Monday, June 15, 2020

यू.पी.एस.सी अभ्यर्थियों हेतु विशेष BOOKS LINKS

  यू.पी.एस.सी अभ्यर्थियों हेतु विशेष BOOKS Links
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● प्राचीन भारत - रामशरण शर्मा -https://drive.google.com/file/d/0BzAQ9_6UrOqNa3lIT3lYa3J6Z28/view?usp=drivesdk 
● मध्यकालीन भारत - सतीश चंद्र - https://drive.google.com/file/d/0BzAQ9_6UrOqNWV8yZlE1YWRvLWs/view?usp=drivesdk
● आधुनिक भारत - विपिन चंद्र - https://drive.google.com/file/d/0BzAQ9_6UrOqNMU1zd1B3XzNXaTQ/view?usp=drivesdk
● आधुनिक भारत भाग I - राजीव अहीर - https://drive.google.com/file/d/0BzAQ9_6UrOqNMU1zd1B3XzNXaTQ/view?usp=drivesdk
● आधुनिक भारत भाग II -  राजीव अहीर - https://drive.google.com/file/d/0BzAQ9_6UrOqNaHhUVmlwaENSWHc/view?usp=drivesdk
● आधुनिक भारत भाग III -  राजीव अहीर - https://drive.google.com/file/d/0B7f00fITsIXSUGRjTVoxMFhtYzg/view?usp=drivesdk
● भारत का भूगोल भाग I - महेश वर्णवाल - https://drive.google.com/file/d/0BzAQ9_6UrOqNUXBBUGxKVG9IaUE/view?usp=drivesdk
● भारत का भूगोल भाग II - महेश वर्णवाल - https://drive.google.com/file/d/0B7f00fITsIXSR2NqaUVVeTJpaWc/view?usp=drivesdk
● भारतीय अर्थव्यवस्था - संजीव वर्मा - https://drive.google.com/file/d/1nSp8RwFyXq9w_Sh2lOiAyRv2olSJtT30/view?usp=drivesdk
● भारतीय राजव्यवस्था - ऍम. लक्ष्मीकांत - https://drive.google.com/file/d/0BzAQ9_6UrOqNa2haMlFKVXVRZDQ/view?usp=drivesdk
● भारतीय शासन - ऍम. लक्ष्मीकांत - https://drive.google.com/file/d/0BzAQ9_6UrOqNWTV5dmtCaEN1bUU/view?usp=drivesdk
● लोकप्रशासन - ऍम. लक्ष्मीकांत - https://drive.google.com/file/d/0BzAQ9_6UrOqNRlZwdHZlVDFXMnM/view?usp=drivesdk
● हमारी संसद - सुभाष कश्यप - https://drive.google.com/file/d/11fROqKVFzzhFzHdNmEsTbe2Vs-79EHyX/view?usp=drivesdk
● हमारा संविधान - सुभाष कश्यप - https://drive.google.com/file/d/0BzAQ9_6UrOqNNm1LV0Fpdmc3RDg/view?usp=drivesdk
● भारत का संविधान - सुभाष कश्यप - https://drive.google.com/file/d/0BzAQ9_6UrOqNTUlvYW9ITUJrM3c/view?usp=drivesdk
● 25 वर्षों की प्रारंभिक परीक्षा के प्रश्नपत्रों का संग्रह हल सहित - https://drive.google.com/file/d/1OKKDa0cR40DtAjlcPVgCoUe5U08naToO/view?usp=drivesdk
● सामान्य हिंदी वैकल्पिक विषय हेतु विगत वर्षों के प्रश्नपत्रों का संग्रह हल सहित - https://drive.google.com/open?id=0B7d3bEtJr8jdMlpHZ0ZEc0pCZGM



*Hindi medium Complete pdfs link!*

> सम्पूर्ण एन.सी.ई.आर.टी पुस्तकें - https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNd3ppcFA4NkJINFE
> सम्पूर्ण अंग्रजी व्याकरण - https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNazRrZkdhWS1HR2c
> सम्पूर्ण हिंदी व्याकरण - https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNWS1MTkQ3TmxKbDQ
> सम्पूर्ण संस्कृत व्याकरण - https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNZEZwNTRnank1OUU
> सम्पूर्ण गणित -  https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNM1ZCaU1jWVhqbkk
> सम्पूर्ण विज्ञानं - https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNaTBIeDdFSnoxaTA
> सम्पूर्ण कम्प्यूटर ज्ञान - https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNNl9ITlVNUlpTUVk
> सम्पूर्ण राजव्यवस्था - https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNRVJDdG5rZ0p0djA
> सम्पूर्ण मनोविज्ञान - https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNYjJ4N1dKem5Cdk0
> सम्पूर्ण राज्य सामान्यज्ञान - https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNZ1otbENkMDVpS00
> सामान्यज्ञान सम्पूर्ण - https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNUmNKZmg2VmpRWUU
> सम्पूर्ण सामान्य अध्ययन - https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNMi1XRVZOeUc3Ums
> सिविल हेतु सामान्य अध्ययन - https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNTExwZWhiMzhGLU0
> वेद , पुराण , जीवनी , कहानियां इत्यादि - https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNVzJNcE9lbFJKcE0
> डॉ. विजय अग्रवाल - https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNOTYxWFloWmR0a3M


उपर्युक्त कुछ नामानुसार उस संस्था व प्रकाशन द्वारा निर्मित PDF उपलब्ध है

अन्य मुख्य पुस्तकें - https://drive.google.com/folderview?id=0BzAQ9_6UrOqNeGJOSGRuR09TaDQ

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SCIENCE
CLASS 6
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CLASS 7
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CLASS 8
https://drive.google.com/open?id=1AaHAIDByl44Rg2zHMU97yl3xaZ4DaK0u
CLASS 9
https://drive.google.com/open?id=15QcLdNdA4rQM59mUwYpeYAoj8J1CAJMa
CLASS 10
https://drive.google.com/open?id=1SLzoGcUjfn-9owWW8ltVKt4uER-ewx62
CLASS 11 BIOLOGY
https://drive.google.com/open?id=10oQ4LLhh4DDPP9F6mA4l6IcCa0nC8woh
CLASS 11 CHEMISTRY PART 1
https://drive.google.com/open?id=1yjfmeRGzc0G3Hy1ENvigkfo08DHYpKJU
CLASS 11 CHEMISTRY PART 2
CLASS 11 PHYSICS PART 1
https://drive.google.com/open?id=1mTzDRWZT02N36krgMrobDGjRVc86Gzqi
CLASS 11 PHYSICS PART 2
https://drive.google.com/open?id=1stO3XPNvavveFyF8Dk5f7DIvjVB0P8fn
CLASS 12 BIOLOGY
https://drive.google.com/open?id=1qd3HSBR5la7ODUv_qgZfGY8kHpauTYH1
CLASS 12 CHEMISTRY PART 1
CLASS 12 CHEMISTRY PART 2
https://drive.google.com/open?id=1GH1kPzmbQbeavpf4JwWQ5wZQwDyWoL0S
CLASS 12 PHYSICS PART 1
CLASS 12 PHYSICS PART 2
https://drive.google.com/open?id=1_Ij_24qqbpAiK_NYo14t68SCtjFT8G9q

