कभी रात के अंतिम पहर में अचानक नींद खुली है आपकी?
कमरे में अँधेरा था। सब कुछ शांत। लेकिन उस शांति के भीतर एक अजीब हलचल थी। जैसे कोई अदृश्य चीज़ आपको देख रही हो। कोई आवाज़ नहीं थी, फिर भी भीतर बहुत कुछ बोल रहा था।
उसी क्षण यदि कोई आपसे पूछता “इस समय तुम कौन हो?”
तो शायद पहली बार आपके पास अपना नाम, काम, संबंध या पहचान से बड़ा कोई उत्तर नहीं होता।
मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि वह स्वयं को वही मान बैठता है जो दुनिया उसे पुकारती है। जबकि सच यह है मनुष्य वह नहीं है जिसे लोग जानते हैं; मनुष्य वह है जिसे वह स्वयं भी अब तक नहीं जान पाया।
और ध्यान उसी अज्ञात व्यक्ति से मिलने की कला है।
लेकिन ध्यान क्या है?
लोगों ने इसे बैठने की मुद्रा बना दिया।
किसी ने इसे आँखें बंद करने तक सीमित कर दिया।
किसी ने इसे शांति पाने की तकनीक कहा।
किसी ने इसे आध्यात्मिक फैशन बना दिया।
परंतु ध्यान इनमें से कुछ भी नहीं।
ध्यान न तो कोई अभ्यास है, न विचारों से युद्ध।
ध्यान कोई उपलब्धि नहीं।
ध्यान कोई चमत्कार भी नहीं।
ध्यान वह क्षण है जब भीतर बैठा “देखने वाला” पहली बार स्वयं को देख लेता है।
इसे समझने के लिए एक बिल्कुल अलग उदाहरण समझिए।
कल्पना कीजिए कि आपके भीतर एक विशाल शहर है।
उस शहर में लाखों सड़कें हैं।
हर सड़क पर भीड़ दौड़ रही है।
कहीं स्मृतियाँ चल रही हैं।
कहीं भविष्य की आशंकाएँ।
कहीं इच्छाओं के बाज़ार खुले हैं।
कहीं पछतावों की अदालतें लगी हैं।
कहीं अधूरी बातों के शोर हैं।
कहीं पुराने घाव अब भी साँस ले रहे हैं।
और इन सबके बीच एक व्यक्ति लगातार भाग रहा है।
वह कभी सफलता के पीछे दौड़ता है।
कभी प्रेम के पीछे।
कभी सम्मान के पीछे।
कभी सुरक्षा के पीछे।
वह इतना दौड़ चुका है कि अब उसे यह भी याद नहीं कि दौड़ शुरू कहाँ से हुई थी।
अब ध्यान को समझिए।
ध्यान उस भागते हुए व्यक्ति को रोकना नहीं है।
ध्यान तो उस पूरे शहर के ऊपर उठ जाना है…
इतना ऊपर कि पहली बार आपको पूरा नक्शा दिखाई देने लगे।
आप अचानक देख लेते हैं
जिस दुःख को आप “अपना स्वभाव” समझते थे, वह केवल एक पुरानी आदत थी।
जिस भय को आप “सच्चाई” मान बैठे थे, वह केवल स्मृति की छाया थी।
जिस क्रोध को आप “ताकत” समझते थे, वह भीतर छिपी असुरक्षा थी।
और जिस व्यक्ति को आप “मैं” कहते रहे… वह वास्तव में विचारों का अस्थायी संग्रह था।
यहीं से मनुष्य की दूसरी यात्रा शुरू होती है।
दुनिया में दो प्रकार के लोग होते हैं।
पहले वे जो जीवन भर अपने विचारों के भीतर रहते हैं।
दूसरे वे जो एक दिन अपने विचारों को अपने सामने बैठे हुए देख लेते हैं।
पहले प्रकार के लोग हमेशा प्रतिक्रिया में जीते हैं।
दूसरे प्रकार के लोग पहली बार सचेत होकर जीना शुरू करते हैं।
ध्यान आपको दूसरा मनुष्य बनाता है।
लेकिन यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म बात है जिसे बहुत कम लोग समझते हैं।
ध्यान का उद्देश्य मन को शांत करना नहीं है।
क्योंकि मन का स्वभाव ही गति है।
जैसे नदी का स्वभाव बहना है।
हवा का स्वभाव चलना है।
आग का स्वभाव जलना है।
यदि आप मन को रोकने की कोशिश करेंगे तो संघर्ष पैदा होगा।
ध्यान संघर्ष समाप्त करता है।
ध्यान मन को रोकता नहीं, उसे पारदर्शी बना देता है।
जैसे साफ़ झील में तल दिखाई देने लगता है, वैसे ही ध्यान में चेतना स्वयं को देखने लगती है।
और तब पहली बार मनुष्य को पता चलता है कि उसके भीतर केवल विचार नहीं हैं… वहाँ एक मौन भी है।
वह मौन खाली नहीं होता।
वह जीवित होता है।
उसी मौन में आपकी वास्तविक बुद्धि छिपी होती है।
दुनिया ने आपको जानकारी दी है।
ध्यान आपको प्रत्यक्ष अनुभव देता है।
जानकारी बाहर से आती है।
अनुभव भीतर से जन्म लेता है।
इसीलिए अत्यधिक शिक्षित व्यक्ति भी भीतर से टूट सकता है, और एक साधारण व्यक्ति भी भीतर से अत्यंत प्रकाशित हो सकता है।
क्योंकि ज्ञान और जागरूकता दो अलग चीज़ें हैं।
ज्ञान स्मृति से आता है।
जागरूकता उपस्थिति से।
ध्यान उपस्थिति की पराकाष्ठा है।
अब प्रश्न उठता है
यदि ध्यान इतना गहरा है तो लोग उससे डरते क्यों हैं?
