक्त अव्यक्त की सभी कलाएं होती हैं। यही दिव्यता है।


सत्कर्म करते रहना ही सही अर्थों में,,, जीवन से प्रेम,, है !


सुप्रभात ,,,,आपका दिवस मंगलमय हो !


मंगलकामना : प्रभु आपके जीवन से अन्धकार (अज्ञान )को मिटायें एवं प्रकाश (ज्ञान )से भर दें !


" जीवन का सत्य आत्मिक कल्याण है ना की भौतिक सुख !"


"सत्य वचन में प्रीति करले,सत्य वचन प्रभु वास।


सत्य के साथ प्रभु चलते हैं, सत्य चले प्रभु साथ।। "


( मनुष्य पद की गरिमा को क्यों खोता है और उसके क्या परिणाम होते है ?


उत्तर -- मनुष्य पद की गरिमा को तामसिक प्रवृतियों ( वासना , लालच एवं अहंकार ) के आधीन होने के कारण खोता है ! पवित्र गीता के अनुसार ये प्रवृतिया नरक का द्वार है ! हमारे मत में ये प्रवृतिया हमारे जीवन में तामस के उदय का आरम्भ है और यही तामस मानवो के जीवन में अज्ञानता , जड़ता एवं मूढ़ता के उदय का कारण है जो हमें नरक लोक ले जाने में सक्षम है ! अतः भ्रष्टाचार से बचो यानि पद की गरिमा को मत खोओ ! कोई भी पद या सम्मान (गरिमा ) इस जन्म में (पूर्व में संचित ) पुण्य कर्मो की देन है !पुण्य कर्मो के ह्यास के साथ ही गरिमा भी समाप्त हो जाती है और मानव को फिर अनेक योनियों में भटकना पड़ता है )


"एक माटी का दिया सारी रात अंधियारे से लड़ता है,


तू तो प्रभु का दिया है फिर किस बात से डरता है..."


हे मानव तू उठ और सागर (प्रभु ) में विलीन होने के लिए पुरुषार्थ कर ,,,,,,,


शरीर परमात्मा का दिया हुआ उपहार है ! चाहो तो इससे " विभूतिया " (अच्छाइयां / पुण्य इत्यादि ) अर्जित करलो चाहे घोरतम " दुर्गति " ( बुराइया / पाप ) इत्यादि !


परोपकारी बनो एवं प्रभु का सानिध्य प्राप्त करो !


प्रभु हर जीव में चेतना रूप में विद्यमान है अतः प्राणियों से प्रेम करो !


शाकाहार अपनाओ , करुणा को चुनो !


* परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥


तनु तिज तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा॥


भावार्थ:- जिनके मन में दूसरे का हित बसता है (समाया रहता है), उनके लिए जगत्‌ में कुछ भी (कोई भी गति) दुर्लभ नहीं है। हे तात! शरीर छोड़कर आप मेरे परम धाम में जाइए। मैं आपको क्या दूँ? आप तो पूर्णकाम हैं (सब कुछ पा चुके हैं)॥


भवसागर से पार होने के लिये मनुष्य शरीर रूपी सुन्दर नौका मिल गई है।


सतर्क रहो कहीं ऐसा न हो कि वासना की भँवर में पड़कर नौका डूब जाय।


जिस प्रकार मैले दर्पण में सूर्य देव का प्रकाश नहीं पड़ता है उसी प्रकार मलिन अंतःकरण में ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता है अर्थात मलिन अंतःकरण में शैतान अथवा असुरों का राज होता है ! अतः ऐसा मनुष्य ईश्वर द्वारा प्रदत्त " दिव्यदृष्टि " या दूरदृष्टि का अधिकारी नहीं बन सकता एवं अनेको दिव्य सिद्धियों एवं निधियों को प्राप्त नहीं कर पाता या खो देता है !



स्टीव जॉब्स

 

स्टीवन पॉल स्टीव जॉब्स की जीवनी

स्टीवन पॉल स्टीव जॉब्स


24 फरवरी 1955 को केलिफोर्निया में जन्में स्टीव जॉब्स का जीवन जन्म से ही संघर्ष पूर्ण था, उनकी माँ अविवाहित कॉलेज छात्रा थी। और इसी कारण वे उन्हें रखना नहीं चाहती थी, और स्टीव जॉब्स को किसी अच्छे परिवार में गोद देने का फैसला कर दिया। लेकिन जो गोद लेने वाले थे उन्होंने ये कहकर मना कर दिया की वे लड़की को गोद लेना चाहते हैं। फिर स्टीव जॉब्स को केलिफोर्निया में रहने वाले पॉल और कालरा जॉब्स ने गोद ले लिया। पॉल और कालरा दोनों ही ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे और मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखते थे। जब स्टीव जॉब्स 5 साल के हुए, तब उनका परिवार केलिफोर्निया के पास ही स्थित माउंटेन व्यू चला गया। पॉल मैकेनिक थे, और स्टीव को इलेक्ट्रॉनिक की चीजों के बारे में और कालरा एकाउंटेंट थी इसलिए वे स्टीव की पढ़ाई में मदद किया करती थी। स्टीव ने मोंटा लोमा स्कूल में दाखिला लिया और वही पर अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी की।
इसके बाद वे उच्च शिक्षा कूपटिर्नो जूनियर हाई स्कूल से पूरी की। और सन 1972 में अपनी कॉलेज की पढ़ाई के लिए ओरेगन के रीड कॉल में दाखिला लिया जो कि वहां की सबसे महंगी कॉलेज थी। स्टीव पढने में बहुत ही ज्यादा अच्छे थे लेकिन, उनके माता-पिता पूरी फीस नहीं भर पाते थे, इसलिए स्टीव ने फीस भरने के लिए बोतल के कोक को बेचकर पैसे जुटाते, और पैसे की कमी के कारण मंदिरों में जाकर वहाँ मिलने वाले मुफ्त खाना खाया करते थे। और अपने होस्टल का किराया बचाने के लिए अपने दोस्तों के कमरों में जमीन पर ही सो जाया करते थे। इतनी बचत के बावजूद फीस के पैसे पुरे नहीं जुटा पाते और अपने माता-पिता को कड़ी मेहनत करता देख उन्होंने कॉलेज छोड़कर उनकी मदद करने की सोची। लेकिन उनके माता-पिता उनसे सहमत नहीं थे। इसलिए अपने माता-पिता के कहने पर कॉलेज में नहीं जाने के स्थान पर क्रेटीव क्लासेज (creative classes) जाना स्वीकार किया। जल्दी ही उसमें स्टीव को रूचि बढ़ने लगी। क्लासेस जाने के साथ-साथ वे अटारी नाम की कंपनी में technician का काम करने लगे। स्टीव आध्यात्मिक जीवन में बहुत विश्वास करते थे, इसलिए स्टीव अपने धर्म गुरु से मिलने भारत आए। और काफी समय भारत में गुजारा। भारत में रहने के दौरान उन्होंने पूरी तरह बौद्ध धर्म को अपना लिया और बौद्ध भिक्षु के जैसे कपड़े पहनना शुरू किया। और पूरी तरह आध्यात्मिक हो गये। और भारत से वापिस कैलिफ़ोर्निया चले गए।


एप्पल कंपनी की शुरुआत:-


सन 1976 में मात्र 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने एप्पल Apple कंपनी की शुरुआत की। स्टीव ने अपने स्कूल के सहपाठी मित्र वोजनियाक के साथ मिलकर अपने पिता के गैरेज में ऑपरेटिंग सिस्टम मैकिनटोश तैयार किया। और इसे बेचने के लिए एप्पल कंप्यूटर का निर्माण करना चाहते थे। लेकिन पैसों की कमी के कारण समस्या आ रही थी। लेकिन उनकी ये समस्या उनके एक मित्र माइक मर्कुल्ला ने दूर कर दी साथ ही वे कंपनी में साझेदार भी बन गये। और स्टीव ने एप्पल कंप्यूटर बनाने की शुरुआत की। साथ ही उन्होंने अपने साथ काम करने के लिए Pepsi, Coca Cola कंपनी के मुख्य अधिकारी जॉन स्कली को भी शामिल कर लिया। स्टीव और उनके मित्रों की कड़ी मेहनत के कारण कुछ ही सालों में एप्पल कंपनी गैराज से बढ़कर 2 अरब डॉलर और 4000 कर्मचारियों वाली कंपनी बन चुकी थी।

एप्पल कंपनी से इस्तीफा:-


लेकिन उनकी ये उपलब्धि ज्यादा देर तक नहीं रही, उनके साझेदारों द्वारा उनको ना पसंद किये जाने और आपस में कहासुनी के कारण एप्पल कंपनी की लोकप्रियता कम होने लगी। धीरे-धीरे कंपनी पूरी तरह कर्ज में डूब गयी। और बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर की मीटिंग में सारे दोष स्टीव का ठहराकर सन 1985 में उन्हें एप्पल कंपनी से बाहर कर दिया। ये उनके जीवन का सबसे दुखद पल था। क्योकि जिस कंपनी को उन्होंने कड़ी मेहनत और लग्न से बनाया था उसी से उन्हें निकाल दिया गया था। स्टीव के जाते ही कंपनी पूरी तरह कर्ज में डूब गयी। एप्पल से इस्तीफा देने के 5 साल बाद उन्होंने Next-ink नाम की और Pixer नाम की दो कंपनियों की शुरुआत की।
Next-ink में उपयोग की जाने वाली तकनीक उत्तम थी। और उनका उद्देश्य बेहतरीन सॉफ्टवेर बनाना था। और Pixer कंपनी में animation का काम होता था। एक साल तक काम करने के बाद पैसों की समस्या आने लगी और Rosh perot के साथ साझेदारी कर ली। और पेरोट ने अपने पैसों का निवेश किया। सन 1990 में Next-ink ने पहला कंप्यूटर बाज़ार में उतारा लेकिन बहुत ही ज्यादा महंगा होने के कारण बाजार में नहीं चल सका। फिर Next-ink ने Inter personal computer बनाया जो बहुत ही ज्यादा लोकप्रिय हुआ। और Pixer ने एनिमेटेड फिल्म Toy story बनायीं जो अब तक की सबसे बेहतरीन फिल्म हैं।

एप्पल कंपनी में वापसी:-


सन 1996 में एप्पल ने स्टीव की Pixer को ख़रीदा इस तरह उनके एप्पल में वापसी हुई। साथ ही वे एप्पल के chief executive officer बन गये। सन 1997 में उनकी मेहनत के कारण कंपनी का मुनाफा बढ़ गया और वे एप्पल के सी.इ.ओ. बन गये। सन 1998 में उन्होंने आईमैक I-mac को बाज़ार में लॉन्च किया, जो काफी लोकप्रिय हुआ। और एप्पल ने बहुत ही बड़ी सफलता हासिल कर ली। उसके बाद I-pad, I-phone, I-tune भी लॉन्च किये। सन 2011 में सी.इ.ओ. पद से इस्तीफा दे दिया और बोर्ड के अध्यक्ष बन गये। उस वक्त उनकी प्रॉपर्टी $7.0 बिलियन हो गयी थी। और apple दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी बन गयी थी।

निधन:-


स्टीव को सन 2003 से Pancreatic नाम की कैंसर की बिमारी हो गयी थी। लेकिन फिर भी वे रोज कंपनी में जाते ताकि लोगों को बेहतरीन से बेहतरीन टेक्नोलॉजी प्रदान कर सके और कैंसर की बिमारी के चलते 5 Oct. 2011 को Paalo Aalto केलिफोर्निया में उनका निधन हो गया।


एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल

 

एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल की जीवनी

एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल


एक स्कॉटिश वैज्ञानिक, खोजकर्ता, इंजिनियर और प्रवर्तक थे जो पहले वास्तविक टेलीफोन के अविष्कार के लिये जाने जाते है।


टेलीफोन के अविष्कार की कहानी


एलेग्जेंडर बेल का जन्म 3 मार्च 1847 को स्कॉटलैंड के एडिनबर्घ में हुआ था। उनका पारिवारिक घर 16 साउथ शेर्लोट स्ट्रीट में था और वहाँ एलेग्जेंडर के जन्म को लेकर कई तरह के शिलालेख भी मौजूद है। उनके पिता प्रोफेसर एलेग्जेंडर मेंलविल्ले बेल स्वरवैज्ञानिक और उनकी माता एलिजा ग्रेस थी। उनका जन्म एलेग्जेंडर बेल के नाम से हुई हुआ था और 10 साल की उम्र में अपने पिता से अपने दो भाइयोंं के मध्य नाम की तरह अपना भी मध्य नाम रखने का निवेदन किया था। उनके 11 वें जन्मदिन पर उनके पिता ने उनका मध्यनाम “ग्रैहम” रहने की उन्हें अनुमति भी दी थी, इसका सुझाव उनके पिता के एक कैनेडियन पारिवारिक दोस्त ने उनके पिता को ही दिया था।

उनके परिवार और सहकर्मियों के अनुसार बेल बचपन से ही बहुत होशियार थे। बेल के पिता, दादा और भाई वक्तुत्व्कला और भाषणों से संबंधित काम से जुड़े हुए थे और उनकी माँ और पत्नी दोनों ही बहरे थे। बेल लगातार भाषण और बात करने वाले उपकरणों के अविष्कार में लगे रहते थे और ऐसा करने से ही उनके दिमाग को चालना मिलती भी गयी। और इसी वजह से 1876 में टेलीफोन की खोज करने वाले बेल को यूनाइटेड स्टेट के पहले पेटेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया था। बेल ने टेलीफोन का अविष्कार कर विज्ञान की दुनिया का सबसे बेहतरीन और सबसे प्रसिद्ध अविष्कार भी कर दिया था। टेलीफोन की खोज करने के बाद बेल ने अपने जीवन में और बहुत से अविष्कार भी किये है जिनमें मुख्य रूप से टेलीकम्यूनिकेशन, हीड्रोफ़ोइल और एरोनॉटिक्स शामिल है। नेशनल जियोग्राफिक सोसाइटी में 1898 से 1903 तक उन्होंने वहाँ रहते हुए सेवा की थी और सोसाइटी के दुसरे प्रेसिडेंट के पद पर कार्यरत रहे।

एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल की शिक्षा:-युवा बालक के रूप में बेल अपने भाइयों की ही तरह थे, उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही अपने पिता से ही ग्रहण की थी। अल्पायु में ही उन्हें स्कॉटलैंड के एडिनबर्घ की रॉयल हाई स्कूल में डाला गया था और 15 साल की उम्र में उन्होंने वह स्कूल छोड़ दी थी। उस समय उन्होंने पढ़ाई के केवल 4 प्रकार ही पुरे किये थे। उन्हें विज्ञान में बहुत रूचि थी, विशेषतः जीवविज्ञान में, जबकि दुसरे विषयों में वे ज्यादा ध्यान नही देते थे। स्कूल छोड़ने के बाद बेल अपने दादाजी एलेग्जेंडर बेल के साथ रहने के लिये लन्दन चले गये थे। जब बेल अपने दादा के साथ रह रहे थे तभी उनके अंदर पढ़ने के प्रति अपना प्यार जागृत हुए और तभी से वे घंटो तक पढ़ाई करते थे। युवा बेल ने बाद में अपनी पढ़ाई में काफी ध्यान दिया था। उन्होंने अपने युवा छात्र दृढ़ विश्वास के साथ बोलने के लिये काफी कोशिशे भी की थी। और उन्होंने जाना की उनके सभी सहमित्र उन्होंने एक शिक्षक की तरह देखना चाहते है और उनसे सीखना चाहते है।

16 साल की उम्र में ही बेल वेस्टन हाउस अकादमी, मोरे, स्कॉटलैंड के वक्तृत्वकला और संगीत के शिक्षक भी बने। इसके साथ-साथ वे लैटिन और ग्रीक के विद्यार्थी भी थे। इसके बाद बेल ने एडिनबर्घ यूनिवर्सिटी भी जाना शुरू किया, और वही अपने भाई मेंलविल्ले के साथ रहने लगे थे। 1868 में अपने परिवार के साथ कनाडा शिफ्ट होने से पहले बेल ने अपनी मेंट्रिक की पढ़ाई पूरी कर ली थी और फिर उन्होंने लन्दन यूनिवर्सिटी में एडमिशन भी ले लिया था।

एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल का पहला अविष्कार:-एक बच्चे के रूप में बेल ने इस दुनिया की प्राकृतिक जिज्ञासा को प्रदर्शित किया था और अल्पायु में ही वानस्पतिक नमूनों को इकट्टा कर उनपर प्रयोग करते रहते थे। उनका सबसे अच्छा दोस्त बेन हेर्डमैन था, जो उनका पड़ोसी भी था और उनके परिवार की एक फ्लौर मिल भी थी। बेल हमेशा अपने दोस्त से पूछा करते थे कि मिल में किन-किन चीजों की जरुरत पड़ती है। तब उनका दोस्त कहता था कि कामगारों की सहायता से गेहूं का भूसा बनाया जाता है और उसे पिसा जाता है। 12 साल की उम्र में बेल ने घर पर ही घुमने वाले दो कठोर पहियों को जोड़कर, (जिनके बिच घर्षण हो सके) एक ऐसी मशीन बनायी जिससे गेहूं को आसानी से पिसा जा सकता था। उनकी इस मशीन का उपयोग कई सालों तक होता रहा। बदले में बेन के पिता जॉन हेर्डमैन ने दोनों बच्चो को खोज करने के लिये एक वर्कशॉप भी उपलब्ध करवायी थी।

एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल के अविष्कार:-मई, 1874 में टेलीफोन का अविष्कार। बाद में उन्होंने फ़ोनोंऑटोग्राफ पर प्रयोग करना शुरू किया, एक ऐसी मशीन जो स्वर की लहरों को रुपरेखा दे सके। इसी साल की गर्मियों में उन्होंने टेलीफोन बनाने की योजना भी बनायी। इसके बाद उन्होंने अपने असिस्टेंट थॉमस वाटसन को भी काम पर रख लिया था। 2 जून 1875 को बेल ने टेलीफोन पर चल रहे अपने काम को सिद्ध किया। इसके बाद वाटसन ने बेल के फ़ोनोंऑटोग्राफ में लगी धातु की एक नलिका को खिंचा। अचानक हुई इस घटना से यह भी पता चला की टेलीफोन से हम ध्वनि को भी स्थानांतरित कर सकते है। 7 मार्च 1876 को बेल में अपने विचारों का पेटेंट हासिल किया।

बेल को यूनाइटेड स्टेट पेटेंट ऑफिस पेटेंट नंबर 174,465 मिला। इससे उनके विचारों को भी कॉपी नही कर सकता था और वे आसानी से टेलेग्राफी तरंगो से मशीन से आवाज को स्थानांतरित कर सकते थे। 3 अगस्त 1876 को उन्होंने पहला लंबी दुरी का कॉल लगाया। इसके बाद बेल को दूर के किसी ब्रन्तफोर्ड गाँव से एक ध्वनि-सन्देश भी मिला, यह सन्देश तक़रीबन 4 मिल दूर से आया था। इस घटना के बाद बेल ने अपनी योजनाओं को लोगों के सामने बोलना शुरू किया और अपनी खोजों को सार्वजनिक रूप से जाहिर भी किया। 11 जुलाई 1877 को बेल ने पहली टेलीफोन कंपनी की स्थापना की। बेल के टेलीफोन कंपनी की स्थापना हुई। इसी साल बेल ने कैम्ब्रिज के मबेल हब्बार्ड से शादी की। लेकिन अभी भी उनकी कमाई का जरिया पढाना ही था क्योंकि उस समय टेलीफोन उनके लिए ज्यादा लाभदायी नही था। 1881 को बेल ने दुसरे कई अविष्कार भी किये। बेल ने फोनोग्राफ, मेंटल डिटेक्टर, मेंटल जैकेट की भी खोज की और साथ ही ऑडियोमीटर की भी खोज की ताकि लोगों को सुनने में परेशानी ना हो, इसके बाद उनके नाम पर 18 पेटेंट दर्ज किये गए।

उनके अविष्कारों को देखते हुए उन्हें बहुत से सम्मानों और पुरस्कारों से नवाजा भी गया था और आज भी उन्हें कई पुरस्कार दिये जाते है। 1897 में बेल प्रसिद्ध हुए और बहुत सी संस्थाओ में भी उन्हें शामिल किया गया। 25 जनवरी 1915 को बेल ने पहला ट्रांस-अटलांटिक फ़ोन कॉल लगाया। पहली बार बेल ने उपमहाद्वीप के बाहर से भी वाटसन को कॉल लगाया। इस कॉल के 38 साल पहले, बेल और वाटसन ने फ़ोन पर बात की थी। लेकिन यह कॉल उस फ़ोन से काफी बेहतर था और आवाज भी साफ़ थी।

एलेग्जेंडर ग्रैहम बेल की मृत्यु:-2 अगस्त 1922 को 75 साल की उम्र में अपनी व्यक्तिगत जगह बेंनभ्रेअघ, नोवा स्कॉटिया में डायबिटीज की वजह से उनकी मृत्यु हुई थी। बेल एनीमिया से भी ग्रसित थे। आखरी बार उन्होंने रात को 2.00 बजे अपनी माउंटेन एस्टेट के दर्शन किये थे। लम्बी बीमारी के बाद उनकी पत्नी मबेल ने उनके गानों में गुनगुनाते हुए कहा था, “मुझे छोड़कर मत जाओ।” जवाब में बेल ने “नहीं…।” कहा और कुछ ही समय बाद उनकी मृत्यु भी हो गयी थी। बेल की अंतिम यात्रा को सम्मान देते हुए उत्तरी अमेरिका उपमहाद्वीप के सभी फ़ोन को उनके सम्मान में साइलेंट पर रखा गया था, वे एक ऐसे अविष्कारक थे जिन्होंने अपने अविष्कार से लाखों मील दूर रह रहे इंसान को भी जोड़ा था।

Lessons to take:-

सफलता हमारा परिचय दुनिया को करवाती है और असफलता हमें दुनिया का परिचय करवाती है|


चार्ल्स बैबेज

 

चार्ल्स बैबेज

जीवन परिचय

चार्ल्स बैबेज का जन्म 26 दिसंबर 1791 को इंग्लैंड देश के लंदन में हुआ था । उनके पिता का नाम बेंजामिन बैबेज था जो एक बैंकर थे । चार्ल्स बैबेज के तीन भाई थे , यह चौथे नंबर के थे । इनका परिवार समृद्ध परिवार था । चार्ल्स्स बैबेज ने अच्छी पढ़ाई करके एक अच्छे गणितज्ञ , अविष्कारक , दार्शनिक , यांत्रिक इंजीनियर बने थे ।

चार्ल्स बैबेज को कंप्यूटर का जनक कहा जाता है । इन्हीं की कल्पना से आधुनिक कंप्यूटर का निर्माण किया गया था । चार्ल्स बैबेज ने हीं पहले यांत्रिक कंप्यूटर का निर्माण किया था ।


विवाह & शिक्षा

चार्ल्स बैबेज ने 1814 को जार्जियाना व्हिटमोर नामक महिला से विवाह किया था । जिनके द्वारा चार्ल्स बैबेज के 8 बच्चेेे हुए थे । इन 8 बच्चों में से सिर्फ तीन बच्चे ही जीवित रह पाए थे ।

चार्ल्स बैबेज ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई घर से ही प्रारंभ की थी । चार्ल्स बैबेज को पढ़ाने के लिए घर पर ही एक शिक्षक आया करता था । घर से ही उन्होंने शिक्षा प्राप्त करने का सफर प्रारंभ किया था । इसके बाद उनको आगे की शिक्षा दिलाने के लिए उनके माता-पिता ने उनको होल्मबुड़ स्कूल में भर्ती करा दिया था । यहां से उन्होंने इंटर पास किया था।

इंटर पास करने के बाद चार्ल्स बैबेज आगे की पढ़ाई करने के लिए अक्टूबर 1810 को ट्रिनिटी कॉलेज कैंब्रिज में पढ़ाई करने के लिए चले गए थे । यहां पर वह गणित एवं इंग्लिश की पढ़ाई करने लगे थे । उनकी रुचि पहले से ही गणित विषय में अधिक थी । विज्ञान विषय में भी उन्होंने सफलता प्राप्त की थी । कैंब्रिज कॉलेज से उन्होंने अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी ।



चार्ल्स का वैज्ञानिक सफर:-

चार्ल्स ने स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद कई पदों पर नौकरी करने के लिए आवेदन किए थे लेकिन वह आवेदन अस्वीकार किए गए थे क्योंकि चार्ल्स के पास सिफारिश नहीं थी । कई बार चार्ल्स ने कॉलेज के प्राध्यापक के लिए आवेदन किया था लेकिन चार्ल्स का यह आवेदन स्वीकार नहीं किया गया था । 1815 को चार्ल्स को रॉयल इंस्टीट्यूट में भाषण देने का चांस मिला था । जहां पर चार्ल्स ने खगोल विज्ञान पर भाषण दिया था ।

चार्ल्स बैबेज और उनके कई मित्रों ने मिलकर एक रॉयल सोसायटी बनाई थी और 1816 को चार्ल्स बैबेज को इस रॉयल सोसायटी का साथी चुना गया था । चार्ल्स बैबेज को जब किसी भी पद पर नौकरी करने के लिए नहीं रखा गया था तब चार्ल्स ने अपने खुद के आविष्कार करना प्रारंभ कर दिया था । 1819 को चार्ल्स बैबेज ने अपनी गणना से अपना पहला गणना इंजन बनाने का काम प्रारंभ किया था और उनकी मेहनत एवं लगन से यह गणना इंजन 1822 को बन के तैयार हो गया था ।

जब मशीन का गणितीय सिद्धांत पूरा हो जाता है तब इस मशीन को अंतर इंजन कहा जाता है और इस मशीन का अंतर इंजन नाम चार्ल्स बैबेज ने ही दिया था । चार्ल्स बैबेज ने अपने कई साथियों के साथ मिलकर रॉयल एनालिटिकल एवं घोस्ट क्लब सोसाइटी का भी गठन किया था । इसके बाद 1820 में एस्ट्रोनॉमीकल सोसायटी भी चार्ल्स बैबेज ने बनाई थी । चार्ल्स ने अविष्कार करना बंद नहीं किया था । इसके बाद वह अपना दिमाग कई तरह की मशीन बनाने में लगाते थे और 1822 को चार्ल्स बैबेज ने पहले कंप्यूटर का आविष्कार किया था ।


आविष्कार

चार्ल्स ने जब एनालिटिकल इंजन का आविष्कार किया था तब गणितीय गणना करने में बहुत आसानी हुई थी क्योंकि यह इंजन गणितीय गणना करने में बहुत सक्षम था । यह मशीन बहुत ही बड़ी मशीन थी । इस मशीन को बनाने में बहुत अधिक खर्चा आया था । चार्ल्स बैबेज को यह मशीन बनाने के लिए ब्रिटिश शासन ने पैसेे दिए थे । यह मशीन बहुत ही भारी थी । इस मशीन का साइज एक घर के बराबर था ।

इस मशीन का इंजन भाप से चलता था । इस मशीन में क्रैंक , शाफ़्ट लगी थी । इसके बाद चार्ल्स बैबेज में कई और मशीनें भी बनाई थी । जिनमें से एक और मशीन थी जिसका नाम डिफरेंशियल इंजन । इस मशीन का नाम चार्ल्स बैबेज ने ही डिफरेंशियल इंजन रखा था । इसी मशीन के कारण ही आधुनिक कंप्यूटर का निर्माण हुआ था ।

Conclusion:-

Never Forever, Give Up..!!!  


