Tuesday, June 16, 2020

Study Tips for UPSC

Study Tips for UPSC


सिविल सेवा परीक्षा में आपकी मेहनत और सफलता के बीच कोई अनिवार्य तथा समानुपातिक कारण-कार्य संबंध नहीं है। अर्थात्  यह ज़रूरी नहीं कि अधिक मेहनत करने वाला अभ्यर्थी सफल हो ही जाएगा और कम मेहनत करने वाला अभ्यर्थी सफल नहीं होगा। सफलता मेहनत के साथ-साथ कई अन्य कारकों पर निर्भर करती है जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है आपकी उत्तर-लेखन शैली।
उत्तर-पुस्तिका की जाँच करने वाले परीक्षक को इस बात की बिल्कुल जानकारी नहीं होती कि उत्तर-पुस्तिका किस उम्मीदवार की है, उसने कितनी गंभीरता से पढ़ाई की है या उसकी परिस्थितियाँ कैसी हैं इत्यादि। परीक्षक के पास अभ्यर्थी के मूल्यांकन का एक ही आधार होता है और वह यह कि अभ्यर्थी ने अपनी उत्तर-पुस्तिका में किस स्तर के उत्तर लिखे हैं? अगर आपके उत्तर प्रभावी होंगे तो परीक्षक अच्छे अंक देने के लिये मजबूर हो जाएगा और यदि उत्तरों में दम नहीं है तो फिर आपने चाहे जितनी भी मेहनत की हो, उसका कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकलेगा। आपकी सफलता या विफलता में तैयारी की भूमिका 50% से अधिक नहीं है। शेष 50% भूमिका इस बात की है कि परीक्षा के तीन घंटों में आपका निष्पादन कैसा रहा? आपने कितने प्रश्नों के उत्तर लिखे? किस क्रम में लिखे, बिंदुओं में लिखे या पैरा बनाकर लिखे, रेखाचित्रों की सहायता से लिखे या उनके बिना लिखे, साफ-सुथरी हैंडराइटिंग में लिखे या अस्पष्ट हैंडराइटिंग में, उत्तरों में तथ्यों और विश्लेषण का समुचित अनुपात रखा या नहीं- ये सभी वे प्रश्न हैं जो आपकी सफलता या विफलता में कम से कम 50% भूमिका निभाते हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि अधिकांश उम्मीदवार इतने महत्त्वपूर्ण पक्ष के प्रति प्रायः लापरवाही बरतते हैं और उनमें से कई तो अपने कॉलेज के बाद के जीवन का पहला उत्तर मुख्य परीक्षा में ही लिखते हैं।यूपीएससी मुख्य परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों की प्रकृति वर्णनात्मक होती है जिसमें प्रश्नों के उत्तर को  निर्धारित शब्दों (सामान्यत:100 से 300 शब्द) में उत्तर-पुस्तिका में लिखना होता है, अत: ऐसे प्रश्नों के उत्तर लिखते समय लेखन शैली एवं तारतम्यता के साथ-साथ समय प्रबंधन आदि पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है। लेखन शैली एवं तारतम्यता का विकास सही दिशा में निरंतर अभ्यास से संभव है, जिसके लिये अभ्यर्थियों को विषय की व्यापक समझ के साथ-साथ कुछ महत्त्वपूर्ण बातों का भी ध्यान रखना चाहिये। हमारा उद्देश्य यही समझाना है कि उम्मीदवारों को शुरू से ही उत्तर-लेखन शैली के विकास के लिये क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिये?
उत्तर-लेखन के विभिन्न चरण:
उत्तर-लेखन की संपूर्ण प्रक्रिया को नीचे दिये गए चार चरणों में विभाजित करके समझा जा सकता है-
1. प्रश्न को समझना तथा सुविधा के लिए उसे कई टुकड़ो में बाँटना
2. उत्तर की रूपरेखा तैयार करना
3. उत्तर लिखना
4. उत्तर के प्रस्तुतीकरण को आकर्षक बनाना।
प्रश्न को समझना तथा टुकड़ो में बाँटना
उत्तर-लेखन प्रक्रिया का सबसे पहला चरण यही है कि उम्मीदवार प्रश्न को कितने सटीक तरीके से समझता है तथा उसमें छिपे विभिन्न उप-प्रश्नों तथा उनके पारस्परिक संबंधों को कैसे परिभाषित करता है? सच तो यह है कि आधे से अधिक अभ्यर्थी इस पहले चरण में ही गंभीर गलतियाँ कर बैठते हैं।प्रश्न को समझने का अर्थ यह है कि प्रश्नकर्त्ता हमसे क्या पूछना चाहता है? कई बार प्रश्न की भाषा ऐसी होती है कि हम संदेह में रहते हैं कि क्या लिखें और क्या छोड़ें? इस समस्या का निराकरण करने के लिये प्रश्न को समझने की क्षमता का विकास करना आवश्यक है।प्रश्न को ठीक से समझने के लिये मुख्यतः दो बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिये-
1. प्रश्न के अंत में किस शब्द का प्रयोग किया गया है।
2. प्रश्न के कथन में कितने तार्किक हिस्से विद्यमान हैं और उन सभी में आपसी संबंध क्या हैं?
प्रश्न के अंत में दिये गए शब्दों से आशय उन शब्दों से है जो बताते हैं कि प्रश्न के संबंध में अभ्यर्थी को क्या करना है? ऐसे शब्दों में विवेचन कीजिये, विश्लेषण कीजिये, प्रकाश डालिये, व्याख्या कीजिये, मूल्यांकन कीजिये, आलोचनात्मक मूल्यांकन, परीक्षण, निरीक्षण, समीक्षा, आलोचना, समालोचना, वर्णन/विवरण एवं स्पष्ट कीजिये/स्पष्टीकरण दीजिये इत्यादि शामिल हैं।इन शब्दों के आधार पर तय होता है कि परीक्षक अभ्यर्थी से उत्तर में क्या उम्मीद कर रहा है? यह सही है कि बहुत से परीक्षक खुद ही इन शब्दों के प्रति हमेशा चौकस नहीं रहते, किंतु अभ्यर्थियों को यही मान कर चलना चाहिये कि परीक्षक इन्हीं शब्दों को आधार बनाकर ही उत्तर का मूल्यांकन करते हैं। इसको ध्यान में रखते हुए हमने कुछ महत्त्वपूर्ण शब्दों को विभिन्न वर्गों में बाँटकर उसके सही आशय को स्पष्ट किया है जिससे आपके उत्तर को एक सही दिशा मिल सके।
व्याख्या/वर्णन/विवरण/स्पष्ट कीजिये/ स्पष्टीकरण दीजिये/प्रकाश डालिये:
इन सभी शब्दों से प्रायः समान आशय व्यक्त होते हैं।ऐसे प्रश्नों में अभ्यर्थी से सिर्फ इतनी अपेक्षा होती है कि वह पूछे गए प्रश्न से संबंधित जानकारियाँ सरल भाषा में व्यक्त कर दे।वर्णन और विवरण वाले प्रश्नों में तथ्यों की गुंजाइश ज़्यादा होती है जबकि ‘व्याख्या कीजिये’, ‘प्रकाश डालिये’ या ‘स्पष्टीकरण दीजिये’ वाले प्रश्नों में पूछे गए विषय को सरल भाषा में समझाते हुए लिखने की अपेक्षा  होती है।
आलोचना/समीक्षा/समालोचना/परीक्षा/परीक्षण/निरीक्षण/गुण-दोष विवेचनः
इन सभी प्रश्नों को एक वर्ग में रखा जा सकता है।ऐसे प्रश्न उम्मीदवार से किसी तथ्य या कथन की अच्छाइयों और बुराइयों की गहरी समझ की अपेक्षा करते हैं।
आलोचना शब्द से यह भाव ज़रूर निकलता है कि अभ्यर्थी को इसमें पूछे गए विषय से जुड़ी नकारात्मक बातें लिखनी हैं किंतु सच यह है कि आलोचना का सही अर्थ गुण और दोष दोनों पक्षों पर ध्यान देना है। मोटे तौर पर अनुपात यह रखा जा सकता है कि समीक्षा/समालोचना/परीक्षा/परीक्षण/निरीक्षण जैसे प्रश्नों में अच्छे और बुरे पक्षों का अनुपात लगभग बराबर रखा जाए जबकि आलोचना वाले प्रश्नों में नकारात्मक पक्षों का अनुपात कुछ बढ़ा दिया जाए अर्थात् 70-75% तक कर दिया जाए।
मूल्यांकन/आलोचनात्मक मूल्यांकनः
मूल्यांकन का अर्थ है किसी कथन या वस्तु के मूल्य का अंकन या निर्धारण करना।ऐसे प्रश्नों में अभ्यर्थी से अपेक्षा होती है कि वह पूछे गए विषय का सार्वकालिक या वर्तमान महत्त्व रेखांकित करे, उसकी कमियाँ भी बताए और अंत में स्पष्ट करे कि उस कथन या वस्तु की समग्र उपयोगिता कितनी है?मूल्यांकन से पहले आलोचनात्मक लिखा हो या नहीं, तार्किक रूप से दोनों बातों को एक ही समझना चाहिये। मूल्यांकन की कोई भी गंभीर प्रक्रिया तभी पूरी हो सकती है जब उसके मूल में आलोचनात्मक पक्ष का ध्यान रखा गया हो। सार यह है कि आलोचनात्मक मूल्यांकन वाले प्रश्नों में अभ्यर्थी को पहले गुण और दोष बताने चाहियें और अंत में उन दोनों की तुलना के आधार पर यह स्पष्ट करना चाहिये कि उस कथन या वस्तु का क्या और कितना महत्त्व है?
विवेचन/मीमांसाः
मीमांसा का अर्थ होता है किसी विषय को व्यवस्थित तथा संपूर्ण रूप में प्रस्तुत करना। ऐसे प्रश्नों का उत्तर लिखना कठिन नहीं होता। उस प्रश्न से संबंधित सभी संभव पक्षों को मिलाकर लिख देना पर्याप्त होता है। विवेचन वाले प्रश्नों में भी मूल अपेक्षा यही होती है।अंतर सिर्फ इतना होता है कि इसमें किसी कथन या तथ्य की चर्चा करते हुए तार्किक व्याख्या की ज़्यादा अपेक्षा होती है।
विश्लेषणः
विश्लेषण तथा संश्लेषण परस्पर विरोधी शब्द हैं। जहाँ संश्लेषण का अर्थ बिखरी हुई चीज़ों को जोड़कर एक करना होता है, वहीं विश्लेषण का अर्थ होता है- किसी एक विचार या कथन को सरल से सरल हिस्सों में विभाजित करना। किसी कथन का विश्लेषण करते हुए अभ्यर्थी को अपने मन में क्या, क्यों, कैसे, कब, कहाँ, कितना जैसे संदर्भों को आधार बनाना चाहिये।
प्रश्नों का तार्किक विखंडन:
सरल भाषा में कहें तो तार्किक विखंडन का अर्थ है जटिल वाक्य को कुछ सरल वाक्यों में तोड़कर उसमें अंतर्निहित उप-प्रश्नों की पहचान करना।  सरल कथनों में तो यह समस्या सामने नहीं आती किंतु जैसे ही जटिल वाक्य-संयोजन वाले प्रश्न उपस्थित होते हैं, अभ्यर्थी के समक्ष उनकी व्याख्या और अर्थ-बोध से जुड़ी कठिनाइयाँ प्रकट होने लगती हैं।ऐसी स्थिति में अभ्यर्थी को मुख्य रूप से उन मात्रा-सूचक या तीव्रता-सूचक शब्दों पर ध्यान देना चाहिये जो प्रश्न का फोकस निर्धारित करते हैं। उदाहरण के लिये, यदि प्रश्न है कि "1975 में घोषित राष्ट्रीय आपातकाल स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे विवादास्पद समयों में से एक के रूप में देखा जाता है।’ मूल्यांकन कीजिये।"  तो इसमें ‘सबसे विवादास्पद समयों में से एक’ वाक्यांश पर सर्वाधिक ध्यान दिया जाना चाहिये। इसमें निहित है कि आपातकाल स्वतंत्र भारत के इतिहास का अकेला विवादास्पद समय नहीं रहा है बल्कि कई विवादास्पद समयों में से एक है। इसके साथ-साथ, इसमें यह भी निहित है कि इस प्रश्न में अभ्यर्थी को हर विवादास्पद समय पर टिप्पणी नहीं करनी है बल्कि उन गिने-चुने विवादास्पद समयों पर चर्चा करनी है जिनकी तुलना में शेष विवादास्पद समय कम तीव्रता वाले रहे हैं।इस प्रश्न में अभ्यर्थी को दिये गए कथन का विखंडन कई उप-प्रश्नों में करना होगा, जैसे- 1975 का आपातकाल अत्यंत विवादास्पद काल क्यों माना जाता है, स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे अधिक विवादास्पद काल कौन-कौन से माने जा सकते हैं, तथा सर्वाधिक विवादास्पद कालों की तुलना में 1975 के आपातकाल की क्या स्थिति रही है?
उत्तर की रूपरेखा तैयार करना
उत्तर-लेखन प्रक्रिया के दूसरे चरण के अंतर्गत उत्तर की एक संक्षिप्त रूपरेखा बनाई जा सकती है। कई अभ्यर्थी इस प्रक्रिया का प्रयोग करने से बचते हैं और समय बचाने के लिये सीधे उत्तर लिखने की शुरुआत कर देते हैं। अगर उनकी लेखन क्षमता बहुत सधी हुई न हो तो तय मानकर चलिये कि उनके उत्तर में अव्यवस्था तथा बिखराव का आना स्वाभाविक है। बेहतर यही है कि अभ्यर्थी दस मिनट की जगह आठ मिनट में ही उत्तर लिखे किंतु उसका उत्तर बिल्कुल सधा हुआ हो। बहुत अच्छी लेखन क्षमता वाले कुछ अभ्यर्थियों का स्तर तो इतना ऊँचा होता है कि वे प्रश्न को पढ़ते ही मन-ही-मन उत्तर की रूपरेखा तैयार कर लेते हैं और सीधे उत्तर-लेखन की शुरुआत कर देते हैं। पर यह क्षमता अर्जित करना एक लंबी और श्रमसाध्य प्रक्रिया है जिसे हर अभ्यर्थी में नहीं पाया जा सकता।नए अभ्यर्थियों के लिये यही बेहतर है कि वे उत्तर की शुरुआत करने से पहले थोड़ा सा समय रूपरेखा या ‘सिनोप्सिज़’ (Synopsis) बनाने पर खर्च करें।रूपरेखा बनाने का अर्थ यह है कि उत्तर से संबंधित जो बिंदु अभ्यर्थी के दिमाग में हैं, उन्हें किसी रफ कागज़ पर लिखकर व्यवस्थित कर लिया जाए। ज़रूरी नहीं है कि हर बिंदु को लिखा ही जाए, यह भी हो सकता है कि अभ्यर्थी रेखाचित्र जैसे किसी फॉर्मेट में उसे तैयार कर ले। उदाहरण के लिये, यदि प्रश्न है कि "एक कुशल नेतृत्व की वज़ह से एक दुरूह संभावना को यथार्थ में परिवर्तित किया जा सका। भारतीय रियासतों के एकीकरण के संदर्भ में इस कथन पर चर्चा कीजिये।" तो इसकी संभावित रूपरेखा कुछ इस प्रकार बनाई जानी चाहिये-
1. भूमिकाः पटेल और बिस्मार्क की तुलना।
2. दुरूह संभावनाः 1947 की स्थिति, अंग्रेज़ों की योजना, कई रियासतों/राजाओं की स्वतंत्र रहने की इच्छा आदि।
3. कुशल नेतृत्वः पटेल की कार्य-क्षमता व कार्य-शैली का संक्षिप्त वर्णन।
4. निष्कर्षः पटेल की भूमिका को बिस्मार्क तथा गैरीबाल्डी आदि की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण सिद्ध करना।
शुरू में अभ्यर्थी इसी फॉर्मेट पर रूपरेखा बनाते हैं। धीरे-धीरे वे इस प्रक्रिया के अभ्यस्त हो जाते हैं और सिर्फ कुछ टूटे-फूटे शब्द लिखने से भी उनका काम चल जाता है। आपको मुख्य परीक्षा में बैठने से पहले रूपरेखा निर्माण का इतना अभ्यास कर लेना चाहिये कि परीक्षा भवन में केवल कुछ आधे-अधूरे संकेतों से ही रूपरेखा संबंधी कार्य पूरा हो सके।परीक्षा भवन में समय के दबाव को देखते हुए यह स्वाभाविक है कि प्रत्येक उत्तर को लिखने से पहले अभ्यर्थी उत्तर की रूपरेखा नहीं बना पाता। अगर आपके साथ भी गति का ऐसा संकट हो तो बेहतर होगा कि 20 में से शुरुआती 7-8 प्रश्नों का उत्तर आप संक्षिप्त रूपरेखाओं के आधार पर लिखें और बाद के प्रश्नों के उत्तर सीधे लिख दें।
उत्तर लिखना
एक अच्छा उत्तर वह है जो प्रश्न का उत्तर है।  प्रश्न की रूपरेखा तैयार हो जाने के बाद अभ्यर्थी को वास्तविक उत्तर-लेखन करना चाहिये।एक अच्छे उत्तर की मुख्यत: दो विशेषताएँ होती हैं- प्रामाणिकता तथा प्रवाह। प्रामाणिकता का अर्थ है कि उत्तर में ऐसे ठोस तथ्य और तर्क विद्यमान होने चाहियें जिनसे प्रश्न की वास्तविक मांग पूरी होती हो अर्थात् परीक्षक को उत्तर पढ़कर यह महसूस होना चाहिये कि अभ्यर्थी ने विषय का गंभीर अध्ययन किया है। प्रवाह का अर्थ है कि उत्तर के पहले शब्द से अंतिम शब्द तक ऐसी क्रमबद्धता होनी चाहिये कि परीक्षक को उत्तर पढ़ते समय बीच में कहीं भी रुकना न पड़े।एक अच्छे उत्तर-लेखन के संबंध में प्रायः प्रत्येक अभ्यर्थी के मन में कुछ जिज्ञासाएँ अनिवार्य रूप से होती हैं जिनका समाधान करने का प्रयास किया गया है।
शब्द सीमा का पालनः
प्रायः अभ्यर्थियों के मन में जिज्ञासा होती है कि उन्हें दी गई शब्द-सीमा के अंदर ही उत्तर लिखना है या इसमें थोड़ी बहुत छूट ली जा सकती है? अगर हाँ, तो कितनी?इस प्रश्न का उत्तर जानने से पहले यह समझ लेना चाहिये कि लोक सेवा आयोग के लिये व्यावहारिक तौर पर यह संभव नहीं है कि वह हर अभ्यर्थी के उत्तरों की शब्द संख्या को गिनने की व्यवस्था कर सके। अतः अभ्यर्थियों को सबसे पहले इस दबाव से मुक्त हो जाना चाहिये कि उनके एक-एक शब्द की गणना की जाती है।इस संबंध में एक सच यह भी है कि भले ही आयोग शब्दों की गणना न करता हो, पर परीक्षक अपने अनुभवों के आधार पर उत्तर-पुस्तिका देखते ही यह अनुमान लगा लेता है कि उत्तर में शब्दों की संख्या लगभग कितनी है। शब्दों की संख्या बहुत अधिक या बहुत कम होने पर ही परीक्षक का ध्यान उस ओर जाता है। ऐसी स्थिति में उसके पास यह विवेकाधीन शक्ति होती है कि वह अभ्यर्थी को इस गलती के लिये दंडित करे या नहीं? सार यह है कि शब्दों की सीमा का थोड़ा-बहुत उल्लंघन करने में समस्या नहीं है किंतु यह उल्लंघन 10-20% से अधिक नहीं होना चाहिये।कुछ अभ्यर्थी इस बात को लेकर भी परेशान रहते हैं कि शब्दों की गणना में ‘है’, ‘था’, ‘चाहिये’ आदि शब्दों की गणना की जाती है या नहीं? उनमें से कुछ यह दावा भी करते हैं कि इन्हें उत्तर की शब्द-सीमा में शामिल नहीं किया जाता। वस्तुतः यह एक भ्रांति है। शब्दों की गणना में सभी प्रकार के शब्द शामिल होते हैं, चाहे वे योजक शब्द हों या अन्य शब्द। हाँ, यह ज़रूर है कि कोष्ठक में लिखे गए शब्दों को प्रायः शामिल नहीं किया जाता। इसी प्रकार, अगर कहीं समास भाषा का प्रयोग किया जाता है तो समास में आने वाले दोनों शब्दों को हाइफन की वज़ह से प्रायः एक शब्द ही मान लिया जाता है।
बिंदुओं में लिखें या पैराग्राफ में?
यह भी अधिकांश उम्मीदवारों की एक सामान्य जिज्ञासा है कि उन्हें उत्तर-लेखन के अंतर्गत बिंदुओं का प्रयोग करना चाहिये या नहीं? वस्तुतः इस प्रश्न का उत्तर हाँ या नहीं में देना संभव नहीं है। यह निर्णय इस बात पर निर्भर करता है कि प्रश्न की प्रकृति क्या है?अगर प्रश्न की प्रकृति ऐसी है कि उसके उत्तर में विभिन्न तथ्यों या बिंदुओं को सूचीबद्ध किये जाने की आवश्यकता है तो निस्संदेह उसमें बिंदुओं का प्रयोग किया जाना चाहिये। किंतु अगर प्रश्न की प्रकृति शुद्ध विश्लेषणात्मक है तो बिंदुओं के प्रयोग से बचना आवश्यक है। ऐसा उत्तर पैराग्राफ पद्धति के अनुसार लिखना ही ठीक रहता है।उदाहरण के तौर पर, अगर यह प्रश्न पूछ लिया जाए कि ‘भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान घटने वाली सबसे महत्त्वपूर्ण पाँच घटनाएँ कौन सी थीं?’  तो इसके उत्तर में बिंदुओं का प्रयोग किया जाना चाहिये। एक छोटी-सी भूमिका लिखने के बाद अभ्यर्थी को सीधे 1-5 तक बिंदु बनाकर एक-एक तथ्य प्रस्तुत करते जाना चाहिये।अगर यह प्रश्न पूछ लिया जाए कि "जहाँ महात्मा गांधी जाति व्यवस्था की कुरीतियों पर कोई गंभीर चोट नहीं कर सके, वहीं डॉ. अम्बेडकर ने जाति व्यवस्था के मूल पर प्रहार किया। स्पष्ट कीजिये"। इस प्रश्न की स्पष्ट अपेक्षा है कि उत्तर का पहला पैरा महात्मा गांधी के संबंध में और दूसरा पैरा डॉ. अम्बेडकर के संबंध में लिखा जाना चाहिये और दोनों ही पैराग्राफों में सिर्फ एक-एक बिंदु की व्याख्या किये जाने की ज़रूरत है। (स्पष्ट है कि ऐसे उत्तरों में बिंदुओं या शीर्षकों की भूमिका नहीं होती। यदि हम अनावश्यक बिंदुओं का प्रयोग करेंगे तो निस्संदेह नुकसान में ही रहेंगे)।
रेखाचित्रों का प्रयोग करें या नहीं?
अभ्यर्थियों के मन में एक दुविधा इस बात को लेकर भी रहती है कि उन्हें किसी उत्तर में रेखाचित्र (जैसे पाई डायग्राम, वेन डायग्राम, तालिका, फ्लो-चार्ट) आदि का प्रयोग करना चाहिये या नहीं?इस प्रश्न का उत्तर यह है कि निबंध तथा विश्लेषणात्मक प्रश्नों में प्रायः इस प्रवृत्ति से बचना ही अच्छा रहता है। किंतु यदि प्रश्न की प्रकृति ही ऐसी हो कि उसमें विभिन्न वस्तुओं का आपसी संबंध या वर्गीकरण आदि दिखाए जाने की ज़रूरत हो तो रेखाचित्र का प्रयोग सहायक भी हो सकता है। उदाहरण के लिये, अगर एथिक्स के प्रश्नपत्र में पूछ लिया जाए कि "अपराध और पाप की धारणाओं में अंतर स्पष्ट करें। क्या यह ज़रूरी है कि हर अपराध पाप हो और हर पाप अपराध?"  तो इस प्रश्न के उत्तर में दो अवधारणाओं का संबंध स्पष्ट करने के लिये वेन डाइग्राम का प्रयोग कर लेना चाहिये। कई जटिल अवधारणाओें में अंतर जितनी आसानी से किसी डायग्राम के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है, उतनी आसानी से लिखित शब्दों के माध्यम से नहीं।सार यह है कि जहाँ विभिन्न धारणाओं के पारस्परिक संबंधों या वर्गीकरण आदि को स्पष्ट करना हो, वहाँ रेखाचित्र शैली का प्रयोग करना हमेशा फायदेमंद होता है किंतु शुद्ध विश्लेषणात्मक प्रश्नों में ऐसे प्रयोगों से बचना चाहिये।
कैसी शब्दावली का प्रयोग करें?
उत्तर लिखने में भाषा-शैली की सरलता एवं सहजता बनाए रखना चाहिये। शब्दों के चयन में इतनी सावधानी बरतना अनिवार्य है कि उत्तर की गरिमा से समझौता न हो।उर्दू, फारसी परंपरा के शब्दों का प्रयोग निबंध में तो कुछ मात्रा में किया जा सकता है किंतु सामान्य अध्ययन के प्रश्नपत्रों में ऐसी भाषा के प्रयोग से बचना चाहिये। अंग्रेज़ी की शब्दावली का प्रयोग करने में समस्याएँ कम हैं। जहाँ भी कोई जटिल, तकनीकी शब्द पहली बार आए, वहाँ आपको कोष्ठक में अंग्रेज़ी का शब्द भी लिख देना चाहिये। कोष्ठक में लिखते समय आप रोमन लिपि का प्रयोग कर सकते हैं। अगर आप अंग्रेज़ी के किसी तकनीकी शब्द का प्रयोग देवनागरी लिपि में करते हैं तो उसके लिये कोष्ठक की ज़रूरत नहीं है। किंतु ध्यान रखें कि इस सुविधा का प्रयोग केवल बहुत ज़रूरी शब्दों के लिये ही किया जाना चाहिये। अगर अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग सामान्य अनुपात से अधिक मात्रा में हुआ तो परीक्षक के मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।परीक्षा में सामान्यतः उस शब्दावली को अधिक महत्त्व दें जो संस्कृत मूल की अर्थात् तत्सम् है। ऐसी शब्दावली प्रायः अधिक औपचारिक मानी जाती है और परीक्षा के अनुशासन को देखते हुए परीक्षक इसे उचित समझते हैं। उदाहरण के लिये, ‘प्रधानमंत्री जी अस्वस्थ्य  है’  कहने में जो औपचारिकता है, वह यह कहने में नहीं है कि ‘वज़ीरे आज़म साहब की तबीयत नासाज़ है।’  इसलिये जहाँ तक संभव हो, अपनी शब्दावली को सरल, सहज किंतु तत्समी बनाए रखने का प्रयास करें।
भूमिका आदि लिखें या नहीं?
अभ्यर्थियों को इस प्रश्न पर भी पर्याप्त संदेह रहता है कि उन्हें अपने उत्तर की शुरुआत में भूमिका लिखनी चाहिये अथवा नहीं? इसी प्रकार, उत्तर के अंत में निष्कर्ष की आवश्यकता को लेकर भी संदेह बना रहता है।आजकल सामान्य अध्ययन और वैकल्पिक विषयों में 200-250 शब्दों से अधिक शब्द-सीमा वाले उत्तर नहीं पूछे जाते हैं। इसलिये, आजकल यह मानकर चलना ठीक है कि बिना किसी औपचारिक भूमिका के आप सीधे अपने उत्तर की शुरुआत कर सकते हैं। उत्तर का पहला एकाध वाक्य ऐसा रखना चाहिये जो भूमिका की ज़रूरत को पूरा कर दे। अगर प्रश्न किसी विवाद पर आधारित है तो एक-दो पंक्तियों का निष्कर्ष भी दिया जाना चाहिये किंतु सामान्य तथ्यात्मक प्रश्नों में निष्कर्ष की कोई आवश्यकता नहीं है।उदाहरण के लिये, अगर प्रश्न है कि ‘स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी और डॉ. अंबेडकर के तुलनात्मक योगदान पर चर्चा करें’  तो उसकी संक्षिप्त भूमिका और निष्कर्ष क्रमशः इस प्रकार हो सकते हैं-भूमिकाः भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की मुख्यधारा का नेतृत्व यदि महात्मा गांधी कर रहे थे तो उसी समय डॉ. अम्बेडकर सदियों से वंचित दलित व आदिवासी समुदाय को मुख्यधारा में जोड़ने की कोशिश कर रहे थे। इन दोनों महान नेताओं के बीच तुलना के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं-निष्कर्षः सार यह है कि यदि महात्मा गांधी की बड़ी भूमिका भारत को अंग्रेज़ों से आज़ाद कराने में थी तो डॉ. अंबेडकर की भूमिका हमें रूढ़ियों और शोषण से आज़ाद कराने में थी।
उत्तर के प्रस्तुतीकरण को आकर्षक बनाना
उत्तर-लेखन का अंतिम पक्ष यह है कि हम अपने उत्तर को ज़्यादा सुंदर व प्रभावशाली कैसे बना सकते हैं? इसके कुछ प्रमुख सूत्र इस प्रकार हैं-
उत्तर के सबसे महत्त्वपूर्ण शब्दों तथा वाक्यों को रेखांकित करना न भूलें, पर यह ध्यान रखें कि रेखांकन का प्रयोग जितनी कम मात्रा में करेंगे, उसका प्रभाव उतना ही अधिक होगा। कई विद्यार्थी लगभग हर पंक्ति को ही रेखांकित कर देते हैं जिसका कोई लाभ नहीं मिलता।अभ्यर्थी को चाहिये कि वह काले और नीले दो रंगों के पेन का प्रयोग करे। जैसे वह नीले पेन से उत्तर लिख सकता है और काले पेन से महत्त्वपूर्ण हिस्सों को रेखांकित कर सकता है। पर यह ध्यान रखें कि इन दोनों रंगों के अलावा अन्य किसी भी रंग के पेन का प्रयोग करना नियम के विरुद्ध है। आपकी लिखावट (हैंडराइटिंग) जितनी साफ-सुथरी होगी, आपको अधिक अंक मिलने की संभावना उतनी ही अधिक होगी। अच्छी हैंडराइटिंग से एक मनोवैज्ञानिक लाभ मिल जाता है जो अंततः अंकों के लाभ में परिणत होता है। अगर आपकी हैंडराइटिंग साफ नहीं है तो नुकसान होना तय है। इसलिये, अभी से कोशिश कीजिये कि हैंडराइटिंग कम से कम ऐसी ज़रूर हो जाए कि उसे पढ़ते हुए परीक्षक को तनाव या सिर-दर्द न हो।अपने शब्दों तथा पंक्तियों के मध्य खाली स्थान इस तरह से छोड़ें कि आपकी उत्तर-पुस्तिका आकर्षक नज़र आए। दो पंक्तियों के बीच में जितना गैप छोड़ते हैं, दो पैराग्राफ के बीच में उससे कुछ ज़्यादा गैप छोड़ें ताकि दूर से देखकर ही यह समझ आ जाए कि कहाँ से नया पैराग्राफ शुरू हो रहा है। इसी प्रकार, हर नया पैराग्राफ लगभग एक ही स्केल से शुरू करें। बाईं तरफ, जहाँ से लिखने का स्थान शुरू होता है, वहाँ से लगभग दो शब्दों का खाली स्थान छोड़कर पैराग्राफ शुरू करना चाहिये और सभी पैराग्राफ उसी बिंदु से शुरू किये जाने चाहियें।
परीक्षा में समय प्रबंधन
मुख्य परीक्षा के प्रायः सभी प्रश्नपत्रों में एक बड़ी समस्या यह भी आती है कि तीन घंटों में सभी प्रश्नों का उत्तर कैसे लिखा जाए? प्रत्येक प्रश्न को कितना समय दिया जाए? सभी प्रश्न किये जाएँ या कुछ को छोड़ दिया जाए? आदि आदि। कुछ लोगों का मानना है कि परीक्षा में समय का विभाजन प्रत्येक प्रश्न के लिये बराबर होना चाहिये किंतु मनोवैज्ञानिक स्तर पर इस बात को सही नहीं माना जा सकता।
शुरुआती उत्तरों का प्रभाव ज़्यादा महत्त्वपूर्ण होता है और अंत तक उस प्रभाव के आधार पर लाभ या नुकसान होता रहता है। इसलिये, शुरुआती कुछ प्रश्नों पर तुलनात्मक रूप से अधिक समय दिया जाना चाहिये।परीक्षा के अंतिम एक घंटे में अभ्यर्थी की सोचने और लिखने की गति अभूतपूर्व तरीके से बढ़ चुकी होती है। इसलिये, अंतिम कुछ प्रश्नों को तुलनात्मक रूप से कम समय मिले तो भी चिंता नहीं करनी चाहिये।हो सकता है कि आप परीक्षा में समय प्रबंधन की इस रणनीति पर पूरी तरह न चल सकें और अंतिम समय में कई प्रश्न बचे रह जाएँ। जैसे मान लीजिये कि समय सिर्फ 20 मिनट रह गया हो और प्रश्न 5 या 6 बचे हुए हों। ऐसी स्थिति में भी कोशिश यही रहनी चाहिये कि कोई प्रश्न छूटे नहीं। अगर आप सभी प्रश्नों में सिर्फ फ्लो-चार्ट या डायग्राम के माध्यम से महत्त्वपूर्ण बिंदु भी लिख देंगे तो भी आपको ठीक-ठाक अंक मिलने की संभावना रहती है । उत्तर-पुस्तिका के अंतिम हिस्से तक पहुँचते- पहुँचते परीक्षक के मन में अभ्यर्थी के बारे में एक राय बन चुकी होती है और अंकों का निर्धारण प्रायः उस राय के आधार पर ही हो रहा होता है। अगर आपके बारे में पहले ही अच्छी राय बन गई है तो अंतिम कुछ प्रश्नों में डायग्राम या सिर्फ बिंदु देखकर भी परीक्षक अच्छे अंक दे देगा क्योंकि वह आपके पक्ष में सकारात्मक अभिवृत्ति बना चुका होता है।  लेकिन अगर आप कुछ प्रश्न पूरी तरह छोड़ देंगे तो वह चाहकर भी आपको अंक नहीं दे सकेगा क्योंकि आपने उसे अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करने का मौका ही नहीं दिया। सार यह है कि कोशिश करनी चाहिये कि एक भी प्रश्न छूटे नहीं। हाँ, जो प्रश्न अभ्यर्थी को आता ही नहीं है, वह तो उसे छोड़ना ही होगा।अगर आप उपरोक्त सभी बिन्दुओं को ध्यान रखते हुए उत्तर लिखते हैं तो निश्चित रुप से आपका उत्तर श्रेष्ठ होगा और आप अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे, जिससे आपकी सफलता की संभावना बढ़ जाएगी