17 वेबसाइट for IAS

17 ऐसी वेबसाइट जो आपके IAS बनने के सपने को कर सकती हैं साकार


ई-लर्निंग आज की शिक्षा में सबसे बड़ी सूचना क्रांति है। ऑनलाइन सूचनाओं का डेटाबेस लगातार अपडेट होते रहता है इसलिए यह आईएएस उम्मीदवारों को सीखने के लिए एक शानदार अवसर प्रदान करता है। हालांकि ऑनलाइन शिक्षा की अपनी सीमाएं होती हैं, लेकिन अभी भी इससे जुड़े फायदे अद्वितीय हैं।
जब बात आईएएस परीक्षा की तैयारी करने की आती है तो यह बात मायने रखती है कि आपने किस क्वालिटी की पढ़ाई की है, लेकिन इसके साथ-साथ यह बात भी उतने ही मायने रखती है कि आपने कितनी पढ़ाई की है। जबसे इंटरनेट सूचना का एक प्रमुख स्रोत बन गया है तब से यहां भी आपको आसानी से स्टडी मटेरियल (अध्ययन सामाग्री) मिल जाता है और किताबों के एकत्रीकरण से बचा जा सकता है।
समसामयिक विषयों की जानकारी के लिए हर रोज विजिट किए जाने योग्य वेबसाइट्स की सूची: इस श्रेणी में ज्यादातर समसामयिक मामलों से संबंधित वेबसाइटों का वर्णन है। आईए इन सूचीबद्ध वेब पेज से पढ़े जाने योग्य सामाग्री का विश्लेषण करते हैं।
1. newsonair.com (ऑल इंडिया रेडियो): आकाशवाणी पर प्रसारित होने वाले हर रोज रात के 9 बजे वाले न्यूज अपडेट्स सुनें और और रविवार को प्रसारित होने वाले बहस- विचार विमर्श को भी आप यहां सुन सकते हैं
2. pib.nic.in: भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय की वेबसाइट्स को सरकारी सूचनाएं सबसे पहले प्रदान करने वाली साइट्स के रूप में जाना जाता है। यहां सभी मंत्रालयों की समसामयिक जानकारी, जैस- नयी योजनाओं का शुभारंभ और सुप्रीम कोर्ट के कुछ ऐतिहासिक निर्णयों की जानकारी प्राप्त होती है।
3. प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया बहुत ही महत्वपूर्ण वन लाइनर (संक्षिप्त) सूचनाएं प्रदान करता है जो कि आईएएस की प्रारंभिक परीक्षा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। कौन, क्या, कब और कहाँ जैसे अपडेट यहां आसानी से पाए जा सकते हैं।
4. यह एक ऐसी वेबसाइट है जहां आप एक ही जगह पर सभी बेहतर संपादकीय और विचारों से संबंधित लेखों को पढ़ सकते हैं। जिस टॉपिक का विश्लेषण करने की जरूरत है उसका चुनाव करें और द हिंदू के आर्टिकल वाले ऑप्शन में उस लेख को खोजें। यह एक मुद्दे पर एक प्रगतिशील अध्ययन प्रदान करता है।
5. यहां आप नवीनतम आर्थिक नीति पर श्रेष्ठ अर्थशास्त्रियों का कॉलम पढ़ सकते हैं। विशेष रूप से आर्थिक सर्वेक्षण और भारतीय रिजर्व बैंक की गतिविधियों से संबंधित जानकारी का अध्ययन कर सकते हैं।
अपडेट नोट्स प्राप्त करने के लिए ध्यान देने योग्य वेबसाइटों की सूची: यूपीएससी विषयों से संबंधित कई वेबसाइट्स हैं और कई ऐसी वेबसाइट्स भी हैं जो विशेष रूप से सिविल सेवा उम्मीदवारों को समर्पित हैं हालांकि, कई स्रोतों से एक विषय के बारे में पढ़ना भ्रम का एक प्रमुख कारण बन सकता है। इसलिए हम केवल उन्हीं वेबसाइट्स की सूची प्रदान कर रहे हैं जहां आप महीने में एक या दो बार विजिट कर करेंट अफेयर्स (समसामयिक विषयों) की जरूरतमंद जानकारी हासिल कर सकते हैं। Best websites for IAS
6. आप यहां से सभी नवीनतम पारित, लंबित और खारिज संसदीय विधेयकों पर नोट्स तैयार कर सकते हैं। इसके अलावा प्रत्येक संसदीय सत्र के बाद सरकार के कार्यों पर त्रैमासिक समीक्षा रिपोर्ट भी यहां से प्राप्त की जा सकती है।
7. mea.gov.in: यहां आप प्रधानमंत्री द्वारा की गयी नवीनतम विदेश यात्राओं का वर्णन देख सकते हैं और साथ में भारत सरकार द्वारा हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापनों का वर्णन भी इस वेबसाइट पर होता है।
8. yojana.gov.in: यहां से आप योजना और कुरूक्षेत्र पत्रिका के सभी नवीनतम संस्करणों और आर्काइव्स को पढ़ सकते हैं।
9. envfor.nic.in: यह वेबसाइट देश के पर्यावरण अनुभाग में वर्तमान अपडेट्स का अध्ययन करने के लिए अत्यंत उपयोगी वेबसाइट्स है। इस साइट पर सालाना रिपोर्ट्स जारी होती हैं जो विशेष रूप से आईएएस की प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी के लिए पढ़ने योग्य होती हैं ।
10. vikaspedia.in: यह वेबसाइट्स आपको भारत में शुरू की गयी सभी सामाजिक और आर्थिक कल्याणकारी योजनाओं पर नोट्स बनाने में मदद करती है। यह भारत सरकार के सभी प्रमुख कल्याण कार्यक्रमों के उद्देश्यों का अध्ययन करने का एक शानदार विकल्प है।
सर्वश्रेष्ठ वेबसाइट्स की सूची जो उत्तम अध्ययन सामाग्री मुहैया कराते हैं: एक उम्मीदवार को सलाह दी जाती है कि वह जब भी सरकार की किसी नीति या योजना से संबंधित जानकारी का अध्ययन करे तो वह केवल स्टैंडर्ड स्त्रोतों का ही प्रयोग करे। इसलिए हम सरकार के बारे में अध्ययन सामाग्री के रूप में जानकारी देने वाले पोर्टलों की एक विशेष सूची प्रदान कर रहे हैं।
11. indiabudget.nic.in: इस वेबसाइट में आप विस्तार से वार्षिक वित्तीय स्टेटमेंट और आर्थिक सर्वेक्षण का अध्ययन कर सकते हैं। वार्षिक बजट की मुख्य विशेषताओं के साथ यहां वित्त मंत्री का भाषण भी उपलब्ध रहता है।
12. arc.gov.in: यहां आप विस्तार में दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों की सभी 15 रिपोर्टों को देख सकते हैं।
13. upsc.gov.in: पिछले वर्ष की आईएएस परीक्षा के सभी प्रश्न पत्रों का यहां वर्णन हैं तथा आईएएस परीक्षा से संबंधित अधिसूचनाओं के लिए भी इस साइट पर विजिट कर सकते हैं।
14. ncert.nic.in: इस वेबसाइट से कक्षा 6 से लेकर 12वीं के तक के एनसीआरटी की पीडीएफ के नोट्स बना सकते हैं या पढ़ सकते हैं।
15. nios.ac.in: पर्यावरण, इतिहास, राजनीति आदि से संबंधित प्रासंगिक अध्ययन सामग्री यहां से डाउनलोड कर सकते हैं या यहां पढ़ सकते हैं। यह वेबसाइट आपकी वैकल्पिक अध्ययन सामग्री के मूल्य संवर्धन रूप में बहुत उपयोगी साबित सकती है।
16. egyankosh.ac.in: अपनी आवश्यकता के अनुसार इग्नू से संबधित सभी पाठ्यक्रम सामग्री इस वेबसाइट्स से पढ़ या डाउनलोड कर सकते हैं।
17. इस वेबसाईट पर समसामयिक मुद्दों एवं करेंट अफेयर्स से सम्बंधित विस्तृत अध्ययन सामग्री सहित डेली अपडेट्स उपलब्ध हैं। यहां आइएएस प्रारम्भिक परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्न पत्रों का संकलन मौजूद है। इसके साथ ही आइएएस परीक्षा की तैयारी से जुड़े टिप्स तथा अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों की भी सटीक जानकारी प्रदान की गयी है।
निष्कर्ष:
इंटरनेट सूचनाओं के एक सागर की तरह है और यह भारतीय प्रशासनिक सेवा के उम्मीदवारों को इस बारे में भ्रमित भी कर सकता है कि उन्हें क्या पढ़ना चाहिए। आईएएस तैयारी के लिए सही वेबसाइट का चुनाव करना अपने आप में एक मुश्किल काम हो जाता है। एक उम्मीदवार को बेहतर अध्ययन और अधिक सामग्री प्राप्त करने के लिए ऊपर सूचीबद्ध सभी वेबसाइटों को बुकमार्क कर लेना चाहिए।
हालांकि ई-प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना बहुत ही आसान हैं लेकिन यहां आईएएस उम्मीदवारों को समय भी ज्यादा खर्च करना पड़ता है। इसलिए आईएएस की तैयारी करने से पहले कुछ अच्छी वेबसाइटों, पत्रिकाओं और चैनलों का चुनाव कर एक सूची तैयार करना महत्वपूर्ण हो जाता है। सबसे महत्वपूर्ण औऱ ध्यान देने योग्य बात यह है कि आईएएस परीक्षा की बेहतर तैयारी करने के लिए ऑफ़लाइन और ऑनलाइन, दोनों अध्ययनों की आवश्यकता होती है। बेहतर तरीके से सीखने के लिए वेबसाइटों का चुनाव करें लेकिन द हिंदू या इंडियन एक्सप्रेस को पढ़ने के लिए कोई समझौता ना करें। कई वेबसाइटें आपको अखबारों का विकल्प और सारांश प्रदान करने का दावा करेंगी लेकिन ध्यान रखें कि अखबारों को पढ़ने का कोई विकल्प नहीं होता है।