राजीव गाँधी

 

राजीव गाँधी


राजीव गाँधी की जीवनी


राजीव गाँधी (अंग्रेज़ी:Rajiv Gandhi, जन्म: 20 अगस्त, 1944 - मृत्यु: 21 मई, 1991) भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के पुत्र और भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पौत्र और भारत के नौवें प्रधानमंत्री थे। इनका पूरा नाम राजीव रत्न गांधी था। राजीव गांधी भारत की कांग्रेस (इ) पार्टी के अग्रणी महासचिव (1981 से) थे और अपनी माँ की हत्या के बाद भारत के प्रधानमंत्री (1984-1989) बने। 40 साल की उम्र में देश के सबसे युवा और नौवें प्रधानमंत्री होने का गौरव हासिल करने वाले राजीव गांधी आधुनिक भारत के शिल्पकार कहे जा सकते हैं। यह पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने देश में तकनीक के प्रयोग को प्राथमिकता देकर कंप्यूटर के व्यापक प्रयोग पर जोर डाला। भारत में कंप्यूटर को स्थापित करने के लिए उन्हें कई विरोधों और आरोपों को भी झेलना पड़ा, लेकिन अब वह देश की ताकत बन चुके कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं। राजीव गांधी देश के युवाओं में काफ़ी लोकप्रिय नेता थे। उनका भाषण सुनने के लिए लोग काफ़ी इंतज़ार भी करते थे। राजीव देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री थे। उन्‍होंने अपने प्रधानमंत्रित्‍व काल में कई ऐसे फैसले लिए जिसका असर देश के विकास पर देखने को मिला।  


जीवन परिचय :

राजीव गाँधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को बंबई (वर्तमान मुंबई), भारत में हुआ था। कैम्ब्रिज में पढ़ाई के दौरान राजीव गांधी की मुलाकात एंटोनिया मैनो से हुई, विवाहोपरांत जिनका नाम बदलकर सोनिया गांधी रखा गया। राजीव गाँधी के दो सन्तानें है, पुत्र राहुल गाँधी और पुत्री प्रियंका गाँधी। राजीव तथा उनके छोटे भाई संजय गाँधी (1946-1980) की शिक्षा-दीक्षा देहरादून के प्रतिष्ठित दून स्कूल में हुई थी। इसके बाद राजीव गांधी ने लंदन के इंपीरियल कॉलेज में दाख़िला लिया तथा केंब्रिज विश्वविद्यालय (1965) से इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम पूरा किया, भारत लौटने पर उन्होंने व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस प्राप्त किया और 1968 से इंडियन एयरलाइन्स में काम करने लगे।  





राजनीतिक सफ़र :

राजीव गांधी ने अपनी राजनीतिक आरुचि के बाद भी मां इंदिरा गाँधी के आदेश पर राजनीति जीवन शुरू किया। छोटे भाई संजय के स्थान पर 1981 में अमेठी से पहला चुनाव जीता और लोकसभा में पहुंचे। जब तक उनके भाई जीवित थे, राजीव राजनीति से बाहर ही रहे, लेकिन एक शक्तिशाली राजनीति व्यक्तित्व के धनी संजय की 23 जून, 1980 को एक वायुयान दुर्घटना में मृत्यु हो जाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी राजीव को राजनीतिक जीवन में ले आईं। जून 1981 में वह लोकसभा उपचुनाव में निर्वाचित हुए और इसी महीने युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए। राजनीतिक पृष्ठभूमि होने के बावजूद राजीव गांधी ने कभी भी राजनीति में रुचि नहीं ली। भारतीय राजनीति और शासन व्यवस्था में राजीव गांधी का प्रवेश केवल हालातों की ही देन था। दिसंबर 1984 के चुनावों में कांग्रेस को जबरदस्त बहुमत हासिल हुआ। इस जीत का नेतृत्व भी राजीव गांधी ने ही किया था। अपने शासनकाल में उन्होंने प्रशासनिक सेवाओं और नौकरशाही में सुधार लाने के लिए कई कदम उठाए। कश्मीर और पंजाब में चल रहे अलगाववादी आंदोलनकारियों को हतोत्साहित करने के लिए राजीव गांधी ने कड़े प्रयत्‍‌न किए। भारत में ग़रीबी के स्तर में कमी लाने और ग़रीबों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए 1 अप्रैल 1989 को राजीव गांधी ने जवाहर रोजगार गारंटी योजना को लागू किया जिसके अंतर्गत इंदिरा आवास योजना और दस लाख कुआं योजना जैसे कई कार्यक्रमों की शुरुआत की।[1]  


असाधारण व्यक्तित्व :

कोई व्यक्ति मानसिक रूप से कितना सुदृढ़ हो सकता है, इसकी मिसाल राजीव गाँधी थे। पहले छोटे भाई की मृत्यु और चार वर्षों बाद मॉं की नृशंस हत्या, इस सब के बाद भी उनके कदम डगमगाए नहीं और वे और शक्ति के साथ भारत निर्माण की मंजिल की ओर बढ़ते गए। इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद लोकसभा में कांग्रेस का पूर्ण बहुमत था, राजीव गांधी लोकसभा के निर्वाचित सदस्य थे, फिर भी राजनीतिक शुचिता का परिचय देते हुए, उन्होंने पुनः लोकसभा में चुनाव समय पूर्व करवाए ताकि कोई यह अंगुली न उठा सके कि जनता ने इंदिरा जी को देखकर कांग्रेस को बहुमत दिया था, राजीव को नहीं। और राजीव गांधी के नेतृत्व में भारत के लोकतंत्र में इतिहास में कांग्रेस ने 542 में से 411 सीटें जीतकर एक नया रिकार्ड बनाया। राजीव गांधी के गद्दी संभालने के समय उन्हें आतंकवाद से जलता झुलसता भारत मिला था। उत्तरी भाग में पंजाब तो उत्तरपूर्व में असम जैसे राज्य के आम नागरिक आतंकवादी और आतंकी घटनाओं से संघर्ष कर रहे थे और यह राजीव गांधी के लिए एक बड़ी पीड़ा का कारण था। उन्होंने पंजाब में आतंकवाद के हल करने की दिशा में अग्रसर होते हुए संत हरचरण सिंह लोंगोवाल से आग्रह किया कि ऐसा कुछ सार्थक किया जाए कि जिसके परिणामस्वरूप पंजाब की जनता को आतंक की आग से बचाया जा सके और इसकी परिणिति के रूप में राजीव-लोंगोवाल समझौता सामने आया जिसका त्वरित प्रभाव यह रहा कि पंजाब के लोगों ने पहली बार मानसिक रूप से यह स्वीकार कर लिया कि पंजाब से आतंकवाद खत्म हो सकता है, और पंजाब के युवा पुनः देश के मुख्य धारा में सम्मिलित हो सकते हैं। यद्यपि संत लोंगोवाल के निधन से समझौते के परिणाम प्राप्त होने में समय जरूर लगा पर इस मानसिक दृढ़ता के बल पर ही पंजाब के लोगों ने धीरे-धीरे आतंकवाद पर विजय प्राप्त करी और आज पंजाब में सब कुछ सामान्य है।[2]  


प्रधानमंत्री के रूप में :

31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश की डांवाडोल होती राजनीतिक परिस्थितियों को संभालने के लिए उन्हें प्रधानमंत्री बनाया गया। उस समय कई लोगों ने उन्हें नौसिखिया भी कहा लेकिन जिस तरह से उन्होंने यह जिम्मेदारी निभाई उससे सभी अचंभित रह गए। राजीव को सौम्य व्यक्ति माना जाता था। जो पार्टी के अन्य नेताओं से विचार-विमर्श करते थे और जल्दबाज़ी में निर्णय नहीं लेते थे। जब उनकी माँ की हत्या हुई, तो राजीव को उसी दिन प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई और उन्हें कुछ दिन बाद कांग्रेस (इं) पार्टी का नेता चुन लिया गया। उनका शासनकाल कई आरोपों से भी घिरा रहा जिसमें बोफोर्स घोटाला सबसे गंभीर था। इसके अलावा उन पर कोई ऐसा दाग़ नहीं था जिसकी वजह से उनकी निंदा हो। पाक दामन होने की वजह से ही लोगों के बीच राजीव गांधी की अच्छी पकड़ थी। श्रीलंका में चल रहे लिट्टे और सिंघलियों के बीच युद्ध को शांत करने के लिए राजीव गांधी ने भारतीय सेना को श्रीलंका में तैनात कर दिया। जिसका प्रतिकार लिट्टे ने तमिलनाडु में चुनावी प्रचार के दौरान राजीव गांधी पर आत्मघाती हमला करवा कर लिया। 21 मई, 1991 को सुबह 10 बजे के क़रीब एक महिला राजीव गांधी से मिलने के लिए स्टेज तक गई और उनके पांव छूने के लिए जैसे ही झुकी उसके शरीर में लगा आरडीएक्स फट गया। इस हमले में राजीव गांधी की मौत हो गई। देश में राजीव गांधी की मौत के बाद बहुत बड़ा रोष देखने को मिला।राजनीतिक सफ़र और पद :दिनांक / वर्ष पद1981 लोकसभा (सातवीं) के लिए निर्वाचित1984 लोकसभा (आठवीं) के लिए पुन: निर्वाचित19 अक्टूबर, 1984 से 2 दिसम्बर, 1984 तक प्रधानमंत्री एवं अन्य सभी मंत्रालय विभाग जो कि अन्य किसी मंत्री को आंवटित किए गए।31 दिसम्बर, 1984 से 14 जनवरी, 1985 वाणिज्य और आपूर्ति, विदेश, उद्योग व कम्पनी मामले, विज्ञान व प्रौद्योगिकी, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, इलैक्ट्रानिक्स, महासागर, विकास, कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार, युवा मामले एवं खेल, संस्कृति, पर्यटन एवं नागर विमानन मंत्रालय का भी पदभार सम्भाला।31 दिसम्बर, 1984 से 20 अक्टूबर, 1986 पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के भी प्रभारी।25 दिसम्बर, 1985 से 24 जनवरी, 1987 रक्षा मंत्रालय के भी प्रभारी।4 जून, 1986 से 24 जून, 1986 परिवहन मंत्रालय के भी प्रभारी।24 जनवरी, 1987 से 25 जुलाई, 1987 वित्त मंत्रालय के भी प्रभारी।4 मई, 1987 से 25 जुलाई, 1987 कार्याक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के भी प्रभारी।15 जुलाई, 1987 से 28 जुलाई, 1987 पर्यटन मंत्रालय के भी प्रभारी।25 जुलाई, 1987 से 26 जून, 1988 विदेश मंत्रालय का भी कार्यभार सम्भाला।22 अगस्त, 1987 से 10 नवम्बर, 1987 जल संसाधन मंत्रालय का कार्यभार भी सम्भाला।मई, 1989 से जुलाई, 1989 संचार मंत्रालय का भी कार्यभार सम्भाला।1989 लोक सभा (नौवीं) के लिए तीसरी बार निर्वाचित।18 दिसम्बर, 1989 से 24 दिसम्बर, 1990 लोक सभा (नौवीं) में विपक्ष के नेता।24 जनवरी, 1990 सदस्य, सामान्य प्रयोजन समिति।1991 लोक सभा (दसवीं) के लिए चौथी बार निर्वाचित।  


योगदान:

राजीव गांधी अपनी इच्छा के विपरीत राजनीति में आए थे। वह खुद राजनीति को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे लेकिन यह विडंबना ही है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज्यादा आलोचना झेलनी पड़ी। उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल और शुरुआत की जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल है। राजीव ने कई साहसिक कदम उठाए जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिजोरम समझौता आदि शामिल है।[3]

 

अलगाववादी आन्दोलन:

दिसम्बर 1984 के आम चुनाव में उन्होंने पार्टी की ज़बरदस्त जीत का नेतृत्व किया और उनके प्रशासन ने सरकारी नौकरशाही में सुधार लाने तथा देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए ज़ोरदार क़दम उठाए। लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आन्दोलन को हतोत्साहित करने की राजीव की कोशिश का उल्टा असर हुआ तथा कई वित्तीय साज़िशों में उनकी सरकार के उलझने के बाद उनका नेतृत्व लगातार अप्रभावी होता गया। 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस (इं) पार्टी के नेता पद पर बने रहे। आगामी संसदीय चुनाव के लिए तमिलनाडु में चुनाव प्रचार के दौरान एक आत्मघाती महिला के बम विस्फोट में उनकी मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि यह महिला तमिल अलगाववादियों से संबद्ध थी।

 

निधन :

अपने राजनीतिक फैसलों से कट्टरपंथियों को नाराज कर चुके राजीव पर श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक्त हमला किया गया लेकिन वह बाल-बाल बच गए थे पर 1991 में ऐसा नहीं हो सका। 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर में एक आत्मघाती हमले में वह मारे गए। उनके साथ 17 और लोगों की जान गई। राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जिसे सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया।

Conclusion:-

Never Forever, Give Up..!!!  


