‘धर्म’ की पारिभाषिकता और ‘Religion’ की भ्रान्ति : एक शास्त्रीय एवं दार्शनिक विवेचन
वर्तमान में प्रचलित ‘धर्म’ शब्द के संदर्भ में एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और विचारणीय प्रश्न उठता है— “हम जिन्हें ‘धर्म’ कह रहे हैं, उनके अपने-अपने ग्रन्थों में ‘धर्म’ की क्या परिभाषा दी गई है?”
यह प्रश्न केवल भाषाई नहीं, अपितु गम्भीर दार्शनिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक विमर्श का विषय है।
१. वैदिक वाङ्मय में ‘धर्म’ की पारिभाषिकता
वैदिक वाङ्मय में ‘धर्म’ कोई सामान्य या लौकिक शब्द नहीं है, अपितु एक पारिभाषिक (technical) संज्ञा है, जिसकी परिभाषा विभिन्न शास्त्रों में अत्यन्त सूक्ष्म और सुसंगत रूप से की गई है।
उदाहरणार्थ—
मीमांसा दर्शन में—
“चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः”
अर्थात् वेदविहित प्रेरणा (चोदना) से जो कर्तव्य निर्धारित होता है, वही धर्म है।
मनुस्मृति में—
“धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥”
यहाँ धर्म को नैतिक गुणों के समुच्चय के रूप में परिभाषित किया गया है।
महाभारत में—
“अहिंसा परमो धर्मः”
अर्थात् अहिंसा को धर्म का सर्वोच्च रूप माना गया है।
उपनिषदों में धर्म को ‘ऋत’ (cosmic order) और ‘सत्य’ के साथ जोड़ा गया है—
जो समस्त सृष्टि को धारण करता है, वही धर्म है।
अतः स्पष्ट है कि वैदिक परम्परा में ‘धर्म’ का अर्थ केवल पूजा-पद्धति या सम्प्रदाय नहीं, बल्कि नैतिकता, कर्तव्य, सत्य और सार्वभौमिक व्यवस्था (cosmic order) से है।
२. ‘Religion’ और ‘धर्म’ : एक वैचारिक असमानता
आधुनिक काल में अंग्रेज़ी शब्द “religion” का हिन्दी अनुवाद प्रायः ‘धर्म’ के रूप में किया जाता है। यही वह बिन्दु है जहाँ से मूल भ्रान्ति आरम्भ होती है।
‘Religion’ सामान्यतः निम्न तत्त्वों को निरूपित करता है—
* किसी विशिष्ट पैग़म्बर या धर्म-प्रवर्तक में आस्था
* एक निश्चित पवित्र ग्रन्थ
* विशेष पूजा-पद्धति या अनुष्ठान
* एक संगठित समुदाय (community identity)
इसके विपरीत, ‘धर्म’—
* किसी एक व्यक्ति या ग्रन्थ पर आश्रित नहीं
* सार्वभौमिक नैतिक नियमों का द्योतक
* आचरण और कर्तव्य का मापदण्ड
* समस्त मानवता (यहाँ तक कि समस्त सृष्टि) पर लागू
अतः केवल शब्द-साम्य के आधार पर ‘religion’ को ‘धर्म’ कहना न केवल भाषिक भूल है, बल्कि दार्शनिक विकृति भी है।
३. परिणाम : अर्थ-भ्रंश और नैतिक भ्रम
जब ‘religion’ के संकीर्ण अर्थ को ‘धर्म’ के व्यापक और शास्त्रीय अर्थ पर आरोपित कर दिया जाता है, तब अनेक प्रकार की भ्रान्तियाँ उत्पन्न होती हैं—
* ‘धर्म’ को केवल सम्प्रदाय या मज़हब समझ लिया जाता है।
* नैतिकता और आचरण की कसौटी गौण हो जाती है
* कर्म का मूल्यांकन उसके औचित्य से नहीं, बल्कि परम्परा से होने लगता है।
फलतः ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, जहाँ—
हिंसा भी ‘धर्म’ प्रतीत होने लगती है और अहिंसा भी।
४. उदाहरण : पशु-बलि और अहिंसा का द्वन्द्व
कुछ परम्पराओं में विशेष अवसरों पर पशु-बलि या पशु-वध को ‘धर्म’ माना जाता है। यहाँ ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग उसके प्रचलित (conventional) अर्थ में हो रहा है, न कि शास्त्रीय पारिभाषिक अर्थ में।
इसके विपरीत—
* वैदिक परम्परा (विशेषतः औपनिषदिक एवं गीता-प्रभावित)
* जैन दर्शन
* बौद्ध दर्शन
इन सभी में अहिंसा को मूल सिद्धान्त माना गया है।
यहाँ एक दार्शनिक प्रश्न उत्पन्न होता है— क्या परम्परा-आधारित कोई भी कर्म, चाहे वह संवेदनहीन या अमानवीय क्यों न प्रतीत हो, केवल इसलिए ‘धर्म’ कहा जा सकता है क्योंकि वह किसी मत में स्वीकृत है?
५. ‘धर्म’ की कसौटी : उचित और अनुचित
इस सन्दर्भ में आवश्यक है कि ‘धर्म’ को केवल नाम या परम्परा से नहीं, बल्कि तत्त्वतः (essentially) समझा जाए।
शास्त्रीय दृष्टि से—
* जो सुकृत्य है (ethical, righteous)
* जो नैतिक है
* जो समष्टि-हितकारी है
* जो सत्य और अहिंसा पर आधारित है
वही ‘धर्म’ है।
और—
* जो कुकृत्य है
* जो अनैतिक है
* जो अनुचित या हानिकारक है
वही ‘अधर्म’ है।
यह दृष्टिकोण केवल शास्त्रीय ही नहीं, बल्कि सार्वभौमिक नैतिक दर्शन (universal ethics) से भी संगत है।
६. गीता का दृष्टिकोण : स्वधर्म और लोकसंग्रह
श्रीमद्भगवद्गीता में ‘धर्म’ को और भी सूक्ष्म रूप से प्रस्तुत किया गया है—
* “स्वधर्मे निधनं श्रेयः” — अपने कर्तव्य का पालन ही श्रेष्ठ है।
* “लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि” — समाज के कल्याण हेतु कर्म करना ही धर्म है।
यहाँ धर्म का सम्बन्ध केवल व्यक्तिगत मोक्ष से नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व (social responsibility) से भी है।
७. निष्कर्ष : धर्म का पुनर्स्थापन
अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि—
* ‘धर्म’ को ‘religion’ का पर्याय मानना एक गंभीर बौद्धिक त्रुटि है।
* ‘धर्म’ का वास्तविक स्वरूप नैतिकता, कर्तव्य, सत्य और कल्याण में निहित है
* किसी भी कर्म को ‘धर्म’ कहने से पूर्व उसे उचित-अनुचित की कसौटी पर परखना अनिवार्य है।
यही ‘धर्म’ की शास्त्रीय परिभाषा है—
और जो इसके विपरीत है, वह ‘अधर्म’ है, चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारा जाए।
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