ये लेख नहीँ, धर्म संहिता है!

ये लेख नहीँ, धर्म संहिता है!

*सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥
* तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥

भावार्थ:-हे माता! सुनो, सुंदर फल वाले वृक्षों को देखकर मुझे बड़ी ही भूख लग आई है। (सीताजी ने कहा-) हे बेटा! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते हैं॥ हनुमान्‌जी ने कहा-हे माता! यदि आप मन में सुख मानें (प्रसन्न होकर) आज्ञा दें तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं है।

-जब माँ से आंजनेय ने कहा कि इस बाग में फल लगे हैं,अतः अपने इस भूखे पुत्र को खाने की आज्ञा दीजिये तो माँ ने माँ के स्वभाव का ही परिचय देते हुए कहा- “सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी।परम सुभट रजनीचर भारी।”

हनुमानजी खुश हो गये कि चलो माँ ने मुझे छोटा पुत्र ही माना है।क्योंकि अभी अभी अजर अमर होने का बरदान दिया है फिर भी चिन्ता बनी हुयी है,इतनी चिन्ता तो माँ छोटे बेटे की ही करती है।हनुमानजी ने कहा--
“तिन्ह कर भय माता मोहिं नाहीं।जो तुम सुख मानहु मन माहीं।”

माँ ने सोचा इसे राक्षसों का भय नहीं है,पर उसकी सोच यह है कि यह बाटिका तो मोह रूपी रावण की बाटिका है।ज्ञान की बाटिका का फल तो ब्यक्ति को धन्य बनाता है,उसमें मोक्ष के फल लगते है।किन्तु क्या इस मोह की बाटिका का फल खाना उचित रहेगा?