जमशेदजी टाटा

 

Jamsetji Tata Success Story


परिचय


जमशेदजी टाटा भारत के प्रसिद्ध उद्योगपति तथा औद्योगिक घराने टाटा समूह के संस्थापक थे। भारतीय औद्योगिक क्षेत्र में जमशेदजी ने जो योगदान दिया वह अति असाधारण और बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। जब सिर्फ यूरोपीय, विशेष तौर पर अंग्रेज़, ही उद्योग स्थापित करने में कुशल समझे जाते थे, जमशेदजी ने भारत में औद्योगिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया था। टाटा साम्राज्य के संस्थापक जमशेदजी द्वारा किए गये कार्य आज भी लोगों प्रोत्साहित करते हैं। उनके अन्दर भविष्य को भाँपने की अद्भुत क्षमता थी जिसके बल पर उन्होंने एक औद्योगिक भारत का सपना देखा था। उद्योगों के साथ-साथ उन्होंने विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा के लिए बेहतरीन सुविधाएँ उपलब्ध करायीं।


प्रारंभिक जीवन

जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा का जन्म 3 मार्च 1839 में दक्षिणी गुजरात के नवसारी में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम नुसीरवानजी तथा माता का नाम जीवनबाई टाटा था। उनके पिता अपने ख़ानदान में अपना व्यवसाय करने वाले पहले व्यक्ति थे। मात्र चौदह वर्ष की आयु में ही जमशेदजी अपने पिता के साथ बंबई आ गए और व्यवसाय में क़दम रखा। छोटी उम्र में ही उन्होंने अपने पिता का साथ देना शुरू कर दिया था। जब वे सत्रह साल के थे तब उन्होंने मुंबई के ‘एलफ़िंसटन कॉलेज’, में प्रवेश ले लिया और दो वर्ष बाद सन 1858 में ‘ग्रीन स्कॉलर’ (स्नातक स्तर की डिग्री) के रूप में उत्तीर्ण हुए और पिता के व्यवसाय में पूरी तरह लग गए। इसके पश्चात इनका विवाह हीरा बाई दबू के साथ करा दिया गया। व्यापार के सम्बन्ध में जमशेदजी ने इंग्लैंड, अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों की यात्राएं की जिससे उनके व्यापार सम्बन्धी ज्ञान और सूझ-बूझ में बृद्धि हुई। इन यात्राओं से उनको यह अनुभव हो गया था कि ब्रिटिश आधिपत्य वाले कपड़ा उद्योग में भारतीय कंपनियां भी सफल हो सकती हैं।



उद्योग में प्रवेश

29 साल की अवस्था तक उन्होंने अपने पिता की कंपनी में कार्य किया फिर उसके बाद सन 1868 में 21 हज़ार की पूँजी लगाकर एक व्यापारिक प्रतिष्ठान स्थापित किया। सन 1869 में उन्होने एक दिवालिया तेल मिल ख़रीदा और उसे एक कॉटन मिल में तब्दील कर उसका नाम एलेक्जेंडर मिल रख दिया! लगभग दो साल बाद जमशेदजी ने इस मिल को ठीक-ठाक मुनाफे के साथ बेच दिया और इन्ही रुपयों से उन्होंने सन 1874 में नागपुर में एक कॉटन मिल स्थापित किया। उन्होंने इस मिल का नाम बाद में ‘इम्प्रेस्स मिल’ कर दिया जब महारानी विक्टोरिया को ‘भारत की रानी’ का खिताब दिया गया। जमशेदजी एक ऐसे भविष्य-द्रष्टया थे जिन्होंने न सिर्फ देश में औद्योगिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया बल्कि अपने कारखाने में काम करने वाले श्रमिकों के कल्याण का भी बहुत ध्यान रखा। श्रमिकों और मजदूरों के कल्याण के मामले में वे अपने समय से कहीँ आगे थे। वे सफलता को कभी केवल अपनी जागीर नही समझते थे, बल्कि उनके लिए सफलता का मतलब उनकी भलाई भी थी जो उनके लिए काम करते थे। दादाभाई नौरोजी और फिरोजशाह मेहता जैसे अनेक राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी नेताओं से उनके नजदीकी संबंध थे और दोनों पक्षों ने अपनी सोच और कार्यों से एक दूसरे को बहुत प्रभावित किया था। वे मानते थे कि आर्थिक स्वतंत्रता ही राजनीतिक स्वतंत्रता का आधार है। जमशेद जी के जीवन के बड़े लक्ष्यों में थे – एक स्टील कंपनी खोलना, एक विश्व प्रसिद्ध अध्ययन केंद्र स्थापित करना, एक अनूठा होटल खोलना और एक जलविद्युत परियोजना लगाना। हालाँकि उनके जीवन काल में इनमें से सिर्फ एक ही सपना पूरा हो सका – होटल ताज महल का सपना। बाकी की परियोजनाओं को उनकी आने वाली पीढ़ी ने पूरा किया। होटल ताज महल दिसंबर 1903 में 4,21,00,000 रुपये के भारी खर्च से तैयार हुआ। उस समय यह भारत का एकमात्र होटल था जहाँ बिजली की व्यवस्था थी। इस होटल की स्थापना उनके राष्ट्रवादी सोच के कारण हुई। भारत में उन दिनों भारतीयों को बेहतरीन यूरोपिय होटलों में घुसने नही दिया जाता था – ताजमहल होटल का निर्माण कर उन्होंने इस दमनकारी नीति का करारा जवाब दिया था।


देश के औद्योगिक विकास में योगदान

देश के औद्योगिक क्षेत्र में जमशेदजी का असाधारण योगदान है। इन्होंने भारत में औद्योगिक विकास की नीवं उस समय डाली जब देश गुलामी की जंजीरों से जकड़ा था और उद्योग-धंधे स्थापित करने में अंग्रेज ही कुशल समझे जाते थे। भारत के औद्योगीकरण के लिए उन्होंने इस्पात कारखानों की स्थापना की महत्वपूर्ण योजना बनाई। उनकी अन्य बड़ी योजनाओं में पश्चिमी घाटों के तीव्र धाराप्रपातों से बिजली उत्पन्न करने की योजना (जिसकी नींव 8 फ़रवरी 1911 को रखी गई) भी शामिल है। इन विशाल योजनाओं की परिकल्पना के साथ-साथ उन्होंने बंबई में शानदार ताजमहल होटल खड़ा किया जो उनके राष्ट्रवाद को दर्शाता है। एक सफल उद्योगपति और व्यवसायी होने के साथ-साथ जमशेदजी बहुत ही उदार प्रवित्ति के व्यक्ति थे इसलिए उन्होंने अपने मिलों और उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों और कामगारों के लिए कई कल्याणकारी नीतियाँ भी लागू की। इसी उद्देश्य से उन्होंने उनके लिए पुस्तकालयों, पार्कों, आदि की व्यवस्था के साथ-साथ मुफ्त दवा आदि की सुविधा भी उन्हें प्रदान की।


ताज होटल का निर्माण

भारत का प्रसिद्ध ताज होटल केवल मुंबई में ही नही बल्कि पुरे विश्व में प्रसिद्ध है। ताज होटल के बनने के पीछे एक बहुत ही रोचक कहानी छुपी हुई है। बात उन दिनों की है जब भारत आजाद नही हुआ था और सिनेमा घरो की शुरुआत हुई थी और पहली फिल्म मुंबई में लगी हुई थी, जिस होटल में फिल्मे लगी हुई थी उस होटल का नाम वाटसन होटल था। वहां केवल ब्रिटिशो को ही आमंत्रित किया गया था और उस होटल के बाहर एक बोर्ड भी लगा हुआ था जिसमे लिखा हुआ था “भारतीय और कुत्ते अंदर नही आ सकते है”। चूकी भारत में फिल्मे पहली बार लगी थी इसीलिए जमशेद जी भी देखना चाहते थे लेकिन उनको प्रवेश नही मिला सका। शायद ये बात का जमशेद जी को बहुत बुरा लगा और उन्होंने दो साल के अन्दर ही वाटसन होटल को की सुन्दरता को पीछे छोड़ते हुए 1903 में ताज होटल का निर्माण करवा दिया। ताज होटल के बाहर एक बोर्ड लगवाया उसमे लिखा था “अंग्रेज और बिल्लियाँ अंदर नही जा सकते”। ये इमारत बिजली की रोशनी वाली पहली इमारत थी। आज भी ताज होटल की तुलना संसार के सबसे सर्वश्रेष्ट होटलों में किया जाता है।


मृत्यु

जमशेद जी ने भारत में औधोगिक विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया है और इन्होने अपने जीवन में मेहनत और अपनी क़ाबलियत से बहुत कुछ हासिल किया। जमशेद जी अपनी आशाओं के प्रतिकूल 65 साल की अवस्था में 19 मई सन 1904 में इनका देहान्त हो गया।

Conclusion:-

हमेशा उम्मीद से ज्यादा दीजिये।  


ब्रूस ली

 

Bruce Lee Success Story


परिचय


जब भी मार्शल आर्ट्स की बात होती है, सबसे पहले ब्रूस ली का नाम लिया जाता है। यूएस में जन्में ब्रूस ली विश्व के सबसे बेहतरीन मार्शल आर्टिस्ट में से एक थे। इसके साथ ही वे एक प्रोड्यूसर, एक्टर, डायरेक्टर, स्क्रिप्ट राइटर,और फिलोसफर भी थे। ब्रूस ली ने बेहद कम उम्र में ही चाइल्ड आर्टिस्ट के रुप में फिल्मों में अपनी जगह बना ली थी। कई लोग उन्हें 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली मार्शल कलाकार और एक सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में मानते हैं।


ब्रूस ली का शुरुआती जीवन

ब्रूस ली 27 नवंबर साल 1940 में यूएस के सेन फ्रांसिस्को के चाइनाटाउन में ली जुन-फेन के रुप में एक संपन्न और आर्थिक रुप से मजबूत परिवार में जन्में थे। उनके पिता का नाम ली होई छुंए था, वो होंग कोंग में ओपेरा सिंगर के तौर पर काम करते थे और फिल्म बैकग्राउंड से जुड़े हुए थे। जबकि उनकी माता का नाम ग्रेस था। जब वे बेहद छोटे थे, तभी उनका परिवार होंग-कोंग में शिफ्ट हो गया था। ब्रूस ली के अलावा उनके चार भाई और बहन भी थे। ब्रूस ली की शुरु से ही दिलचस्पी मार्शल आर्टस को सीखने में थी। वहीं इसके लिए उनके पिता ने भी उन्हें काफी प्रोत्साहित किया था। महज 13 साल की उम्र में ही ब्रूस ली ने मास्टर यिप मैन से कुंगफू की ट्रेनिंग लेना शुरु कर दिया था।



पढ़ाई-लिखाई

ब्रूस ली ने अपनी शुरुआती पढ़ाई ”ला सल्ले कॉलेज से” की थी। इस स्कूल में उनका खराब प्रदर्शन के चलते उन्हें वहां से निकाल कर ”सेंट फ्रांसिस जेवियर्स कॉलेज” में डाल दिया गया था। पढ़ाई के दौरान भी मार्शल आर्ट्स में रुझान होने की वजह से वे स्ट्रीट फाइ्टस और गैंग रिवलरीस में शामिल होते रहते थे। हालांकि, इसकी वजह से उनके माता-पिता को उनकी काफी टेंशन रहती थी, क्योंकि वे ली को एक हेल्थी और अच्छा माहौल देना चाहते थे, इसके लिए वे होंग कोंग छोड़कर सीएटल चले गए और जहां ब्रूस ली ने एडिसन टेक्नीक स्कूल में अपनी आगे की पढ़ाई की। इस दौरान उन्होंने एक रेस्टोरेंट में लिव-इन वेटर के रुप में भी काम किया और फिर 1961 में उन्होंने वांशिंगटन यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया। हालांकि बाद में मार्शल आर्टस में कैरियर बनाने के लिए उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया था।


फिल्मों में ब्रूस ली

जब एक बच्चा सही से न तो बोल पाता है और न ही चल पाता है उस समय से ब्रूस ली फिल्मों में अपना करियर बनाने की शुरुआत कर दी थी। जी हां जब ब्रूस ली महज 3 महीने के थे, तब उन्होंने ”गोल्डन गेट गर्ल” की फिल्म में काम किया। इसके बाद वे चाइल्ड आर्टिस्ट के रुप में कई फिल्मों में काम करते रहे और अपनी क्यूट अदाओं से दर्शकों के दिल में उन्होंने अपने लिए एक अलग जगह बना ली। इस तरह वे अपने एक्टिंग प्रतिभा को और अधिक निखारते चले गए। उन्होंने 6 साल की उम्र तक करीब 20 फिल्मों में चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर काम कर लिया था, जो कि अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी। इसके अलावा उन्होंने खुद को एक बेहतर डांसर के रुप में भी पेश दिया।


मार्शल आर्टिस्ट

कुछ सालों तक फिल्मों में एक्टिंग करने के बाद उन्होंने एक्टिंग को छोड़ दिया और मार्शल आर्ट्स में अपना करियर बनाने का फैसला लिया। उन्होंने मार्शल आर्ट्स में अपने कैरियर की शुरुआत कुंग-फु के ट्रेनर के रुप में की थी और फिर उन्होंने एक मार्शल आर्ट्स स्कूल “ली जुन फेन गुंग फु इंस्टीट्यूट” खोला। इसके बाद उन्होंने मशहूर मार्शल आर्टस ट्रेनर जेम्स ली के साथ मिलकर मार्शल आर्टस स्टूडियो भी खोला था। साल 1964 में जब वे महज 24 साल के थे उस दौरान उन्होंने लॉन्ग बीच अंतर्राष्ट्रीय कराटे चैंपियनशिप में भागीदारी निभाई और अपने अद्भभुत प्रदर्शन से खूब तारीफें बटोंरी, इसके बाद वे एक अच्छे मार्शल आर्टिस्ट के रुप में पॉपुलर हो गए थे। साल1967 में ब्रूस ली ने अपनी मार्शल आर्ट्स की अद्भुत प्रतिभा से एक बार फिर से सुर्खियां बटोरीं और इससे बाद उन्होंने कई मैच जीते। उनके अद्भुत और आसाधारण प्रदर्शन के चलते वे हॉलीवुड फिल्म डायरेक्टर्स की नजरों में चढ़ गए और फिर उन्हें कई टीवी सीरीज और फिल्मों में काम करने का ऑफर मिलने लगे। ब्रूस ली ने अपनी पहली टीवी सीरीज ‘दी ग्रीन होर्नेट’ में अहम किरदार निभाया था। इस टीवी शो का पहला सीजन 1967 से 1967 तक चला था। इसके बाद ब्रूस ली ने ”आयरनसाइड”, ”ब्लोनडाई”, ”हियर कम्स दी ब्राइड्स” में बतौर गेस्ट अपीरयंस के तौर पर अभिनय किया था। हालांकि, एक्टिंग के दौरान वे मार्शल आर्ट्स में भी ध्यान देते थे और कई नई-नई तकनीक खोजते रहते थे। इसके बाद ब्रूस ली ने साल 1972 में फिल्म ‘वे ऑफ़ ड्रैगन’ में एक एक्टर, डायरेक्टर, राइटर और कोरियोग्राफर के रुप में काम किया। साल 1973 में ब्रूस ली ने ‘इंटर डी ड्रैगन’ फिल्म में शानदार अभिनय किया, यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त हिट हुई और दुनिया की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी। इस तरह उन्होनें अपने अल्प जीवन काल में कई फिल्में और टीवी शो किए एवं एक बेहतरीन मार्शल आर्टिस्ट के रुप में खुद की पहचान पूरे विश्व भर में बनाई। आज भी लोग उनके ताउक्वांडो स्टाइल का लोहा मानते हैं और उन्हें आदर्श मानकर मार्शल आर्टस की कला सीखते हैं।


