"रिश्तों में अप्रासंगिक होते लोग: साथ रहते हुए भी अनुपस्थित"
हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं है कि लोग अकेले हो गए हैं। उससे भी अधिक दुखद यह है कि लोग रिश्तों में रहते हुए भी एक-दूसरे के लिए अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। घर अब भी हैं, बातचीत अब भी होती है, साथ की तस्वीरें अब भी खिंचती हैं, लेकिन धीरे-धीरे कई संबंध भीतर से खाली हो चुके हैं। उनमें उपस्थिति है, पर सहभागिता नहीं; निकटता है, पर आत्मीयता नहीं।
कुछ स्त्रियाँ और पुरुष जीवन में ऐसे मोड़ पर पहुंच जाते हैं जहां वे एक-दूसरे की ज़रूरत तो बने रहते हैं, लेकिन महत्व नहीं। वे दिनचर्या का हिस्सा होते हैं, जीवन का नहीं। उनका होना उतना ही सामान्य मान लिया जाता है जितना साँसों का बहना जब तक कोई तेज़ धड़कन न महसूस करे, या कोई सांस अटक न जाए, उन्हें किसी की ध्यान नहीं जाता।
रिश्तों की यह अप्रासंगिकता धीरे-धीेरे जमा होती चुप्पियों, अधूरी सुनवाई, लगातार टाले गए संवादों और भीतर दबे अपमानों से बनती है। एक समय था जब लोग एक-दूसरे को पढ़ने की कोशिश करते थे चेहरे देखकर थकान समझ लेते थे, आवाज़ से बेचैनी पहचान लेते थे। अब बहुत कुछ कहा जाता है, पर सुना कम जाता है। हर व्यक्ति अपनी व्यस्तताओं, असुरक्षाओं और निजी महत्वाकांक्षाओं में इतना घिर चुका है कि सामने वाले का भावनात्मक अस्तित्व धीरे-धीरे धुंधला पड़ने लगता है।
किसी संबंध में एक व्यक्ति लगातार प्रयास करता रहता है, दिल को बचाने की कोशिश में, जबकि दूसरा केवल मौजूद रहता है सिर्फ सुविधा निभाता। एक संवाद चाहता है, एक समझने की कोशिश करता है, तो दूसरा शांति के नाम पर चुप्पी अपनाता है। धीरे-धीरे प्रेम एक श्रम बन जाता है, अपनापन एकतरफ़ा जिम्मेदारी। और तब, जो कभी सहज था, वह बोझ बन जाता है।"
बहुत-सी स्त्रियाँ वर्षों तक घरों में अपनी इच्छाओं को स्थगित करके संबंधों को जीवित रखती हैं। वे टूटते हुए संवादों को जोड़ती हैं, रूठे हुए मनों को संभालती हैं, सबकी भावनाओं का भार उठाती हैं। लेकिन एक दिन उन्हें महसूस होता है कि वे केवल व्यवस्था का हिस्सा बनकर रह गई हैं उनकी थकान दिखाई नहीं देती, उनकी चुप्पी सुनी नहीं जाती, उनके सपनों का कोई इतिहास नहीं रखा जाता। वे उपस्थित रहती हैं, लेकिन उन्हें महसूस नहीं किया जाता।
दूसरी ओर कई पुरुष भी भीतर से गहरी अप्रासंगिकता का अनुभव करते हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे केवल मजबूत रहें, कमाएँ, निर्णय लें, और भावनाओं को नियंत्रित रखें। उनकी संवेदनाएँ अक्सर मज़ाक बना दी जाती हैं। उन्हें धीरे-धीरे यह सिखा दिया जाता है कि कमजोरी दिखाना हार है। परिणाम यह होता है कि वे अपने ही संबंधों में भावनात्मक रूप से निर्वासित हो जाते हैं। वे बोलना बंद कर देते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कोई सचमुच सुनना नहीं चाहता।