हनुमानजी तो ऐसे भूखे हैं,जिन्होंने जन्म लेते ही सूर्य को फल समझकर मुख में रख लिया।हनुमानजी की इस लीला का संकेत यह है कि संसार की बाटिका में धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष का फल लगा हुआ है,और वह उन्हें तो चाहिए नहीं,वह दूर वाले उस फल के इच्छुक हैं,जो कि आकाश में प्रकाश के रूप में दिखाई दे रहा है,और उस फल तक छलाँग लगाने की सामर्थ्य भी उनमें है।यह हनुमानजी का एक रूप है।

संसार में अनेक ब्यक्ति तो मोह की बाटिका का ही फल खा रहे हैं।किन्तु हनुमानजी का अभिप्राय था कि अगर भक्ति देवी की कृपा हो जाय,तो मोह की बाटिका का भी फल खाया जा सकता है।ज्ञान में तो मोह का तिरस्कार है,पर भक्ति में मोह की बड़ी महिमा है।इसे युँ कहें कि भक्त भी भगवान को देखकर मोहित ही तो होता है।

जनकपुर  वासी स्त्रियाँ यही तो कहती हैं-- “कहहु सखी अस को तनुधारी।जेहिं न मोह यह रूप निहारी।”
हनुमानजी का तात्पर्य भी यही है कि भूख मिटाने का काम तो भक्ति का ही है,क्योंकि ज्ञानी-बिरागी तो कहेंगे कि संसार की वस्तुएँ नश्वर हैं।इनका फल ग्रहण करने का अर्थ है अपना विनाश।पर भक्ति में करुणा है।अतः हनुमानजी कहते हैं कि आप आदेश दें तो मै फल खा लूँ।शब्द कितना अच्छा चुना - “लागि देख सुन्दर फल रूखा।”

“फल बड़े सुन्दर हैं।”मोह की बाटिका के फल बड़े सुन्दर होते हैं।इन्हें देखकर लोगों का मन ललच जाता है।पर सुन्दरता फल का बहिरंग गुण है,सुन्दर फल भी अगर कड़ुवा हो तो आदमी थूके बिना मानेगा नहीं।अतः माँ ने कहा कि पुत्र!खाने से पूर्व “सुन्दर”को “मधुर” बना लो,तब तुम इसे ग्रहण करो।

और इसका उपाय भी बता दिया--
“रघुपति चरन हृदय धरि,तात मधुर फल खाहु।”
यानी मोह की बाटिका का फल जब तुम भगवान को अर्पित कर दोगे,तब यह मोह की बाटिका का फल न रहकर प्रभु का प्रसाद हो जायगा।और प्रसाद होते ही मधुर हो जायगा।हनुमानजी ने कहा-माँ कितनी वात्सल्यमयी हैं।

हनुमानजी ने फल खाने के साथ साथ बाग को उजाड़ दिया,राक्षसों को मारा तथा लंका को जला दिया।लौटने पर बंदरों ने पूछा कि आपने माँ से आज्ञा तो केवल फल खाने की ली थी,बाग उजाड़ने,राक्षसों को मारने तथा लंका को जलाने की आज्ञा तो ली नहीं थी,फिर आपने ए तीनों काम किसकी आज्ञा से किए?

हनुमानजी ने कहा कि मैंने आज्ञा तो केवल फल खाने की ही ली थी,पर शेष तीनों काम तो फल खाने के फल थे।इसका अभिप्राय यह है कि भक्ति देवी की कृपा का फल खाने के बाद भी अगर मोह की बाटिका न उजड़े,दुर्गुणों के राक्षसों का विनाश न हो और प्रबृत्ति की लंका न जले तो माँ की कृपा किस काम की?

वस्तुतः भक्ति की कृपा के फल का रसास्वादन करने के बाद ब्यक्ति के जीवन का मोह विनष्ट हो जाता है,दुर्गुण नष्ट हो जाते हैं तथा प्रबृत्ति की मोहमयी लंका भी जलकर नष्ट
हो जाती है।

“अकाल पड़ा,इसका अर्थ यही है कि भूख तो भक्ति के बिना नहीं मिटेगी।श्रीसीताजी आयीं।भौतिक जगत में इसका फल यह हुआ कि वर्षा हुयी और आध्यात्मिक अर्थ यह है कि साक्षात पराभक्ति का आगमन।भक्ति की उपलब्धि ब्यक्ति के प्रयत्न से नहीं होती।वे किसी साधना,तपस्या के फल से नहीं,अपितु अपनी सहज कृपा से आयीं। और जनकजी ने उन्हें पाया तो उनकी निष्कामता और बैराग्य का दूसरा पक्ष उनके सामने आया। 

सांसारिक ब्यक्ति शरीर से जन्म लेने वाले को पुत्र या पुत्री स्वीकार करता है,यह स्वाभाविक प्रबृत्ति है।पर यहाँ,सुनयनाजी के गर्भ से सीताजी का जन्म नहीं हुआ, और जन्म के मूल में पिता के रूप में जनकजी भी नहीं हैं,किन्तु जब उन्होंने इस दिब्य कन्या को देखा, तो उनके हृदय में वात्सल्य उमड़ पड़ा,और उन्होंने उन्हें पुत्री के रूप में स्वीकार कर,सुनयनाजी की गोद में दे दिया।ब्यावहारिक जगत में शरीर का नाताहै पर भक्ति का नाता शरीर का नहीं है।

महाराज दशरथ की शरीर के प्रति महत्व बुद्धि है,इसलिए भगवान से कहते हैं कि आप मेरे पुत्र बनिए,किन्तु जनकजी ने शरीर से संबंधित न होने के बाद भी सीताजी को पुत्री स्वीकार कर लिया तो इसका अर्थ यह है कि वे शरीर की भावना से ऊपर उठे हुये”बिदेह” हैं।भक्ति का मूलाधार ही भाव है।

अब देखिए!शरीर के नाते से पाने के लिए मनुजी को कितने लम्बे काल तक साधना करनी पड़ी,और एक जन्म लगाने के बाद,तब कहीं दूसरे जन्म में जाकर श्रीराम को पुत्र कहने का अवसर मिला।अतः शरीर वाले नाते की प्रक्रिया बड़ी लम्बी है।इसमें समय की,श्रम की, वस्तुओं की आवश्यकता हो सकती है।पर अगर कोई भाव से नाता मानना चाहे तो एक क्षण में मान ले।इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भावना यानी भक्ति का मार्ग सरल है।

ईश्वर कहता है कि तुम सकाम हो तो मुझे पुत्र बना लो,और यदि निष्काम हो तो मुझे पुत्री बना लो।मैं तो दोनों के लिए ही प्रस्तुत हूँ।पिता पुत्र का नाता सकामता का नाता है तथा पिता पुत्री का नाता निष्कामता का नाता है।रामायण में दोनों नातों का संकेत आपको मिलेगा।

रामचरितमानस में कौशल्याजी,कैकेयीजी,सुमित्राजी के जीवन में शरीर के माध्यम से प्रभु चार रूपों में आए।पर बन में भगवान राम ने शबरी को माँ कहा और उन्होंने भी प्रभु को पुत्र रूप में स्वीकार किया।यह तो विशुद्ध भाव का नाता है।

भगवान को श्रीदशरथजी ने पुत्र रूप में पाया,यह शरीर का नाता था,पर गीधराज ने पुत्र माना और भगवान ने उन्हें पिता स्वीकार किया,तो कितना सरल मार्ग हो गया।मानो एक गीध भी भगवान को पुत्र बना सकता है।एक दीन हीन भीलनी भी भगवान को पुत्र मानकर अपने को धन्य कर सकती है। अतः सीताजी का मिथिला में प्राकट्य भावराज्य का प्राकट्य है।भाव से एक  नाता महाराज जनक ने पाया।