छोटी सी उम्र में ब्रूस ली दुनिया को कह गए अलविदा

महान मार्शल आर्टिस्ट और सुपरस्टार ब्रूस ली की अचानक मौत ने कई लोगों को आश्चर्य में डाल दिया। दरअसल, 20 जुलाई, 1973 को ब्रूस ली की अचानक मौत हो गई। ब्रूस ली की मौत की वजह से उनके दिमाग में सूजन आने के कारण बताई जाती है। ऐसा कहा जाता है कि सिर दर्द होने पर ब्रूस ली ने पैन किलर खा ली थी, जिसके रिएक्शन की वजह से उनके दिमाग में सूजन आ गई और 32 साल की छोटी सी उम्र में उनकी मौत हो गई। ब्रूस ली की मौत के बाद उनके शव को सीएटल के लेकव्यू कब्रिस्तान में दफना दिया गया था। जबकि उनकी मौत के बाद उनके घर को एक पर्यटक स्थल के रुप में तब्दील कर दिया गया।


ब्रूस ली के जीवन से जुड़े आश्चर्यजनक तथ्य

ब्रसू ली होंगकोंग के सबसे प्रसिद्ध चाइल्ड आर्टिस्ट में से एक थे। वे 18 साल की उम्र तक वे 20 फिल्में कर चुके थे।
ब्रूस ली ने बदमाशों से लड़ने के लिए मार्शल आर्टस की कला सीखना शुरु किया था।
ब्रूस ली की जीवन की आखिरी फिल्म ”गेम्स ऑफ डेथ” उनके मरणोपरांत रिलीज हुई थी, इस फिल्म में उनका वास्तविक अंतिम संस्कार का सीन फिल्माया गया था, जिसमें उन्हें ताबूत के अंदर दिखाया गया है।
ब्रूस ली मार्शल आर्टिस्ट, एक्टर, डायरेक्टर, राइटर होने के साथ-साथ एक बेहद खतरनाक ड्राइवर भी थे। इसके साथ वे इतने तेज थे कि उनकी वीडियो को स्लो मोशन में देखनी पड़ती थी।
ब्रूस ली अपनी उंगली की ताकत से टिन से बनी कैन में छेद कर देते थे।
ब्रूस ली एक दिन में 5 हजार पंच मार कर प्रैक्टिस करते थे और उन्होंने अपने शरीर से पसीने निकालने वाली ग्रंथि को निकलवा दिया था।
ब्रूस ली अपने पिता को अपना आइडियल मानते थे उन्होंने कहा था कि उनके पिता उनके सबसे पहले मार्शल आर्ट्स के गुरु थे।


ब्रूस की जीवन की महान उपलब्धियां और पुरस्कार

वे दुनिया के सबसे बेहतरीन मार्शल आर्टिस्ट थे। साल 2013 में मरणोपरांत उन्हें एशियाई अवॉर्ड्स में प्रतिष्ठित फाउंडर अवॉडर्स से नवाजा गया था।
ब्रूस ली को मरणोपरांत टाइम मैग्जीन द्धारा 20वीं सदी के 100 सबसे ज्यादा प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में शुमार किया गया था।
साल 2013 में मार्शल आर्ट्स के क्षेत्र में ब्रूस ली के उल्लेखनीय योगदानों के चलते चीन के गुंगज्होई में 7 फुट लंबी उनकी विशाल प्रतिमा बनाई गई।
ब्रूस ली होंग-कोंग के चा-चा डांस के भी चैंपियन रह चुके हैं।
मार्शल आर्टिस्ट होने के साथ-साथ ब्रूस ली एक बेहतरीन स्केच आर्टिस्ट भी थे।


ब्रूस ली के अनमोल वचन

हमेशा रियल रहो, खुद को पेश करो, खुद पर विश्वास रखो, बाहर जाकर किसी अन्य सफल व्यक्तित्व को मत तलाशो और इसकी नक़ल मत करो।

एक बुद्धिमान शख्स एक मुर्ख के सवाल से बहुत कुछ सीख सकता है, लेकिन एक मुर्ख एक बुद्धिमान के जवाब से कुछ भी नहीं सीख सकता है।

अगर आप वाकई में अपनी जिंदगी से प्यार करते हैं तो वक्त को बर्बाद न करें, क्योंकि वो वक्त ही है, जिससे जिंदगी बन सकती है।

किसी भी चीज पर अपना अधिकार करना दिमाग से शुरु होता है।

अगर आप किसी चीज के बारे में सोचने से काफी वक्त जाया तकते हैं, तो निश्चित ही आप उसे कभी नहीं कर पाएंगे।

Conclusion:-

असफलता से डरो मत —असफलता नहीं, बल्कि छोटा लक्ष्य बनाना अपराध है। महान प्रयसों में असफल होना भी शानदार होता है।  


जॉनी लीवर

 

Success Story of Johnny Lever


मेरा परिचय


जॉन प्रकाश राव उर्फ़ जॉनी लीवर एक भारतीय कॉमेडियन अभिनेता हैं। वह हिंदी सिनेमा में अपनी कॉमिक टाइमिंग के लिए प्रसिद्ध हैं। जॉनी लीवर भारत के पहले स्टैंड कॉमेडियन हैं। उन्हें अब तक 13 बार फिल्मफेयर अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। जॉनी बॉलीवुड में अब तक साढ़े तीन सौं से अधिक फिल्मों में काम कर चुके हैं।


कभी पैन बेचता था देश का यह मशहूर कॉमेडियन

वैसे तो बॉलीवुड में एक से बढकर एक कॉमेडियन हुए लेकिन पहला स्टैंडअप कॉमेडियन जॉनी लीवर को ही माना जाता है. 14 अगस्त 1956 को इसाई परिवार में जन्मे Johnny Lever का असली नाम जॉन प्रकाश राव है. जॉनी लीवर बॉलीवुड के अपने शुरुआती समय में मिमिक्री किया करते थे और धीरे धीरे कड़ी महनत के साथ वो आज बॉलीवुड के एक हास्य कलाकार के रूप में जाने जाते है जिन्हें अब तक 13 फिल्मफेयर अवार्ड मिल चुके है. 350 से भी ज्यादा फिल्मो में काम करना इस बात का सबुत है कि लोगो ने उनकी कड़ी मेहनत के साथ, उन्हें एक कॉमेडियन के रूप में स्वीकारा है. परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत न हो तो मुंबई में सपने पुरे करना और भी मुश्किल हो जाता है. ऐसा ही कुछ Johnny Lever के साथ भी था. वह घर में अपने दो भाई और तीन बहनो में सबसे बड़े थे और जिम्मेदारियो के नीचे दबे थे. ऐसे में उन्होंने आन्ध्रा एजुकेशन सोसाइटी हाई स्कूल में अपनी पढाई शुरू की और सातवी क्लास के बाद स्कूल छोड़ कर काम के लिए मुंबई आना पड़ा. मुंबई में उन्होंने पैन बेचना शुरू कर दिया. मुंबई में वह बॉलीवुड गानों पर लोगो का मनोरंजन कर पैन बेचा करते थे. उसके बाद उनके पिता प्रकाश राव जानुमाला ने उन्हें अपने साथ हिंदुस्तान यूनिलीवर की फैक्ट्री में काम पर लगवा दिया. वहां भी उन्होंने लोगो का, अपने साथियों का मनोरंजन कर दिल जीत लिया और उनके सहकर्मियों ने ही उन्हें “जॉनी लीवर” नाम दिया. जॉनी लीवर के अंदर के मिमिक्री कलाकार को प्रताप जैन और राम कुमार ने पहचाना. और उन्हें स्टेज शो पर काम करने का मौका दिया जहा से उनकी कॉमेडी का जादू चलता गया. 1982 में उन्हें मशहूर संगीतकार कल्यानजी-आनंदजी और अमिताभ बच्चन के साथ स्टेज शेयर करने का मौका मिला. इसी तरह एक स्टेज शो के दौरना सुनील दत्त ने जॉनी लीवर के टैलेंट को समझते हुए अपनी फिल्म ‘’दर्द का रिश्ता’’ में एक रोल दिया जिसके बाद उन्हें कई छोटे मोटे रोल मिलते चले गए. उस समय उन्होंने एक ऑडियो कैसेट कम्पनी के लिए भी काम किया जो ‘’हंसी के हंगामे’’ नाम का कार्यक्रम बनाते थे और ये कार्यक्रम देश ही नही बल्कि विदेशो में भी हिट रहा. अब तक Johnny Lever स्टेज और फिल्मो में कई छोटे छोटे रोल कर चुके थे लेकिन उन्होंने कोई बड़े बजट की फिल्म नही की थी. फिर उन्होंने एक कार्यक्रम में भाग लिया जहा बॉलीवुड के बड़े बड़े सितारे और निर्देशक आये हुए थे. वहा भी उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया और निर्देशक गुल आनंद ने उन्हें फिल्म जलवा के लिए रोल ऑफर किया. फिल्म जलवा की सफलता के बाद उन्हें खुद को औपचारिक रूप से भी एक हास्य कलाकार के रूप में स्थापित किया. उसके बाद उन्हें कई बड़ी फल्मो में काम मिलने लगा. जाहिर है पैन बेचने से लेकर एक बेस्ट कॉमेडियन बनने तक का सफर जॉनी लीवर के लिए आसान नही रहा होगा लेकिन उनकी मेहनत और उनकी कलाकरी ने आज उन्हें इस मुकाम पर पहुंचा दिया है कि वे आर्टिस्ट असोसिएशन के प्रेसिडेंट हैं और इसके अलावा वह मिमिक्री आर्टिस्ट असोसिएशन मुंबई के अध्यक्ष भी हैं। साथ ही जॉनी लीवर लगभग 190 करोड़ की सम्पति के मालिक भी है. दोस्तों जॉनी लीवर का जीवन लाखो लोगो के लिए एक प्रेरणा है जो दिखाता है की अगर आपमें टैलेंट है तो चाहे जिन्दगी में कितनी भी मुश्किलें क्यों न हो मेहनत के दम पर आप अपने सपनो को उडान दे सकते है.


Conclusion:-

Never Forever, Give Up..!!!  


कपिल देव

 कपिल देव का जीवन परिचय


परिचय


कपिल देव क्रिकेट की दुनिया का एक ऐसा नाम हैं, जिनको क्रिकेट में उच्च एवं सम्मानीय दर्जा प्राप्त है. इस महान खिलाड़ी ने भारत में पहली बार क्रिकेट वर्ल्ड कप लाने का काम किया था, जिसको उस समय किसी ने भी सपने में भी नहीं सोचा था. इन्होंने साल 1999 एवं साल 2000 के बीच 10 महीने तक भारत के कोच की भूमिका निभाई थी. हरियाणा तूफान के नाम से जाने वाले इस क्रिकेटर को क्रिकेट पिच पर कभी भी रन आउट होते हुए नहीं देखा गया था. इस खिलाड़ी ने अपनी फिटनेस पर इतना ध्यान दिया हुआ था कि सेहत की वजह से इन्हें कभी भी टेस्ट मैच से बाहर नहीं किया गया. कपिल देव दाएं हाथ के बल्लेबाज होने के साथ साथ दाएं हाथ के तेज गेंदबाज भी थे, जो तेजी से रन बनाना पसंद करते थे.


कपिल देव का जन्म एवं शिक्षा 

ये महान खिलाड़ी पंजाब के एक बहुत प्रसिद्ध शहर चंडीगढ़ में पैदा हुए थे. इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा डी. ए. वी. स्कूल से प्रारम्भ की और स्नातक की पढ़ाई के लिए सेंट एडवर्ड कॉलेज में गए. खेल में रूचि एवं प्रतिभा को देखकर इनको देश प्रेम आजाद के पास क्रिकेट सीखने के लिए भेजा गया. 



कपिल देव का परिवार 

जब भारत और पाकिस्तान को अलग किया जा रहा था, उस समय इनका परिवार रावलपिंडी (पाकिस्तान) से फाजिल्का (भारत) में आकर रहने लगा था. यहीं पर इनके पिता रामलाल निखंज ने लकड़ी का व्यवसाय किया. पाकपट्टन पाकिस्तान से सम्बन्ध रखने वालीं इनकी माता राजकुमारी एक ग्रहणी थीं. ये कुल मिलाकर सात भाई-बहन थे जिनमें से चार बहनें, तीन भाई थे, जबकि ये छठे स्थान पर थे. कुछ समय बाद इनके माता-पिता ने पंजाब की राजधानी में रहना उचित समझा. इनका विवाह सन् 1980 में रोमी भाटिया नाम की एक स्त्री से हुआ था. इसके 17 साल बाद इनके यहां एक लड़की का जन्म हुआ, जिसका नाम अमिया देव रखा गया था. 


कपिल देव का क्रिकेट करियर 

कपिल देव का करियर सन् 1975 से प्रारम्भ हुआ था. जब इन्होंने हरियाणा के लिए पंजाब के विरुद्ध मैच खेला था, जिसमें कपिल देव ने 6 विकेट के साथ हरियाणा को शानदार जीत दिलाकर, पंजाब को 63 रन पर ही ढेर कर दिया था. सन् 1976 -77 में जम्मू कश्मीर के विरुद्ध खेले गए एक मैच में इन्होंने 08 विकेट लिए तथा 36 रन बनाये और उन्होंने उसी वर्ष बंगाल के विरुद्ध 07 विकेट तथा 20 रन बनाये थे. इन दोनों मैचों में इनकी प्रतिभा सबको दिखाई देने लगी. इसके बाद इन्होंने सन् 1978 में टेस्ट मैच खेलना प्रारम्भ कर दिया था. इन्होंने अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय टेस्ट मैच पाकिस्तान के खिलाफ खेला था. इस मैच में कपिल देव ने सिर्फ 13 रन बनाए थे, हालांकि 1 विकेट भी लिया था. कपिल देव ने बेहतरीन बल्लेबाजी से सन् 1979 -1980 में उन्होंने दिल्ली के खिलाफ 193 रन की नाबाद पारी खेलकर हरियाणा को शानदार जीत दिलायी. ये उनके करियर का पहला शतक था. जिसके बाद साबित हो गया की कपिल देव सिर्फ गेंदबाजी से ही नहीं बल्कि बल्लेबाजी से भी भारत को जीत दिला सकते हैं. इनकी दोनों प्रतिभाओं की बदौलत इनको अभी तक का सबसे बेहतरीन आलराउंडर माना जाता है. 17 अक्टूबर सन् 1979 में वेस्टइंडीज के खिलाफ उन्होंने 124 में 126 रन बनाये थे. इसको इनकी एक यादगार पारी के रूप में गिना जाता है. 