यूपीएससी से IAS या IPS इंसान ही बनते हैं. कई सवाल जो हम अप्रेन्टिस को असमंजस में डालते आये है, कई नये अप्रेन्टिस दोस्तों ने ब्लॉग पर पूछा कि आईएएस बनने के लिए इंसान के अन्दर क्या होना चाहिए, क्या IAS सिर्फ अच्छे पढ़ने वाले, मेधावी विद्यार्थी ही बन सकते हैं जिनका पास्ट अकेडमिक रिकॉर्ड अच्छा रहा हो?
ऐसा बिल्कुल नहीं है. आप भी आईएएस बन सकते हैं. यह बिल्कुल मैटर नहीं करता कि आपने 10वीं या 12वीं में क्या स्कोर किया है….भले आपने ग्रेजुएशन थर्ड डिवीज़न से पास की हो….पास्ट पास्ट होता है. पास्ट को भूलकर आपको आगे देखना चाहिए. यदि आप पास्ट की गलतियों को देखकर अपने आज को ख़राब कर रहे हैं तो आपको अपने भविष्य में अन्धकार ही अन्धकार मिलेगा. इसलिए अच्छा है कि पीछे मुड़ कर कभी न देखें !
पढ़ाई के दौरान एकाग्रचित कैसे हों? क्या आपने अपने शहर में घोड़ा को चलते देखा है?
घोड़े के दोनों आँखों के बगल में चमड़े की पट्टी लगा दी जाती है. ऐसा इसीलिए क्योंकि वह सीधा देख पाए. चलते वक़्त उसके बगल में होने वाली सड़क की गतिविधियों पर उसका ध्यान न जा पाए और वह सिर्फ सीधा देख कर अपने लक्ष्य की ओर चले. ऐसा विद्यार्थी जीवन में होना चाहिए. आप अपने अगल-बगल की गतिविधियों पर ध्यान मत दें. कौन आपके बारे में क्या कह रहा है, आपके बारे में क्या विचार रखता है, आपके फूफा आपका मजाक उड़ाते हैं, आपके पड़ोसी आपके घर पर बैठने को लेकर तंज कसते हैं….यदि आपका ध्यान इन सब पर चला गया तो आप अपने लक्ष्य को पाने से चूक जायेंगे !
आप सफल हो जायेंगे तो यही लोग आपको बधाई भी देंगे. दूसरों को कहते फिरेंगे कि देखिए मेरा भतीजा/भाँजा आईएएस/आईपीएस है. अन्दर ही अन्दर वे भले ही कुढ़ते रहें पर शान से आपकी तारीफ़ दूसरों के सामने करेंगे ताकि उनका स्टेटस भी ऊँचा हो. इसीलिए इन मामूली फैक्टर से अपने जीवन को नष्ट मत कीजिए. लोगों को कहते रहने दीजिए, मैं भी आप ही लोगों में से यूँही एक तरह से इसी तरह सुनता आया हूँ बेफिक्र रहिये बेवाक रहिये हमारी तरह !
UPSC की परीक्षा कोई बैंकिंग या SSC की परीक्षा नहीं है. यह एक high-level परीक्षा है. इनके सवाल अच्छे-अच्छों की छुट्टी कर देते हैं. आपने लाख तैयारी की हो, 24 घंटे ही क्यों न पढ़ लिया हो, पर आप जनरल नॉलेज के 200 के 200 सवाल कभी सही नहीं कर सकते जैसा CAT या अन्य MBA परीक्षा में लोग कर लेते हैं. इसलिए आपकी मंजिल टेढ़ी-मेढ़ी है और न ही इसका कोई शोर्ट-कट है. हम अपनी मंजिल तभी पूरी कर पायेंगे जब हम स्वयं में यह दृढ़संकल्प करें कि हम किसी भी बाहरी नकारात्मक शक्तियों को अपने आस-पास भी नहीं फटकने देंगे और दिन -रात एक कर के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेंगे !
आईएएस की तैयारी के लिए एक साल पर्याप्त माना जाता है. वैसे ये विद्यार्थी के क्षमता पर निर्भर करता है. किसी के लिए 6 महिने की पढ़ाई भी काफी है और किसी के लिए 2 साल की पढ़ाई भी काफी नहीं. पर इसमें निराश होने की जरुरत नहीं. क्षमता को बढ़ाया और घटाया जा सकता है. आप ठान लें कि आज से और अभी से आप अगले साल तक रोजाना 6 घंटे की पढ़ाई करेंगे तो आप इस टेढ़े-मेढ़े सफ़र को सरलता से पार कर जायेंगे. पर ऐसा अक्सर होता नहीं. हर लोगों का मोटिवेशन लेवल अलग-अलग होता है और यही मोटिवेशन लेवल हार और जीत का फैसला करता है. आप हो सकता है आज यह आर्टिकल पढ़ कर कसम खा लें कि मैं रोजाना आईएएस की पढ़ाई के लिए अगले मेंस तक 6 घंटे दूंगा….और यह भी हो सकता है कि आप आज और कल तक अपने संकल्प पर कायम भी रहें….मगर तीसरे दिन आते-आते तक …कुछ ऐसा होगा कि आप फिर वापस वहीं पर चले जायेंगे जहाँ पहले थे. सब छूट जायेगा. किसी की गर्लफ्रेंड नाराज़ हो जाएगी, कभी व्हाट्सएप गुनगुनाने लगेगा, कभी पिताजी की डांट पड़ने से उदास हो जाओगे….कुछ न कुछ ऐसा हो ही जायेगा कि आप अपने लक्ष्य से भटक जाओगे !
वहीं जिसका सफल होना लिखा है…वह अपने लक्ष्य पर डटा रहेगा. चाहे आँधी आए, चाहे तूफान….चाहे गर्लफ्रेंड ने बात करना बंद कर दिया, चाहे पापा की डांट ही क्यूँ न पड़ गयी हो..उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा. वह दिन रात एक कर देगा. इन्टरनेट पर भी वही चीजें देखेगा जो उसकी काम की हों, जो उसे प्रोत्साहित करती हों…जो उसके नोट्स बनाने के काम आए या फिर कुछ उपयोगी बिषय वस्तु लगे अवगत रहें !
मेरी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं…! मेरी भी नहीं, यही सवाल प्रारंभ में मेरा भी था, लेकिन सवाल को करने से मुझे आजतक कोई फायदा नहीं हुआ बल्कि नुकसान ही हुआ है ! कईओं का यही सवाल... उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं हैं, लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे कैसे आगे बढ़ें? हाँ. हमारे नसीब में हर कुछ नहीं होता. किसी के पास किताबें खरीदने के पैसे-ही-पैसे हैं….हज़ारों की किताबें वह खरीद सकता है मगर दुर्भाग्य है कि उन्हें पढ़ने का उसके पास समय ही नहीं. किन्हीं को एक किताब को खरीदने के लिए 100 बार सोचना पड़ता है. पुरानी किताबों को बेचकर उन्हें नयी किताबें लेनी पड़ती हैं. पर सोचिए, आपके पास सिर्फ पैसे नहीं हैं, किन्हीं-किन्हीं के पास लिखने के लिए हाथ भी नहीं है, किन्हीं की आँखें कमजोर हैं, उन्हें कुछ दिखता नहीं….!
इसलिए पीड़ा की कोई सीमा नहीं है. आप गरीब हैं, अमीर हैं…फर्क तो पड़ता है. पर उतना नहीं जितना हम सोच लेते हैं. किताबें उधार भी ली जा सकती हैं, पुरानी किताबों को भी कम दामों में ख़रीदा जा सकता है….बस दिमाग में यह रहना चाहिए कि हमें रुकना नहीं है, चलते रहना है…चलते रहना है….जितना कठिन संघर्ष होगा उतनी ही शानदार जीत होगी. अपनी सोंच को संकुचित नहीं कीजिए. मेरे पास ये नहीं है, वो नहीं है से अच्छा है कि जो है उसका पूर्ण प्रयोग करना सीखें. छोटी सोच और पैर में पड़ी मोच से आगे कभी नहीं बढ़ा जा सकता !
क्या दिल्ली जाना जरुरी है? सबसे बड़ा सवाल !
यूपीएससी परीक्षा में सफल होने के लिए दिल्ली जाने की आवश्यकता नहीं है. आप बेशक घर बैठे भी तैयारी कर सकते हैं. घर में बैठने से बहुत बार मन टूटता है. कभी चीनी ले आओ, कभी सब्जियाँ …पढ़ाई के बीच-बीच में आपको कई बार उठना पड़ता है. आप अन्दर से चिढ़ जाते हैं और यही चिढ़ आपमें नकारात्मकता लाता है जो आपके लक्ष्य के लिए खतरनाक है. घर के कुछ काम कर देने से आपका बहुत सारा समय बर्बाद नहीं होता, हद से हद 2 घंटे, वह भी रोज नहीं…कभी-कभी. मगर इसको लेकर स्वयं को स्ट्रेस मत दें…पॉजिटिव सोचें….आपको इस परीक्षा के लिए समाज के बारे में भी जानना है. याद कीजिए UPSC आपसे decision making से भी सवाल पूछती है. जैसे कि आप किसी दवाई की दुकान गए, आप गौर करते हैं कि दवाई वाले भैया ने आपको दवाई की खरीद पर रसीद नहीं दिया, कच्चा चिट्ठा दे कर पैसे ले लिए…तो ऐसे में आप क्या करेंगे? i) उसे इस बात से अवगत करायेंगे कि आपको रसीद देनी चाहिए और रसीद देने की माँग करेंगे ii) बगल के थाने में रिपोर्ट कर देंगे iii) उसे डरायेंगे-धमकाएंगे iv) चुप-चाप दवा ले कर घर लौट जायेंगे !
इसलिए जब तक आप समाज को जानोगे नहीं, बाहर घूमोगे नहीं…तो इन सवालों का जवाब आप दोगे कैसे? इसलिए हर चीजों को पॉजिटिव वे में लें….आपको कोई डिस्टर्ब भी कर रहा है तो उसमें भी कोई पोसिटिवनेस ढूँढिए. दिल्ली जाना तभी ठीक है, जब आपके पास पर्याप्त पैसे हों या आप घर में बैठ कर बिल्कुल पढ़ नहीं सकते या आपके अगल-बगल परिवार में कोई भी इस बैकग्राउंड से न हो !
मैं नया अप्रेन्टिस हूँ, शुरुआत कहाँ से करे ?.. बेहतर है पहले सिलेबस को ध्यान से देखिए. फिर पिछले साल आये सवालों को देखिए. उन पर रिसर्च कीजिए. यह भी एक अभ्यास है. धीरे-धीरे आप UPSC में पूछे जाने वाले सवालों के पैटर्न को अच्छी तरह समझने लगेंगे. आपको पता लग जायेगा कि UPSC डायरेक्ट सवाल नहीं पूछती ….जैसे- वर्तमान वित्त मंत्री कौन हैं, यह सब SSC लेवल के सवाल हैं. UPSC को पूछना होगा तो वह वित्त मंत्री के कार्यक्षेत्र क्या-क्या हैं…यह पूछेगी. इस तरह आप पैटर्न को समझेंगे. पैटर्न को जब आप समझ जायेंगे और फिर जा कर किताबों को पढ़ेगें तो आप पायेंगे कि आप किताब को अलग ढंग से पढ़ रहे हैं. आपको सिर्फ वही चीज उस किताब में दिखेगी जो आपके काम की हो. किताबों में वाक्यों पर पेंसिल से लाइन भी ड्रा करिए जो वाक्य आपको इम्पोर्टेन्ट लगे. Recommended किताबों के बारे में मैं पहले ही लिख चुका हूँ, यहाँ पढ़ें !
UPSC में लेखन अभ्यास का क्या रोल है?
आपको पढ़ने के साथ-साथ लिखने का भी अभ्यास करते रहना चाहिए क्योंकि लेखन के क्षेत्र में जब तक आपका हाँथ नहीं खुलेगा आप मेंस में अच्छा परफॉर्म नहीं कर पाओगे. किसी भी टॉपिक को संक्षेप में (लगभग 200 शब्द) लिखने का रोज अभ्यास करें. यदि आपकी लेखन शैली को कोई जाँच करने वाला या व्याकरण चेक करने वाला हो तो सोने पर सुहागा है !
मैं लगातार मिल रही विफलता से टूट चुका हूँ
विफलता मिलने से टूटना स्वभाविक है. विफलता परेशान ही करती है और अन्दर से विचलित भी. पर अब तो आपके पास attempts भी कई सारे हैं. जरुरी नहीं कि हर कोई पहली या दूसरी बार में ही सफलता प्राप्त कर ले क्योंकि हमारे जीवन में भाग्य का भी रोल होता है. आपने कई बार देखा होगा कि आपका दिन कभी-कभी जरुरत से ज्यादा अच्छा जाता है और जिस दिन कुछ खराब होना रहता है तो उस दिन सब कुछ लगातार खराब ही ख़राब होता है. हिम्मत मत हारिये. कभी-कभी गुच्छे की आखरी चाभी भी ताला खोल देती है इसलिए डटे रहिए !