भाव के नाते से एक पात्र यदि श्रीसीताजी हैं तो दूसरी द्रोपदी(महाभारत)हैं।सद्गुरुदेव श्री रामकिंकरजी ने एक लेख पढ़ा,जिसमें किसी महिला ने लिखा था कि आज की नारी को सीता नहीं अपितु द्रोपदी जैसी तेजस्विनी होने की आवश्यकता है ।

उन्होंने लिखा था कि नारी को सहनशील नहीं होना चाहिए।सीताजी को उन्होंने “भीरु”कहा था।उसमें अन्य और ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया था,जिसे दुहराना उचित नहीं हैँ।उनका अभिप्राय यह था कि दबी-दबी सी रहने वाली सीता का आदर्श नारी समाज के लिए ठीक नहीं है। द्रोपदी की जो तेजस्विता है,वही आज की नारी का आदर्श होना चाहिए।

इसमें कोई संदेह नहीं कि द्रोपदी की भी अपनी महानता है,पर श्रीसीताजी से उसकी तुलना किसी तरह से नहीं की जा सकती।श्री सीताजी साक्षात् महाशक्ति हैं,जगज्जननी हैं। 

यद्यपि द्रोपदी भी तेजोमयी हैं,भगवान कृष्ण उनसे अनुराग करते हैं,पर अंतर तो है ही।इसे सूत्र के रूप में यूँ कहा जा सकता है कि अगर द्रोपदी नर की पत्नी हैं,तो श्रीसीताजी नारायण की प्रिया हैं।और नर तथा नारायण में बहुत बड़ा अंतर है।उनके जन्म में भी बहुत महत्वपूर्ण अंतर है।

श्रीसीताजी ने पृथ्वी से जन्म लिया,और पृथ्वी का स्वभाव तो हमें पता ही है कि उनमें कितनी उदारता है,कितनी सहिष्णुता है तथा कितनी करुणा है।इसलिए श्रीसीताजी के जीवन में भी सहिष्णुता है।

इसे जो लोग “दब्बूपन” मानते हैं,तो उनके बिचार दर्शन के लिए भला क्या किया जा सकता है?गोस्वामीजी ने श्रीसीताजी के विषय में यही लिखा है--
“धरनि सुता धीरज धरेउ समय सुधरम बिचारि।”
अर्थात वे धरित्री की पुत्री हैं,इसलिए उन्होंने अत्यंत कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य धारण किया।पर ऐसा नहीं है कि वे तेजस्विनी नहीं हैं।तेजस्विता की पराकाष्ठा भी उनमें है।

आप देखिये कि,जो लंका में अकेले बन्दिनी हों,राक्षस राक्षसिनियों से घिरी हुयी हों,जगत बिजेता रावण जिनके समक्ष समस्त संसार के वैभवों को लेकर उपस्थित होकर जिन्हें प्रलोभन दे रहा हो,बिबाह करने के लिए आग्रह कर रहा हो,पर उसका जो उत्तर उन्होंने दिया,उसे सुनकर कौन कह सकता है कि, श्रीसीताजी तेजस्विनी नहीं हैं।रावण को फटकारते हुए उन्होंने कहा--
“सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा।कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।
सठ सूने हरि आनेसि मोहीं।अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।”
रावण को ‘सठ’कहने में उन्हें जरा भी भय नहीं है।वे कहती हैं कि तू निर्लज्ज है।ऐसी तेजस्विता सरल है क्या?।

तेजस्विता होने का अर्थ यह नहीं कि वे हमेशा तेजस्विता
प्रगट कर लोगों को जलाती रहें। द्रोपदी ने कभी कड़वी बात कह दी,तो तेजस्विता का मापदंड हमेशा कड़वे बोल बोलना ही नहीं लिया जा सकता।अब इसे दूसरे सूत्र के संदर्भ में देखें- द्रोपदी का जन्म भी यज्ञ से हुआ और श्रीसीताजी का जन्म भी यज्ञ से हुआ।

श्रीसीताजी के प्राकट्य के मूल में पृथ्वी हैं और द्रोपदी का प्रादुर्भाव यज्ञकुंड की अग्नि से अपने भाई धृष्टद्युम्न के साथ हुआ।पर यहाँ दृष्टि दूसरी है।एक ओर यदि जनकजी जैसे महा बैराग्यवान,ज्ञानी तथा निष्काम हैं,तो दूसरी ओर सकाम और संसारी द्रुपद हैं।और द्रुपद की कथा भी बड़ी बिचित्र है।

द्रुपद व द्रोणाचार्य दोनों गुरुकुल में साथ साथ पढ़ते थे।उनकी मित्रता इतनी प्रगाढ़ थी कि द्रुपद ने कहा मित्र मैं राजा बनूँगा तो आधा राज्य तुम्हें दे दूँगा।

समय बीतने पर द्रुपद राजा हो गये और द्रोणाचार्य गरीब बने रहे।बेटे अश्वत्थामा को आटे को घोलकर दूध बनाकर पिलाने की नौबत से दुखी द्रोणाचार्य अपने दोस्त द्रुपद के यहाँ गये।जब उन्हें अपनी गरीबी का हाल सुनाने के बाद,उनका गुरुकुल का बचन याद दिलाया,तो द्रुपद बोले कि बचपन की नासमझी की बातों को याद रखना मूर्खता है।कहो तो तुम्हें कुछ धन,मुद्रा,धेनु आदि दिलवा दूँ,पुरानी बातों को भूल जाओ।द्रोणाचार्य अपमान से तिलमिला उठे,और
कहा,मुझे तुम्हारी कोई वस्तु नहीं चाहिए।

आगे चलकर द्रोणाचार्य कौरवों और पांडवों के शिक्षक बने।शिष्यों ने शिक्षा पूरी करने के बाद गुरुदक्षिणा देनी चाही।द्रोणाचार्य ने कहा,तुम लोगों में से जो द्रुपद को बंदी बनाकर ले आयेगा,मैं समझूँगा कि वही मेरा योग्य शिष्य है।अर्जुन ने द्रुपद को बंदी बनाकर गुरु के समक्ष खड़ा कर दिया।द्रोणाचार्य ने कहा,द्रुपद मैं तुम्हें मार भी सकता हूँ,किन्तु ऐसा नहीं करूँगा,केवल तुम्हारा बचन पूरा कराऊँगा,और उन्होंने द्रुपद का आधा राज्य छीन लिया।