कप्तानी

 उस समय सन् 1982-83 में भारत श्रीलंका से मैच खेलने गया हुआ था. लेकिन आधिकारिक तौर पर इन्हें वेस्टइंडीज में हो रही एकदिवसीय मैचों की श्रृंखला में कप्तान बनने का मौका मिला. उस समय वेस्टइंडीज टीम का काफी बोलबाला था, मतलब उस समय वेस्टइंडीज टीम को हराना नामुमकिन सा था. और सुनील गावस्कर की शानदार पारी के सहारे वेस्टइंडीज को भारत ने एक मैच में हरा दिया था. उस मैच में सुनील गावस्कर जो इनके साथी खिलाड़ी थे उन्होंने 90 रन बनाये थे. वहीं कपिल देव ने 72 रन बनाने के साथ-साथ 2 विकेट भी चटकाए थे. इसी जीत की बदौलत भारत को आने वाले वर्ल्ड कप में वेस्टइंडीज को हरा पाने का विश्वास बढ़ गया. जो कि विश्व कप हासिल करने में दिखाई दिया था. 


1983 का वर्ल्ड कप

उसके बाद 1983 के वर्ल्ड कप का समय आया. हालांकि पिछले विश्व कप में भारतीय टीम के प्रदर्शन को देखने के बाद किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि भारत विश्व कप जीत सकता है. जब कपिल देव ने वर्ल्ड कप में खेलना शुरू किया था तब इनका औसत: 24.94 सामान्य बॉलर की तरह ही था. भारत को सेमीफइनल में पहुंचने के लिए ज़िम्बाब्वे से मैच जीतना आवश्यक हो गया था. उस मैच के दौरान भारत लगभग हार की ओर बढ़ ही रहा था कि कपिल देव ने अपनी शानदार बल्लेबाजी की बदौलत मैच संभाल लिया. इसी मैच के दौरान इन्होंने 175 रन बनाकर ज़िम्बाब्बे की गेंदबाजी को धोकर रख दिया, क्योंकि इन्होंने सिर्फ 138 गेंदों में ये रन बनाएं थे. जिसमें इन्होंने 22 बॉउंड्रीज, 16 चौके और 6 छक्कों की मदद से लगाईं थीं. 9 वें विकेट के लिए 126 रन की सबसे बड़ी साझेदारी किरमानी (22 रन) एवं कपिल देव के बीच हुई थी, जिसको 27 सालों तक कोई नहीं तोडा पाया था. इतना ही नहीं इसी मैच में कपिल देव ने शानदार गेंदबाजी करते हुए ज़िम्बाब्बे के 5 विकेट भी लिए थे. इसके बाद कपिल देव को मर्सिडीज कार पुरस्कार के रूप में मिली, यही पारी इनके जीवन की सबसे यादगार एवं महत्वपूर्ण पारी थी. जिसने इनको सबकी नजरों में महान बनाया. इस मैच की बदौलत भारत का 1983 के विश्व कप में जीत के लिए अपना सफर तय कर पाने का रास्ता मिला था. 1983 के विश्व कप के दौरान बीबीसी की हड़ताल की वजह से इस मैच का टेलीकास्ट नहीं हो सका था और इस मैच का लुफ्त क्रिकेट प्रेमी नहीं उठा सके थे. भारत को 1983 विश्व कप अपने नाम करने के लिए वेस्टइंडीज को फाइनल में हराना पड़ा था. भारत ने कपिल देव की कप्तानी में 1983 में इंग्लैंड में होने वाले इस वर्ल्ड कप को जीतकर इतिहास रच दिया. कहा जाता है इस शानदार प्रदर्शन की बदौलत भारत भी क्रिकेट की दुनिया का सितारा बनकर सामने आया. इस समय भारत को एक अलग स्तर पर देखा जाता है. इतना ही नहीं भारत ने अभी तक सभी तरह की ट्रॉफी जीत रखीं है. कपिल देव के करियर का बुरा दौर उसके बाद 1984 में वेस्टइंडीज के साथ टेस्ट मैचों के साथ एकदिवसीय मैंचों की श्रृंखला का आयोजन किया गया. जिसमें भारत की बुरी हार हुई. वहीं ये कपिल देव के करियर का सबसे बुरा वक्त था, जिससे चयनकर्ताओं ने इनको कप्तानी के पद से हटाने का फैसला लिया और फिर से गावस्कर को कप्तान बना दिया गया. इसके बाद कपिल देव 1987 में कप्तान बनाया गया, जिसमें भारत सेमीफाइनल तक पहुंचा था. लेकिन भारत इंग्लैंड से हारकर विश्व कप जीतने में असफल रहा और सबने इसके लिए देव पर ही इल्जाम लगा दिया. एक बार फिर से इनसे कप्तानी छीनकर गावस्कर को दे दी गई, यही इनकी कप्तानी का अंतिम सफर था. जिसके बाद इनको कभी भी कप्तान बनने का मौका नहीं मिला. हालांकि 1989 में उपकप्तान जरूर बनाया गया था. 


कपिल देव के कोच बनने का सफर 

बीसीसीआई ने इन्हें भारत का कोच नियुक्त किया लेकिन कुछ विवाद के चलते इन्होंने केवल 10 महीने में ही इस्तीफा दे दिया. कहा जाता है कि ऑस्ट्रेलिया से भारत के 2-0 से श्रृंखला हारने के बाद इन पर मैच फिक्सिंग का आरोप लगाया गया था. जिसके चलते इन्होंने इन सब बेबुनियादी आरोपों से बचने के लिए अपने पद से इस्तीफा दे दिया. 


कपिल देव पुरस्कार एवं उपलब्धियां 

सन् 1979-80 के सत्र में क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन करने की वजह से इन्हें भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला अर्जुन पुरस्कार दिया गया. ये पुरस्कार सरकार उन खिलाड़ी को देती हैं जिन्होंने किसी भी खेल के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान दिया हो.

उसके 1982 के दौरान भारत ने कपिल देव की प्रतिभा और लगन को देखकर पद्म श्री का पुरस्कार भी इन्हें दिया. इतना ही नहीं इनको एक साल बाद यानी कि सन् 1983 विज्डन क्रिकेटर ऑफ द ईयर का सम्मान दिया गया, जिसका आधार इनकी विश्व-कप में जबरदस्त प्रदर्शन को माना जाता है.

इन्होंने 1994 में रिचर्ड हेडली का टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा विकेट हासिल करने का रिकार्ड तोड़ दिया था. इतना ही नहीं टेस्ट क्रिकेट में 400 विकेट के साथ-साथ टेस्ट क्रिकेट में अपने 4000 रन पूरे करने वाले अभी तक के विश्व के उच्चतम खिलाड़ी हैं.

सन् 1991 में कपिल देव के योगदान एवं लगन को सम्मानित करने के लिए पद्म भूषण जैसा उच्चतम पुरस्कार दिया गया. इसके बाद सन् 2002 में सदी के विज्डन भारतीय क्रिकेटर के सम्मान को देकर इनका दर्जा क्रिकेट की दुनिया में और बड़ा दिया गया.

सन् 2010 आईसीसी क्रिकेट हॉल ऑफ फेम पुरस्कार देकर इनकी प्रतिभा को सम्मानीय दर्जा दिया गया. इसके तीन साल बाद सन् 2013 एनडीटीवी द्वारा भारत में 25 सबसे महान वैश्विक जीवित महापुरूष का खिताब दिया गया.

भारतीय सेना से जुड़ने के लिए कपिल देव ने सन् 2008 भारतीय क्षेत्रीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल का पद ग्रहण कर लिया. भारतीय सेना का अधिक सम्मान करने की वजह से इन्होंने ऐसा किया था.


कपिल देव के जीवन पर आधारित फिल्म 

भारतीय सिनेमा के मशहूर निर्देशक कबीर खान ने कपिल देव की बायोपिक बनाने का काम शुरू कर दिया है. जब कपिल देव से पूछा गया था कि आपका किरदार किस अभिनेता को दिया जाना चाहिए, तो उन्होंने रणवीर सिंह का नाम लिया था. फैंटम प्रोडक्शन एवं अनुराग बासु के साथ अन्य लोगों ने भी इस फिल्म पर अपना पैसा लगाया है. जिसमें रणवीर सिंह को कपिल देव की भूमिका में अभिनय करते हुए देखा जाएगा.


कपिल देव के जीवन के रोचक तथ्य 

कपिल देव ने व्यापार करने के लिए कैप्टन्स एलेवेन नाम से सन् 2006 में दो रेस्टोरेंट खोले जिनमें एक चंडीगढ़ में हैं और दूसरा पटना में मौजूद है, जिनको ये खुद संभालते हैं.

कपिल देव एक ऐसे खिलाडी हैं, जिन्होंने दो से अधिक फिल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाएं निभाई हैं. जिनके नाम ‘इकबाल’ दूसरी ‘मुझसे शादी करोगी’ एवं ‘ये दिललगी है’. इतना ही नहीं अभी हाल में कपिल देव के ऊपर एक फिल्म बनने की खबरें भी आ रहीं हैं.

कपिल देव की रूचि किताबें लिखने में भी बहुत है, इसलिए इन्होंने अभी तक तीन आत्मकथाएं लिखी है, जिनके नाम ‘गोड्स डिक्री’, ‘क्रिकेट माय स्टाइल’ एवं ‘स्ट्रैट फ्रॉम माय हार्ट’ शामिल हैं.

Conclusion:-

Never Forever, Give Up..!!!  


शाहरुख खान

 शाहरुख खान की सफलता की कहानी




शाहरुख खान को कौन नहीं जानता, वे फिल्मी दुनिया के सबसे चमकते सितारों में से एक है। शाहरुख खान बॉलीवुड के सर्वश्रेष्ठ एवं सफल अभिनेता हैं जिन्होंने अपने शानदार अभिनय के अंदाज से करोड़ों लोगों के दिलों में अपनी एक अलग जगह बनाई है। शाहरुख खान जो SRKके नाम से भी जाने जाते है। एक भारतीय फिल्म अभिनेता, निर्देशक और टेलीविज़न कलाकार भी है। जिन्हें मीडिया में “बॉलीवुड का बादशाह”, “किंग ऑफ़ बॉलीवुड” और “किंग खान” भी कहा जाता है। वे एक्शन, रोमांस, ड्रामा, कॉमेडी सभी फिल्में कर चुके हैं। उनका नाम सबसे अमीर अभिनेताओं में भी गिना जाता है। शाहरुख़ खान अब तक 80 से भी ज्यादा बॉलीवुड फिल्म कर चुके है। लोस एंजेल्स के टाइम्स पत्रिका के अनुसार वे “दुनिया के सबसे बड़े मूवी स्टार” के नाम से भी जाने जाते है। जिनके चाहते भारत के साथ-साथ पुरे एशिया में भी फैले हुए है।


Childhood

इस प्रेरणादायक कहानी की शुरुआत 2 November 1965 से होती हैं। दिल्ली के एक मुस्लीम परिवार में शाहरुख खान का जन्म हुआ। उनके पिता का नाम मीर ताज मोहम्मद था जो एक स्वतंत्रता सेनान्नी थे और उनकी माँ का नाम लतीफ फातिमा था। वैसे तो भारत पाकिस्तान के अलग होने से पहले उनका परिवार पेशावर में रहता था लेकिन 1948 में जब विभाजन हुआ तो उनके पिता अपने परिवार के साथ दिल्ली में आकर बस गये। शाहरुख का बचपन दिल्ली के राजेंद्र इलाके में बिता, जहाँ उनका परिवार एक किराये के घर में रहती थी। शाहरुख खान के पिता एक रेस्टोरेंट चलाया करते थे। शाहरुख खान ने अपनी शुरुआती पढ़ाई दिल्ली के St. Columba School से की और पढ़ाई में अच्छे होने की वजह से शाहरुख ने स्कूल का सबसे बड़ा अवार्ड Sword of Honour भी जीता था। लेकिन सिर्फ 16 साल की उम्र में shahrukh khan के जीवन में एक दुखद पल जब आया जब उनके पिता ने दुनिया को अलविदा कहा, हालाँकि इतनी कम उम्र में पिता को खोने के बाद भी शाहरुख के अन्दर परेशानीयों से लड़ने का जज्बा कभी भी खत्म नहीं हुआ था। उन्होंने 1950 में हंसराज कॉलेज में एडमिशन ले लिया, जहाँ पर उन्होंने एक ग्रुप ज्वाइन किया और उस ग्रुप में रहते हुए उन्होंने बैरी जॉन के अंतर्गत एक्टिंग सीखी। इसके बाद शाहरुख खान Mass Communications में मास्टर डिग्री लेने का फैसला लिया लेकिन एक्टिंग के लिए पढ़ाई अधूरी छोड़ दी और इसी बीच उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में भी एडमिशन लिया। जहाँ पर उन्होंने एक्टिंग के रोल्स सीखें। Shahrukh khan का पहला रोल टीवी सीरीज दिल दरिया में था लेकिन कुछ production परेशानीयों के चलते ये टीवी सीरिज एक साल के बाद रिलीज हुआ और इसी बीच शाहरुख खान ने फौजी नाम के एक सीरीयल में काम किया। इस तरह से उनकी टेलीविजन में प्रथम एंट्री फौजी नाम के एक टीवी सीरियल से हुई, उसके बार उन्होंने कई और टीवी सीरीज जैसे सर्कस, Wagle ki duniya, Idiot और उम्मीद में काम किया। उस समय शाहरुख खान की एक्टिंग को देखकर लोगों ने उनकी तुलना दिलीपकुमार से करनी शुरू कर दी थी और फिर 1991 में उन्होंने अपनी प्रेमिका गौरी के साथ शादी कर ली। गौरी और शाहरुख के बीच पिछले कई सालों से प्रेम संबंध थे लेकिन बहुत सारी रुकावट और परेशानीयों का सामना करने का बाद ये दोनों एक हो पाये थे। शाहरुख खान का अभी एक्टिंग करियर शुरू ही हुआ था की उन्हें एक और बड़ा सदमा लगा, जब 1991 में उन्होंने अपनी माँ को खो दिया और इस दुख को भुलाने के लिए वे मुंबई चले गये और अपने आप को पूरी तरह से एक्टिंग में झोंक दिया।