आईएएस_साक्षात्कार_में_अपनी_शारीरिक_भाषा_कैसी_रखें।

उम्मीदवार पहले यूपीएससी प्रीलिम्स और उसके बाद मेन्स परीक्षा और अन्त में यूपीएससी बोर्ड साक्षात्कार का के लिये अर्हता प्राप्त करते है। यह आईएएस परीक्षा का सबसे महत्वपूर्ण चरण या हिस्सा माना जा सकता है, क्योंकि भले ही आप यूपीएससी बोर्ड के सदस्यों द्वारा पूछे गए सभी सवालों के जवाब जानते हों, लेकिन यदि आप उनके उत्तर तर्कसंगत या ठीक से नहीं दे पाते तो यह आपकी बहुत ही असंतुष्ट छवि को दर्शाता है और संभावना है कि आपको अस्वीकार कर दिया जाए। यूपीएससी बोर्ड एक आश्वस्त और पेशेवर उम्मीदवार को एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में नियुक्त करने की तलाश करता है। बोर्ड एक उम्मीदवार में ऐसे व्यक्तित्व की भी तलाश करते हैं जो आसानी से भ्रमित या विचलित नहीं होते, और जो आपातकाल या दबाव की परिस्थिति को अपने व्यक्तित्व तथा व्यवहार में दिखने नहीं देते हैं।
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इसलिए, आपके लिए यह महत्वपूर्ण है कि आप उस व्यक्ति की छवि को चित्रित करें जिसे स्वयं पर पूरा विश्वास हो क्योंकि एक सिविल सेवक या राजनयिक होना कोई आसान कार्य नहीं है और भविष्य के अधिकारी के रूप में आपको यूपीएससी के साक्षातकार पैनल में अपने आत्मविश्वास का परिचय देना होगा। शारीरिक भाषा एक दर्पण की तरह है जिसके माध्यम से एक अनजान व्यक्ति आपके चरित्र के बारे में बता सकता है। अतः, सही शारीरिक भाषा (Body Language) में विकास करें ताकि आप अपने यूपीएससी व्यक्तित्व परीक्षण के दौरान सकारात्मक माहौल पैदा कर सकें। इस लेख के जरिये हम आपको आईएएस साक्षात्कार के दौरान व्यवहार करने के बारे में कुछ सुझाव देंगे।
#अपने_आप_और_अपने_ज्ञान_में_विश्वास (#Self_Belief)
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अपने ज्ञान और अपनी पृष्ठभूमि नाम आदि के साथ तैयार रखें और सैद्धांतिक रूप से उसे जानें, यह आपको आत्मविश्वास देगा। अपने चेहरे पर विश्वास दिखाएं बात करते समय नीचे की तरफ न देखें प्रश्न पूछने वाले व्यक्ति की तरफ देख कर अपने जवाब दें, यह आपके आत्मविश्वास और ऊर्जा को दर्शाता है। यदि आपको किसी सवाल का जवाब नहीं पता है तो ईमानदारी से कहें की मुझे इसके बारे में नही पता, यूपीएससी बोर्ड इसकी सराहना करेगा।
#नोट: ज्ञान का अहंकार विफल करने का एक निश्चित-शॉर्टकट तरीका है, अपने ज्ञान पर आश्वस्त रहें, लेकिन नम्र रहें और आदर दिखाएं।
#उत्साह_की_भूमिका (#Confidence)
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उत्साह का मतलब है कि आपका अपने ध्येय के लिए समर्पित होना। यदि पूर्ण वाक्यों में उत्तर दें कम बोलने से बचें साक्षात्कारकर्ता को आप में रुचि बनाए रखने के लिये यह आवश्यक है। किन्तु अधिक उत्साह संक्रामक भी हो सकता है और यह बोर्ड के सदस्यों को आपके पक्ष में निर्णय लेने की संभावना को बाधित कर सकता है।
#आशावाद (#Optimism)
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किसी को भी बेवकूफ पसंद नहीं आते हैं, यूपीएससी बोर्ड को दिखाएं कि आप एक सकारात्मक व्यक्ति हैं और अपने जवाबों में सकारात्मक रहें भले ही स्थिति गंभीर हो। समस्याओं के समाधान प्रदान करें और आशा का साथ न छोड़ें, क्योंकि आशावाद उत्साह की तरह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है।
#आईएएस_साक्षात्कार_के_दौरान_अपनी_शारीरिक_भाषा_के_विकास_के_लिये_क्या_करें_और_क्या_न_करें।
⚫अपनी बाहों को ऊपर न चढ़ाएं क्योंकि यह एक रक्षात्मक संकेत दर्शाता है।
⚫कैजुअल रूप से या अनुचित तरीके से पोशाक न करें।
⚫अति सूक्ष्म शब्दों में जवाब न दें।
⚫अहंकारी शैली का प्रयोग न करें।
⚫साक्षात्कारकर्ता के कथन को ठीक करने का प्रयास न करें और बाधा उत्पन्न न करें।
⚫चर्चा करते समय शारीरिक हाव भाव का ध्यान रखें जैसे - जम्हाई न लें इससे लगता है कि आप बोर  हो रहे हैं।
⚫अपनी मुट्ठी को न छूएं यह आक्रामकता और क्रोध को दर्शाता है।
⚫घृणा और  नर्वस होना घबराहट को दर्शाती है।
⚫बात करते समय अपना चेहरा न छूएं - इसे कन्फ्यूज (धोका) होने का संकेत माना जाता है।
⚫अपने सिर पर अंगुलियां फिराने से बचें यह भी अनिश्चितता का संकेत है।
⚫अपने कपड़ों के बारे में अधिक चिंता न करें और अपनी कुर्सी के किनारे की तरफ न बैठें।
⚫एक संतुलित मुस्कुराहट के साथ प्रश्नों के स्पष्ट रूप से उत्तर दें और साक्षात्कारकर्ता की आंखों से संपर्क बनाये रखें।


इंटरव्यू_टिप्स ...