द्रुपद ने इस अपमान का बदला लेने के लिए यज्ञ किया।
अब जरा सोचिए,जनकजी और द्रुपद की भला क्या तुलना हो सकती है?जनकजी में महान संतुलन है,ज्ञान है,बैराग्य है,किन्तु द्रुपद तो हमारे सामने एक क्रोधी,प्रतिक्रियावादी तथा हिंसक स्वभाव वाले राजा के रूप में हमारे सामने आते हैं।

द्रुपद ने यज्ञ किया।यज्ञ के पीछे भावना थी कि मुझे ऐसा पुत्र मिले,जो द्रोणाचार्य का सिर काट सके।इस यज्ञ से धृष्टद्युम्न और द्रोपदी का जन्म होता है।आगे वर्णन आता है कि धृष्टद्युम्न ने द्रोणाचार्य से ही शस्त्र की शिक्षा पायी।और धृष्टद्युम्न ने महाभारत के युद्ध में जब द्रोणाचार्य शस्त्र छोड़कर नेत्र मूँदकर,ध्यान मग्न बैठे थे,तभी पिता की बात रखने के लिए द्रोणाचार्य का सिर काट लिया।इसके बाद अश्वत्थामा में भी बदला लेने की बृत्ति आई और युद्ध समाप्त होने के बाद उसने धृष्टद्युम्न का बध कर दिया।

किसी पत्रकार ने श्री किंकरजी से पूछा कि रामायण और महाभारत में क्या अन्तर है,तो उन्होंने जबाब दिया कि,”महाभारत माने”-जैसा होता है,और “रामायण माने”-जैसा होना चाहिए।महाभारत अर्थात क्रिया-प्रतिक्रिया का चक्र।

इस चक्र को अगर अनवरत रूप से बढ़ाते ही चला जाये,तो जीवन में एक महाविनाश की सृष्टि हो सकती है। यह महाभारत के विनाश से स्पष्ट है।

श्रीरामचरितमानस में श्रीसीताजी को कहा गया कि वे तो--
“अतिसय प्रिय करुणानिधान की।”

मातृ बृत्ति,करुणा से युक्त बृत्ति है,और श्रीसीताजी का जन्म किसी प्रतिक्रिया से नहीं हुआ है,किसी से बदला लेने के लिए नहीं हुआ है।उनका तो जन्म हुआ है,प्रभु के हृदय में जीव
के प्रति करुणा उत्पन्न करने के लिए।उनका पक्ष करुणा और प्रेम का पक्ष है।

लंका का युद्ध समाप्त होने के बाद,भगवान राम ने विभीषण से कहा,सीता को ले आइए।

विभीषणजी ने पालकी मँगाई,सीताजी स्नान व वस्त्र परिवर्तन के बाद पालकी में बैठ गयीं।जब वे वानर सेना के पास पहुँचीं,तो बानर ब्यग्र हो गये,उनके दर्शन के लिए,किन्तु
पालकी के ऊपर पर्दा पड़ा हुआ था।बानर,शिष्टाचार क्या जानें?सोचे पर्दा उठाकर दर्शन कर लें।किन्तु लिखा हुआ है कि जो राक्षस पालकी ढो रहे थे तथा रक्षा करने के लिए बेंत लेकर चल रहे थे,वे बेंत दिखाकर बन्दरों को पालकी के पास जाने से रोकने लगे।

जब प्रभु ने इस दृश्य को देखा,तो कहा मित्र विभीषण!--
“सीता सखा पयादें आनहु।” सीताजी को पालकी पर नहीं, पैदल ले आओ।श्रीसीताजी उतरीं।उनका दर्शन करके बन्दर धन्य हो गये।

यद्यपि सीताजी प्रारंभ में ही अस्वीकार कर सकतीं थीं,कि प्रियतम के पास मैं पैदल ही चलूँगी,पालकी पर नहीं।पर वे पालकी पर बैठकर आ गयीं।इसका अभिप्राय भी माँ की करुणा ही है।वस्तुतः माँ ने सोचा कि मैं यदि पैदल चलूँगी तो बंदरगण जो मेरे सुपुत्र हैं,उनकी अभिलाषा तो पूर्ण हो जायेगी,पर राक्षसगण भी तो मेरे पुत्र ही हैं।

और, प्रभु ने प्रतिज्ञा की है कि- “निशिचर हीन करौं महि”
तो जो बचे हुए मेरे राक्षस पुत्र है,उनकी रक्षा का उपाय यही है कि, उनसे भी सेवा लेकर, प्रभु से मैं कह दूँ कि”पहले वे जैसे भी रहे हों,पर आज तो वे मेरा भार ढोने वाले हैं,आज मेरे रक्षक हैं,अतः इन पर कृपा कीजिए।बस! यही माँ की करुणा है।और यही श्रीसीताजी का स्वरूप है।

कलयुग क्या है ?

कलयुग क्या है ? 

कलयुग का सीधा सा अर्थ है कलह। जहाँ भी कलह है वहां पर कलयुग है। जब भगवान श्री कृष्ण जी अपनी लीला करके अपने लोक में चले गए थे उसी समय से द्वापर युग खत्म हो गया था और कलयुग का आगमन हो गया है।

कलयुग कितने साल का है। हमारे शास्त्रों में बताया गया है की कलयुग 4,32,000 वर्ष तक रहेगा। जिसकी गणना इस प्रकार की गई है।

पुराण के मुताबिक मानव का एक वर्ष देवताओं के एक अहोरात्र यानी दिन-रात के बराबर है। जिसमें उत्तरायण दिन व दक्षिणायन रात मानी जाती है। दरअसल, एक सूर्य संक्रान्ति से दूसरी सूर्य संक्रान्ति की अवधि सौर मास कहलाती है। मानव गणना के ऐसे 12 सौर मासों का 1 सौर वर्ष ही देवताओं का एक अहोरात्र होता है। ऐसे ही 30 अहोरात्र, देवताओं के एक माह और 12 मास एक दिव्य वर्ष कहलाता है।

देवताओं के इन दिव्य वर्षो के आधार पर चार युगों की मानव सौर वर्षों में अवधि इस तरह है,

सतयुग 4800 (दिव्य वर्ष) 17,28,000 (सौर वर्ष)
त्रेतायुग 3600 (दिव्य वर्ष) 12,96,100 (सौर वर्ष)
द्वापरयुग 2400 (दिव्य वर्ष) 8,64,000 (सौर वर्ष)
कलियुग 1200 (दिव्य वर्ष) 4,32,000 (सौर वर्ष)

उस समय घोर कलयुग आएगा जिस समय माँ गंगा और गोवर्धन पर्वत लुप्त हो जायेंगे। क्योंकि इन दोनों को श्राप है। पढ़िए इस कलयुग में क्या-क्या घटित होगा।

