1. शांति का परम स्वरूप
आंतरिक शांति से बढ़कर संसार में कोई दूसरा नाद (ध्वनि या कंपन) नहीं है। यह शांति किसी बाहरी प्रयास से नहीं, बल्कि एक विशेष अवस्था में स्वतः स्फूर्त होती है।
2. द्वैत का अंत और शांति का उदय
स्मरण रहे कि जब समस्त द्वैत नाद (अनुकूल-प्रतिकूल, सुख-दुःख, अपना-पराया) समाप्त हो जाते हैं, तभी वास्तविक आंतरिक शांति प्रकट होती है। जब तक भीतर द्वंद्व का कोलाहल है, तब तक शांति का अनुभव असंभव है।
3. मन: सबसे बड़ा अवरोधक
जैसे ही साधक उस परम शांति के करीब पहुँचता है, मन अपना खेल शुरू कर देता है। शांति में डूबने और उसमें रमने के बजाय, मन पुनः किसी अन्य 'नाद' या कल्पना की रचना करने लगता है। यही साधक के मार्ग का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष अवरोधक है।
4. इंद्रियों का बंधन और बोध
मन की इस चंचलता का मुख्य कारण चित्त का पंच कर्म-इंद्रियों के साथ गहरा जुड़ाव है।
• अवरोध: जब तक चित्त कर्म-इंद्रियों के माध्यम से बाहरी जगत में उलझा रहेगा, तब तक अंतर्मुखी होना संभव नहीं है।
सार: वास्तविक ज्ञान और बोध का उदय तभी होता है जब मन बाहरी विषयों से विमुख होकर स्वयं के शांत केंद्र में ठहरना सीख जाता है।
• समाधान: जब यह जुड़ाव टूटता है, तभी ज्ञान-इंद्रियाँ पूर्णतः सक्रिय और जागृत हो पाती हैं।
जो आगे जाकर राजयोग, भक्ति योग ज्ञान योग हठ योग जैसी अवस्था स्वत घटित होती चली जाएगी
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