पैनल का सबसे पहला प्रश्न होगा आपसे कि अपने बारे में कुछ बताएं ...तो वहां पर आपको 2  या 3 लाइन में अपना महत्वपूर्ण ब्यौरा देना होगा !   जैसे अपना नाम , कहाँ के रहने वाले हैं और अपनी शिक्षा और अगर कोई जॉब है तो उसे अंत में !  इस प्रश्न को जरूर तैयार कर लें !
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इसके बाद अपने नाम , जन्म स्थान , जन्म तारीख से जुडी महत्वपूर्ण चीजें तैयार कर लीजिये ...जैसे आपके नाम का अर्थ क्या है ? , आपके जन्मदिन पर किसी अन्य विशेष व्यक्ति का जन्म या कोई अन्य महत्वपूर्ण घटना ,  आपके जन्म स्थान से सम्बंधित कोई इतिहास आदि ! कभी कभी गृह जनपद से भी जुड़े प्रश्न पूछ लेते हैं इसलिए अपने गृह जनपद के बारे में सम्पूर्ण जानकारी एकत्र कर लीजिये ...वह किन चीजों में विशिष्ट है और किन चीजों में कमजोर !
अगला प्रश्न हो सकता है कि आप अधिकारी क्यों बनना चाहते हैं या आप इस सेवा में क्यों आना चाहते हैं ? ...इसका उत्तर भी आप आराम से 2  लाइन में सटीक तैयार कर लीजिये !इस प्रश्न के उत्तर में बहुत लोग चिंतित रहते हैं कि सबसे अच्छा उत्तर क्या रहेगा तो मैं आपको आस्वस्त कर दूँ कि इस प्रश्न के एक से अधिक सही उत्तर हो सकते हैं इसलिए आराम से सोच समझकर तैयार कीजिये !
अब बारी आती है आपके विषयों कि और वैकल्पिक की ! इससे जुड़े प्रश्न जरूर पूछे जायेंगे जैसे आपको सबसे ज्यादा कौन सी  विषय पढ़ने में रूचि है और क्यों ? , वैकल्पिक का चुनाव क्यों किया ? आपके विषयों के अध्ययन के व्यवहारिक क्या उपयोग हो सकते हैं आपकी सेवा में आदि !
इसके बाद आपसे विषयों से सम्बंधित कुछ शैक्षिक प्रश्न किये जायेंगे ! उसके लिए आप पिछले 8  माह की बड़ी घटनाओं को देख जाइये ! बड़ी योजनाएं , बड़े शुभारम्भ , महत्वपूर्ण घटनाएं आदि !  ज्यादा गहराई में इसलिए नहीं जाएगा क्योंकि एक सीमित समय होता है !
इसके बाद वैकल्पिक विषय को लेकर कुछ प्रश्न अवश्य होंगे !
इंटरव्यू तक आप लगातार एक राष्ट्रीय स्तर का न्यूज़ पेपर जरूर पढ़ते जाइये !
तनाव मत लीजिये , पुरे इंटरव्यू के दौरान सकारात्मक रहें !
हमेशा राजनीति और धर्म , जाती के प्रति निष्पक्ष रहें ...किसी विशेष तरफ कोई झुकाव ना रहे !
इंटरव्यू में किसी आलोचना या कटाक्ष के दौरान किसी भी जीवित व्यक्ति का नाम लेने से बचें , खासकर राजनीति से जुड़े लोगों का!
किसी प्रश्न का उत्तर ना बनें तो साफ स्वीकार कर लीजिये की नहीं आता लेकिन भटकाव और प्रश्न के परे उत्तर ना दें !
पूरे इंटरव्यू के दौरान आत्मविश्वास बहुत जरुरी है , झिझक और शर्माना बिलकुल नहीं होना चाहिए !

न्यूनतम आय गारंटी योजना (UBI) की विशेषताएं


न्यूनतम आय गारंटी योजना (UBI) की विशेषताएं

भारत एक लोकतांत्रिक देश है यहाँ सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से लोगों के कल्याण को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध होती है. दूसरी ओर विपक्षी दल; सत्ता पक्ष की कमियों को उजागर करके उनके कल्याण के लिए और भी नयी योजनायें लाने के लिए दबाव बनाते हैं.

इसी क्रम में इस लेख में कांग्रेस और बीजेपी दोनों पार्टियों ने देश से गरीबी ख़त्म करने के लिए न्यूनतम गारंटी योजना (MIG) और न्यूनतम आय गारंटी योजना (UBI) नामक दो अलग अलग योजनाओं की बात कही है. आइये इस लेख में इन दोनों के बारे में मुख्य अंतर जानते हैं.
आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने गरीबी कम करने के प्रयास के लिए देश में चल रही विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाओं के स्थान पर एक न्यूनतम आय गारंटी योजना (UBI) शुरू करने की वकालत की थी. इसके जवाब में राहुल गाँधी ने देश में न्यूनतम गारंटी योजना (MIG) की बात कही जो कि देश में 25 करोड़ गरीब लोगों को 6 हजार रुपये प्रति माह देने का प्रस्ताव रखती है.

न्यूनतम आय गारंटी योजना (UBI) की विशेषताएं;

1. यूनिवर्सल बेसिक इनकम देश के प्रत्येक नागरिक के लिए एक फिक्स (मासिक) नकद हस्तांतरण योजना है. इसका मतलब है कि यह योजना अमीर और गरीब, नौकरीपेशा और बेरोजगार सभी के लिए होगी.
2. अर्थशास्त्री सुरेश तेंदुलकर ने देश के लोगों को पोषण की व्यवस्था के लिए न्यूनतम 7,620 रुपये प्रति व्यक्ति/ वार्षिक देने की अनुशंसा दी थी. इसलिए NDA सरकार देश की 75% आबादी को न्यूनतम 7,620 रुपये प्रति व्यक्ति/ वार्षिक देगी. इसका अनुमानित खर्च जीडीपी का लगभग 4.9% होगा.
3. इस योजना के तहत लोगों को वस्तुओं और सेवाओं देने के स्थान पर सीधे उनके खाते में नकद रुपया भेजा जायेगा.
न्यूनतम गारंटी योजना (MIG)की विशेषताएं;
1. MIG देश के केवल गरीब ग्रामीण और शहरी परिवारों को कवर करेगा.
2. इस योजना से देश के सभी नागरिकों को रुपये नहीं मिलेंगे, इसलिए यह एक लक्षित योजना होगी.
3. यह योजना देश के 25 करोड़ गरीब लोगों को हर माह 6 हजार रुपये देगी जिसका कुल खर्च देश की जीडीपी के 2% के बराबर होगा.
आइये जानते हैं कि इन दोनों योजनाओं में क्या मुख्य अंतर हैं;
1. यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) NDA सरकार द्वारा प्रस्तावित है जबकि न्यूनतम गारंटी योजना (MIG) कांग्रेस पार्टी द्वारा प्रस्तावित है.
2. यूनिवर्सल बेसिक इनकम का कांसेप्ट NDA सरकार ने 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में दिया था जबकि न्यूनतम गारंटी योजना (MIG) की घोषणा कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गाँधी ने जनवरी में छत्तीसगढ़ के रायपुर में की थी.
3. यूबीआई एक सार्वभौमिक अर्थात सभी के लिए योजना है यानी यह लाभार्थियों की पहचान नहीं करती है जबकि MIG खासतौर पर देश के गरीब ग्रामीण और शहरी परिवारों के लिए लक्षित योजना है.
4. UBI योजना का पात्र होने के लिए लाभार्थी की आर्थिक स्थिति, रोजगार या बेरोजगार जैसे मापदंडों को ध्यान में नहीं रखा जायेगा. इसके उलट MIG स्कीम के लाभार्थी विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के द्वारा चिन्हित किये जायेंगे.
5. UBI योजना में एक परिवार के हर सदस्य को अलग अलग सहायता दी जाएगी जबकि MIG योजना में तहत पूरे परिवार को इकाई माना जायेगा अर्थात परिवार के हर सदस्य को अलग अलग सहायता नहीं दी जाएगी.
6. UBI योजना के तहत देश की 75% जनसँख्या को 7,620 रुपये प्रति व्यक्ति/ वार्षिक दिया जायेगा जबकि MIG के तहत देश के 25 करोड़ गरीबों को 6 हजार रुपये प्रति वर्ष दिया जायेगा.
ध्यान रहे कि अर्थशास्त्री सुरेश तेंदुलकर ने देश के लोगों को पोषण की व्यवस्था के लिए न्यूनतम 7,620 रुपये प्रति व्यक्ति/ वार्षिक देने की अनुशंसा दी थी.
7. UBI पर सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 4.9% खर्च होगा जबकि MIG पर कुल परिव्यय सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 2% होगा.
भारत के पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम का कहना है कि एमआईजी योजना की लागत यूबीआई की लागत का केवल 1/5 वां हिस्सा हो सकती है (यह मानते हुए कि 20% आबादी गरीबी रेखा से नीचे है).
सारांशतः यह कहना बुद्धिमानी होगी कि दोनों योजनाएँ ठीक हैं, यदि ये अपने इच्छित उद्देश्यों को पूरा करती हैं. वर्तमान में भारत जीडीपी का लगभग 5.2 प्रतिशत हिस्सा सभी प्रायोजित कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च करता है. यदि UBI और MIG योजनायें शुरू की जातीं हैं तो सरकार को इन कल्याणकारी योजनाओं में से कुछ के बजट में कमी करनी होगी या फिर कुछ योजनाओं को बंद करना पड़ सकता है क्योंकि सरकार के पास UBI और MIG जैसी योजनाओं पर अतिरिक्त खर्च करने के लिए संसाधन नहीं होंगे.

भारत_के_सभी_राष्ट्रपतियों_की_सूची_कार्यकाल

भारत_के_सभी_राष्ट्रपतियों_की_सूची_कार्यकाल
एवं_उनका_राजनीतिक_सफर
राष्ट्रपति को भारत में प्रथम नागरिक माना जाता है. यह देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद है. निर्वाचक मंडल भारत के राष्ट्रपति का चुनाव करता है. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बिना भारत में कोई भी कानून लागू नहीं हो सकता है. इस लेख के माध्यम से अब तक जितने राष्ट्रपति चुने गए है उनकी सूची दी जा रही है और साथ ही उनसे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का विवरण दिया जा रहा है.
राष्ट्रपति का चुनाव संसद और राज्य के विधानमंडल के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता हैं. निर्वाचक मंडल भारत के राष्ट्रपति का चुनाव करता है और इनके सदस्यों का प्रतिनिधित्व अनुपातिक होता है. उनका वोट सिंगल ट्रांसफीरेबल होता है और उनकी दूसरी पसंद की भी गिनती होती है. राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बिना भारत में कोई भी कानून लागू नहीं हो सकता है.
1. #डॉ_राजेन्द्र_प्रसाद
भारत के एकमात्र राष्ट्रपति थे, जिन्होंने दो कार्यकालों तक राष्ट्रपति पद पर कार्य किया. वे संविधान सभा के अध्यक्ष भी थे और भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के प्रमुख नेता. उनको 1962 में भारत रत्न दिया गया था.
2. #डॉ_सर्वपल्ली_राधाकृष्णन
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर 1888 को हुआ था और इसी दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है. उनको 1954 में भारत रत्न दिया गया था।
3. #डॉ_जाकिर_हुसैन
डॉ जाकिर हुसैन भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति बनें और इनकी मृत्यु पद पर रहते ही हुई थी. तात्कालिक उपराष्ट्रपती वी.वी गीरि को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया था. उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद हिदायतुल्लाह 20 जुलाई 1969 से 24 अगस्त 1969 तक कार्यवाहक राष्ट्रपति बने. यह भारत के सबसे प्रसिद्ध तबला वादक थे.
मोहम्मद हिदायतुल्लाह को 2002 में भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था. इनको भारत में शिक्षा की क्रांति लाने के लिए भी याद किया जाता है. इनके नेतृत्व में राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय जामिया मिलिया इस्लामिया स्थापित किया गया था.
4. #वी_वी_गिरि
वी. वी गिरी भारत के चौथे राष्ट्रपति थे. इनका पूरा नाम वराहगिरी वेंकटगिरी है. इनके समय में दुसरे चक्र की मतगणना करनी पड़ी थी. यह पहले भारत के कार्यवाहक राष्ट्रपति रहे थे. 1975 में उनको भारत रत्न से सम्मानित किया गया था.
5. #फखरुद्दीन_अली_अहमद
फखरुद्दीन अली अहमद भारत के पांचवे राष्ट्रपति थे. दुसरे राष्ट्रपति जिनकी मृत्यु राष्ट्रपति के पद पर ही हो गई थी. बी.डी जत्ती को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया था.
6. #नीलम_संजीव_रेड्डी
भारत के छठे राष्ट्रपति बने और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे हैं. वे भारत के ऐसे राष्ट्रपति थे जिन्हें राष्ट्रपति के उम्मीदवार होते हुए प्रथम बार विफलता प्राप्त हुई और दूसरी बार उम्मीदवार बनाए जाने के बाद वह राष्ट्रपति पद पर निर्वाचित हुए थे.
7. #ज्ञानी_जैल_सिंह
राष्ट्रपति बनने से पहले वे पंजाब के मुख्यमंत्री और केंद्र में भी मंत्री रहे थे. भारतीय डाक घर से संबंधी विधेयक पर उन्होंने पॉकेट वीटो का भी प्रयोग किया था. उनके राष्ट्रपति कार्यकाल में बहुत सी घटनाये घटी जैसे ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गाँधी की हत्या और 1984 में सिख विरोधी दंगा.
8. #आर_वेंकटरमण
आर. वेंकटरमण 1984 से 87 तक भारत के उपराष्ट्रपति रहे थे. वे एक भारतीय वकील, स्वतंत्रता संग्रामी और महान राजनेता थे. उन्होंने अपने राष्ट्रपति काल में सर्वाधिक प्रधानमंत्री को उनकी पद की शपथ दिलाई थी. 
9. #डॉ_शंकर_दयाल_शर्मा
वे अपने राष्ट्रपति पद से पहले, भारत के आठवें उप राष्ट्रपति थे. 1952 से 56 तक वे भोपाल के मुख्य मंत्री रहे थे और 1956 से 67 तक कैबिनेट मिनिस्टर. इंटरनेशनल बार एसोसिएशन ने उनको लीगल प्रोफेशन में बहु-उपलब्धियों के कारण ‘लिविंग लीजेंड ऑफ़ लॉ अवार्ड ऑफ़ रिकग्निशन’ दिया था.
10. #के_आर_नारायणन
के. आर. नारायणन भारत के प्रथम दलित राष्ट्रपति तथा प्रथम मलयाली व्यक्ति थे जिन्हें देश का सर्वोच्च पद प्राप्त हुआ था. वे लोकसभा चुनाव मतदान करने वाले तथा राज्य की विधानसभा को सम्बोधित करने वाले पहले राष्ट्रपति थे.
11. #डॉ_ए_पी_जे_अब्दुल_कलाम
डॉ ए. पी. जे. अब्दुल कलाम भारत के मिसाईल मेन नाम से भी जाने जाते हैं. वे पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने राष्ट्रपति पद को संभाला और भारत के पहले राष्ट्रपति जो सर्वाधिक मतों से जीते थे. उनके निर्देशन में रोहिणी-1 उपग्रह, अग्नि और पृथ्वी मिसाइलो का सफल प्रक्षेपण किया गया था. यहा तक कि 1974 एवं 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा था. 1997 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया था.
12. #श्रीमती_प्रतिभा_सिंह_पाटिल
वह राष्ट्रपति बनने से पहले राजस्थान की राज्यपाल रहीं थी. 1962 से 85 तक वह पांच बार महाराष्ट्र की विधानसभा की सदस्य रही और 1991 में लोकसभा के लिए अमरावती से चुनी गई थी. इतना ही नहीं वह सुखोई विमान उड़ाने वाली पहली महिला राष्ट्रपति भी हैं.
13. #प्रणब_मुखर्जी
प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति चुनाव लड़ने से पहले केंद्र सरकार में वित्त मंत्री के पद पर थे. उनको 1997 में सर्वश्रेष्ठ सांसद का पुरस्कार एवं 2008 में भारत का दूसरा सबसे बड़ा असैनिक सम्मान पद्म विभूषण प्रदान किया गया था.
14. #राम_नाथ_कोविंद
राम नाथ कोविंद का जन्म 1 अक्टूबर, 1945 को उत्तर प्रदेश, भारत में हुआ था. वह एक वकील और राजनेता हैं. वे भारत के 14वें और वर्तमान राष्ट्रपति हैं. राम नाथ कोविंद 25 जुलाई, 2017 को राष्ट्रपति बने और भारतीय जनता पार्टी के सदस्य रहे. राष्ट्रपति बनने से पहले वे बिहार के पूर्व गवर्नर थे. राजनीतिक समस्याओं के प्रति उनके दृष्टिकोण ने उन्हें राजनीतिक स्पेक्ट्रम में प्रशंसा दिलाई. एक राज्यपाल के रूप में, उनकी उपलब्धियां विश्वविद्यालयों में भ्रष्टाचार की जांच के लिए न्यायिक आयोग का निर्माण करना था.