 कलयुग के अवगुण और लक्षण,,,,

श्री तुलसीदासकृत रामचरतिमानस में इसका वर्णन आया है। काकभुशुण्डि जी गरुड़ जी को बता रहे हैं कलयुग के लक्षण और प्रभाव-

नर-नारी पापपरायण (पापों में लिप्त) रहेंगें॥ कलियुग के पापों ने सब धर्मों को ग्रस लिया, सद्ग्रंथ लुप्त हो गए, दम्भियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना कर-करके बहुत से पंथ प्रकट कर दिए॥ सभी लोग मोह के वश हो गए, शुभ कर्मों को लोभ ने हड़प लिया।

कलियुग में न वर्णधर्म रहता है, न चारों आश्रम रहते हैं। सब पुरुष-स्त्री वेद के विरोध में लगे रहते हैं। ब्राह्मण वेदों के बेचने वाले और राजा प्रजा को खा डालने वाले होते हैं। वेद की आज्ञा कोई नहीं मानता॥ जिसको जो अच्छा लग जाए, वही मार्ग है। जो डींग मारता है, वही पंडित है। जो मिथ्या आरंभ करता (आडंबर रचता) है और जो दंभ में रत है, उसी को सब कोई संत कहते हैं॥

जो (जिस किसी प्रकार से) दूसरे का धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान है। जो दंभ करता है, वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान कहा जाता है॥

जो आचारहीन है और वेदमार्ग को छोड़े हुए है, कलियुग में वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान् है। जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी है॥

जो अमंगल वेष और अमंगल भूषण धारण करते हैं और भक्ष्य-भक्ष्य (खाने योग्य और न खाने योग्य) सब कुछ खा लेते हैं वे ही योगी हैं, वे ही सिद्ध हैं और वे ही मनुष्य कलियुग में पूज्य हैं॥

जिनके आचरण दूसरों का अपकार (अहित) करने वाले हैं, उन्हीं का बड़ा गौरव होता है और वे ही सम्मान के योग्य होते हैं। जो मन, वचन और कर्म से लबार (झूठ बकने वाले) हैं, वे ही कलियुग में वक्ता माने जाते हैं॥

सभी मनुष्य स्त्रियों के विशेष वश में हैं और बाजीगर के बंदर की तरह (उनके नचाए) नाचते हैं। ब्राह्मणों को शूद्र ज्ञानोपदेश करते हैं और गले में जनेऊ डालकर कुत्सित दान लेते हैं॥

सभी पुरुष काम और लोभ में तत्पर और क्रोधी होते हैं। देवता, ब्राह्मण, वेद और संतों के विरोधी होते हैं। अभागिनी स्त्रियाँ गुणों के धाम सुंदर पति को छोड़कर पर पुरुष का सेवन करती हैं॥

सुहागिनी स्त्रियाँ तो आभूषणों से रहित होती हैं, पर विधवाओं के नित्य नए श्रृंगार होते हैं।

शिष्य और गुरु में बहरे और अंधे का सा हिसाब होता है। एक (शिष्य) गुरु के उपदेश को सुनता नहीं, एक (गुरु) देखता नहीं (उसे ज्ञानदृष्टि) प्राप्त नहीं है)॥

जो गुरु शिष्य का धन हरण करता है, पर शोक नहीं हरण करता, वह घोर नरक में पड़ता है। माता-पिता बालकों को बुलाकर वही धर्म सिखलाते हैं, जिससे पेट भरे॥

स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञान के सिवा दूसरी बात नहीं करते, पर वे लोभवश कौड़ियों (बहुत थोड़े लाभ) के लिए ब्राह्मण और गुरु की हत्या कर डालते हैं॥

शूद्र ब्राह्मणों से विवाद करते हैं (और कहते हैं) कि हम क्या तुमसे कुछ कम हैं? जो ब्रह्म को जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है। (ऐसा कहकर) वे उन्हें डाँटकर आँखें दिखलाते हैं॥

संत जन बताते हैं की यहाँ शुद्र का मतलब किसी जाति से नहीं बल्कि नीच आचरण करने वाले से है। और ब्राह्मण का अर्थ जो मन कर्म वचन से किसी का बुरा नही करता और जीव मात्र में परमात्मा का दर्शन करके उसकी(परमात्मा) भक्ति करता है।

जो पराई स्त्री में आसक्त, कपट करने में चतुर और मोह, द्रोह और ममता में लिपटे हुए हैं, वे ही मनुष्य अभेदवादी (ब्रह्म और जीव को एक बताने वाले) ज्ञानी हैं। मैंने उस कलियुग का यह चरित्र देखा॥

वे स्वयं तो नष्ट हुए ही रहते हैं, जो कहीं सन्मार्ग का प्रतिपालन करते हैं, उनको भी वे नष्ट कर देते हैं। जो तर्क करके वेद की निंदा करते हैं, वे लोग कल्प-कल्पभर एक-एक नरक में पड़े रहते हैं॥

तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि जो वर्ण में नीचे हैं, स्त्री के मरने पर अथवा घर की संपत्ति नष्ट हो जाने पर सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं॥

वे अपने को ब्राह्मणों से पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं। ब्राह्मण अपढ़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख और नीची जाति की व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वामी होते हैं॥

शूद्र नाना प्रकार के जप, तप और व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन (व्यास गद्दी) पर बैठकर पुराण कहते हैं। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। अपार अनीति का वर्णन नहीं किया जा सकता॥

कलियुग में सब लोग वर्णसंकर और मर्यादा से च्युत हो गए। वे पाप करते हैं और (उनके फलस्वरूप) दुःख, भय, रोग, शोक और (प्रिय वस्तु का) वियोग पाते हैं॥

वेद सम्मत तथा वैराग्य और ज्ञान से युक्त जो हरिभक्ति का मार्ग है, मोहवश मनुष्य उस पर नहीं चलते और अनेकों नए-नए पंथों की कल्पना करते हैं॥

संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। उनमें वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयों ने हर लिया। तपस्वी धनवान हो गए और गृहस्थ दरिद्र। हे तात! कलियुग की लीला कुछ कही नहीं जाती॥

कुलवती और सती स्त्री को पुरुष घर से निकाल देते हैं और अच्छी चाल को छोड़कर घर में दासी को ला रखते हैं। पुत्र अपने माता-पिता को तभी तक मानते हैं, जब तक स्त्री का मुँह नहीं दिखाई पड़ता॥

जब से ससुराल प्यारी लगने लगी, तब से कुटुम्बी शत्रु रूप हो गए। राजा लोग पाप परायण हो गए, उनमें धर्म नहीं रहा। वे प्रजा को नित्य ही (बिना अपराध) दंड देकर उसकी विडंबना (दुर्दशा) किया करते हैं॥