Career

मुंबई जाकर उनकी किस्मत ने उनका साथ दिया और उनकी एक्टिंग को देखते हुये उन्हें कई सारी फिल्मों में काम मिल गया। जैसे की सबसे पहले उन्हें हेमा मालिनी डायरेक्शन में "दिल आशना है" फिल्म में साइन किया गया। ये हेमा मालिनी का एक डायरेक्टर के तौर पर एक डेब्यू फिल्म था लेकिन 1992 में रिलीज हुई "Deewana" मूवी शाहरुख खान की डेब्यू फिल्म बनी। इस मूवी में उस समय के स्टार एक्टर ऋषि कपूर ने भी काम किया था। दीवाना पोस्ट ऑफिस पर एक हिट फिल्म साबित हुई और इसने शाहरुख खान के बॉलीवुड करियर को एक अच्छी शुरुआत दी। इस मूवी के लिए उन्हें फिल्मफेयर का "Best Male Debut Award" से नवाजा गया था। 1992 में उनकी इसके अलावा तीन और भी फ़िल्में आई जैसे चमत्कार, दिल आशना है और राजू बन गया जेंटलमैन। 1993 में शाहरुख खान ने अपनी लीग से हटकर रोल किये और इसी साल उनकी 2 फिल्म डर और बाजीगर आई जिनमें वे हीरो की जगह खलनायक की भूमिका निभाते नजर आये और लोगों को उनकी एक्टिंग खूब पसंद आई। बाजीगर में उनके अलग किरदार और शानदार एक्टिंग की वजह से उनको फिल्मफेयर अवार्ड फॉर दे बेस्ट एक्टर मिला और इस तरह से बॉलीवुड़ में कदम रखकर सिर्फ 2 साल में ही शाहरुख खान ने अपनी एक्टिंग के जरिये पूरी दुनिया में लोहा मनवाया। आगे भी शाहरुख खान कई फिल्मों में खलनायक का रोल निभाते नजर आये। कोई भी अपनी शुरुआत समय में खलनायक वाले किरदार करने से बचता है पर शाहरुख खान उनके विपरीत काम कर रहे थे और वो हर मुश्किल से मुश्किल रोल को करके लोगों के बीच मशहूर होते जा रहे थे। 1995 में शाहरुख खान ने ६ से ७ फिल्मों में काम किया जिनमें से उनकी सफल फिल्म "करण अर्जुन" और "दिल वाले दुल्हनियाँ ले जायेंगें" साबित हुई और यही वो मूवी थी जिसके बाद शाहरुख खान के एक रोमांटिक छवि बन गई। इस फिल्म ने कूल १० filmfare awards जीते थे जिसमें शाहरुख खान को दूसरी बाद बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिला। जिसके बाद शाहरुख ने अलग - अलग फिल्मों में अहम भूमिका निभाई। 1998 में करण जोहर के डायरेक्शन में आई फिल्म "Kabhi Khushi Kabhi Gham" में एक्टिंग के लिए उन्हें फिर से फिल्मफेयर का बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिला और इस तरह से शाहरुख खान ने अभी तक कूल 14 फिल्मफेयर अवार्ड जीते हैं। आगे भी शाहरुख खान बहुत सारी फिल्मों में काम करते रहे जिनमें से कुछ सुपरहिट रही तो कुछ फ्लॉप भी रही। 1999 में शाहरुख खान ने जूही चावला के साथ एक प्रोडक्शन हाउस खोला जिसकी बदौलत वो एक प्रोडूसर भी बने। उनके प्रोडक्शन द्वारा बनाई गई पहली फिल्म "Phir Bhi Dil Hai Hindustani" बॉक्स ऑफिस पर फेलियर साबित हुई। इसके बाद 2001 में शाहरुख खान के प्रोडक्शन हाउस की दूसरी फिल्म "Asoka" भी बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह पीटी और बतौर एक्टर काफी सफल रहे शाहरुख खान एक प्रोडूसर के तौर पर कमाल करने में नाकाम रहे थे। तभी 2001 December में उनको "Shakti: The Power" फिल्म की सूटिंग जके दौरान पीठ में चौट लग गई जिसकी वजह से उनकी पीठ में काफी दर्द रहने लगा था जब इसका इलाज भारत में ना हो सका तो उन्होंने लंदन जाकर इलाज करवाया और फिर भारत वापसी के बाद उन्होंने कम से कम दबाव में काम करने का फैसला लिया। हालाँकि इसी दौर में "Mohabbatein, कभी ख़ुशी कभी गम, और Devdas जैसी उन्होंने लगातार कई सारी हिट फ़िल्में की और फिर आगे भी उन्होंने Swades, Veer-Zaara, Paheli, Don, Chak De India, My Name Is Khan, Ra. one, Chennai Express, Happy New Year और Raees की तरह बहुत सारी हिट मूवीज में काम किया और अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया। इतना ही नहीं शाहरुख खान एक अच्छे एक्टर होने के साथ - साथ एक बिजनेसमैन भी है वे Red Chillies Entertainment production कंपनी के मालिक है।


Conclusion

साथ ही वे जूही चावला और उनके पति के साथ पार्टनरशिप में आईपीएल की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) के मालिक है और फ़िलहाल शाहरुख की कूल संपति लगभग 5 हजार करोड़ के आसपास है जिस वजह से वे दुनिया के सबसे अमीर एक्टर्स में शुमार किये जाते हैं। उम्मीद करता हूँ आपको बॉलीवुड़ के किंग शाहरुख खान (Shahrukh Khan) की सफलता की कहानी पसंद आई होगी और आपको इससे बहुत प्रेरणा मिली होगी अगर हाँ तो इस पोस्ट को सोशल मीडिया पर अपने दोस्तों के साथ शेयर जरुर करें।

Conclusion:-

Never Forever, Give Up..!!!  


मलाला यूसुफजई

 मलाला यूसुफजई


जीवन परिचय


मलाला यूसुफजई एक ऐसी लड़की का नाम है, जिसने पाकिस्तान जैसे देश में लड़कियों की शिक्षा को उसका हक बताकर लड़ाई की शुरुआत की। ना सिर्फ लड़ाई बल्कि तालिबानी आतंकवादियों का निशाना बनते हुए सिर पर गोली भी खाई। अब मलाला पूरे दुनियाभर में सबसे कम उम्र में शांति का नोबेल पुरुस्कार प्राप्त करने वाली व्यक्तित्व है।


कौन हैं मलाला यूसुफजई

12 जुलाई, 1997 को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत के स्वात में जन्मी मलाला के संघर्ष की कहानी उस वक्त शुरु होती है, जब वो आठवीं में पढ़ती थी। 2007 से 2009 तक तालिबान ने स्वात घाटी पर कब्जा कर लिया था। तालिबानियों के डर से घाटी के लोगों ने लड़कियों को स्कूल भेजना बंद कर दिया और 400 से ज्यादा स्कूल बंद हो गए। जिसमें मलाला का स्कूल भी शामिल था।

पढ़ने में तेज मलाला ने ने अपने पिता जियाउद्दीन यूसुफजई से दूसरी जगह एडमिशन कराने की गुजारिश की। इसके बाद मलाला ने पिता उसे पेशावर लेकर गए। यहीं मलाला ने सिर्फ 11 साल की उम्र में नेशनल मीडिया के सामने एक मशहूर भाषण दिया जिसका शीर्षक था हाउ डेयर द तालिबान टेक अवे माय बेसिक राइट टू एजुकेशन? इस घटना ने मलाला की जिंदगी बदल कर रख दी।



'गुल मकई' बन उजागर की तालिबान की करतूत

तालिबान ने मलाला और उसकी सहेलियों का बचपना और स्कूल छीन लिया था। मलाला को ये बात इतनी चुभ गई कि उन्होंने 2009 से दूसरे नाम 'गुल मकई' से बीबीसी के लिए एक डायरी लिखी। जिसमें उन्होंने स्वात घाटी में तालिबान के कुकृत्यों की परत दर परत खोल कर रख दी। इसमें उसने जिक्र किया था कि टीवी देखने पर रोक के चलते वह अपना पसंदीदा भारतीय सीरियल राजा की आएगी बारात नहीं देख पाती थी। इससे तालिबानी बौखला उठे। कुछ दिनों बाद दिसंबर 2009 में मलाला के पिता ने ये खुलासा कर दिया कि मलाला ही 'गुल मकई' हैं।


जब आतंकियों ने पूछा...कौन है मलाला

अपनी डायरी से मलाला ने तालिबानियों ने नाक में दम कर दिया। बौखलाए तालिबानियों ने 9 अक्टूबर, 2012 के दिन आतंकियों ने मलाला की स्कूल बस पर कब्जा कर लिया। बस में चढ़ते ही आतंकियों ने पूछना शुरु किया कि मलाला कौन है? सभी बच्चे चुप होकर मलाला की ओर देखने लगे। सभी आतंकी ने मलाला के सिर पर एक गोली मार दी। गंभीर रूप से घायल मलाला को इलाज के लिए ब्रिटेन ले जाया गया। यहां उन्हें क्वीन एलिजाबेथ अस्पताल में भर्ती कराया गया। पूरी दुनिया में मलाला के स्वस्थ्य होने की प्रार्थना की गई और आखिरकार मलाला वहां से स्वस्थ होकर अपने देश लौट गईं।


पूरी दुनिया ने दिया सम्मान

मलाला जब स्वस्थ होकर स्वदेश पहुंची तबतक उन्हें पूरी दुनिया जानने लगी थी। उन्हें कई तरह से पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 19 दिसम्बर 2011 को पाकिस्तानी सरकार द्वारा 'पाकिस्तान का पहला युवाओं के लिए राष्ट्रीय शांति पुरस्कार मलाला युसुफजई को मिला। नीदरलैंड के किड्स राइट्स संगठन ने भी अंतर्राष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया। 2013 में उन्हें वूमन ऑफ द ईयर अवार्ड से भी नवाजा गया था। इसके अलावा भी कई देशों ने मलाला को सम्मानित किया।


यूएन ने मलाला के जन्मदिन को बनाया मलाला दिवस।


लड़कियों की शिक्षा के अधिकार के लिए लड़ने वाली मलाला के नाम पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने उनके 16वें जन्मदिन पर 12 जुलाई को मलाला दिवस घोषित कर दिया। मलाला ने वर्ष 2013 में एक किताब 'आय एम मलाला' भी लिखी थी।


2014 में मिला दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान

10 दिसंबर 2014 के दिन मलाला को दुनिया के सबसे बड़े पुरस्कार शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नॉर्वे में आयोजित इस कार्यक्रम में भारत के कैलाश सत्यार्थी के साथ संयुक्त रुप से नोबले पुरस्कार प्रदान किया गया। इस तरह मलाला सबसे कम 17 वर्ष की उम्र में नोबेल प्राप्त करने वाली विजेता बन गईं।

Conclusion:-

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अब्राहम लिंकन

 अब्राहम थॉमस लिंकन

Who is अब्राहम लिंकन?


अमेरिका के 16 वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का जन्म 12 फरवरी, 1809 को केंटकी (अमेरिका) में हुआ था। उनका पूरा नाम अब्राहम थॉमस लिंकन था उनके पिता एक किसान थे। वह एक साल तक स्कूल भी नहीं गए लेकिन खुद ही पढ़ना लिखना सिखा और वकील बने। एक सफल वकील बनने से पहले उन्होंने विभिन्न प्रकार की नौकरियां की और धीरे – धीरे राजनीति की ओर मुड़े। उस समय देश में गुलामी की प्रथा की समस्या चल रही थी। गोरे लोग दक्षिणी राज्यों के बड़े खेतों के स्वामी थे, और वह अफ्रीका से काले लोगों को अपने खेत में काम करने के लिए बुलाते थे और उन्हें दास के रूप में रखा जाता था। उत्तरी राज्यों के लोग गुलामी की इस प्रथा के खिलाफ थे और इसे समाप्त करना चाहते हैं अमेरिका का संविधान आदमी की समानता पर आधारित है। इस मुश्किल समय में, अब्राहम लिंकन 1860 में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे।

वह गुलामी की समस्या को हल करना चाहते थे। दक्षिणी राज्यों के लोग गुलामी के उन्मूलन के खिलाफ थे। इससे देश की एकता में खतरे आ सकता है। दक्षिणी राज्य एक नए देश बनाने की तैयार कर रहा था। परन्तु अब्राहम लिंकन चाहता था कि सभी राज्यों एकजुट हो कर रहे। अब्राहम लिंकन को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। वह किसी भी कीमत पर देश की एकता की रक्षा करना चाहते थे। अंत में उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच एक नागरिक युद्ध छिड़ गया। उन्होंने युद्ध बहादुरी से लड़ा और घोषणा की, “एक राष्ट्र आधा दास और आधा बिना दास नहीं रह सकता” वह युद्ध जीत गए और देश एकजुट रहा। 4 मार्च 1865 को अब्राहम लिंकन इनका दुसरी बार शपथ समारोह हुआ। शपथ समारोह होने के बाद लिंकन इन्होंने किया हुआ भाषण बहुत मशहूर हुआ। उस भाषण से बहुत लोगों के आँख में आंसू आ गये। वह किसी के भी खिलाफ नहीं थे और चाहते थे कि सब लोग शांति से जीवन बिताये।

1862 में लिंकन की घोषणा की थी अब सभी दास मुक्त होगें। इसी से ही लिंकन लोगों के बीच लोकप्रिय रहा। अपनी जिंदगी में कई बार असफलताओं का सामना करने वाले अब्राहम लिंकन आख़िरकार अमेरिका के एक सफल राष्ट्रपति बने थे। वे संयुक्त राज्य अमेरिका के ऐसे महापुरुष थे, जिन्होंने देश और समाज की भलाई के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया। लिंकन कभी भी धर्म के बारे में चर्चा नहीं करते थे और किसी चर्च से सम्बद्ध नहीं थे। एक बार उनके किसी मित्र ने उनसे उनके धार्मिक विचार के बारे में पूछा। लिंकन ने कहा – “बहुत पहले मैं इंडियाना में एक बूढ़े आदमी से मिला जो यह कहता था “जब मैं कुछ अच्छा करता हूँ तो अच्छा अनुभव करता हूँ और जब बुरा करता हूँ तो बुरा अनुभव करता हूँ”। यही मेंरा धर्म है”।

मृत्यु:-


14 अप्रैल 1865 को वॉशिंग्टन के एक नाट्यशाला में नाटक देख रहे थे तभी ज़ॉन विल्किज बुथ नाम के युवक ने उनको गोली मारी। इस घटना के बाद दुसरे दिन मतलब 15 अप्रैल के सुबह अब्राहम लिंकन की मौत हुई।

एक बार लिंकन और उनके एक सहयोगी वकील ने एक बार किसी मानसिक रोगी महिला की जमीन पर कब्जा करने वाले एक धूर्त आदमी को अदालत से सजा दिलवाई। मामला अदालत में केवल पंद्रह मिनट ही चला। सहयोगी वकील ने जीतने के बाद फीस में बँटवारकन ने उसे डपट दिया। सहयोगी वकील ने कहा कि उस महिला के भाई ने पूरी फीस चुका दी थी और सभी अदालत के निर्णय से प्रसन्न थे परन्तु लिंकन ने कहा – “लेकिन मैं खुश नहीं हूँ। वह पैसा एक बेचारी रोगी महिला का है और मैं ऐसा पैसा लेने के बजाय भूखे मरना पसंद करूँगा। तुम मेरी फीस की रकम उसे वापस कर दो।”

Lessons to take:-

"भीड़ हमेशा उस रास्ते पर चलती है जो रास्ता आसान लगता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं की भीड़ हमेशा सही रास्ते पर चलती है| अपने रास्ते खुद चुनिए क्योंकि आपको आपसे बेहतर और कोई नहीं जानता|"


जेफ बेजोस

 जेफ बेजोस

Who Is जेफ बेजोस ?