भारत_के_राष्ट्रपति_का_चुनाव_किस_प्रकार_होता_है

भारत_के_राष्ट्रपति_का_चुनाव_किस_प्रकार_होता_है

राष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार एकल संक्रमणीय मत और गुप्त मतदान द्वारा होता है| किसी उम्मीदवार को, इस चुनाव में निर्वाचित होने के लिए कुल मतों का एक निश्चित भाग प्राप्त करना होता है| राष्ट्रपति का निर्वाचन जनता प्रत्यक्ष मतदान से नही करती है बल्कि एक निर्वाचन मंडल के सदस्यों द्वारा इसका निर्वाचन किया जाता है|
भारत का राष्ट्रपति, देश का प्रथम नागरिक होने के साथ साथ तीनों सेनाओं का प्रमुख भी होता है | भारत विदेश में जितने भी समझौते करता है वे सभी राष्ट्रपति के नाम से ही किये जाते हैं| भारतीय संविधान के भाग V के अनुच्छेद 52 से 58 तक संघ की कार्यपालिका का वर्णन है| संघ की कार्यपालिका में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा महान्यायवादी शामिल होते हैं| भारत के वर्तमान राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने 25 जुलाई, 2012 भारत के 14वें राष्ट्रपति (13वें व्यक्ति) के रुप में कार्यभार सँभाला था।
#राष्ट्रपति_के_पद_हेतु_अहर्ताएं
1. भारत का नागरिक हो
2. 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो
3. लोक सभा का सदस्य चुने जाने की योग्यता रखता हो
4.  किसी भी लाभ के पद पर न हो
इसके अतिरिक्त चुनाव के नामांकन के लिए कम से कम 50 लोगों ने उसके नाम का प्रस्ताव रखा हो और इतने ही लोगों ने अनुमोदन किया हो |
राष्ट्रपति के पद की अवधि, पद धारण की तारीख से 5 साल तक होती है| हालांकि वह इससे पहले भी कभी भी उपराष्ट्रपति को अपना त्याग पत्र दे सकता है|
#राष्ट्रपति_के_निर्वाचन_में_कौन_कौन_वोट_डालता_है
राष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार एकल संक्रमणीय मत और गुप्त मतदान द्वारा होता है| किसी उम्मीदवार को, इस चुनाव में निर्वाचित होने के लिए कुल मतों का एक निश्चित भाग प्राप्त करना होता है | राष्ट्रपति का निर्वाचन जनता प्रत्यक्ष मतदान से नही करती है बल्कि एक निर्वाचन मंडल के सदस्यों द्वारा इसका निर्वाचन किया जाता है| इस चुनाव में इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि इसमें सभी राज्यों का सामान प्रतिनिधित्व हो| इस निर्वाचन में निम्न लोग वोट डालते  हैं :
1. लोकसभा तथा राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य (राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य नही)
2. राज्य विधान सभा के निर्वाचित सदस्य
3. दिल्ली और पुदुचेरी विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य (केवल इन्ही दो केंद्र शासित प्रदेशों के सदस्य इसमें भाग लेते हैं)
#राष्ट्रपति_के_निर्वाचन_की_प्रक्रिया_इस_प्रकार_है
राज्य विधान सभाओं तथा संसद के प्रत्येक सदस्य के मतों की संख्या निम्न प्रकार निर्धारित होती है :-
a. प्रत्येक विधान सभा के निर्वाचित सदस्य के मतों की संख्या, उस राज्य की जनसंख्या को, उस राज्य की विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों तथा 1000 के गुणनफल से प्राप्त संख्या द्वारा भाग देने प्राप्त होती है |
एक विधयक के मत का मूल्य =  राज्य की कुल जनसंख्या
विधान सभा के निर्वाचित सदस्य x 1000
b. संसद के प्रत्येक सदन के निर्वाचित सदस्यों के मतों की संख्या, सभी राज्यों के विधायकों के मतों के मूल्य को संसद के कुल सदस्यों की संख्या से भाग देने पर प्राप्त होती है |
एक संसद सदस्य के मतों का मूल्य = सभी राज्यों के विधायकों के मतों का कुल मूल्य
#संसद_के_निर्वाचित_सदस्यों_की_कुल_संख्या             
इस पूरी चुनाव प्रक्रिया को एक राज्य बिहार के उदाहरण की सहायता से इस प्रकार समझा जा सकता है:
चुनाव के बाद गणना के प्रथम चरण में प्रथम वारीयत के मतों की गणना होती है | यदि उम्मीदवार निर्धारित मत प्राप्त कर लेता है तो वह निर्वाचित घोषित हो जाता है  अन्यथा मतों के स्थानांतरण की प्रक्रिया अपनाई जाती है और यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि कोई उम्मीदवार निर्धारित मत प्राप्त नही कर लेता है |
राष्ट्रपति चुनाव से सम्बंधित सभी विवादों की जांच व फैसले उच्चतम न्यायालय में होते है और उसका निर्णय अंतिम होता है|
#निम्न_कारणों_से_राष्ट्रपति_का_पद_खाली_हो
#सकता_है
1. कार्यकाल समाप्ति पर
2. उसके त्यागपत्र देने पर
3. महाभियोग द्वारा हटाये जाने पर
4. उसकी मृत्यु पर
5. यदि उसका निर्वाचन अवैध घोषित हो जाये
#राष्ट्रपति_पर_महाभियोग_शुरू_करने_की_प्रक्रिया
#क्या_है
केवल कदाचार अर्थात "संविधान का उल्लंघन" के मामले में ही महाभियोग लगाकर उसे पद से हटाया जा सकता है| महाभियोग पर आरोप संसद के किसी भी सदन में शुरू किया जा सकता है| कदाचार के आरोपों पर सदन(जिस सदन नेआरोप लगाये हों) के एक चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए और राष्ट्रपति को 14 दिन का नोटिस दिया जाना चाहिए | महाभियोग का प्रस्ताव दो तिहाई बहुमत से पारित होने के पश्चात् इसे दूसरे सदन में भेजा जाता है, जो कि लगाये गए आरोपों की जाँच करता है| यदि दूसरा सदन इन आरोपों को सही पाता है और महाभियोग प्रस्ताव को दो तिहाई बहुमत से पारित कर देता है तो राष्ट्रपति को विधेयक पारित होने की तिथि से अपने पद से हटा दिया जाता है| ज्ञातब्य है कि इस महाभियोग की प्रक्रिया में राष्ट्रपति द्वारा नामित किये गए सदस्य भाग नही लेते हैं|
#राष्ट्रपति_की_संवैधानिक_स्थिति
भारत के संविधान में सरकार का स्वरुप संसदीय है| यहाँ पर राष्ट्रपति केवल कार्यकारी प्रधान होता है और मुख्य शक्तियां प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में निहित होती हैं अर्थात भारत का राष्ट्रपति अपने अधिकारों का प्रयोग प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल की सलाह पर करता है |
डॉक्टर आंबेडकर की नजरों में राष्ट्रपति की स्थिति इस प्रकार :
‘भारतीय संविधान में, भारतीय संघ के कार्यकलापों का एक प्रमुख होगा जिसे संघ का राष्ट्रपति कहा जायेगा |’
#अर्थात_भारत_का_राष्ट्रपति:-
1. भारतीय संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति की स्थिति वही होगी जो कि ब्रिटेन में राजा की है |
2. वह राष्ट्र का प्रमुख होता है, परन्तु कार्यकारी नही होता है क्योंकि भारत के संविधान में कार्यकारी प्रमुख तो यहाँ का प्रधानमंत्री होता है |
3. वह राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है, उस पर शासन नही करता है |
4. वह राष्ट्र का प्रतीक होता है, सभी विदेशी समझौते उसी के नाम से किया जाते हैं |
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भारत के राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया बहुत ही कठिन है लेकिन इससे एक यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि इस चुनाव में सभी राज्यों को उनकी जनसंख्या के हिसाब से पूरा प्रतिनिधित्व दिया गया है |

भारतीय_रिज़र्व_बैंक_के_मुख्य_कार्य_क्या_हैं

भारतीय_रिज़र्व_बैंक_के_मुख्य_कार्य_क्या_हैं?

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भारत का सर्वोच्च मौद्रिक प्राधिकरण हैl यह संगठन भारतीय अर्थव्यवस्था में नोटों की छपाई और पैसों की आपूर्ति का प्रबंधन करने के लिए जिम्मेदार हैl भारतीय रिजर्व, बैंक विदेशी मुद्रा का संरक्षक, वाणिज्यिक बैंकों का बैंक, भारत सरकार का बैंक और क्रेडिट नियंत्रक के तौर पर काम करता हैl
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश का केन्द्रीय बैंक है। भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना 1935 में बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1934  के तहत 5 करोड़ रूपए की शुरूआती धनराशि के साथ की गई थीl  उस समय भारतीय रिजर्व बैंक के लगभग सभी शेयरों का स्वामित्व गैर-सरकारी शेयरधारकों के हाथों में थाl इसलिए कुछ लोगों के हाथों में शेयरों के केन्द्रीयकरण को रोकने के लिए, 1 जनवरी 1949 को भारतीय रिजर्व बैंक का राष्ट्रीयकरण किया गया थाl
#रिजर्व_बैंक_के_कार्य
1. #नोट_जारी_करना: भारतीय रिजर्व बैंक के पास देश में नोटों को छापने का एकाधिकार हैl उसके पास एक रूपए के नोट (केवल वित्त मंत्रालय द्वारा जारी किया जाता है) को छोड़कर सभी प्रकार के नोट जारी करने का अधिकार हैl नोटों को जारी करने/छपाई के लिए रिजर्व बैंक न्यूनतम रिजर्व प्रणाली (Minimum Reserve System)को अपनाता हैl इस प्रणाली के तहत 1957 से रिजर्व बैंक सोने और विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में 200 करोड़ रूपए रिजर्व रखता है जिनमें से कम-से-कम 115 करोड़ रूपए सोने के रूप में और शेष विदेशी मुद्राओं के रूप में होना चाहिएl इस 200 करोड़ की धनराशि को रखने के बाद रिजर्व बैंक जरुरत के हिसाब से कितनी भी मुद्रा को छाप सकता है हालांकि उसे भारत सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है |
2. #भारत_सरकार_का_बैंक: भारतीय रिजर्व बैंक का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य भारत सरकार और राज्यों के बैंक, एजेंट और सलाहकार के रूप में कार्य करना हैl यह राज्य और केन्द्र सरकार के सभी बैंकिंग कार्य करता है और आर्थिक और मौद्रिक नीति से संबंधित मामलों पर सरकार को उपयोगी सलाह भी देता हैl यह सरकार के सार्वजनिक ऋण का प्रबंधन भी करता है।
3. #बैंकों_का_बैंक: भारतीय रिजर्व बैंक अन्य वाणिज्यिक बैंकों के लिए उसी प्रकार कार्य करता है जिस प्रकार अन्य बैंक आमतौर पर अपने ग्राहकों के लिए कार्य करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक देश के सभी वाणिज्यिक बैंकों को पैसा उधार देता है।
4. #क्रेडिट_का_नियंत्रक: भारतीय रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों द्वारा उत्सर्जित क्रेडिट को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी लेता हैl इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए यह देश में प्रभावी रूप से ऋण को नियंत्रित करने और विनियमन करने के लिए मात्रात्मक और गुणात्मक तकनीकों का व्यापक उपयोग करता हैl जब भारतीय रिजर्व बैंक देखता है कि अर्थव्यवस्था में पर्याप्त धन आपूर्ति है और इससे देश में मुद्रास्फीति की स्थिति पैदा हो सकती है तो वह अपने कड़े मौद्रिक नीति के माध्यम से बाजार में पैसे की आपूर्ति में कमी करता है और जब अर्थव्यवस्था में धन की आपूर्ति में कमी हो जाती है तो वह बाजार में पैसे की आपूर्ति को बढ़ा देता हैl
5. #विदेशी_मुद्रा_भंडार_का_संरक्षक: विदेशी विनिमय दर को स्थिर रखने के उद्देश्य से भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी मुद्राओं को खरीदता और बेचता है और देश के विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा भी करता हैl विदेश विनिमय बाज़ार में जब विदेशी मुद्रा की आपूर्ति कम हो जाती है तो भारतीय रिजर्व बैंक इस बाजार में विदेशी मुद्रा बेचता है जिससे कि इसकी आपूर्ती बढाई जा सके और जब विदेशी मुद्रा की आपूर्ति अर्थव्यवस्था में बढ़ जाती है तो RBI विदेशी मुद्रा बाजार से विदेशी मुद्रा को खरीदता हैl वर्तमान में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 360 बिलियन अमेरिकी डॉलर हैl
6. #अन्य_कार्य: भारतीय रिजर्व बैंक कई अन्य विकास कार्यों को करता है। इन कार्यों में कृषि के लिए ऋण का अनुमोदन और कार्यान्वयन (जोकि नाबार्ड को स्थानांतरित किया जाता है), सरकारी प्रतिभूति और व्यापारिक बिलों की खरीद-बिक्री, सरकारी खरीद के लिए ऋण देना और मूल्यवान वस्तुओं की बिक्री आदि शामिल हैl यह अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य करता है और भारत की सदस्यता का प्रतिनिधित्व करता है।
भारतीय रिजर्व बैंक में एक नए विभाग का गठन: 6 जुलाई, 2005 को वित्तीय बाजारों पर निगरानी के लिए भारतीय रिजर्व बैंक में एक नए विभाग, जिसका नाम वित्तीय बाजार विभाग रखा गया है, का गठन किया गया थाl
यह नवगठित विभाग भविष्य में ऋण प्रबंधन और मौद्रिक संचालन की गतिविधियों को अलग करेगा। यह विभाग मुद्रा बाजार के उपकरणों के विकास और निगरानी का कार्य करेगा और सरकारी प्रतिभूतियों और विदेशी मुद्रा बाजार की निगरानी भी करेगा।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भारत का केन्द्रीय बैंक देश की मौद्रिक नीति को बनाता है और उन सभी उपायों को करता है जिससे कि अर्थव्यवस्था में आवश्यकता के अनुसार मुद्रा की पूर्ती सुनिश्चित की जा सकेl