धनी लोग मलिन (नीच जाति के) होने पर भी कुलीन माने जाते हैं। द्विज का चिह्न जनेऊ मात्र रह गया और नंगे बदन रहना तपस्वी का। जो वेदों और पुराणों को नहीं मानते, कलियुग में वे ही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं॥

कवियों के तो झुंड हो गए, पर दुनिया में उदार (कवियों का आश्रयदाता) सुनाई नहीं पड़ता। गुण में दोष लगाने वाले बहुत हैं, पर गुणी कोई भी नहीं। कलियुग में बार-बार अकाल पड़ते हैं। अन्न के बिना सब लोग दुःखी होकर मरते हैं॥

कलियुग में कपट, हठ (दुराग्रह), दम्भ, द्वेष, पाखंड, मान, मोह और काम आदि (अर्थात् काम, क्रोध और लोभ) और मद ब्रह्माण्डभर में व्याप्त हो गए (छा गए)॥

मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान आदि धर्म तामसी भाव से करने लगे। देवता (इंद्र) पृथ्वी पर जल नहीं बरसाते और बोया हुआ अन्न उगता नहीं॥

स्त्रियों के बाल ही भूषण हैं (उनके शरीर पर कोई आभूषण नहीं रह गया) और उनको भूख बहुत लगती है (अर्थात् वे सदा अतृप्त ही रहती हैं)। वे धनहीन और बहुत प्रकार की ममता होने के कारण दुःखी रहती हैं। वे मूर्ख सुख चाहती हैं, पर धर्म में उनका प्रेम नहीं है। बुद्धि थोड़ी है और कठोर है, उनमें कोमलता नहीं है॥

मनुष्य रोगों से पीड़ित हैं, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्ष का थोड़ा सा जीवन है, परंतु घमंड ऐसा है मानो कल्पांत (प्रलय) होने पर भी उनका नाश नहीं होगा॥

कलिकाल ने मनुष्य को बेहाल (अस्त-व्यस्त) कर डाला। कोई बहिन-बेटी का भी विचार नहीं करता। (लोगों में) न संतोष है, न विवेक है और न शीतलता है। जाति, कुजाति सभी लोग भीख माँगने वाले हो गए॥

ईर्षा (डाह), कडुवे वचन और लालच भरपूर हो रहे हैं, समता चली गई। सब लोग वियोग और विशेष शोक से मरे पड़े हैं। वर्णाश्रम धर्म के आचरण नष्ट हो गए॥

इंद्रियों का दमन, दान, दया और समझदारी किसी में नहीं रही। मूर्खता और दूसरों को ठगना, यह बहुत अधिक बढ़ गया। स्त्री-पुरुष सभी शरीर के ही पालन-पोषण में लगे रहते हैं। जो पराई निंदा करने वाले हैं, जगत् में वे ही फैले हैं॥  

कलिकाल पाप और अवगुणों का घर है, किंतु कलियुग में एक गुण भी बड़ा है कि उसमें बिना ही परिश्रम भवबंधन से छुटकारा मिल जाता है॥ सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार। गुनउ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार॥

कलियुग केवल नाम अधारा , सुमिर सुमिर नर उतरहि पारा : कलयुग में केवल भगवान का नाम ही भवसागर से पार उतरने का साधन है केवल भगवान का नाम सुमिरन से इस भवसागर से पार पाया जा सकता है।

कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग। जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग॥ सत्ययुग, त्रेता और द्वापर में जो गति पूजा, यज्ञ और योग से प्राप्त होती है, वही गति कलियुग में लोग केवल भगवान्‌ के नाम से पा जाते हैं॥

सत्ययुग में सब योगी और विज्ञानी होते हैं। हरि का ध्यान करके सब प्राणी भवसागर से तर जाते हैं। त्रेता में मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं और सब कर्मों को प्रभु को समर्पण करके भवसागर से पार हो जाते हैं॥ द्वापर में श्री रघुनाथजी के चरणों की पूजा करके मनुष्य संसार से तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है और कलियुग में तो केवल श्री हरि की गुणगाथाओं का गान करने से ही मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं॥ कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा॥

कलियुग में न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्री रामजी का गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्री रामजी को भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहों को गाता है, वही भवसागर से तर जाता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं।

 कलियुग का एक पवित्र प्रताप (महिमा) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर (मानसिक) पाप नहीं होते॥

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास। गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास॥

यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुग के समान दूसरा युग नहीं है, (क्योंकि) इस युग में श्री रामजी के निर्मल गुणसमूहों को गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार (रूपी समुद्र) से तर जाता है॥

शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विज्ञान और मन का प्रसन्न होना, इसे सत्ययुग का प्रभाव जानें॥

सत्त्वगुण अधिक हो, कुछ रजोगुण हो, कर्मों में प्रीति हो, सब प्रकार से सुख हो, यह त्रेता का धर्म है।

रजोगुण बहुत हो, सत्त्वगुण बहुत ही थोड़ा हो, कुछ तमोगुण हो, मन में हर्ष और भय हो, यह द्वापर का धर्म है॥

तमोगुण बहुत हो, रजोगुण थोड़ा हो, चारों ओर वैर-विरोध हो, यह कलियुग का प्रभाव है।

जिसका श्री रघुनाथजी के चरणों में अत्यंत प्रेम है, उसको कालधर्म (युगधर्म) नहीं व्यापते।

एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥ 
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥

तुलसीदासजी कहते हैं- इस कलिकाल में योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है। बस, श्री रामजी का ही स्मरण करना, श्री रामजी का ही गुण गाना और निरंतर श्री रामजी के ही गुणसमूहों को सुनना चाहिए॥

नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। कलियुग में राम का नाम कल्पतरु (मन चाहा पदार्थ देने वाला) और कल्याण का निवास (मुक्ति का घर) है।

और इसके बाद कह दिया केवल कलियुग की ही बात नहीं है, चारों युगों में, तीनों काल में और तीनों लोकों में नाम को जपकर जीव शोकरहित हुए हैं।

राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥ कलियुग में यह राम नाम मनोवांछित फल देने वाला है, परलोक का परम हितैषी और इस लोक का माता-पिता है (अर्थात परलोक में भगवान का परमधाम देता है और इस लोक में माता-पिता के समान सब प्रकार से पालन और रक्षण करता है।)

कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है। नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥

भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥

अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है।

इसलिए सब चिंता, भय छोड़कर, मन क्रम और वाणी से भगवान का नाम जपिए और सत्कर्म कीजिये।