अमेरिकी उद्यमी जेफ बेजोस Amazon.com के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी और ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ के मालिक हैं। उनके सफल व्यापारिक उपक्रमों ने उन्हें दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक बना दिया है।

उनकी Net Worth 125+ Billion Dollar है| जबसे अमेजन कंपनी अस्तित्व आई है पूरी दुनिया का Shopping करने का तरीका ही बदल दिया। Amazon कंपनी अमेरिका की है और इसका Head Office भी USA में ही है तो दोस्तों चलिए Amazon की Success Story को शरू से जानते हैं


Early Life


उद्यमी और ई-कॉमर्स की दुनीया में अपनी धाक जमा चुके जेफ बेजोस का जन्म 1964 में न्यू मैक्सिको में हुआ था। बेजोस को कंप्यूटर से शुरुआती लगाव था और उन्होंने Princeton university में कंप्यूटर साइंस और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।

स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद उन्होंने वॉल स्ट्रीट पर काम किया और 1990 में वे निवेश फर्म D.E.Shaw में सबसे कम उम्र के वरिष्ठ उपाध्यक्ष बने। चार साल बाद, उन्होंने Amazon.com खोलने के लिए अपनी आकर्षक नौकरी छोड़ दी, एक ऑनलाइन किताबों की दुकान शुरू की जो इंटरनेट की सबसे बड़ी सफलता की कहानियों में से एक बन गई।

2013 में बेजोस ने 250 मिलियन डॉलर के सौदे में The Washington Post को खरीद लिया। उनके सफल व्यापारिक उपक्रमों ने उन्हें दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक बना दिया है।

जेफ बेजोस का जन्म 12 जनवरी, 1964 को अल्बुकर्क, न्यू मैक्सिको में एक किशोर मां, जैकलीन गिज जोर्गेनसेन और उनके जैविक पिता टेड जोर्गेनसेन के घर हुआ था। जॉर्गेन्स की शादी एक साल से कम समय में हुई थी, और जब बेजोस 4 साल के थे, तो उनकी मां ने क्यूबा के अप्रवासी माइक बेजोस से दोबारा शादी कर ली।

एक बच्चे के रूप में, जेफ बेजोस ने इस बात में एक प्रारंभिक रुचि दिखाई कि चीजें कैसे काम करती हैं, अपने माता-पिता के गैरेज को प्रयोगशाला में बदल दिया। वह एक किशोर के रूप में अपने परिवार के साथ मियामी चले गए, जहां उन्होंने कंप्यूटर के लिए एक प्रेम विकसित किया और अपने हाई स्कूल के वेलेडिक्टोरियन स्नातक किया। यह हाई स्कूल के दौरान था कि उन्होंने अपना पहला व्यवसाय शुरू किया, ड्रीम इंस्टीट्यूट, चौथे, पांचवें और छठे ग्रेडर के लिए एक शैक्षिक ग्रीष्मकालीन शिविर।

बेजोस ने प्रिंसटन विश्वविद्यालय में कंप्यूटर में अपनी रुचि पर कार्य किया, जहां उन्होंने 1986 में कंप्यूटर साइंस और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की। स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद, उन्होंने वॉल स्ट्रीट पर कई फर्मों में काम पाया, जिसमें फिटेल, बैंकर्स ट्रस्ट और निवेश फर्म डी.ई. शॉ आदि थे।

Starting of Amazon.com


बेजोस ने अपने गैरेज में अपनी नवेली कंपनी के लिए कार्यालय स्थापित किया, जहां कुछ कर्मचारियों के साथ, उन्होंने सॉफ्टवेयर विकसित करना शुरू किया। उन्होंने दो बेडरूम वाले घर में ऑपरेशनों का विस्तार किया, जो तीन सन माइक्रोस्ट्रेशन से सुसज्जित था, और अंततः वहीँ एक परीक्षण स्थल विकसित किया।

साइट को बीटा परीक्षण के लिए 300 दोस्तों को आमंत्रित करने के बाद, बेजोस ने 16 जुलाई, 1995 को दक्षिण अमेरिकी नदी के नाम पर Amazon.com का नाम चुना।

कंपनी की प्रारंभिक सफलता काफी अच्छी थी। बिना किसी प्रेस प्रचार के, Amazon.com ने 30 दिनों के भीतर संयुक्त राज्य अमेरिका और 45 विदेशी देशों में किताबें बेच दीं। दो महीनों में, बिक्री $ 20,000 प्रति सप्ताह तक पहुंच गई, यह कम्पनी उनकी अपेक्षाओं से की तुलना में काफी तेजी से बढ़ रहा था।

Amazon.com 1997 में सार्वजनिक हुआ, कई बाजार विश्लेषकों ने यह सवाल उठाया कि क्या पारंपरिक खुदरा विक्रेताओं ने अपने ई-कॉमर्स साइटों को लॉन्च किया है या नहीं। दो साल बाद, स्टार्ट-अप न केवल बना रहा, बल्कि प्रतियोगियों से आगे निकल कर ई-कॉमर्स लीडर बन गया।

बेजोस ने 1998 में सीडी और वीडियो की बिक्री के साथ अमेज़ॅन में विविधता जारी रखी, और बाद में कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स, खिलौने और प्रमुख खुदरा साझेदारी का सामान भी अपनी इस वेबसाइट पर बेचना शुरू किया। 90 के दशक की शुरुआत में कई डॉट.कॉम धमाकेदार रहे, लेकिन अमेज़न की बिक्री में तेजी आई, जो 1995 में 510,000 डॉलर से उछलकर 2011 में 17 बिलियन डॉलर से अधिक हो गई।

2006 में, Amazon.com ने अपनी वीडियो-ऑन-डिमांड सेवा शुरू की; शुरुआत में यह TiVo पर Amazon Unbox के रूप में जाना जाता था, अंततः इसे Amazon Instant वीडियो के रूप में रीब्रांड किया गया।

Kindle E-Reader


2007 में, कंपनी ने एक हैंड हेल्ड डिजिटल बुक रीडर किंडल को जारी किया, जिसने उपयोगकर्ताओं को अपनी पुस्तक चयनों को खरीदने, डाउनलोड करने, पढ़ने और संग्रहीत करने में सक्षम बनाया।

बेजोस ने 2011 में किंडल फायर के अनावरण के साथ टैबलेट मार्केटप्लेस में अमेज़ॅन में प्रवेश किया। अगले सितंबर में, उन्होंने नए किंडल फायर एचडी की घोषणा की, जो कंपनी की अगली पीढ़ी का टैबलेट है जो ऐप्पल के आईपैड को अपने पैसे के लिए चलाने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

The Washington Post


बेजोस ने 5 अगस्त 2013 को दुनिया भर में सुर्खियां बटोरीं, जब उन्होंने अपनी मूल कंपनी द वाशिंगटन पोस्ट कंपनी से जुड़े द वाशिंगटन पोस्ट और अन्य प्रकाशनों को $ 250 मिलियन में खरीदा। इस सौदे ने ग्राहम परिवार द्वारा द पोस्ट कंपनी पर चार पीढ़ी के शासनकाल के अंत को चिह्नित किया, जिसमें कंपनी के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी डोनाल्ड ई. ग्राहम और उनकी भतीजी, पोस्ट प्रकाशक केथरीन ग्राहम शामिल थे।

Amazon Drones


दिसंबर 2013 की शुरुआत में, बेजोस ने सुर्खियां बटोरीं, जब उन्होंने अमेज़ॅन द्वारा एक नई, प्रयोगात्मक पहल का खुलासा किया, जिसे “अमेज़ॅन प्राइम एयर” कहा गया, ग्राहकों को डिलीवरी सेवाएं प्रदान करने के लिए ड्रोन का उपयोग किया।

बेजोस के अनुसार, ये ड्रोन पांच पाउंड तक वजन वाली वस्तुओं को ले जाने में सक्षम हैं, और कंपनी के वितरण केंद्र से 10 मील की दूरी के भीतर यात्रा करने में सक्षम हैं। उन्होंने यह भी कहा कि प्राइम एयर चार या पांच साल के भीतर वास्तविकता बन सकती है।

जब कंपनी ने 2014 में फायर फोन लॉन्च किया, तो बेजोस ने अमेज़ॅन के कुछ बड़े मिसयूज़ में से एक का निरीक्षण किया; हालांकि इसकी काफी आलोचना की गई, जिसकी वजह से इसे अगले वर्ष बंद कर दिया गया।

Blue Origin


2000 में, बेजोस ने ब्लू ओरिजिन की स्थापना की, जो एक एयरोस्पेस कंपनी है, जो ग्राहकों को भुगतान करने के लिए इसे सुलभ बनाने के लिए अंतरिक्ष यात्रा की लागत को कम करने के लिए प्रौद्योगिकी विकसित करती है।

डेढ़ दशक तक, कंपनी ने चुपचाप काम किया। फिर, 2016 में, बेजोस ने पत्रकारों को केंट, वाशिंगटन से मुख्यालय, सिएटल के दक्षिण में जाने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने मनुष्यों की दृष्टि का न केवल दौरा किया, बल्कि अंततः अंतरिक्ष का उपनिवेशण किया। 2017 में, बेजोस ने ब्लू ओरिजिन को फंड करने के लिए सालाना अमेजन स्टॉक में लगभग 1 बिलियन डॉलर बेचने का वादा किया था।

दो साल बाद, उन्होंने ब्लू ओरिजिन मून लैंडर का खुलासा किया और कहा कि कंपनी अपने सबऑर्बिटल न्यू शेपर्ड रॉकेट की परीक्षण उड़ानों का संचालन कर रही है, जो पर्यटकों को कुछ मिनटों के लिए अंतरिक्ष में ले जाएगा।

“हम अंतरिक्ष के लिए एक सड़क बनाने जा रहे हैं। और फिर आश्चर्यजनक चीजें होंगी, ”बेजोस ने कहा। अगस्त 2019 में, नासा ने घोषणा की कि ब्लू ओरिजिन उन 13 कंपनियों में से है जिन्हें 19 प्रौद्योगिकी परियोजनाओं पर सहयोग करने के लिए चुना गया था, जो चंद्रमा और मंगल पर पहुंचने के लिए थीं। ब्लू ओरिजिन चंद्रमा के लिए एक सुरक्षित और सटीक लैंडिंग सिस्टम विकसित कर रहा है और साथ ही तरल प्रणोदक वाले रॉकेट के लिए इंजन नोजल भी। नासा के केनेडी स्पेस सेंटर के ठीक बाहर एक पुनर्निर्मित परिसर से पुन: प्रयोज्य रॉकेट बनाने और लॉन्च करने के लिए कंपनी नासा के साथ भी काम कर रही है।

Amazon Prime Video


7 सितंबर, 2006 को USA में अमेज़ॅन अनबॉक्स के रूप में लॉन्च किया गया, यह सेवा अपने विस्तारित पुस्तकालय के साथ बढ़ी, और प्राइम के विकास के साथ प्राइम वीडियो सदस्यता को जोड़ा गया प्राइम वीडियो, जिसे अमेजन प्राइम वीडियो के रूप में भी विपणन किया जाता है, एक अमेरिकी इंटरनेट वीडियो है जो डिमांड सेवा पर विकसित, स्वामित्व और अमेज़न द्वारा संचालित है। यह किराए या खरीद और प्राइम वीडियो के लिए टेलीविज़न शो और फिल्में प्रदान करता है, अमेज़ॅन स्टूडियो की मूल सामग्री का चयन और अमेज़ॅन की प्रमुख सदस्यता में शामिल लाइसेंस प्राप्त अधिग्रहण। 14 दिसंबर 2016 को प्राइम वीडियो को दुनिया भर में लॉन्च किया गया


Net Worth


जुलाई 2017 में, बेज़ोस नंबर 2 पर वापस जाने से पहले, दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बनने के लिए उनहोने Microsoft के संस्थापक Bill Gates को पीछे छोड़ दिया। Amazon के प्रमुख ने फिर अक्टूबर में शीर्ष स्थान हासिल किया, और जनवरी 2018 में,ब्लूमबर्ग ने उनकी कुल संपत्ति $ 105.1 बिलियन आंकी, जिससे वह इतिहास के सबसे अमीर व्यक्ति बन गए। 2019 में उनकी कुल संपत्ति 153 बिलियन है और वह अब दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं।


Lessons to take:-

जब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों की वजह दूसरों को मानते है, तब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों को मिटा नहीं सकते|