IAS परीक्षा की तैयारी बिगनर्स कैसे करें

IAS परीक्षा की तैयारी बिगनर्स कैसे करें 

यह तो हम सभी जानते हैं कि संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) सिविल सेवा परीक्षा (CSE) आयोजित कराता है और यह देश की एक कठिन व प्रतिष्ठित परीक्षा है। लाखों युवा छात्र देश के कोने-कोने से इस परीक्षा की तैयारी करते हैं और एक IAS अफसर बनने का सपना देखते हैं। परन्तु परीक्षा की तैयारी शुरू करते समय हम इस बात का बहुत की कम ध्यान देते हैं कि तैयारी कैसे शुरू करें? “IAS परीक्षा की तैयारी बिगनर्स कैसे करें” आज हम इसी बात पर विमर्श करेंगे ताकि वह भी परीक्षा की तैयारी रणनीति से परिचित हो सकें।  यदि हम इस परीक्षा की प्रक्रिया व प्रकृति को देखें तो हम पायेंगे कि इस परीक्षा में सफलता पाने के लिये हमें चाहिये कि हम एक सटीक रणनीति और व्यवस्था के साथ तैयारी करें। सामान्यत: एक अभ्यर्थी यदि इस परीक्षा की तैयारी स्नातक से पूर्व या स्नातक स्तर से ही शुरू कर दें तो यह भी संभव है कि इस सेवा में जाने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है, और अभ्यर्थी सफलता पूर्वक इस प्रतिष्ठित सेवा में अपना भविष्य निर्धारित कर सकते हैं।
मुख्यत: इस कठिन परीक्षा में सफलता पाने के लिये अभ्यर्थीयों में शैक्षिक योग्यता के साथ अनुशासन व धैर्य होना अतिआवश्यक है, और एक समझदार अभ्यर्थी को यह चाहिये कि वह इस परीक्षा की तैयारी शुरू करने से पहले यह निर्धारित कर ले कि उसमे पर्याप्त व उचित योग्यता, अनुशासन और धैर्य है, जिससे वह इस परीक्षा में निश्चित सफलता प्राप्त कर सके।
IAS परीक्षा की तैयारी शुरू करने वाले छात्र निम्न रूप से अपनी तैयारी शुरू कर सकते हैं-
स्कूल विद्यार्थियों के लिये टिप्स
1) अतिशीघ्रता न करें
सभी छात्रों और उनके अभिवावकों को हमारा सबसे पहला सुझाव यही है कि आप सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिये अतिशीघ्रता न करें। स्मरण रहे कि यह परीक्षा ज्ञान की परीक्षा नहीं है बल्कि सम्पूर्ण व्यक्तित्व की परीक्षा है और व्यक्तित्व का सहज विकास करने के लिये बच्चों को सहजता से बचपन गुजारने देना चाहिए। अगर आप आठवीं या उससे छोटी क्लास में पढ़ते हैं तो अभी आपको इस परीक्षा की तैयारी के लिये अलग से कुछ भी पढ़ने की ज़रूरत नहीं है। आप बस अपनी क्लास की पढ़ाई अच्छे से कीजिए और खूब खेलिये-कूदिये। अगर आप 9वीं से 12वीं क्लास के विद्यार्थी हैं तो अपनी तैयारी की थोड़ी-बहुत शुरुआत कर सकते हैं।
2) पाठ्यक्रम गंभीरता से पढ़ें
आप स्कूल में चाहे किसी भी क्लास में पढ़ते हों, आपके लिये सबसे ज़रूरी सुझाव यही है कि आप अपना पाठ्यक्रम ठीक से पढ़ें। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी का कम से कम 25-30 प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जो NCERT की स्कूल पुस्तकों को गहराई से पढ़ने से खुद ही तैयार हो जाता है। इसलिये, यह बहुत ज़रूरी है कि आप अपनी पढ़ाई को गंभीरता से लें। आपने पुस्तकें ढंग से पढ़ी हैं, इसे जांचने के लिए आप NCERT क्लास बेस्ड मॉक टेस्ट में सम्मिलित हो सकते हैं और जिन्हें हल करके आप अपनी तैयारी का सटीक मूल्यांकन कर सकते हैं।
3) 11वीं कक्षा में उपयुक्त विषय चुनें
बेहतर होगा कि आप एक वैकल्पिक कॅरियर को ध्यान में रखकर अपने विषय चुनें। फिर भी, यदि आपने ठान ही लिया है कि आपको सिर्फ और सिर्फ सिविल सेवा परीक्षा को ध्यान में रखकर विषयों का चयन करना है और किसी वैकल्पिक कॅरियर पर ध्यान नहीं देना है तो बेहतर होगा कि आप आर्ट्स के विषय चुनें। आर्ट्स के विषयों में भी प्राथमिकता भूगोल, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा राजनीति-शास्त्र को दी जानी चाहिये। ये सभी विषय सिविल सेवा परीक्षा के पाठ्यक्रम में बड़ा हिस्सा रखते हैं। अगर आप इन्हें शुरू से पढ़ेंगे तो निस्संदेह तैयारी के अंतिम दौर में सहजता महसूस करेंगे।
कॉलेज और उसके बाद के विद्यार्थियों के लिये टिप्स
अगर अभी आप ग्रैजुएशन कर रहे हैं या उसमें प्रवेश लेने वाले हैं और आपने निश्चय कर लिया है कि आपको आगे चलकर IAS या PCS जैसी किसी सेवा में अपना कॅरियर बनाना है तो आपके लिये निम्नलिखित सुझाव कारगर हो सकते हैं-
1) ग्रैजुएशन के लिये उपयुक्त विषय चुनें
यदि आपने ठान ही लिया है कि आपको सिर्फ और सिर्फ सिविल सेवा परीक्षा को ध्यान में रखकर ग्रैजुएशन के विषयों का चयन करना है और किसी वैकल्पिक कॅरियर पर ध्यान नहीं देना है तो बेहतर होगा कि आप आर्ट्स के विषय चुनें। आर्ट्स के विषयों में भी प्राथमिकता भूगोल, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा राजनीति-शास्त्र को दी जानी चाहिये। ये सभी विषय सिविल सेवा परीक्षा के पाठ्यक्रम में बड़ा हिस्सा रखते हैं। अगर आप इन्हें शुरू से पढ़ेंगे तो निस्संदेह तैयारी के अंतिम दौर में सहजता महसूस करेंगे और हो सके तो अपना वैकल्पिक विषय निर्धारित कर लें और उसे अधिक गंभीरता से अभी से पढ़ना शुरू कर दें।
2) तैयारी शुरू करें
सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी बहुत धैर्य और ठहराव की मांग करती है। इसलिये, इसकी शुरुआत हड़बड़ी में नहीं बल्कि ठोस योजना के साथ करें। कॉलेज जीवन के शुरुआती दिनों में यह ज़रूरी नहीं है कि आप इस परीक्षा की तैयारी के प्रति अत्यंत गंभीर हो जाएँ। बेहतर होगा कि कॉलेज के पहले एक-दो वर्षों में आप कॉलेज की पढ़ाई पर फोकस करें। इस दौरान आप ज़्यादा से ज़्यादा यह कर सकते हैं कि अख़बार/पत्रिकाएँ पढ़ने और रोज़ाना कुछ न कुछ लेखन-अभ्यास करने की आदत डाल लें।
3) NCERT पुस्तकों से तैयारी प्रारंभ करें
जैसा की पूर्व में बताया जा चूका है कि सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी का कम से कम 25-30 प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जो NCERT की पुस्तकों को गहराई से पढ़ने पर तैयार हो जाता है। इसलिये, जब भी आप इस परीक्षा की तैयारी शुरू करें तो पहले चरण के रूप में NCERT की पुस्तकों को पढ़ें।
कॉलेज के अंतिम वर्ष से आप गंभीर तैयारी की शुरुआत कर सकते हैं। कोशिश करनी चाहिये कि इस वर्ष में आप उन NCERT पुस्तकों को पढ़ लें जो तैयारी के लिये सहायक हैं। ग्रैजुएशन और उसके बाद आपको उन पुस्तकों पर आना चाहिये जो विशेष रूप से इस परीक्षा के लिये पढ़े जाने की अपेक्षा है। फिर भी, अगर आप ग्रैजुएशन खत्म होने तक इस परीक्षा की तैयारी शुरू नहीं कर पाते हैं तो बिल्कुल तनाव न लें। आप जब भी गंभीरता से पढ़ना शुरू करेंगे, लगभग डेढ़ वर्षों में तैयारी पूरी कर लेंगे।
आपके मन में यह दुविधा हो सकती है कि आपको NCERT की किन कक्षाओं तथा किन विषयों की पुस्तकें पढ़नी हैं। इसके समाधान के लिये नीचे उपयोगी पुस्तकों की सूची दी जा रही है-
1) भूगोल: कक्षा 6 से 12 तक NCERT की नई पुस्तक ( विश्व के भूगोल के लिये कक्षा 6 से 8 तक की NCERT की पुरानी पुस्तक भी पढ़ें)
2) इतिहास: कक्षा 6 से 12 तक NCERT की नई पुस्तक। इनको पढ़ने के बाद प्राचीन भारत (रामशरण शर्मा), मध्यकालीन भारत (सतीश चंद्रा) एवं आधुनिक भारत (विपिन चंद्रा) की कक्षा 11 एवं 12 की पुरानी NCERT की पुस्तकें भी पढ़नी चाहियें।
3) विज्ञान: कक्षा 6 से 10 तक NCERT की नई पुस्तक। इनके अलावा, कक्षा 11 की जीव विज्ञान तथा कक्षा 12 की जीव विज्ञान (अंतिम 4 अध्याय) भी अवश्य पढ़ें ।
4) अर्थव्यवस्था – कक्षा 9 से 12 तक NCERT नई पुस्तक।
5) राजव्यवस्था – कक्षा 11 और 12 की NCERT की नई पुस्तक। इनके अलावा, कक्षा 11 (राजनीतिक सिद्धांत) एवं 12 (भारत में लोकतंत्र : मुद्दे एवं चुनौतियाँ) की NCERT पुरानी पुस्तक भी पढ़ सकते हैं।
6) सामाजिक-राजनीतिक जीवन – कक्षा 6 से 10 तक NCERT की नई पुस्तक।
आपने NCERT की पुस्तकें गहराई से पढ़ीं या नहीं; इसका मूल्यांकन करने आप क्लास स्तरीय NCERT मॉक टेस्ट में अवश्य सम्मिलित हों और मॉक टेस्ट हल करके आप अपनी तैयारी का सटीक मूल्यांकन कर सकते हैं।
सभी विद्यार्थियों के लिये टिप्स
1) सह-पाठ्य गतिविधियों में भाग लें
सिविल सेवा परीक्षा ज्ञान से अधिक व्यक्तित्व की परीक्षा है और व्यक्तित्व विकसित करने के लिये किताबें पढ़ना काफी नहीं है। व्यक्तित्व का विकास भिन्न-भिन्न तथा जटिल परिस्थितियों का सामना करने से होता है। इसलिये, स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई के दौरान विद्यार्थियों को चाहिये कि वे ज़्यादा से ज़्यादा सह-पाठ्य गतिविधियों में हिस्सा लें। कॉलेज के विद्यार्थियों को कम से कम पहले दो वर्षों में तो आपको सह-पाठ्य गतिविधियों में भाग लेना ही चाहिये। ग्रैजुएशन के अंतिम वर्ष से चाहें तो आप इस परीक्षा की तैयारी में पूरे मनोयोग से जुट सकते हैं।
सबसे अच्छा यह होगा कि आप डिबेट जैसी एक मंचीय गतिविधि में जमकर भाग लें और किसी एक टीम स्पोर्ट (जैसे क्रिकेट) में थोड़ा-बहुत समय गुज़ारें। कॉलेज ख़त्म कर परीक्षा की तैयारी में जुटे उम्मीदवार सिर्फ अपनी तैयारी पर फोकस करें।
2) अख़बार तथा पत्रिकाएँ पढ़ें
सिविल सेवा परीक्षा में करेंट अफेयर्स की भूमिका बहुत अधिक है। मुख्य परीक्षा में सामान्य अध्ययन के पेपर में लगभग आधे प्रश्न किसी न किसी रूप में करेंट अफेयर्स से जुड़े होते हैं। इसलिये, इस परीक्षा में वे लोग बेहतर साबित होते हैं जिनकी अख़बार तथा पत्रिकाएँ पढ़ने में स्वाभाविक रुचि रही होती है।
सबसे पहले, यह ज़रूरी है कि आप सही अख़बारों और पत्रिकाओं को चुनें। यह सुझाव भी 9वीं और उससे बड़ी कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों के लिये है, पर छठी से आठवीं क्लास के बच्चे भी चाहें तो थोड़ी-बहुत कोशिश कर सकते हैं। अखबार जितना समझ में आ जाए, उतना ठीक है; पूरा अख़बार समझने की ज़िद न करें। स्कूल के स्तर पर आप इनमें से कोई एक अख़बार देखते रहें, इतना ही काफी है। कॉलेज के अंतिम वर्ष या कॉलेज ख़त्म कर चूके सिविल सेवा के उम्मीदवार से अपेक्षा होती है कि वह संपादकीयों तथा लेखों में किये गए विश्लेषण के स्तर तक पहुँचे।
अगर किसी कारण अख़बार न पढ़ पा रहे हों तो वे करेंट अफेयर्स की कोई अच्छी मासिक पत्रिका पढ़कर काम चला सकते हैं। या इसी ग्रुप में यानी IAS&PCS DK Academy में ही मेरे द्वारा और राजेश यादव सर द्वारा करेन्ट के लिए आर्टिकल्स पोस्ट किए जाते है। अगर आप अभी से उन्हें पढ़ने की आदत डाल लेंगे तो परीक्षा देने के समय तक करेंट अफेयर्स के एक्सपर्ट बन जाएंगे।
3) लेखन शैली का विकास करें
यह सुझाव मुख्य रूप से 9वीं और उससे बड़ी कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों के लिये है। छठी से आठवीं क्लास के बच्चे भी चाहें तो हल्की-फुल्की कोशिश कर सकते हैं। गौरतलब है कि सिविल सेवा परीक्षा में सफलता अंततः अच्छी लेखन शैली से तय होती है और अच्छी लेखन शैली का विकास निरंतर अभ्यास से लंबी अवधि में होता है। अगर आप स्कूल के दिनों से ही लेखन अभ्यास शुरू कर देंगे तो कॉलेज के अंतिम वर्षों तक आपकी शैली परिपक्वता के उस स्तर को ज़रूर छू लेगी जिसकी अपेक्षा इस परीक्षा में की जाती है।
लेखन शैली को विकसित करने के लिए आप कई आसान उपाय अपना सकते हैं। सबसे आसान उपाय यह है कि आप किसी अख़बार या पत्रिका में प्रकाशित1000-1500 शब्दों का कोई लेख ध्यान से पढ़ें और फिर लगभग 250-300 शब्दों में उसका सार लिखें। दूसरा तरीका है कि आप हर सप्ताह किसी विषय पर 1000 शब्दों में निबंध लिखने का अभ्यास करें। निबंध लेखन के अभ्यास से न सिर्फ आप निबंध के प्रश्नपत्र में अच्छे अंक ला सकेंगे बल्कि आपकी विश्लेषणात्मक व रचनात्मक चिंतन की क्षमता भी बढ़ेगी।
लेखन शैली की उत्कृष्टता बहुत हद तक आपके शब्द-चयन पर निर्भर करती है, इसलिये आपको अपना शब्द-संसार समृद्ध करने के लिये प्रयासरत रहना चाहिये। इसका सर्वश्रेष्ठ तरीका है कि आप नई-नई किताबें व पत्रिकाएँ पढ़ें और जहाँ कहीं भी कोई नया शब्द, प्रभावशाली कविता, सूक्ति या कथन मिले उसे नोट कर लें। इन नोट किये हुए शब्दों को दो-चार बार आपको यत्नपूर्वक प्रयोग में लाना पड़ेगा, फिर ये आपके शब्द-संसार में सहज रूप से शामिल हो जाएंगे। लेखन-शैली का चमत्कार काफी हद तक इस बात पर भी टिका होता है कि आप प्रभावशाली कथनों का सटीक प्रयोग कर पाते हैं या नहीं। अभी से यह अभ्यास शुरू कर देंगे तो सिविल सेवा परीक्षा में बैठने से पहले आपकी भाषा निस्संदेह धारदार हो जाएगी।
4) IAS टॉपर्स के इंटरव्यू पढ़ें/देखें
यह सुझाव मुख्य रूप से 9वीं और उससे बड़ी कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों के लिये है। छठी से आठवीं क्लास के बच्चे भी चाहें तो यह कर सकते हैं। IAS टॉपर्स के इंटरव्यू पढ़ने या देखने से नए उम्मीदवारों को प्रेरणा मिलती है और तैयारी से जुड़े कई पक्षों पर उनकी समझ स्पष्ट हो जाती है। इसलिये, आपको चाहिये कि ज़्यादा से ज़्यादा टॉपर्स के इंटरव्यू पढ़ें और देखें। आप IAS टॉपर्स के इंटरव्यू किसी पत्रिका या वेबसाइट या यूट्यूब पर भी देख सकते हैं। इससे आप निरंतर मोटीवेट होते रहेंगे और आपका ध्यान नहीं भटकेगा।
5) सिलेबस की पूरी समझ बना लें
UPSC के परीक्षा स्ट्रक्चर को समझना बहुत जरूरी है। ऐसा न हो कि आपकी मेहनत बिना किसी वजह के हो क्योंकि UPSC के उम्मीदवारों को किसी भी विषय में शोध नहीं करना है बल्कि उन्हें विषय की आधारभूत समझ के साथ सिलेबस के आधार पर अपनी जानकारी को परिपूर्ण करना है इसलिए उम्मीदवारों को सिलेबस सिर्फ देखना नहीं है बल्कि उसे जज्ब कर लेना है। यह सलाह कॉलेज के अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए हैं। पिछले साल के क्वेश्चन पेपर्स का अभ्यास करना और उनके हिसाब से अपनी आगे की तैयारी करना भी जरूरी है।
कॉलेज के बाद के लिए टिप्स
इस समय परीक्षा की तैयारी अक्सर वे शुरू करते हैं, जिन्हें IAS में जाने की प्रेरणा जरा देर से मिली हो। ऐसे युवा भी काफी संख्या में सफल होते हैं, जिन्होंने ग्रेजुएशन के बाद IAS परीक्षा की तैयारी शुरू की। ये युवा अपनी पूरी ऊर्जा और पूरा समय इसी परीक्षा की तैयारी को दे सकते हैं। ऐसे में उनकी तैयारी ज्यादा फोकस्ड रहती है। फिर, ग्रेजुएशन कर चुके युवा की, अपने विषयों में तो अच्छी नींव डल ही चुकी होती है। दरअसल, ‘सही समय’ से ज्यादा महत्वपूर्ण है IAS क्लियर करने के प्रति आपका समर्पण और प्रतिबद्धता। इस समर्पण, प्रतिबद्धता और कठोर परिश्रम के बल पर ही आप IAS अध‍िकारी बनने का अपना सपना साकार कर सकते हैं।
सिविल सेवा परीक्षा का सिलेबस काफी बड़ा होता है। खासकर जनरल स्टडीज का दायरा तय करना और मुश्किल है। इसलिए पढ़ाई का मॉड्यूल बनना बहुत अहम है। हर दिन कितने घंटे पढ़ना है यह तय होना चाहिए। इसके बाद यह क्रम टूटना नहीं चाहिए। ऐसा नहीं है कि किसी सप्ताह हमने जमकर पढ़ाई की और अगला सप्ताह खाली चला गया। बेहतर है कि टॉपिक के अनुसार टाइम बांट लें और उस निर्धारित टाइम में टॉपिक को खत्म करें।
अगर अभी तक आपने अपना वैकल्पिक विषय नहीं चयनित किया है तो सबसे पहले उसे चुने। सिविल सेवा की तैयारी करने वाले उम्मीदवारों की सबसे बड़ी समस्या वैकल्पिक विषयों के चयन की होती है। हमेशा उस विषय को प्राथमिकता दें जिसमें आपकी रूचि हो। जिसे पढ़ने में मजा आता हो और आप उसमें खुद को सहज महसूस करते हों। NCERT और प्रमाणिक पुस्तकों का अध्ययन करें।
सिविल सेवा की तैयारी और परीक्षा की प्रक्रिया लगभग डेढ़ वर्ष चलती है। ऐसे में यह जरूरी है कि इस पूरी अवधि के दौरान खुद की सोच सकारात्मक बनाए रखें। पढ़ाई के दौरान समय-समय पर ब्रेक लें। मूवी देखें, दोस्तों से बात करें। यह बात समझनी होगी कि तैयारी एक पक्षीय नहीं होती है। इसमें आपकी सोच और स्वास्थ्य की अहम भूमिका होती है।मूवी का मतलब ये नहीं है कि आप दिन भर मूवी देखे महीने में 1-2बार देख लेना काफी है।

भारतीय_सर्वोच्च_न्यायालय_के_बारे_में_रोचक_तथ्य

भारतीय_सर्वोच्च_न्यायालय_के_बारे_में_रोचक_तथ्य 

सुप्रीम कोर्ट भारत का शीर्ष अदालत है जो 28 जनवरी, 1950 को अस्तित्व में आया था| इसका मुख्यालय नई दिल्ली में तिलक मार्ग पर स्थित है। यह एक संवैधानिक निकाय है जिसकी व्याख्या भारतीय संविधान के भाग V के अध्याय 4 में अनुच्छेद 124 से 147 के अंतर्गत की गई है |  राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय में 30 न्यायधीश तथा 1 मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की जाती है जिनकी सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष है| यहाँ हम उच्चतम न्यायालय से संबंधित कुछ रोचक तथ्यों का विवरण दे रहे हैं|
1. भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना 28 जनवरी, 1950 को “भारत की संघीय अदालत” के स्थान पर की गई थी| “भारत की संघीय अदालत” की स्थापना भारत सरकार अधिनियम 1935 और प्रिवी काउंसिल के तहत की गई थी और वह ब्रिटिश काल के दौरान देश में सर्वोच्च न्यायिक संस्था थी|
2. भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के उद्घाटन समारोह का आयोजन संसद भवन परिसर के चेंबर ऑफ़ प्रिंसेस में किया गया था। क्या आप जानते हैं कि 1937 से 1950 के बीच लगभग 12 वर्षों तक  चैंबर ऑफ़ प्रिंसेस ही “भारत की संघीय अदालत” का भवन था| आज़ादी के बाद भी 1958  तक चैंबर ऑफ़ प्रिंसेस ही भारत के उच्चतम न्यायालय का भवन था, जब तक कि 1958 में उच्चतम न्यायालय ने अपने वर्तमान तिलक मार्ग, नई दिल्ली स्थित परिसर का अधिग्रहण किया|
3. अपने प्रारंभिक वर्षों में, सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही एक साल में 28 दिन ही चलती थी और इसका समय 10 बजे से 12 बजे और दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक होता था| लेकिन वर्तमान समय में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही एक साल में 190 दिन चलती है |
4. 29 अक्टूबर 1954 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सुप्रीम कोर्ट के भवन की आधारशिला रखी थी|
5. सुप्रीम कोर्ट का भवन हार्डिंग पुल के ठीक विपरीत हार्डिंग एवेन्यू में 17 एकड़ की त्रिभुजाकर भूमि पर इंडो-ब्रिटिश स्थापत्य शैली में बनाया गया है| इसके मुख्य वास्तुकार गणेश भीकाजी देवलकर थे, जो सीपीडब्ल्यूडी के पहले भारतीय प्रमुख थे|
6. आश्चर्य की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट का निर्माण इस प्रकार किया गया है कि यह न्याय के तराजू का प्रतिनिधित्व करता है| राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था कि न्याय के तराजू के दोनों पलड़े सामान होने चाहिए| अतः सुप्रीम कोर्ट भवन का केन्द्रीय हिस्सा जिसमें मुख्य न्यायाधीश का कमरा एवं दो बड़े कोर्टरूम स्थित हैं तराजू के केन्द्रीय बीम का प्रतिनिधित्व करता है|
7. भवन का दायां एवं बायां हिस्सा तराजू के दोनों पलड़ो का प्रतिनिधित्व करता है। इसके दाएं हिस्से में भारत के अटॉर्नी जनरल एवं अन्य विधि अधिकारियों का कार्यालय, बार-कक्ष (bar-room) और पुस्तकालय स्थित है जबकि इसके बाएं हिस्से में कोर्ट के कार्यालय स्थित हैं|
8. 1979 में भवन की संरचना में पूर्वी एवं पश्चमी दो हिस्सों को जोड़ा गया था और इसका अंतिम विस्तार 1994 में किया गया था|
9. एक और रोचक तथ्य सुप्रीम कोर्ट के लॉन परिसर में स्थापित काले रंग की पीतल की 210 सेमी. ऊँची मूर्ति के बारे में है| इस मूर्ति में एक महिला एक बच्चे को पकड़े हुए है एवं बच्चे के हाथ में एक खुली हुई किताब है| इस मूर्ति में प्रदर्शित महिला भारत माता का प्रतिनिधित्व करती है और बच्चे को इस तरह दिखाने का आशय यह है कि वह भारत के युवा गणराज्य रक्षा कर रही है| जबकि मूर्ति में प्रदर्शित किताब देश की कानूनों का प्रतिनिधित्व करता है और किताब का संतुलन सभी के लिए समान न्याय का प्रतिनिधित्व करता है। इस मूर्ति की स्थापना 20 फरवरी 1980 को की गई थी और इसके डिजाइनर “चिंतामणि कार” थे|
10. क्या आप जानते हैं कि भारत की पहली महिला न्यायाधीश और भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश का संबंध भारत के सबसे शिक्षित राज्य केरल से था? भारत की पहली महिला न्यायाधीश सुश्री अन्ना चांडी थी, जो 1927 में लॉ स्कूल में दाखिल हुई और 1929 में बार-एशोसिएशन में शामिल हुई| वह 1937 में पहली महिला “जिला मुन्सिफ़” और 1948 में पहली “जिला न्यायाधीश” बनी| वह शायद उच्च न्यायालय की न्यायाधीश बनने वाली विश्व की दूसरी महिला थी| वह 1959 में केरल उच्च न्यायालय की न्यायाधीश बनी थी| भारत में उच्च न्यायालय की दूसरी महिला न्यायाधीश फातिमा बीवी थी।
11. भारत के सुप्रीम कोर्ट एवं एशिया के किसी सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला न्यायाधीश फातिमा बीवी थी, जिन्हें 1959 में सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया गया था।
12. सुप्रीम कोर्ट की मुहर के रूप में “सारनाथ के अशोक स्तंभ” में वर्णित  24 तीलियों वाले पहिये की प्रतिकृति का प्रयोग किया जाता है|
13. फरवरी 2009 के बाद से भारत के उच्चतम न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश सहित न्यायाधीशों की संख्या 31 है। महत्वपूर्ण बात यह है कि मूल संविधान में केवल 8  न्यायाधीशों का स्थान निर्धारित किया गया था और न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का शक्ति संसद को दी गई है| 1960 में न्यायाधीशों की संख्या को बढाकर 11, 1968 में 14, 1978 में 18, 1986 में 26 और 2009 में 31 कर दी गई है।
14. क्या आप जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति कैसे की जाती है?
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्त राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 124(2) के अनुसार उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के साथ विचार-विमर्श के बाद किया जाता है|
*1993 तक उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती थी लेकिन अब 5 वरिष्ठतम न्यायाधीशों की समिति कानून मंत्रालय को नामों की सूची भेजती है और कागजातों की छानबीन के बाद उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है| अब यह राष्ट्रपति पर निर्भर करता है कि वह नामों पर विचार करे या उन्हें पुनर्विचार के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास वापस भेज दे| लेकिन यदि सुप्रीम कोर्ट पुनर्विचार के बाद उन्हीं नामों को भेजता है तो राष्ट्रपति उन व्यक्तियों की नियुक्ति पर मुहर लगा देता है|
15. आइये अब जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बनने के लिए किसी व्यक्ति के पास क्या-क्या योग्यता होनी चाहिए?
- उसे भारत का नागरिक होना चाहिए|
- वह किसी उच्च न्यायालय में लगातार कम से कम 10 वर्ष तक न्यायाधीश रह चुका हो या वह उच्च न्यायालय या किसी भी न्यायालय में कम-से-कम 10 वर्ष से विधि व्यवसाय कर रहा हो या वह राष्ट्रपति की नजर में देश का प्रतिष्ठित विधिवेत्ता हो|
- राष्ट्रपति के फैसले के अनुसार, एक प्रख्यात कानूनी विद्वान या विशेषज्ञ को भी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जा सकता है|
16. न्यायाधीशों का कार्यकाल क्या है?
भारत के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष है जबकि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष है|
17. क्या आपने कभी सोचा है कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को किस प्रकार उनके पद से हटाया जाता है?
केवल दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को राष्ट्रपति के द्वारा हटाया जा सकता है और इसकी जाँच की शक्ति संसद को दी गई है| यदि संसद के दोनों सदन के उपस्थित सदस्यों में से दो-तिहाई सदस्यों द्वारा किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए प्रस्ताव पारित किया जाता है उस न्यायाधीश को उसके पद से हटाया जा सकता है|
18. क्या आपको सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के वेतन की जानकारी है?
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का वेतन 1 लाख रूपये और अन्य न्यायाधीशों का वेतन 90,000 रूपये है|
19. क्या होता है जब सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश अनुपस्थित होते है?
अनुच्छेद 126 के अनुसार, जब मुख्य न्यायाधीश अनुपस्थित होते हैं तो राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट के किसी अन्य न्यायाधीश को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करते हैं|
20. क्या सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधीश कोई अन्य पद पर कार्य कर सकता है?
सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर किसी भी अदालत में एक न्यायाधीश के रूप में कार्य नहीं कर सकते हैं| लेकिन सरकार आम तौर पर विभिन्न आयोगों के प्रमुखों के पद पर सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को नियुक्त करती है|

