सुबह की उनींदी रोशनी में
जब पलकों पर अधूरा सपना ठहरा था,
एक हाथ बढ़ा
नरम अहसास की तलाश में,
पर वहाँ…
सिर्फ खालीपन था।
तकिए में अब भी बसी थी
उसकी गंध,
जैसे स्मृतियाँ शरीर छोड़ती नहीं,
बस आत्मा में उतर जाती हैं।
कमरे की दीवारें चुप थीं,
दरवाज़े बंद,
और सन्नाटा
मानो किसी तूफ़ान के बाद का
भयावह विराम।
वह मिली
ज़मीन से सिमटी हुई,
पन्नों के बीच खोई नहीं,
बल्कि पन्नों से बाहर
अपने ही जीवन का अर्थ खोजती हुई।
आँखों में डर था,
और डर में एक गहरी थकान
जैसे बहुत पहले हार मान चुकी हो।
वह आया
धीरे, स्थिर,
पर भीतर उफनता हुआ समुद्र,
जिसकी लहरें
किनारों को नहीं,
आत्माओं को तोड़ती हैं।
उसने कहा
“जो पढ़ा है, भूल जाओ।”
जैसे स्मृति कोई किताब हो,
और दर्द कोई पंक्ति,
जिसे मिटाया जा सके।
पर कुछ सच ऐसे होते हैं
जो खून में उतरते हैं,
और फिर…
हर धड़कन में दोहराए जाते हैं।
वह चीख नहीं सकी,
बस चुप रही
क्योंकि कभी-कभी आवाज़
सबसे पहले मरती है।
समय बीता
घंटों, दिनों, या शायद वर्षों में,
जहाँ हर स्पर्श
प्यार नहीं,
बल्कि एक युद्ध था
जिसमें एक जीतता रहा,
और एक मिटता रहा।
उसका शरीर
नीले निशानों का नक्शा,
उसकी आत्मा
टूटे हुए आईने का टुकड़ा,
जिसमें हर प्रतिबिंब
खुद को पहचानने से इंकार करता था।
फिर भी…
वह जिंदा थी।
क्यों?
क्योंकि मरना आसान नहीं होता,
जब दिल किसी और की कैद में हो।
रातें गुजरती रहीं,
और हर रात
एक नई हार,
एक नई आदत बनती गई।
वह कहती
“मुझे साथ ले चलो।”
और जवाब आता
“तू सिर्फ एक चाहत है,
ज़रूरत नहीं।”
पर वह जानती थी
वह पानी है,
और पानी को ठुकराया नहीं जाता,
बस देर से समझा जाता है।
उसकी आँखों में
अब आँसू नहीं,
बस एक गहरा सवाल था
“क्या मैं कभी काफी थी?”
और कहीं भीतर
एक टूटती हुई आवाज़ फुसफुसाती
“नहीं।”
पर प्रेम अजीब होता है,
वह तर्क नहीं सुनता,
बस बंधन चुनता है।
वह टूटती रही,
फिर भी उसी की ओर भागती रही,
जैसे पतंगा
आग को अपना घर समझ ले।
और वह
जो खुद को मजबूत समझता था,
दरअसल डरता था
कहीं वह सच में ज़रूरत बन न जाए।
सुबह फिर आई,
पर इस बार रोशनी में
कोई उम्मीद नहीं थी।
बस एक साल पुरानी याद
और एक सच्चाई
कि कुछ रिश्ते
शुरू ही होते हैं
खत्म होने के लिए।
फिर भी…
धड़कनें चलती रहीं।
क्योंकि दिल
अवज्ञाकारी होता है,
वह टूटकर भी
धड़कना नहीं छोड़ता।
यह प्रेम नहीं था
यह एक कैद थी,
जहाँ चाबी भी उसी के पास थी
और कैदी भी वही था।
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