क्योंकि ध्यान आपके सारे नकली चेहरों को धीरे-धीरे गिराने लगता है।
आपने वर्षों से अपने भीतर अनेक पात्र बना रखे हैं।
एक चेहरा दुनिया के लिए।
एक परिवार के लिए।
एक संबंधों के लिए।
एक अकेलेपन के लिए।
लेकिन ध्यान के सामने अभिनय टिकता नहीं।
वह आपको निर्वस्त्र नहीं करता, बल्कि वास्तविक करता है।
और वास्तविक होना संसार का सबसे कठिन कार्य है।
क्योंकि दुनिया आपको सफल देखना चाहती है, सचेत नहीं।
ध्यान धीरे-धीरे आपके भीतर की मशीनरी को उजागर करता है।
आप देखना शुरू करते हैं कि अधिकांश लोग जी नहीं रहे केवल प्रोग्राम होकर प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
कोई प्रशंसा मिलते ही प्रसन्न हो जाता है।
कोई आलोचना मिलते ही टूट जाता है।
कोई तुलना से जलता है।
कोई स्मृतियों में जीता है।
कोई भविष्य के डर में।
बहुत कम लोग वर्तमान में होते हैं।
ध्यान वर्तमान में लौट आने की कला नहीं वर्तमान में विलीन हो जाने की अवस्था है।
और यहाँ सबसे अद्भुत बात आती है।
ध्यान आपको दुनिया से दूर नहीं ले जाता।
ध्यान पहली बार आपको दुनिया के योग्य बनाता है।
क्योंकि तब आप संबंधों में स्वामित्व नहीं, उपस्थिति लाते हैं।
प्रेम में भय नहीं, स्वतंत्रता लाते हैं।
कार्य में तनाव नहीं, स्पष्टता लाते हैं।
मौन में खालीपन नहीं, विस्तार अनुभव करते हैं।
धीरे-धीरे आपको समझ आने लगता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा दुःख यह नहीं कि उसके पास कम है।
उसका सबसे बड़ा दुःख यह है कि वह स्वयं से कभी मिला ही नहीं।
उसने सबको समय दिया
दुनिया को, महत्वाकांक्षाओं को, स्क्रीन को, शोर को, संबंधों को
पर स्वयं के साथ बैठने का साहस नहीं किया।
ध्यान वही साहस है।
और शायद इसी कारण ध्यान करने वाला व्यक्ति बदलता नहीं दिखाई देता…
लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसी गहराई उतर आती है जिसे शब्दों में समझाया नहीं जा सकता।
वह कम बोलता है, पर अधिक सुनता है।
कम भागता है, पर अधिक देखता है।
कम साबित करता है, पर अधिक समझता है।
क्योंकि उसने जीवन को बाहर से नहीं, भीतर से छूना शुरू कर दिया होता है।
एक दिन ध्यान में बैठा मनुष्य अचानक समझता है
वह जीवन भर उत्तर खोजता रहा, जबकि समस्या प्रश्नों की थी ही नहीं।
समस्या यह थी कि प्रश्न पूछने वाला स्वयं धुंधला था।
जैसे ही देखने वाला स्पष्ट होता है, जीवन रहस्य नहीं रह जाता।
तब अस्तित्व बोझ नहीं लगता।
समय दुश्मन नहीं लगता।
अकेलापन खाली नहीं लगता।
और मृत्यु?
मृत्यु भी भय नहीं लगती।
क्योंकि जिसने स्वयं को विचारों से अलग अनुभव कर लिया…
वह जान जाता है कि बदलने वाली हर चीज़ “मैं” नहीं हो सकती।
शरीर बदलता है।
भावनाएँ बदलती हैं।
संबंध बदलते हैं।
समय बदलता है।
पर जो इन सबको बदलते हुए देख रहा है…
उसके भीतर कुछ ऐसा है जो हमेशा से शांत है।
ध्यान उसी शाश्वत दर्शक से परिचय है।
और शायद मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी यही नहीं कि वह दुखी है
बल्कि यह है कि उसके भीतर अनंत आकाश होते हुए भी वह स्वयं को एक छोटे से विचार में कैद किए बैठा है।
ध्यान उस कैद का ताला खोल देता है।
उसके बाद जीवन समाप्त नहीं होता।
वहीं से पहली बार सचमुच शुरू होता है।
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