मौद्रिक_नीति_समिति of India

मौद्रिक_नीति_समिति of India


#संरचना_और_उद्देश्य

केंद्र सरकार द्वारा संशोधित RBI अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के अनुसार 6 सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (MPC) का गठन किया गया है. मौद्रिक नीति समिति की पहली बैठक 3 अक्टूबर, 2016 को आयोजित की गई थी. यह समिति विभिन्न नीतिगत निर्णय लेती है जैसे रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, एमएसएफ और लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी आदि से सम्बंधित होते हैं.
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भारत का सर्वोच्च मौद्रिक प्राधिकरण है. RBI अर्थव्यवस्था की आवश्यकता के अनुसार मुद्रा आपूर्ति को बनाए रखने के लिए अधिकृत है. RBI, देश में एक रुपये के नोट और सभी सिक्कों को छोड़कर सभी मूल्य के नोटों को छापता और वितरित करता है.
#मौद्रिक_नीति_क्या_है
मौद्रिक नीति; भारतीय रिज़र्व बैंक की उस नीति को बताती है जिसके माध्यम से देश की मौद्रिक नीति को इस प्रकार नियंत्रित किया जाता है कि देश में मुद्रा स्फीति को बढ़ाये बिना देश के आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया जा सके.
ज्ञातव्य है कि RBI; भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत मौद्रिक नीति बनाने के लिए अधिकृत है.
इसलिए मौद्रिक नीति से तात्पर्य किसी देश के केंद्रीय बैंक द्वारा अपनाए गए ऋण नियंत्रण उपायों से है.
#मौद्रिक_नीति_के_उद्देश्य:
चक्रवर्ती समिति के अनुसार; मूल्य स्थिरता, आर्थिक विकास, आर्थिक समानता, सामाजिक न्याय, नए मौद्रिक और वित्तीय संस्थानों को बढ़ावा देना और पोषण करना भारत में मौद्रिक नीति के महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं.
RBI हमेशा मुद्रास्फीति की दर को कम करने या इसे एक स्थायी सीमा के भीतर रखने की कोशिश करती है, जबकि दूसरी ओर भारत सरकार देश की जीडीपी वृद्धि में तेजी लाने पर ध्यान केंद्रित करती है.
#मौद्रिक_नीति_समिति_क्या_है?
केंद्र सरकार द्वारा धारा 45ZB के तहत मौद्रिक नीति समिति (MPC) गठित की जाती है. MPC; देश के विभिन्न क्षेत्रों के विकास के लिए महत्वपूर्ण नीतिगत दरों जैसे रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी रेट, बैंक रेट इत्यादि का निर्धारण करता है.
केंद्र सरकार द्वारा संशोधित RBI अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के अनुसार 6 सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (MPC) का गठन किया जाता है. मौद्रिक नीति समिति की पहली बैठक 3 अक्टूबर, 2016 को आयोजित की गई थी.
रिज़र्व बैंक का मौद्रिक नीति विभाग (MPD) मौद्रिक नीति तैयार करने में MPC की सहायता करता है.
#मौद्रिक_नीति_समिति_का_गठन
मौद्रिक नीति समिति (MPC) में अध्यक्ष सहित कुल 6 सदस्य होते हैं. यह समिति विभिन्न नीतिगत निर्णय लेती है जो कि रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, एमएसएफ और लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी आदि से सम्बंधित होते हैं.
#अप्रैल_2019_में_मौद्रिक_नीति_समिति_में
#शामिल_सदस्य_इस_प्रकार_हैं;
1. भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर - अध्यक्ष, पदेन; (श्री शक्तिकांत दास)
2. भारतीय रिजर्व बैंक के उप-गवर्नर, मौद्रिक नीति के प्रभारी – सदस्य, पदेन; (डॉ. विरल वी. आचार्य)
3. भारतीय रिजर्व बैंक के एक अधिकारी को केंद्रीय बोर्ड द्वारा नामित किया जाता है - पदेन सदस्य,; (डॉ. माइकल देवव्रत पात्रा)
4. डॉ. रवींद्र ढोलकिया, प्रोफेसर, भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद - सदस्य
5. प्रोफेसर पामी दुआ, निदेशक, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स - सदस्य
6. श्री चेतन घाटे, प्रोफेसर, भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) - सदस्य
पदेन सदस्यों को छोड़कर शेष सभी सदस्य 4 वर्ष या अगले आदेश तक (जो भी पहले हो) कार्यभार सँभालते हैं.
ज्ञातव्य है कि रिज़र्व बैंक द्विमासिक समीक्षा में पालिसी रेट में बदलाव लाता रहता है. किसी दर में बदलाव लाना है या नहीं इसका निर्णय ये 6 सदस्य ही वोटिंग के आधार पर करते हैं.
#मौद्रिक_नीति_के_साधन_दो_प्रकार_के_होते_हैं:
1. मात्रात्मक साधन (Quantitative Instruments): सामान्य या अप्रत्यक्ष (कैश रिज़र्व रेशियो, वैधानिक तरलता अनुपात, ओपन मार्केट ऑपरेशंस, बैंक दर, रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, सीमांत स्थायी सुविधा और लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी (LAF).
2. गुणात्मक साधन (Qualitative Instruments): चयनात्मक या प्रत्यक्ष (मार्जिन मनी में परिवर्तन, प्रत्यक्ष कार्रवाई, नैतिक दबाव)
यह उल्लेखनीय है कि मौद्रिक नीति के उपर्युक्त सभी उपकरण अर्थव्यवस्था की आवश्यकता के अनुसार उपयोग किए जाते हैं. ये उपकरण अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति के प्रवाह को बनाए रखते हैं ताकि अर्थव्यवस्था की वृद्धि को सुनिश्चित करने के लिए मुद्रास्फीति की दर को स्थिर किया जा सके.
मुझे आशा है कि इस लेख को पढ़ने के बाद आपको यह समझना चाहिए कि मौद्रिक नीति समिति कैसे बनी है और इसके उद्देश्य क्या होते हैं? यह टॉपिक प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे यूपीएससी और राज्य लोक सेवा आयोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.

भारत_की_मुख्य_योजनाएं_जिन्हें_विश्व_बैंक की_सहायता_प्राप्त_है?

भारत_की_मुख्य_योजनाएं_जिन्हें_विश्व_बैंक
की_सहायता_प्राप्त_है?

2 फरवरी, 2018 को भारत सरकार और विश्व बैंक ने वाराणसी से हल्दिया के बीच गंगा नदी पर अपना पहला आधुनिक अंतर्देशीय जल परिवहन विकसित करने के लिए $ 375 मिलियन के ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस लेख में द्वारा भारत में विश्व बैंक की सहायता से चलायी जा रही कुछ महत्वपूर्ण योजनाओं के बारे में बताया गया है.
विश्व बैंक अपने सदस्य देशों को विकास परियोजनाएं चलाने के लिए IDA के माध्यम से सस्ती दरों पर लोन मुहैया कराता है. वर्ष 2017 में भारत ने विश्व बैंक से 1776 मिलियन डॉलर का कर्ज लिया था इस मामले में चीन का नंबर पहला है क्योंकि उसने 2420 मिलियन डॉलर का कर्ज लिया हुआ है. वर्तमान में विश्व बैंक, भारत के 783 से ज्यादा प्रोजेक्ट्स में आर्थिक सहायता दे रहा है. इस लेख में द्वारा भारत में विश्व बैंक की सहायता से चलायी जा रही कुछ महत्वपूर्ण योजनाओं के बारे में बताया गया है. 
आइये कुछ योजनाओं के बारे में जानते हैं;
1. #कौशल_भारत_मिशन_ऑपरेशन
स्वीकृति तिथि : 23 जून, 2017
समाप्ति तिथि : 31 मार्च, 2023 को
कुल परियोजना लागत : यूएस $ 3188.88 मिलियन
विश्व बैंक सहायता: यूएस $ 250 मिलियन
उधारकर्ता: आर्थिक मामलों का विभाग, मंत्रालय
कार्यान्वयन एजेंसी: कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय
2. #स्वच्छ_भारत_मिशन
स्वीकृति तिथि : 15 दिसंबर, 2015
समाप्ति तिथि :  31 जनवरी, 2021
कुल परियोजना लागत : यूएस $ 22000 मिलियन
विश्व बैंक सहायता:  यूएस $ 1500 मिलियन अमरीकी डालर
उधारकर्ता:  भारत सरकार
कार्यान्वयन एजेंसी: पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय
3. #राष्ट्रीय_गंगा_नदी_बेसिन_परियोजना
स्वीकृति तिथि : 31 मई, 2011
समाप्ति तिथि :  31 दिसंबर, 2019
कुल परियोजना लागत : यूएस $ 1556 मिलियन
विश्व बैंक सहायता:  यूएस $1000 मिलियन अमरीकी डालर
उधारकर्ता:  भारत सरकार
कार्यान्वयन एजेंसी: पर्यावरण और वन मंत्रालय
किस व्यक्ति के मरने पर कई देशों की करेंसी बदल जाएगी?
4. #प्रधानमन्त्री_ग्रामीण_सड़क_परियोजना
स्वीकृति तिथि : 20 दिसंबर, 2010
समाप्ति तिथि :  15 दिसंबर, 2020
कुल परियोजना लागत : यूएस $ 1500 मिलियन
विश्व बैंक सहायता:  यूएस $ 1500 मिलियन अमरीकी डालर
उधारकर्ता:  भारत सरकार
कार्यान्वयन एजेंसी: राष्ट्रीय ग्रामीण मार्ग विकास एजेंसी
5. #राष्ट्रीय_ग्रामीण_आजीविका_परियोजना
स्वीकृति तिथि : 5 जुलाई, 2011
समाप्ति तिथि :  30 जून, 2023
कुल परियोजना लागत : यूएस $ 1171 मिलियन
विश्व बैंक सहायता:  यूएस $ 1000 मिलियन अमरीकी डालर
उधारकर्ता:  भारत सरकार
कार्यान्वयन एजेंसी: ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार
6. #समन्वित_बाल_विकास_सेवाएं (ICDS)
स्वीकृति तिथि : 6 सितंबर, 2012
समाप्ति तिथि :  30 अगस्त, 2022
कुल परियोजना लागत : यूएस $ 151.50 मिलियन
विश्व बैंक सहायता:  $ 106 मिलियन अमरीकी डालर
उधारकर्ता:  भारत सरकार
कार्यान्वयन एजेंसी: भारत सरकार
7. #राष्ट्रीय_एड्स_नियंत्रण_सहायता_परियोजना
स्वीकृति तिथि : 1 मई, 2013
समाप्ति तिथि :  31 दिसंबर, 2019
कुल परियोजना लागत : यूएस $ 510 मिलियन
विश्व बैंक सहायता:  यूएस $ 255 मिलियन अमरीकी डालर
उधारकर्ता:  भारत सरकार
कार्यान्वयन एजेंसी: राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन
8. #गरीबों_के_लिए_आवास_योजना
स्वीकृति तिथि : 14 मई, 2013
समाप्ति तिथि :  31 दिसंबर, 2018
कुल परियोजना लागत : यूएस $ 100 मिलियन
विश्व बैंक सहायता:  यूएस $ 100 मिलियन
उधारकर्ता:  भारत सरकार
कार्यान्वयन एजेंसी: राष्ट्रीय आवास बैंक
9. #MSME_विकास_नवाचार_और_समावेशी
#वित्त_परियोजना
स्वीकृति तिथि : 24 फरवरी, 2015
समाप्ति तिथि :  31 मार्च, 2020
कुल परियोजना लागत : यूएस $ 550 मिलियन
विश्व बैंक सहायता:  यूएस $ 550 मिलियन
उधारकर्ता:  सिडबी
कार्यान्वयन एजेंसी: सिडबी
10. #राष्ट्रीय_जल_विज्ञान_परियोजना
स्वीकृति तिथि : 15 मार्च, 2017
समाप्ति तिथि :  31 मार्च, 2025
कुल परियोजना लागत : यूएस $ 350 मिलि
विश्व बैंक सहायता:  यूएस $ 175 मिलियन अमरीकी डालर
उधारकर्ता:  आर्थिक मामले विभाग, भारत सरकार
कार्यान्वयन एजेंसी: जल संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार
11. #उत्तर_प्रदेश_के_गरीबों_के_लिए_पर्यटन
#विकास_परियोजना
स्वीकृति तिथि : 20 दिसंबर, 2017
समाप्ति तिथि :  30 दिसंबर, 2022
कुल परियोजना लागत : यूएस $ 57.14 मिलियन
विश्व बैंक सहायता:  यूएस $ 40 मिलियन
उधारकर्ता:   भारत सरकार
कार्यान्वयन एजेंसी: उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग
12. #पूर्वी_समर्पित_फ्रेट_कॉरिडोर_3
स्वीकृति तिथि : 30 जून, 2015
समाप्ति तिथि :  30 नवंबर, 2021
कुल परियोजना लागत : यूएस $ 1107 मिलियन
विश्व बैंक सहायता:  यूएस $ 650 मिलियन
उधारकर्ता:   समर्पित फ्रेट कॉरिडोर (लिमी), भारत
कार्यान्वयन एजेंसी: N/A
13. #अटल_भूजल_योजना (अभय)
स्वीकृति तिथि : 5 जून, 2018
समाप्ति तिथि :  N/A
कुल परियोजना लागत : यूएस $ 1000 मिलियन
विश्व बैंक सहायता:  यूएस $ 500 मिलियन अमरीकी डालर
उधारकर्ता:   आर्थिक मामले विभाग, वित्त मंत्रालय
कार्यान्वयन एजेंसी: जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय
ऊपर लिखी गयी योजनाओं से स्पष्ट हो जाता है कि विश्व बैंक भारत की विकास योजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. हालाँकि इन सभी प्रोजेक्ट्स की पूरी लागत विश्व बैंक से प्राप्त नहीं हो रही है लेकिन फिर भी इस दिशा में विश्व बैंक का योगदान सराहनीय अवश्य है.

