सोचो ज़रा गहराई से—
यह सेब, यह केले, यह मिठाइयाँ – किसने बनाए?
क्या तुमने बनाए?
नहीं! यह सब तो उसी परमात्मा की देन है।
और फिर तुम इन्हीं को उसकी मूर्ति के सामने रखकर कहते हो –
“भगवान, इसे स्वीकार करो।”
क्या यह मज़ाक नहीं है?
जैसे कोई तुम्हारे घर आए, तुम्हारा ही दिया हुआ सामान उठाए और फिर तुम्हें ही वापस करके कहे—“यह लो, मेरी तरफ़ से भेंट!”
क्या यह मज़ाकिया नहीं है?
क्या यह पागलपन नहीं है?
“परमात्मा को तुम्हारे मिठाई, कपड़े और फल चाहिए क्या?” ✨
कभी सोचा है?
तुम मंदिर में जाते हो, या घर में कोई पूजा करते हो।
थाली सजाते हो – सेब, केला, मिठाइयाँ, रंग-बिरंगे कपड़े, चमकते दीपक, अगरबत्ती, रुद्राक्ष, और न जाने क्या-क्या।
लेकिन सवाल यह है कि—
परमात्मा को तुम्हारे इन उपहारों की ज़रूरत है क्या?
क्या सचमुच उसे लड्डू चाहिए?
क्या वह रसगुल्ले खाता है?
क्या उसके लिए केले, सेब, नारियल और कपड़े काम आते हैं?
क्या उसने यह ब्रह्मांड बनाकर सोचा होगा कि "चलो, अब देखता हूँ कौन मुझे मिठाई खिलाता है!"
⚡ यह धोखा है – और यह धोखा किसी और से नहीं, खुद से है।
तुम खुद को बहला रहे हो।
तुम्हें लगता है कि जितना महंगा प्रसाद, उतनी जल्दी आशीर्वाद।
जितना सुंदर वस्त्र चढ़ाओगे, उतनी जल्दी भगवान तुम्हारी सुनेंगे।
तुम सोचते हो भगवान का भी कोई “रेट कार्ड” है।
लेकिन सच्चाई यह है—
तुम्हारे भगवान को कुछ नहीं चाहिए।
यह सब तुम्हारी अपनी ही भूख है –
तुम्हारी मानसिक भूख, दिखावे की भूख, व्यापार की भूख, अहंकार की भूख।
“तुम्हारा परमात्मा तुम्हारे मंदिर में बंद नहीं है।
वह तो पक्षी की उड़ान में है,
वह तो सूरज की पहली किरण में है,
वह तो उस गरीब के भूखे पेट में है
जिसे तुमने कल मंदिर जाते वक्त देखा और नजरें फेर लीं।”
🍬 परमात्मा के संसार में, परमात्मा को भेंट!
⚔ असली धोखा कहाँ है?
धोखा यह है कि तुमने खुद को असली भेंट देना भूल गए हो।
तुम्हारे कपड़े, तुम्हारी मिठाइयाँ, तुम्हारे फल – यह सब खरीदा हुआ है।
लेकिन तुम खुद?
तुम्हारी चेतना, तुम्हारा हृदय, तुम्हारा मौन, तुम्हारी प्रार्थना –
तुम्हारा प्रेम 🧡💜🩷
वह कहाँ है?
वह तुम परमात्मा के चरणों में क्यों नहीं रखते?
“मंदिर में फूल चढ़ाने से ज़्यादा आसान है,
अपने भीतर की गंदगी साफ करना बहुत कठिन है।
लेकिन आदमी कठिन रास्ते पर क्यों जाए?
उससे आसान है कि एक नारियल फोड़ दो,
थोड़ा दूध गिरा दो,
और समझ लो कि भगवान खुश हो गए।”
💡 असली संदेश समाज के लिए
आज ज़रूरत है कि हम इस झूठे लेन-देन से बाहर आएं।
परमात्मा को खुश करने का कोई सौदा नहीं है।
न कोई मिठाई, न कोई वस्त्र, न कोई दीपक –
बल्कि सच्चा दीपक तो तुम्हारे भीतर का दीपक है।
अगर उसे जलाना सीख गए,
तो परमात्मा को कहीं बाहर खोजने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
किसी भूखे को खाना खिला दो, वही सच्चा प्रसाद है।
किसी रोते हुए को हंसी दे दो, वही असली आरती है।
किसी पीड़ित की मदद कर दो, वही असली पूजा है।
🔥 कटाक्ष
आज के धर्म का व्यापार यह है कि –
भगवान को भी तुम्हारे जैसी ही भूख लगी है।
उसे भी मिठाई चाहिए,
उसे भी कपड़े चाहिए,
उसे भी पैसा चाहिए।
और तुम भूल गए कि—
जिस परमात्मा ने आकाश बनाया, धरती बनाई, सूरज-चाँद बनाए,
क्या उसे तुम्हारे लड्डू की भूख होगी?
यह सब तुम्हारा धोखा है।
धोखा मंदिरों का है,
धोखा पुजारियों का है,
और सबसे बड़ा धोखा तुम्हारे अहंकार का है—
जो सोचता है कि मैं कुछ चढ़ाऊँगा और परमात्मा मेरे अनुकूल हो जाएगा।
🌌 निष्कर्ष
परमात्मा को कुछ नहीं चाहिए।
ना तुम्हारी मिठाइयाँ,
ना तुम्हारे कपड़े,
ना तुम्हारे दीपक।
परमात्मा केवल तुम्हें चाहता है—
तुम्हारा सच्चा हृदय,
तुम्हारा मौन,
तुम्हारी प्रामाणिकता।
बाकी सब धोखा है – और वह भी खुद के साथ।
👉 तो अगली बार जब पूजा करो,
फल, मिठाई और वस्त्र ले जाने से पहले यह पूछो—
क्या सचमुच परमात्मा इससे खुश होंगे?
या यह सब केवल मेरा ही धोखा है?
आपके अंदर बैठे परमात्मा को मेरा नमस्कार
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