रिश्तों में अप्रासंगिकता का सबसे खतरनाक रूप वह है जिसमें दोनों लोग साथ रहते हुए भी एक-दूसरे की आंतरिक दुनिया से बाहर हो जाते हैं। वे एक-दूसरे की आदत बन जाते हैं, अनुभव नहीं। उनके बीच आवश्यक बातें बचती हैं खर्च, ज़िम्मेदारियाँ, दिनचर्या लेकिन वे बातें मर जाती हैं जिनसे आत्माएँ जुड़ती हैं। कोई यह नहीं पूछता कि तुम भीतर से कैसे हो। कोई यह नहीं जानना चाहता कि तुम्हारे डर क्या हैं, तुम्हारी अधूरी इच्छाएँ क्या हैं, तुम्हारे भीतर कौन-सी चुप्पी हर रात रोती है।
धीरे-धीरे संबंध प्रदर्शन में बदल जाते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखाई देता है, भीतर बहुत कुछ खत्म हो चुका होता है। लोग साथ बैठकर भी अलग-अलग दुनियाओं में खोए रहते हैं। स्पर्श में गर्माहट कम हो जाती है, शब्दों में धैर्य घट जाता है, और आंखों में वह ठहराव नहीं बचता जिसमें कभी अपनापन दिखाई देता था।
इस समय की एक बड़ी विडंबना यह भी है कि लोग प्रेम से अधिक प्रमाण चाहते हैं। हर भावना को साबित करना पड़ता है। भरोसा कम हुआ है, निगरानी बढ़ी है। संवाद की जगह अनुमान ने ले ली है। लोग एक-दूसरे को समझने से पहले परखने लगते हैं। संबंध धीरे-धीरे साझेदारी से अधिक मानसिक संघर्ष बन जाते हैं।
फिर भी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है।
अब भी ऐसे लोग हैं जो रिश्तों को केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं मानते, बल्कि दो मनुष्यों की साझा यात्रा समझते हैं। अब भी कुछ स्त्रियाँ और पुरुष ऐसे हैं जो सुनने की कला बचाए हुए हैं। जो बहस से पहले समझना चाहते हैं। जो सामने वाले की चुप्पी में छिपी थकान पहचान लेते हैं। जो यह जानते हैं कि किसी व्यक्ति को प्रेम देना केवल उसके अच्छे दिनों में साथ रहना नहीं, बल्कि उसके भीतर टूट रही चीज़ों को भी गंभीरता से देखना है।
रिश्ते शब्दों से कम, संवेदनाओं से अधिक बचते हैं। किसी को महत्व देना बड़े उपहारों से नहीं, छोटी उपस्थितियों से साबित होता है समय देकर, बिना टोके सुनकर, थके हुए चेहरे को पहचानकर, और यह याद रखकर कि सामने वाला व्यक्ति कोई भूमिका नहीं, एक पूरा मनुष्य है।
शायद दुनिया में सबसे गहरी हिंसा वही है जब किसी को धीरे-धीरे यह महसूस करा दिया जाए कि उसके होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। और शायद सबसे बड़ा प्रेम यह है कि किसी व्यक्ति को यह एहसास दिया जाए कि वह देखा जा रहा है, सुना जा रहा है, समझा जा रहा है।
रिश्तों को बचाने के लिए हमेशा बड़े समाधान नहीं चाहिए होते। कई बार केवल इतना काफी होता है कि हम अपने सबसे करीब के व्यक्ति को फिर से मनुष्य की तरह देखना शुरू करें एक ऐसी आत्मा की तरह जो प्रेम, सम्मान, ध्यान और स्वीकृति चाहती है।
कोई भी व्यक्ति अचानक अप्रासंगिक नहीं होता। उसे धीरे-धीरे अनदेखा किया जाता है। और जो लोग अनदेखा होते-होते चुप हो जाते हैं, वे अक्सर सबसे ज़्यादा प्रेम करने वाले लोग होते हैं।
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