योजना_आयोग_और_नीति_आयोग

योजना_आयोग_और_नीति_आयोग

योजना आयोग पंचवर्षीय योजनाओं को तैयार करने वाली भारत सरकार की गैर संवैधानिक और गैर– वैधानिक संस्था थी। हालांकि, केंद्र सरकार ने इस आयोग के स्थान पर सामाजिक और आर्थिक मुद्दों की सलाहकार निकाय, नीति आयोग का गठन कर दिया है।

#योजना_आयोग

आयोग में प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष, केंद्रीय कार्यकारिणी द्वारा नियुक्त उपाध्यक्ष, आधा दर्जन सदस्य और महत्वपूर्ण कैबिनेट मंत्री होते हैं।
#योजना_आयोग_के_कार्य_और_उद्देश्य_इस_प्रकार_हैं–
• तकनीकी कर्मियों समेत देश के सामग्री, पूंजी और मानव संसाधनों का आकलन करना और देश की जरूरत के अनुसार अगर ऐसे संसाधनों में कमी पाई जाती है तो इन संसाधनों में बढ़ोतरी की संभावनाओं की जांच करना।
देश के संसधानों के सबसे प्रभावी और संतुलित उपयोग के लिए योजना बनाना।
• प्राथमिकता के आधार पर, योजना के कार्यान्वयन के चरणों को परिभाषित करना और प्रत्येक चरण को पूरा करने के लिए संसाधनों के आवंटन का प्रस्ताव देना।
• आर्थिक विकास को अवरुद्ध करने वाले कारकों का संकेत देना और योजना के सफल कार्यान्वयन के लिए वर्तमान सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति में शर्तों का निर्धारण करना।
• योजना के सभी चरणों का उसे सभी पहलुओं के सफल कार्यान्वयन हेतु अनिवार्य तंत्र की प्रकृति का निर्धारण करना।
• समय– समय पर योजना के प्रत्येक चरण के कार्यान्वयन की प्रगति का मूल्यांकन करना और नीति एवं उपायों में समायोजन की सिफारिश करना कि इस तरह के मूल्यांकन आवश्यक होना दिख सकते हैं; और
ऐसी अंतरिम या सहायक सिफारिशें करना जो उपयुक्त दिखाई दे – चाहे वह सौंपे गए कर्तव्यों के निर्वहन को सुविधाजनक बनाने के लिए हो या मौजूदा आर्थिक स्थिति, वर्तमान नीतियों, उपायों और विकास कार्यक्रमों पर विचार करने के लिए या ऐसी विशेष समस्याओं की जांच करना जिसे  केंद्र या राज्य सरकारों की सलाह के लिए भेजा जा सकता है।

#नीति_आयोग

नीति आयोग, केंद्र और राज्य सरकारों के लिए रणनीतिक एवं तकनीकी सलाह प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए योजना आयोग का स्थान लेने वाली एक गतिशील संस्था है।
नीति आयोग में शामिल हैं–  अध्यक्षः भारत के प्रधानमंत्री, सीईओ, उपाध्यक्ष, पदेन सदस्य– महत्वपूर्ण कैबिनेट मंत्री (गृह, वित्त, रेलवे और कृषि), विशेष आमंत्रित सदस्य– कुछ अन्य कैबिनेट मंत्री, पूर्ण कालिक सदस्य और शासी परिषद में होते हैं सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और विधानमंडलों के साथ केंद्र शासित प्रदेशों और अन्य केंद्र शासित प्रदेशों के लेफ्टिनेंट गवर्नर।
#नीति_आयोग_के_कार्य_और_उद्देश्य_इस_प्रकार_हैं–
• यह संस्था सरकार के 'थिंक टैंक' के तौर पर काम करती है।
• यह दिशात्मक और नीति निर्माता के तौर पर काम करती है।
• नीति आयोग सरकारों को केंद्र और राज्य स्तर पर नीति के मुख्य तत्वों में प्रासंगिक रणनीतिक एवं तकनीकी परामर्श मुहैया कराती है।
• नियंत्रण की बजाए, ध्यान उत्प्रेरक बनने और राज्यों एवं केंद्र के लिए एक मंच मुहैया कराने पर है जहां ये दोनों एक साथ आएंगे और आर्थिक नीतियों एवं विकास योजनाओं के मुद्दों पर चर्चा करेंगे।
• यह गावं के स्तर पर विश्वसनीय योजनाओं को तैयार करने के लिए तंत्र विकसित करेगी और आगे चलकर सरकार के उच्च स्तर पर इसे शामिल करेगी। यह समाज के उन वर्गों पर विशेष ध्यान दिया जाना सुनिश्चित करेगी जिन पर आर्थिक प्रगति के पर्याप्त लाभ न मिलने का खतरा हो सकता है।
• नीति आयोग राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं का साझा दृष्टिकोण विकसित करेगी।



Q_1. निर्वाचन आयोग की स्थापना कब हुई ? Ans.  1950
Q_2. संघ लोक सेवा आयोग की स्थापना कब हुई ? Ans.  1950
Q_3. योजना आयोग की स्थापना कब हुई ? Ans.  1950
Q_4. वित्त आयोग की स्थापना कब हुई ? Ans.  1951
Q_5. विश्व विद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना कब हुई ? Ans.  1953

Q_6. केन्द्रीय सतर्कता आयोग की स्थापना कब हुई ? Ans.  1964
Q_7. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की स्थापना कब हुई ? Ans.  1990
Q_8. राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना कब हुई ? Ans.  1992
Q_9. राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना कब हुई ? Ans.  1992
Q_10. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना कब हुई ? Ans.  1992
Q_11. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की स्थापना कब हुई ? Ans.  1993
Q_12. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना कब हुई ? Ans.  2003
Q_13. नीति आयोग (NITI) की स्थापना कब हुई ?

राजनैतिक_शब्दावली

राजनैतिक_शब्दावली

●स्थगन प्रस्ताव
स्थगन प्रस्ताव किसी लोक महत्व के मामले पर पेश किया जाता है । जब ये स्वीकार कर लिया जाता है तब लोक महत्व के कार्य के लिए सदन का नियमित कार्य रोक दिया जाता है ।इस प्रस्ताव को पेश करने के लिए न्यूनतम 50 सदस्यों की स्वीकृति जरूरी है ।
●धन विधेयक
संसद में राजस्व एकत्र करने या अन्य प्रकार के धन के संबंधित विधेयक को धन विधेयक कहा जाता है । धन विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश किया जाता है । धन विधेयक को पुन:विचार के लिए राष्ट्रपति लौटा नहीं सकता ।
●विनियोग विधेयक
विनियोग विधेयक में भारत की संचित निधि पर भारित व्यय की पूर्ति के लिए धन तथा सरकार के खर्च के लिए अनुदान की मांग शामिल होती है । भारत में संचित निधि में से कोई भी धन विनियोग विधेयक के अधीन ही निकाला जा सकता है ।
●अविश्वास प्रस्ताव
यह प्रस्ताव लोकसभा या विधानसभा में विपक्षी दलों द्वारा लाया जाता है । दरअसल ये प्रस्ताव सत्तारूढ पार्टी या गठबंधन के बहुतमत की परीक्षा होती है...। अगर ये प्रस्ताव पारित हो जाता है तो मंत्रिपरिषद् को इस्तीफा देना पड़ता है । सरकार गिर जाती है ।
●अध्यादेश
जब संसद का अधिवेशन नहीं चल रहा हो और किसी विशेष उद्देश्य के लिए कानून की आवश्यकता हो, तो राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता है । इस अध्यादेश का प्रभाव संसद द्वारा निर्मित कानून जैसा ही होगा ।
●प्रश्नकाल
जब संसद की कार्यवाही शुरू होती है...उसके शुरू के पहला घंटा सामान्यत: प्रश्नकाल कहलाता है ।
●शून्य काल
संसद के दोनों सदनों में प्रश्न काल के ठीक बाद के समय को शून्य काल कहा जाता है । शून्य काल का लोकसभा या राज्यसभा की प्रक्रिया तथा संचालन नियम में कोई उल्लेख नहीं है ।
●सदन का स्थगन
स्थगन द्वारा सदन के कामकाज को विनिर्दिष्ट समय के लिए स्थगित कर दिया जाता है ।
●अनुपूरक प्रश्न
सदन में किसी सदस्य द्वारा अध्यक्ष की अनुमति से किसी विषय पर दिए गए जवाब का स्पष्टीकरण के लिए अनुपूरक प्रश्न पूछने की अनुमति प्रदान करता है ।
●विघटन
केवल लोकसभा का ही विघटन हो सकता है । इससे लोकसभा भंग हो जाती है ।
●तारांकित प्रश्न
जिन सवालों का जवाब सदस्य तुरंत सदन में चाहता है उसे तारांकित प्रश्न कहा जाता है ।
●अतारांकित प्रश्न
जिन प्रश्नों का उत्तर सदस्य लिखित में चाहता है, उन्हें अतारांकित प्रश्न कहा जाता है ।
●पदेन
पद धारण करने के कारण ।
●निर्वाचन मंडल
विशेष मतदान के मकसद से गठित निर्वाचकों का विशेष समूह । जैसे- राष्ट्रपति के चुनाव के लिए संसद या विधानसभाओं से निर्वाचित सदस्य निर्वाचक मंडल का गठन करते है ।
●न्यायिक समीक्षा
विधायिका का बनाया गया कानून संविधान के मुताबिक है या नहीं, इसकी न्यापालिका जांच करती है, इसे ही न्यायिक समीक्षा कहा जाता है ।
●प्रभुसत्ता संपन्न
जहां देश आंतरिक और बाह्य मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र हो और किसी बाह्य शक्ति पर निर्भर न हो ।
●निषेधाधिकार
मुख्य कार्यपालिका द्वारा सोच-विचार के बाद किसी विधायी अधिनियम पर अपनी अस्वीकृति । ऐसा करने से अधिनियम कानून का रुप नहीं ले पाता ।
●निंदा प्रस्ताव
सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करने के लिए संसद के किसी भी सदन में निंदा प्रस्ताव लाया जा सकता है ।
●गुलेटिन
वह संसदीय प्रक्रिया जिसमें सभी मांगों को जो नियत तिथि तक नहीं निपटाई गई हो बिना चर्चा के ही मतदान के लिए रखा जाता है ।
●काकस (Caucus)
किसी राजनीतिक दल अथवा गुट के प्रमुख सदस्यों की बैठक को काकस कहते हैं । इन प्रमुख सदस्यों द्वारा तय की गई नीतियों से ही पूरा दल संचालित होता है ।
●सचेतक
राजनीतिक दल में अनुशासन बनाए रखने के लिए सचेतक की नियुक्ति हर दल द्वारा की जाती है ।
●धर्म निरपेक्ष
जहां धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता तथा सभी धर्मों को समान रूप से देखा जाता है ।
●लोकतंत्र
सरकार को सारी शक्तियां जनता से प्राप्त होती हैं । शासकों का चुनाव जनता द्वारा किया जाता है । दूसरे रूप में कह सकते हैं कि लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए है ।
●समाजवाद
ऐसी व्यवस्था जिसमें उत्पादन और वितरण का स्वामित्व राज्य के नियंत्रण में रहता है ।
●गणराज्य
इसका मतलब यह है कि राज्य का अध्यक्ष एक निर्वाचित व्यक्ति है जो एक निश्चित अवधि के लिए पद ग्रहण करता है।

Not hard to learn English, Try these 10 tips

Not hard to learn English, try these 10 tips...


Are you unable to learn English due to problems in Grammar and Translation? So no matter you can try some of the ways in which your mind will feel and you will learn English as well.Essential Tips For Fragrant English...
1. Search engine used in English...
Use Google in English while searching any information.Especially when it comes to getting news or information about your choice. For example, if you like cooking, then you can search food recipes in English. Also get information about fashion, car, travel in English. Maybe you did not understand anything initially, but do not panic at it. Learn the meaning of some words and then try to understand. Gradually your interest will start to grow. Learn English Free here 
2. Listen and try to understand...
Learning to listen to English is the best way to learn. The biggest advantage of this is to improve the pronunciation. So whenever you go out, listen to your headphones by downloading some of your favorite audio recordings. This will help you to understand many things like English idioms...
3. Follow people who post in English on Twitter, Facebook and Google Plus follow...
Facebook, Twitter and Google Plus will all be active. Why not take advantage of this inlearning English ? You follow people like that who post in English. Keep in mind that these people should be from the fields you are interested in. This way, when these people post and tweet your liking, you will read them with great passion and understand the meaning. After this you also communicate with them.
4. Write your blog in English...
You must both understand and write English. For this, create your own blog and type in it according to your choice. This is a great platform for learning English , with the help of which you can freely put your views in English in front of others.
5. Read also the blogs of others...
If you think that you are not ready to write your blog at the moment, then you start reading others' blogs. In the blog you can see how the writer is writing about, about who is writing and what people are saying about the blog. This will also inspire you and your writing skills will be strengthened and you will understand Grammar's structure.
6. See English movies and listen to English music...
Watching movies and listening to songs is not what they like. If you want to be perfect in English then you can do all these work in English. This will help you learn English. Especially you will help to understand the language of colloquialism.
7. Read the English book...
If you have a passion for reading books then you can read the English book of your choice. Keep in mind that read a book that you can read by mind. If possible, then read the children's English book, if possible. After this slowly read your level and English books of choice. Write whatever new words you learn in English to a notebook.With this, try to use new words in sentences. 
8. Follow the English website to read the news...
It is also important to be aware of the daily news. It is important for you to fall in the English website to know the news. This will give you a lot of news, like lifestyle, technology, and you will understand the words in these fields.
9. Practice with friends... 
After learning so much in English, practice practicing with your friends and know how much improvement you have done in English.
10. Do not translate the language into English...
Do not translate your language into English. Think English for fluency. Talk to yourself. Do not be afraid to make mistakes. be confidence...

17 English titles...

I. Common Titles
1. Mr. (श्री/श्रीमान्): for men, regardless of marital status, who do not have another professional or academic title.

2. Mrs. (श्रीमती): for married women who do not have another professional or academic title.

3. Miss(कुमारी): for girls, unmarried women and (in the UK) married women who continue to use their maiden name (although "Ms" is often preferred for the last two). In the UK, it is used in schools to address female teachers, regardless of marital status.

II. Formal Titles
1. Sir (महोदय): for men, formally if they have a British knighthood or if they are a baronet. Also used in secondary schools; most tend not to call male teachers "Mr ___", but rather "Sir".

2. Ma'am (महोदया): for women, a term of general respect.

3. Lady (रानी): for female peers with the rank of baroness, viscountess, countess, and marchioness, or the wives of men who hold the equivalent titles.

4. Lord (प्रभु): for male barons, viscounts, earls, and marquesses, as well as some of their children.

5. Excellency (माननीय): a title of honor given to certain high officials, as governors, ambassadors, royalty, nobility, and Roman Catholic bishops and archbishops, (preceded by his, your, etc.).

6. Gentleman (सज्जन): originally a social rank, standing below an esquire and above a yeoman. The term can now refer to any man of good, courteous conduct. 

III. Academic/Professional Titles 
1. Dr.(डाक्टर): (abbreviation for Doctor) for the holder of a doctoral degree (e.g. PhD, or MD in many countries) and for medical practitioners

2. Professor(प्रोफ़ेसर): for a person who holds the academic rank of professor in a university or other institution.

3. Chancellor(दानाध्यक्ष): for the chancellor of a university.

4. Principal(प्रधानाचार्य): for the head of a school/organisation.

5. President (राष्ट्रपति): may apply to a person holding the title of president, or presiding over certain other governmental bodies.

6. Master (शिक्षक): a male schoolteacher.

7. Warden (ध्यान रखने वाला): a person responsible for the supervision of a particular place or activity or for enforcing the regulations associated with it.

8. Dean (महाविद्यालय का अध्यक्ष): the head of a university faculty or department or of a medical school.


Business Meetings...

 phrases:
(Business Meetings में बात करने के तरीके):

1. Interrupting 
(जब आपको किसी की बात के बीच में अपनी बात कहनी हो)

May I have a word? (क्या में कुछ बोल सकता हूँ?)
If I may, think..(मैं कुछ कहूं?)
Excuse me for interrupting. (दख़ल देने के लिए क्षमा)

2. Giving opinions (सलाह देना)

I (really) feel that..(मुझे ऐसा लगता है..)
In my opinion...(मेरी सलाह में...)
The way I see things..(जिस तरह से मैं चीज़ों को देखता हूँ..)

3. Asking for opinions (सलाह के लिए पूछना)

Do you (really) think that... 
[Name] can we get your input?
How do you feel about?

4. Commenting on opinions (सलाह पर टिप्पणी देना)

I have never thought about it this way before (मैंने इस तरह से पहले कभी नहीं सोचा)
Good Point!
I get your point (मुझे समझ आ गया)
I see what you mean.

5. Agreeing (किसी की बात मान जाना)

Exactly!
That's (exactly) the way I feel. (मुझे भी ऐसा ही लगता है)
I have to agree with (name)

6. Disagreeing with other opinions (किसी की सलाह से असहमत होना)

Up to a point I agree with you, but..(कुछ हद्द तक मैं आपसे सहमत हूँ, लेकिन...)
(I'm afraid) I can't agree...(मैं आपसे सहमत नहीं हूँ)

7. Advising and suggesting (सुझाव देना)

We should..
Why don't you..
How/What about...
I suggest/recommend that..

8. Clarifying (अपनी बात को स्पष्ट रूप से कहना)

(Statement) Have I made that clear? (क्या मैंने यह आपको स्पष्ट रूप से बता दिया?)
(Statement) Do you see what I am getting at?
Let me put this another way (statement)
I'd just like to reiterate that (statement) (मैं यह फिर से कह रहा हूँ कि....)

9. Asking for repetition (बात दोहराने के लिए कहना)

I didn't catch that.
Could you repeat that, please?
I missed that. Could you say, it again please? (मुझे समझ नहीं आया, क्या आप इसे दोहरा सकतें हैं?)
Could you run that by me one more time? (क्या आप मेरे लिए इसे दोबारा बोल सकते हैं?)


10 Commonly confused words:

1. Further - about the degree (और अधिक)
E.g. The first team has gone furthest in its analysis.

2. Farther - about distance (अधिक दूर)
E.g. The farthest point from the sun.

3. Especially - particularly (खास तौर पर)
E.g. He despised them all, especially Tom.

4. Specially - for a purpose (किसी वजह के लिए)
E.g. A new coat and hat, bought specially for your wedding.

5. Older - comparing ages of people (लोगों की उम्र की तुलना करना)
E.g. This building is older than that one.

6. Elder - comparing ages of the family members (परिवार में लोगों की उम्र की तुलना करना)
E.g. My elder daughter is 11.

7. Altogether - completely, in total (कुल मिलाकर)
E.g. I stopped seeing her altogether.

8. All together - all in one place (सभी एक साथ)
E.g. They arrived all together.

9. Beside - next to (के बगल में)
E.g. He sat beside me in the front seat.

10. Besides - in addition to (के अतिरिक्त)
E.g. I have no other family besides my parents.